मनमानी, धौंस, व्यापारिक बंदिशें, सीनाज़ोरी: अंतरराष्ट्रीय संवाद के नए मुहावरे

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक तरह की अराजकता फैल रही है और सारा राजनय बेहद दबाव में है. अनैतिक आचरण अब खुलेआम हो रहा है और लोग लाचार देख रहे हैं. यह अनैतिकता और जुर्रत पूंजी-बाज़ार-मीडिया-राजनीति के महागठबंधन का परिणाम है.

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गाज़ा और यूक्रेन में दो बरस से अधिक समय से युद्ध चल रहे हैं. दोनों ही मामलों में अमेरिका बेहद पक्षपात से काम ले रहा है और आक्रांताओं को आक्रमण करने, विजय पाने और लूट लेने का लाभ मिले, इसे सुनिश्चित करने का प्रयत्न कर रहा है. (इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

यों तो कोई भी समय ऐसा नहीं हुआ है जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रों ने नैतिक रूप से आचरण किया हो. लेकिन अगर हम इस बात को ध्यान में रखें कि मनुष्यता का जैसे-जैसे विकास होता गया है, उसमें यह विवेक बढ़ता-गहराता गया है कि शांति, सद्भाव और परस्परता न सिर्फ़ वांछनीय आदर्श हैं बल्कि उन्हें अब प्राप्त किया जा सकता है. आपसी संवाद, आदान-प्रदान, संचार और यातायात के माध्यम इतने व्यापक और सक्षम हो गए हैं कि परस्पर समझ और साझेदारी हर स्तर पर बढ़ सकती है, बढ़ी ही है.

पर विडंबना यह है कि दूसरे महायुद्ध के बाद शांति और सहयोग बढ़ाने के जो संस्थागत प्रयत्न हुए थे और जिन्होंने, शीत महायुद्ध के बावजूद, काफ़ी हद तक शांति बनाए रखने में सफलता पाई थी, वे सभी आज निष्प्राण और निर्बल हैं. उनकी कोई आवाज़ सुननेवाला नहीं है. अमेरिका, रूस जैसे बड़े और शक्तिशाली राष्ट्रों के अलावा चीन, इज़रायल आदि कई देश नई युयुत्सा से उत्तेजित और प्रेरित होकर या तो युद्धरत हैं या युद्ध करने को उतारू हैं. मनमानी, धौंस, व्यापारिक बंदिशें, सीनाज़ोरी आदि अंतरराष्ट्रीय संवाद के नए मुहावरे हैं.

गाज़ा और यूक्रेन में दो युद्ध चलते दो बरस से ज़्यादा हो चुके हैं. गाज़ा में इज़रायल ने जो जनसंहार किया है वह दूसरे महायुद्ध की नात्सी क्रूरता को भी पार कर गया लगता है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, संयुक्त राष्ट्र संघ, यूरोपियन यूनियन, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय आदि इज़रायल को हज़ारों बच्चे, स्त्रियों, पत्रकारों आदि को मारने, अस्पतालों-राहत शिविरों-दवाइयां और भोजन बांटने वाली जगहों को नष्ट करने से रोक नहीं पाए हैं.

इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू बहुत गर्वोन्मत्त हत्यारे हैं, जिनके मनुष्यविरोधी कार्यों के लिए, उन्हें संसार के हर देश में जाने पर गिरफ़्तार किया जाना और सज़ा दी जानी चाहिए. पर ऐसा करने को कोई तैयार नहीं; सिर्फ़ न्यूयॉर्क सिटी मेयर पद के उम्मीदवार ज़ोहरान ममदानी ने ऐसी करने की दुस्साहसिक घोषणा की है. फिलहाल हर दिन गाज़ा में फिलिस्तीनी मारे जा रहे हैं.

उधर यूक्रेन पर रूसी हमला बदस्तूर चल रहा है. उसका कोई हल निकल आएगा ऐसी उम्मीद रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बीच हुई अलास्का वार्ता से की जा रही थी. पर तीन घंटे की वार्ता के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला. सूत्रों से जो ख़बरें आई हैं वे बताती हैं कि रूसी अपनी मांगों पर अड़ा हुआ है जो यूक्रेन की प्रभुसत्ता के विरुद्ध हैं.

दोनों ही युद्धों के मामले में अमेरिका बेहद पक्षपात से काम ले रहा है और आक्रांताओं को आक्रमण करने, विजय पाने और लूट लेने का लाभ मिले इसे सुनिश्चित करने का प्रयत्न कर रहा है. भारत का, इन मामलों में रुख़, बहुत ही ढुलमुल रहा है. उसने आक्रमण का विरोध नहीं किया, जल्दी ही युद्धविराम हो इसकी निराधार कामना की; अपनी ओर से कोई पहल नहीं की और इस तरह अपने को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अप्रसांगिक बना लिया.

इसका बचाव यह है कि यह राष्ट्रहित में किया गया है. वह हित किस क़दर क्षत-विक्षत हुआ यह प्रमाणित हुआ इस बात से ऑपरेशन सिंदूर के समय संसार के किसी देश ने हमारा समर्थन नहीं किया. हमारे प्रतिनिधिमंडल गए और कुछ हासिल किए बिना लौटे. यह तो स्पष्ट है कि आतंकवाद का सामान्य विरोध हमारे हित को ठोस ढंग से आगे नहीं बढ़ाता. शायद ही कोई देश होगा जो आतंकवाद के सामान्य विरोध की घोषणा पहले से न करता आया हो- वे देश भी जो आतंकवादियों को समर्थन गुपचुप देते रहे हैं.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक तरह की अराजकता फैल रही है और सारा राजनय बेहद दबाव में है. अनैतिक आचरण अब खुलेआम हो रहा है और लोग लाचार देख रहे हैं. यह अनैतिकता और जुर्रत पूंजी-बाज़ार-मीडिया-राजनीति के महागठबंधन का परिणाम है. रणनीति में नीति के फिर से प्रबल और सशक्त होने का कोई उपाय या पहल नज़र नहीं आती.

हम इक्कीसवीं सदी का कुल एक चौथाई हिस्से को पार करते हुए विश्वव्यापी नैतिक और वैचारिक शून्य और अराजकता में पहुंच और फंस गए हैं.

शोकगीत

हाल ही में अंग्रेज़ी में मुत्यु, स्मृति, विलाप और शोक की मूल अंग्रेज़ी में लिखी और अनूदित कविताओं का एक बृहद् संचयन आया है: ‘द पेंगुइन बुक ऑफ एलेजी’. लगभग साढ़े पांच सौ पृष्ठों में प्राचीन से लेकर समकालीन शोकगीत संकलित किए गए हैं. बहुत-सी परिचित कविताएं हैं तो बहुत सी अपरिचित कविताएं भी. कई कविताएं पूर्वपरिचित व्यक्तियों के लिए शोकगीत हैं पर ऐसी भी काफ़ी हैं जो कम-से-कम हमें अपरिचित व्यक्तियों के लिए लिखी गई हैं और मार्मिक हैं.

यीट्स की ही एक कविता किसी अपरिचित आयरिश व्यक्ति के लिए लिखी गई है जिसमें दो स्मरणीय पंक्तियां हैं: ‘सुंदर और भोले का कोई शत्रु नहीं/समय के सिवाय’. स्वयं यीट्स की मृत्यु पर डबल्यूएच ऑडेन की प्रसिद्ध कविता में पंक्तियां हैं: ‘तुम हमारी तरह की मूढ़मति थे… क्‍योंकि कविता से कुछ नहीं होता’.

संचयन के संपादकों एंड्रू मोशन और स्टीफ़न रेगन ने भूमिका में शुरू में ही कहा है कि कविता, सारी कविता, एक तरह से समय के विनाशकारी प्रवाह से लपक ली गई ज़िंदगी का रिकॉर्ड होती है और इसलिए सभी कविता किसी हद तक शोकमय होती है. लेकिन शोकगीत एक विशेष प्रकार की कविता-विधा है. उसकी परंपरा बहुत पुरानी है और आज तक शोकगीत लिखे जा रहे हैं.

कई बदलाव आए, निजी शोकगीतों के अलावा राजनीतिक, सामाजिक शोकगीत भी लिखे गए हैं. इन दिनों, विशेषतः अरबी और यूक्रेनियन भाषाओं में, युद्धों की विभीषिका और हिंसक छाया में शोक की जो निजी कविताएं, बहुत मर्मस्पर्शी ढंग से, लिखी जा रही हैं, वे साथ ही राजनीतिक शोकगीत भी हैं.

भारत में, मुझे लगता है, शोकगीत की परंपरा थोड़ी क्षीण रही है. यों तो मिथुनरत क्रौंचयुगल के वध के बाद आदिकवि वाल्मीकि ने शोक से पहला श्लोक रचा. एक छायावादी कवि ने लिखा कि ‘वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान…’. पर स्वयं उन्होंने कोई स्मरणीय शोकगीत नहीं लिखा. लिखा तो दूसरे कवि निराला ने ‘सरोज-स्मृति’. फिर भी आधुनिक हिंदी में मृत्यु, क्षति, विलाप, स्मृति का बोध कम या क्षीण ही है. भक्त कवियों जैसे कबीर और तुलसी दास में कालबोध प्रबल है. पर बाद में यह बोध क्षीण हुआ है.

उदाहरण के लिए हमारे एक बड़े कवि मुक्तिबोध में समयबोध तो बहुत सशक्त है पर कालबोध अनुपस्थित है. ऐसा क्यों है, इस वक्त इस मुकाम पर जाने की ज़रूरत नहीं है. इतना भर नोट किया जा सकता है कि नश्वरता का बोध हमारी कविता में कम सक्रिय है.

इस सिलसिले में निराला ही अधिक याद आते हैं. उनकी कई कविताओं में मानों एक लंबा शोकगीत बिखरा हुआ है: ‘अभी न होगा मेरा अंत’, ‘मैं अकेला, देखता हूं, आ रही मेरे दिवस की सान्‍ध्‍यवेला’. आसन्न मृत्यु को लेकर भी निराला की ही कविता याद आती है: ‘पत्रोत्‍कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है, आशा का प्रदीप जलता है…’.

मुझे पचास के दशक में शायद यक्ष्मा से दिवंगत कवि सूर्य प्रताप सिंह की एक कविता याद आती है जो उनके एकमात्र मरणोत्तर प्रकाशित संग्रह ‘आस्था’ में प्रकाशित हुई थी: ‘क्या नहीं है, फूल है बहती नदी है, हवा है. चाहता हूं बांध लूं तस्वीर तेरी वक्ष से, अभी लेकिन बोतलों में चार दिन की दवा है.’ हो सकता है यह पूरी कविता न हो. पर इतनी ही याद रह गई है. शायद इस पर सोचना चाहिए कि हमारी कविता में शोक, विलाप, नश्वरता का बोध इतना कम क्यों है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)