आम चुनावों को लेकर यह धारणा बहुत व्यापक है कि वे निष्पक्षता और सम्यक् भाव से नहीं होते और तरह-तरह की धांधलियां होती रहती हैं. पिछले एक दशक में यह धारणा कई तरह से पुष्ट होती रही है: छोटी-मोटी धांधलियां पकड़ी जाती हैं पर ज़्यादा व्यापक बच-बचा ली जाती हैं.
इस धारणा के साथ यह प्रभाव भी व्यापक है कि हमारा चुनाव आयोग अब निष्पक्ष नहीं है- उसकी अनेक कार्रवाइयां और निर्णय, व्यवस्था और संचालन सत्ता पक्ष के पक्ष में झुके होते हैं; उसकी विपक्षी दलों के प्रति दृष्टि बेहद पूर्वग्रस्त है, कई बार तो यह तक लग सकता है कि चुनाव संचालित करने के बजाय आयोग स्वयं ही चुनाव लड़ रहा है. यह सब करने में उसे कोई संकोच नहीं होता. वह एक ओर संवैधानिक संस्था है जो सत्ताभक्त, पक्षधर और पालतू हो गई है.
पिछले सप्ताह लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता ने चुनाव आयोग द्वारा दिए गए डेटा का कई महीनों के सघन विश्लेषण के बाद यह सचाई सप्रमाण साबित की कि देश के संसदीय चुनाव के दौरान बेंगलुरु के एक विधानसभा क्षेत्र में एक लाख से अधिक वोटों की चोरी की गई है. यह विश्लेषण और उसके प्रमाण सार्वजनिक रूप से सबके सामने रखे गए.
होना तो यह चाहिए था कि चुनाव आयोग इसको संज्ञान में लेकर खुद जांच करना शुरू कर देता. लेकिन उसने, ऐसा करने के बजाय, प्रतिपक्ष नेता से यह सब हलफ़नामा देकर उसके सामने रखने को कहा. अजब मज़ाक है कि जो सबके सामने है, सारे देश के सामने है वह आयोग, प्रक्रियात्मक कुटेव का सहारा लेकर, अपने सामने नहीं मानता.
और तो और, आयोग ने यह तक कहा कि अगर नेता हलफ़नामा नहीं देते हैं तो उन्हें देश से क्षमा मांगनी चाहिए.
यह अद्भुत संवैधानिक सीनाज़ोरी है कि जिसे खुद क्षमा मांगना चाहिए पूरे देश से, वह चोरी सामने लाने वाले से क्षमा मांगने की गुस्ताख़ी कर रहा है. आयोग को यह याद भी नहीं रह गया अपनी सत्ताभक्ति में कि भारत में लोकसभा का प्रतिपक्ष लगभग 60 प्रतिशत वोट पाकर (जो सत्तारूढ़ दलों को मिले 40 प्रतिशत से डेढ़ गुना है) प्रतिनिधित्व करता है और उसकी ऐसी हेकड़ी के साथ अवमानना या उपेक्षा करना लोकतंत्र के हनन के बराबर है.
आयोग को यह भी याद नहीं रह गया है कि वह सत्ता द्वारा नियुक्त भले किया जाता है, है तो वह जनता और संविधान का प्रतिनिधि. वह नियमों के उलझाव का सहारा लेकर संविधान की आत्मा को भूलने का प्रयत्न कर रहा है.
उधर बिहार में गहन जांच सर्वेक्षण में पचास से अधिक लाख लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने के आसार है: सर्वेक्षण के दौरान भी तरह-तरह की चोरियां सामने आई हैं, आ रही हैं. लगता है कि आयोग ने हर वैध मतदाता वोट दे सके उसको सुरक्षित करने के अपने बुनियादी नैतिक और क़ानूनी कर्तव्य से विरत होकर लाखों मतदाताओं को वोट देने से वंचित करने का एक दुष्ट अभियान चला रखा है. सौभाग्य से यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के सामने था और उसने अब आयोग को डेटा सार्वजनिक करने का निर्देश दिया है.
यह हिसाब में लेना चाहिए कि इस मुक़ाम पर जब चुनाव आयोग, एक तरह से, सारे देश और जनता के सामने कठघरे में खड़ा किया जा चुका है; अपना बचाव वह खुद नहीं कर रहा है बल्कि सत्ता पक्ष कर रहा है. भले उसको इसकी ख़बर नहीं है, यह भारत के चुनाव आयोग के पतन का सबसे नीचा मुक़ाम है.
उसकी विश्वसनीयता और प्रामाणिकता पर, उसकी निष्पक्षता पर गहरा संकट मंडरा रहा है, वह सवालों के घेरे में है और उसे अपने को बचाने के लिए सत्ता से बेशर्म समर्थन लेना पड़ रहा है. जब भारतीय लोकतंत्र के पतन की गाथा लिखी जाएगी तो उसमें आयोग की गर्हित भूमिका की कथा भी शामिल होगी.
स्वतंत्रता सांसत में
भारत को स्वतंत्र हुए इस सप्ताह 78 वर्ष हो गए. इस अवसर पर हम अगर कुछ लेखा-जोखा करें तो कहना होगा कि हमने अपनी स्वतंत्रता और अपना लोकतंत्र दोनों को क़ायम रखा है, पर दोनों ही इधर लगातार संकट में हैं. दोनों में प्रायः हर दिन कटौती होती रहती है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इधर लगभग अपराध बना दिया गया है.
ताज़ा उदाहरण है जम्मू-कश्मीर में कुछ पुस्तकों पर प्रतिबंध. सूचना क्रांति और संचार क्रांति के इस युग में एक ठिठक-दिमाग़ राज्य को यह लगता है कि प्रतिबंधित करने से वे पुस्तकें अब पढ़ी नहीं जाएंगी. होगा यह कि लोग इन प्रतिबंधित पुस्तकों को खोज-खोज कर पढ़ेंगे जो शायद अन्यथा न पढ़ते. दूसरे, उस राज्य को छोड़कर भारत के बाकी हिस्सों में वे पुस्तकें मिलती और पढ़ी जाती रहेंगी.
स्वतंत्रता को दबाने का हर प्रयत्न विफल होने को अभिशप्त है क्योंकि स्वतंत्रता की ललक अब हर भारतीय में जैविक ललक की तरह है. लोकतंत्र में कटौती करने के अभियान में सत्तापक्ष, संवैधानिक संस्थान, दुर्भाग्य से, शामिल हैं. उसे चांपने की कोशिशें रोज़ाना होती रहती हैं. लोकतांत्रिक ढंग से और उसका लाभ उठाकर जो शक्तियां सत्तारूढ़ होती हैं वे ही उसमें कटौती का अभियान चलाती हैं.
कृतघ्न दुष्टता का इससे बेहतर प्रमाण मिलना, हमारे समय में, मुश्किल है. यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले लगभग 80 बरसों में भारत में जो भी प्रगति हुई है वह, बहुत हद तक, स्वतंत्रता और लोकतंत्र के कारण,उनके द्वारा उपलब्ध कराए गए अवसरों, सुविधाओं, साधनों आदि के कारण हुई है. हम समता की ओर भी बढ़े हैं और वंचित वर्गों की सत्ता में भागीदारी भी बढ़ी है. बहुत कुछ और बेहतर हो सकता था. पर जितना हुआ है वह कम नहीं है.
जो हालात इस समय हैं उनसे लगता है कि अब लोकतंत्र सत्ता और सरकार से हटकर अब जनता के पास ही बच पायेगा. विपर्यास होगा कि सत्ता और स्वेच्छाचारी और संकीर्ण होगी, जनता स्वतंत्र-उदार और लोकतांत्रिक. जनता समता और न्याय चाहेगी, राज्य विषमता और अत्याचार से चलेगा. यह एक तरह की अराजकता होगी पर उससे गुज़रे बिना राज्य को अटल रूप से लोकतांत्रिक बनने पर मजबूर करना संभव नहीं होगा.
यह एक बूढ़े लेखक का दुस्स्वप्न या दिवास्वप्न हो सकता है पर, जो भी हो, स्वप्न तो है ही. हमें स्वप्न देखना नहीं छोड़ना चाहिए. वह कभी सच नहीं होता जिसका पहले स्वप्न न देखा गया हो!
अलिखित कविता भर जीवन
सदियों से कितनी ही कोशिश क्यों न हो रही हो, जीवन कविता से अधिक विपुल-जटिल, अधिक व्याप्त-विशाल रहा है: वह ‘अलिखित कविता भर जीवन’ रहा आया है. यह शब्द-समुच्चय मैंने युवा कवि वसु गंधर्व के हाल में प्रकाशित पहले कविता संग्रह ‘वीतराग’ से लिया है जिसे सेतु प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.
हमारे स्मृतिहीन समय में कविता में भी विस्मृति व्याप गई है. वसु की कविता इस प्रवृत्ति का अपवाद है. उसमें ‘स्मृतियों का अपना गल्प’ सहेजने का जतन है. उनके यहां अनंत, शाश्वत, प्राचीन, उद्गम, प्रागैतिहासिक नींद, निराकार पतझर, निर्लिप्त तन्मयता, उंगलियों की प्राचीन उष्णता जैसे शब्द और अभिव्यक्तियां उनकी कविताओं को स्मृति की मोहक आभा देते हैं.
वे सब घटते हैं ऐसे कविता-संसार में जिनमें चश्मा, चेहरा, ख़ाली जगहें, थकना, धीमापन, धूप-बारिश, विदा, पीड़ा, भाई, मां, पितामह, सोना, ढूंढना, पानी, शोक, गोश्त, बक्सा, नींद, दीमक, नीलाम्बरी बीज, कमीज़, धूल आदि सब हैं जो उसे विपुल बनाते हैं.
यह ऐसी कविता है जिसमें संग-साथ और निस्संगता दोनों हैं. भाषा की चमक इन कविताओं की असली चमक है.
कुछ अंश देखिये:
तो हमारी प्रतीक्षारत कायाएं अंधेरा ढलते किवाड़ खटखटायेंगी
मृत्यु के सिरहाने टिका होगा अकेले दीये को बालता हाथ
जीवन के निरर्थक, निःप्रसंग लेन-देन के कोहरे से
अचानक झांकता कभी दिखेगा धूप का एक टुकड़ा.
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इस आश्वासन के साथ भूलना चीज़ों को
कि समय रहते भूलना चीज़ों को
कि समय रहते भूलना
याद रखने से कितना बड़ा और ज़रूरी है
कितना शाश्वत है
कि पृथ्वी सिखाती है त्यागना
बटोरने से अधिक
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ढलते दिनों के शोर में
अकेलेपन में कुत्तों की टेढ़ी दुम के छल्ले में
अपनी आवाज़ में सांप की देह भर गोलाकार के निराकार में
बोलते हैं अंधेरे दरवाज़े से टकराती हवा गिर जाती है बचपन के
खोखल में जहां एक दांत गड़ा होता है नर्म मिट्टी की कोख में
और धुआंती राख पर गोश्त के टुकड़ों की तरह सिंकती रहती है
आंखों पर जमी पपड़ियां
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वसु जो हो रहा है उसके प्रति भी चौकन्ने हैं:
विवर्ण इस अंधकार में बोलो
जिसमें कट गए हसदेव के वृक्ष
वृक्षों के साथ कटते लोगों की पीड़ा को
मेरी देह में आकर बोलो
अंत का मर्म भी वसु पहचानते हैं:
पता नहीं धूसर विवरणों और उदास चन्द्रमाओं की कौन-सी
कथा बुदबुदाकर पितामह से मुंह में लिया होगा अंतिम कौर
पता नहीं उनके तलुवे की घिसट में
सीने के आहिस्ता डोलने में कितना था स्याह रंग
कितनी आ पायी थी मृत्यु की छाया
आइने में प्रतिबिंबित दिखा था अपना ही मुख या कुछ और
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
