नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (19 अगस्त) को पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य द्वारा दायर पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें शीर्ष अदालत के 3 अप्रैल के फैसले को चुनौती दी गई थी. इस फैसले में पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग (डब्ल्यूबीएसएससी) द्वारा 2016 में की गई 25,000 नियुक्तियों को एकमुश्त रद्द करने के फैसले को बरकरार रखा गया था.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि पुनर्विचार याचिकाएं गुण-दोष के आधार पर पुनर्विचार के लिए विचारणीय नहीं हैं और इन पर विचार नहीं किया जा सकता क्योंकि सभी प्रासंगिक पहलुओं की पहले ही व्यापक रूप से जांच और विचार किया जा चुका है.
पीठ ने कहा, ‘3 अप्रैल, 2025 का फैसला व्यापक और गहन दलीलें सुनने और सभी तथ्यात्मक और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद पारित किया गया था.’
इसने दोहराया कि जस्टिस (सेवानिवृत्त) बैग समिति, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की जांच और सेवा आयोग तथा पश्चिम बंगाल माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा प्रवेश संबंधी निष्कर्षों ने ‘चयन प्रक्रिया में अनियमितताओं’ और ‘खामियों को छिपाने’ के प्रयासों को स्थापित किया है.
अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि डब्ल्यूबीएसएससी द्वारा मूल ओएमआर शीट या यहां तक कि उनकी प्रतियों को संरक्षित करने में विफलता ‘एक महत्वपूर्ण कारक’ थी, जो इसके खिलाफ थी, जिससे उम्मीदवारों की योग्यता का सत्यापन ‘असंभव नहीं तो और अधिक कठिन’ हो गया. अनियमितताओं को छिपाने के प्रयास ने पीठ को आश्वस्त किया कि 2016 की पूरी भर्ती प्रक्रिया ही ख़तरे में पड़ गई थी, जिससे ‘प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखने’ के लिए इसे अमान्य करना ही एकमात्र रास्ता बचा था.
यह स्वीकार करते हुए कि बेदाग नियुक्तियों को भी रद्द करने से ‘नाराज़गी और पीड़ा’ होगी, अदालत ने कहा कि चयन प्रक्रिया की शुचिता की रक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. सभी पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज करते हुए आदेश में कहा गया, ‘संबंधित अधिकारियों, जो इस पूरे विवाद के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार थे… के खिलाफ की गई प्रतिकूल टिप्पणियां पूरी तरह से उचित और न्यायोचित थीं.’
ज्ञात हो कि 3 अप्रैल को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की खंडपीठ ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस निर्देश को बरकरार रखा था जिसमें कक्षा 9 से 12 तक के सहायक शिक्षकों और सरकारी व सहायता प्राप्त स्कूलों में गैर-शिक्षण कर्मचारियों की 2016 की पूरी भर्ती प्रक्रिया को अमान्य करार दिया गया था.
गौरतलब है कि इस घोटाले ने बंगाल को हिलाकर रख दिया था, जिसमें गलत तरीके से चुने गए उम्मीदवारों ने सुनवाई के लिए महीनों तक विरोध प्रदर्शन किया था. इस बीच, पश्चिम बंगाल एसएससी ने दावा किया था कि उसने परीक्षा के एक साल बाद मूल ओएमआर या उत्तर पुस्तिकाओं को नष्ट कर दिया था.
इन भर्तियों में अनियमितता, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के आरोप लगे थे और इसकी शिकायतें कलकत्ता हाईकोर्ट को मिली थी. इसके बाद हाईकोर्ट ने सीबीआई को जांच के आदेश दिए थे, जिसने राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी, उनकी करीबी अर्पिता मुखर्जी और कुछ अन्य अधिकारियों को गिरफ्तार किया था.
सीबीआई ने पश्चिम बंगाल एसएससी और स्कैनिंग और मूल्यांकन का काम करने वाली एक निजी फर्म के कर्मचारी के साथ ओएमआर शीट की सॉफ्ट कॉपी को बेमेल पाया था.
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सीबीआई की 300 पन्नों की रिपोर्ट पर विचार किया था और 17 मुद्दों पर प्रकाश डाला था. जस्टिस देबांगसु बसाक और मोहम्मद शब्बर रशीदी की पीठ ने कहा था कि एसएससी ने जानबूझकर सबूत नष्ट कर दिए थे और गुप्त रूप से ओएमआर शीट की स्कैनिंग का काम एनवाईएसए नामक कंपनी को सौंप दिया था, जिसने फिर यही काम दूसरी कंपनी स्कैनटेक को सौंप दिया था.
