पंजाब विश्वविद्यालय: गर्ल्स हॉस्टल से बाहर जाने के लिए अब अभिभावक की अनुमति अनिवार्य

पंजाब विश्वविद्यालय के छात्रावास में रहने वाली छात्राओं के लिए जारी नए ‘घोषणा पत्र’ के तहत एक फ़ॉर्म में अभिभावकों से यह घोषित करने को कहा जा रहा है कि वे अपनी बेटी को ‘दिन या रात में कभी भी’ हॉस्टल से बाहर जाने की अनुमति देते हैं या नहीं.' छात्र संगठनों ने इसका विरोध किया है.

अभिभावकों से यह लिखवाया जा रहा है कि वे अपनी बेटी को ‘दिन या रात में कभी भी’ हॉस्टल से बाहर जाने की अनुमति देते हैं या नहीं. (फोटो साभार: फेसबुक/पिंजरा तोड़)

नई दिल्ली: पंजाब विश्वविद्यालय के छात्रावास में रहने वाली छात्राओं के लिए नए नियम को लाया गए है. एक नए ‘घोषणा पत्र’ को लेकर आरोप लग रहा है कि यह फॉर्म साल 2018 के ऐतिहासिक 48 दिन लंबे आंदोलन के बाद हासिल किसी भी समय आने-जाने के अधिकार को कमजोर करता है.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस फ़ॉर्म में अभिभावकों से यह लिखवाया जा रहा है कि वे अपनी बेटी को ‘दिन या रात में कभी भी’ हॉस्टल से बाहर जाने की अनुमति देते हैं या नहीं. साथ ही, यह भी अधिकृत किया जा रहा है कि अगर छात्रा रात भर हॉस्टल से बाहर रहती है या बार-बार आधी रात के बाद लौटती है तो विश्वविद्यालय अभिभावकों को इसकी सूचना देगा.

छात्र संगठनों ने इस कदम का कड़ा विरोध किया है. उनका कहना है कि यह कदम फिर से पाबंदियां लागू करता है और साल 2018 में हासिल मोबिलिटी या आने-जाने के समान अधिकार को कमजोर करता है.

छात्रों को यह बात भी खल रही है कि फ़ॉर्म में दिन के समय का ज़िक्र भी है, जिससे आशंका है कि अब सामान्य दिन के समय में बाहर निकलने की गतिविधियां भी निगरानी के दायरे में आ जाएंगी.

बताया जा रहा है कि यह फ़ॉर्म पिछले साल एमएससी की एक छात्रा की बाहर घूमने के दौरान मौत हो जाने के मद्देनजर लाया गया था. छात्रा के माता-पिता ने बाद में विश्वविद्यालय को बताया था कि उन्हें यह नहीं पता था कि वह अक्सर रात में हॉस्टल से बाहर जाती है और यह भी नहीं पता था कि हॉस्टल में किसी भी समय प्रवेश की अनुमति है.

प्रशासन का कहना है कि इसके बाद कई अभिभावक ऐसे ही सवाल और चिंताएं विश्वविद्यालय के समक्ष उठाने लगे. 

पंजाब विश्वविद्यालय के डीन स्टूडेंट्स वेलफ़ेयर प्रोफेसर अमित चौहान ने कहा, ‘यह फ़ॉर्म परिवारों को आश्वस्त करने और छात्राओं की स्वतंत्रता बरकरार रखने के बीच का संतुलित रास्ता है. अधिकांश अभिभावकों को 24×7 एंट्री से आपत्ति नहीं है, लेकिन वे चाहते हैं कि अगर बच्चा पूरी रात या बार-बार आधी रात के बाद बाहर रहता है तो उन्हें जानकारी दी जाए. यह निगरानी नहीं बल्कि पारदर्शिता और विश्वविद्यालय, छात्राओं व परिवार के बीच आपसी समझ बनाने की कोशिश है.’

वहीं, छात्र संगठनों का कहना है कि यह अधिकार छात्राओं का है, अभिभावकों का नहीं. एक छात्रा ने कहा, ‘विश्वविद्यालय को ऐसे फ़ॉर्म थोपने के बजाय अभिभावकों को साफ़-साफ़ बताना चाहिए कि 24×7 एंट्री एक हक़ीक़त है और यह अधिकार उनकी मंज़ूरी से परे है.’

छात्राओं का मानना है कि यह ‘सहमति’ के नाम पर संस्थागत नियंत्रण की वापसी है, जो धीरे-धीरे उस आज़ादी को खत्म करती है जिसके लिए उन्होंने संघर्ष किया था.