हाईकोर्ट ने पति के छोड़ने के बावजूद ससुराल में रहने के लिए महिला को सराहा, आदर्श पत्नी बताया

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने तलाक़ के एक मामले में पत्नी को छोड़ देने वाले पति को राहत देने से इनकार किया, और पुरुष के परिजनों के साथ रह रही पत्नी की सराहना करते हुए कहा कि महिला ने अपने कष्ट को सहानुभूति के लिए इस्तेमाल नहीं किया और 'आदर्श पत्नी के धर्म का पालन करती रहीं.'

अदालत ने यह भी कहा कि महिला ने 'अकेले रहने पर भी मंगलसूत्र, सिंदूर या विवाह के प्रतीकों को नहीं त्यागा, क्योंकि उनके लिए विवाह कोई अनुबंध नहीं, बल्कि एक अमिट संस्कार है.' (प्रतीकात्मक फोटो: द वायर)

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने तलाक के एक मामले में पति को राहत देने से इनकार करते हुए पत्नी की सराहना की और कहा कि ‘पति द्वारा त्याग दिए जाने’ के बावजूद महिला ने अपना ससुराल नहीं छोड़ा और वह ‘पत्नी धर्म का पालन करती रही.’

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस विनोद कुमार द्विवेदी की पीठ पति द्वारा निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें अदालत ने उन्हें तलाक देने से इनकार कर दिया गया था.

न्यायालय ने कहा कि ‘हिंदू अवधारणा के अनुसार, विवाह एक पवित्र, शाश्वत और अटूट बंधन है. एक आदर्श भारतीय पत्नी, अपने पति द्वारा त्याग दिए जाने पर भी शक्ति, गरिमा और सदाचार का प्रतीक बनी रहती है.’

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि इस मामले में पत्नी का आचरण ‘धर्म, सांस्कृतिक मूल्यों और वैवाहिक बंधन की पवित्रता पर आधारित’ था.

पीठ के मुताबिक, पति के छोड़ देने की तकलीफ के बाद भी पत्नी अपने धर्म पर अड़ी रहीं. कड़वाहट और निराशा में उन्होंने अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी को कम नहीं होने दिया. वह न तो अपने पति की वापसी की भीख मांगती हैं, न ही उन्हें बदनाम करती हैं. बल्कि अपने शांत धैर्य और नेक आचरण को अपनी ताकत बनाती हैं. साथ ही उन्होंने कोशिश की कि उनके किसी कृत्य से ससुराल या मायके पर कोई दाग न लगे.

अदालत ने आगे कहा, ‘वह उनकी देखभाल और स्नेह से सेवा कर रही हैं, जैसे वह अपने पति की उपस्थिति में करतीं, जिससे उनका नैतिक स्तर मज़बूत होता है. वह अपने कष्टों का उपयोग सहानुभूति पाने के लिए नहीं करती, बल्कि उसने दुख को अलग दिशा में मोड़ा, जो नारी के हिंदू आदर्श को दर्शाता है….’

अदालत ने ये भी कहा कि ‘अकेले रहने पर भी उन्होंने मंगलसूत्र, सिंदूर या अपनी वैवाहिक स्थिति के प्रतीकों को नहीं त्यागा, क्योंकि उनके लिए विवाह कोई अनुबंध नहीं, बल्कि एक संस्कार है – एक अमिट संस्कार.’

अदालत ने कहा, ‘पत्नी ने अपने दृढ़ निश्चय और चरित्र का परिचय दिया है, जो एक सामान्य भारतीय महिला/पत्नी में होता है.’ साथ ही यह पति ही है, ‘जिसने पत्नी को त्यागकर, उसके साथ क्रूरता की है.’

अदालत ने इस मामले को एक ऐसा मामला बताया, जो एक सामान्य भारतीय महिला की पत्नी की वफादारी को दर्शाता है, जो अपने पारिवारिक जीवन को बचाने के लिए अपना पूरा प्रयास करती है.