प्रिय द वायर हिंदी, मैं प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद से असहमत हूं…

करीब साल भर पहले प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने 'द वायर हिंदी' में 'कविता में जनतंत्र' नामक एक श्रृंखला प्रकाशित की थी. युवा लेखक विभांशु कल्ला प्रस्तावित करते हैं कि अपूर्वानंद ने भारत पर मंडराते जनतांत्रिक संकट और उसके लक्षणों की पहचान तो की, लेकिन उनके आग्रह इस संकट की उत्पत्ति और विकास को समझने में बाधा बन गये.

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'कविता में जनतंत्र' तीस से अधिक आलोचनात्मक लेखों की श्रृंखला है, जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने लिखा है. ये लेख भारत में जनतंत्र पर मंडराते ख़तरे पर केंद्रित हैं. (फोटो: द वायर)

न केवल हिंदी की मुख्यधारा की पत्रकारिता बल्कि उस मुख्यधारा को काउंटर करने के लिए बनी ‘वैकल्पिक’ पत्रकारिता में भी हिंदी के साहित्य का प्रतिनिधित्व कमजोर दिखाई पड़ता है. प्रिंट और डिजिटल मीडिया में पाठकों के बीच साहित्यिक समझ पैदा करने का कोई रुझान नहीं दिखता. परिणामस्वरूप हिंदी साहित्य अपने विशिष्ट साहित्यिक हलकों (‘साहित्यिक’ कहलाई जाने वाली पत्रिकाओं और वेबसाइट) तक सीमित है. इस तरह ‘साहित्यिक पाठक’ और ‘सामान्य पाठक’ का फ़र्क़ बरकरार है.

कम देखने को मिलता है कि खबरों को छापने वाला कोई प्लेटफॉर्म अपने यहां किसी साहित्यिक रचना को जगह दे. ऐसे में यह कल्पना मुश्किल है कि वह साहित्य आलोचना के ज़रिए वैचारिक हस्तक्षेप की कोशिश भी करेगा. इस परिदृश्य में ‘द वायर हिंदी’ द्वारा मई-जून 2024 में ‘कविता में जनतंत्र’ नाम से पूरी श्रृंखला प्रकाशित करना प्रभावित करता है. 

‘कविता में जनतंत्र’ तीस से अधिक आलोचनात्मक लेखों की श्रृंखला है, जिसे दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने लिखा है. इन लेखों का मूल विषय भारत में जनतंत्र पर मंडराते ख़तरे हैं. अपूर्वानंद कविता एवं उसकी आलोचनात्मक व्याख्या के जरिए नागरिकों को सिकुड़ते जनतंत्र के अलग-अलग आयामों पर विचार करने को आमंत्रित करते हैं.

यह ज़रूरी है. हर बदलते समय के सापेक्ष कविताओं की व्याख्या होनी चाहिए. नए संदर्भ कविताओं के अर्थ का विस्तार करते हैं, साथ ही हमें अपने समय को समझने में भी मदद करते हैं. 

इस श्रृंखला का व्यापक संदर्भ भारतीय जनतंत्र का सिकुड़ना है, लेकिन जब यह श्रृंखला प्रकाशित हो रही थी, देश में आम चुनाव हो रहे थे. इसलिए चुनावी आकांक्षाएं भी इन लेखों में अभिव्यक्त होती हैं. यहां उसी श्रृंखला के कुछ लेखों को समझने का प्रयास है.

जनतंत्र और क्रांति का ख़्याल 

इस कड़ी का एक लेख है, ‘भारतीय जनतंत्र में क्रांति का ख़्याल’ . इस लेख की मुराद धूमिल की कविता ‘श्रीकाकुलम’ की व्याख्या करते हुए, भारतीय जनतंत्र के सामने क्रांति के ख्याल को एक ख़तरे के तौर पर लक्षित करना है.

इस लेख की शुरुआत लेखक श्रीकाकुलम की कुछ पंक्तियों को उद्धृत करते हुए एक सवाल के साथ करते हैं-

एक आदमी –
दूसरे आदमी की गरदन
धड़ से अलग कर देता है

जैसे एक मिस्त्री बल्टू से
नट अलग करता है.

तुम कहते हो-यह हत्या हो रही है
मैं कहता हूं- मैकेनिज्म टूट रहा है

इसके बाद अपूर्वानंद एक प्रश्न पूछते हैं: ‘कौन सा मेकेनिज़्म टूट रहा था? क्या वह संसदीय जनतंत्र का मेकेनिज़्म था?’

इसके आगे के लेख का रिश्ता कविता के संदर्भ से टूट जाता है, और वह भारत के राजनीतिक इतिहास की शासक-पक्षीय व्याख्या के ज़रिए ‘संसदीय लोकतंत्र के आदर्श’ बनाम ‘क्रांति के ख़्याल’ की एक बाइनरी रचता है.

इस बाइनरी को स्थापित करने के लिए लेख में प्रतीकों का हवाला दिया गया है. पहले राष्ट्रीय-ध्वज तिरंगे के सम्मान को भारतीय जनतंत्र में आस्था की एक शर्त की तरह स्थापित किया जाता है. और फिर बताया जाता है कि आज़ादी के बाद लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और कम्युनिस्ट पार्टियों ने कभी तिरंगे को अपने मुख्यालयों पर नहीं लगाया.

इस प्रकार लेखक भारतीय जनतंत्र के बुनियादी विचार के विरुद्ध आरएसएस और कम्युनिस्टों को स्थापित कर देते हैं. इस स्थापना को कम्युनिस्ट राजनीति के खिलाफ और पुख्ता करने के लिए अपूर्वानंद ‘लाल क़िले पर लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’ और ‘हम हर इक देश के झंडे पर एक लाल सितारा मांगेंगे’ जैसे प्रतीकों का सहारा लेते हैं. इन राजनीतिक प्रतीकों के ज़रिए वे वैकल्पिक सामाजिक-आर्थिक साम्यवादी विचारधारा को जनतंत्र विरोधी साबित कर देते हैं.

 जिस तरह अपूर्वानंद अतीत में जाकर तिरंगे की स्वीकार्यता को भारतीय जनतंत्र की स्वीकार्यता की अनिवार्य शर्त की तरह देख रहे हैं, ठीक उसी प्रकार इन दिनों भारतीय राज्य और सत्तावान संगठन के सौजन्य से ‘हर घर तिरंगा’ के आक्रामक नारे राष्ट्रवाद और देशभक्ति की निशानदेही करने का लिटमस परीक्षण बन चुके है. प्रतीकों के सरलीकरण से इस लेख को इतिहास के उस दौर की बड़ी बहसों के बारे में न बात करने की छूट मिल जाती है. जैसे लेखक को यह नहीं बताना पड़ेगा कि जब नेहरू आर्थिक जनतंत्र बनाने की बात कर रहे थे, तो आने वाले समय में सत्ता में रहते हुए उन्होंने भारत को ‘आर्थिक जनतंत्र’ बनाने के लिए क्या ‘संवैधानिक’ प्रयास किए?

नेहरू के दौर में आए सीलिंग एक्ट से कितना ज़मींदारी उन्मूलन हुआ? उस दौर में ‘कुली’ से ‘मज़दूर’ बनाए जा रहे चाय बागानों, जूट और कॉटन मिलों और तमाम दूसरे  मेहनतकश लोगों के जीवन स्तर पर आज़ादी का क्या प्रभाव पड़ा? 

यहां धूमिल की बहुउद्धृत कविता ‘रोटी और संसद’ को याद करना चाहिए-

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं—
‘यह तीसरा आदमी कौन है?’
मेरे देश की संसद मौन है.

दरअसल, भारत की आज़ादी जितने बड़े दावों और इरादों के साथ शुरू हुई थी, वह बहुत जल्द फीकी पड़ गई. एक तरफ नई साम्राज्यवादी शक्तियों ने भारत को नए तरीक़ों से अपनी गिरफ़्त में लेना शुरू कर दिया था, दूसरी तरफ़ देसी ज़मींदारों और पूंजीपतियों के अन्याय व शोषण से जनता के एक बड़े वर्ग को मुक्ति दिलाने के वादे फाजिल साबित हो रहे थे- 

और सहसा मैंने पाया कि मैं ख़ुद अपने सवालों के
सामने खड़ा हूं और
उस मुहावरे को समझ गया हूं
जो आज़ादी और गांधी के नाम पर चल रहा है
जिससे न भूख मिट रही है, न मौसम
बदल रहा है.

धूमिल की कविता अकाल-दर्शन का एक हिस्सा.

यहां हमें धूमिल की कविता के संदर्भ में फिर से लेखक द्वारा पूछे गए मूल प्रश्न पर लौटना चाहिए: आख़िर कौन-सा मैकेनिज्म टूट रहा था?

धूमिल की कविता ‘श्रीकाकुलम’ जब साल 1971 में ‘आवेग’ पत्रिका में छपी, उससे दो साल पहले आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम में हुए घटनाक्रम को संदर्भ से ग़ायब कर, सिर्फ संसदीय जनतंत्र बनाम क्रांति के ख्याल की बाइनरी में हम इस कविता को नहीं समझ सकते. 

गौरतलब है कि साल 1959 में श्रीकाकुलम सहित आंध्र प्रदेश के कई ज़िलों में गिरिजन संगम के निर्माण से एक नए आंदोलन की शुरुआत होती है: किसानों से छीनी गई ज़मीन को वापस लौटाने, ख़ाली ज़मीन को भूमिहीन किसानों में बांटने और वन उत्पादों की उचित क़ीमत जैसी मांगों के साथ यह आंदोलन वहां के भूमिहीन किसानों और आदिवासियों के बीच लोकप्रियता प्राप्त करता है.

आंदोलन की शुरुआत से ही स्थानीय ज़मींदार तबका अपने को गिरिजन संगम के खिलाफ एकजुट करने की कोशिश करता है. साल 1967 तक ज़मींदारों की असुरक्षा बढ़ जाती है, और वह गिरिजन संगम पर प्रत्यक्ष हमला शुरू करते हैं. उसी साल 31 अक्टूबर के दिन संगम की एक तालुक़ा स्तरीय बैठक में भाग लेने जा रहे राजनीतिक कार्यकर्ताओं मगन्ना और कोरान्ना की हत्या कर दी जाती है.

इन हत्याओं के बाद भारतीय राज्य किसी भी प्रकार के न्याय को सुनिश्चित करने में विफल रहता है, जिसके प्रतिरोध में गिरिजन संगम द्वारा कई जगह सभाएं की जाती है, जिससे आंदोलन का अगला पड़ाव सशस्त्र संघर्ष जन्म लेता है. ज़मींदारों के खिलाफ शुरू हुए इस संघर्ष के दमन के लिए श्रीकाकुलम ज़िले में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के दस हज़ार से अधिक सैनिक भेजकर, भारतीय राज्य अपना पक्ष चुनता है.

और 1969 तक श्रीकाकुलम किसान विद्रोह का भारतीय राज्य और ज़मींदारों द्वारा मिलकर दमन कर दिया जाता है. यह वह ऐतिहासिक ज़मीन है जिस पर खड़े होकर धूमिल के मैकेनिज्म को समझा जाना चाहिए.

अगर राज्य ‘हिंसा पर एकाधिकार’ की अभिव्यक्ति है, तो श्रीकाकुलम जैसी दमनकारी घटनाओं से स्पष्ट होता है कि भारतीय राज्य में हिंसा के एकाधिकार का प्रयोग किन लोगों के खिलाफ और किन लोगों के पक्ष में किया जा रहा था. भारतीय संसद में ज़मींदारों की उपस्थिति और साम्राज्यवाद के नए प्रारूप ने उस समय ही यह संकेत दे दिए थे कि भारतीय हिंसा पर एकाधिकार किस वर्ग का है, किस वर्ग के पक्ष में संसद मौन है और किस वर्ग के दमन के लिए पुलिस का इस्तेमाल किया जा रहा है. 

इस तरह अहिंसा, भारत का विचार,  संविधान, लोकतंत्र जैसी कई नैतिकताओं के सहारे एक प्रकार की हिंसा की वैधानिकता को मान्यता दिलाना और दूसरी तरफ़ अपनी मानवीय गरिमा खोकर शोषित पीड़ित होते हुए लोगों के प्रतिरोध को अवैधानिक घोषित करना– धूमिल की कविता के संदर्भ में इसे ही मैकेनिज्म समझा जाना चाहिए.

स संदर्भ में लेखिका अरुंधति रॉय अपने एक व्याख्यान में मुश्किल सवाल पूछती है- 

‘क्या भूखे लोग भूख हड़ताल कर सकते हैं? मैं मानती हूं अहिंसा एक प्रकार का उम्दा राजनीतिक नाटक है, जब आपके पास दर्शक हो. लेकिन उस आदिवासी के बारे में सोचिए जो सड़क से चार दिन पैदल चलने की दूरी पर रहता है, अगर उस पर कोई अन्याय होता है तो क्या वह अहिंसात्मक नाटक कर सकता है.’

काश! किसी आदिवासी या भूमिहीन किसान का प्रतिरोध दर्ज करवाना, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर के पदोन्नति न होने पर लिखे गए सार्वजनिक पत्र पर आई प्रतिक्रिया जितना आसान होता. (पाठकों से सवाल है, क्या पंजाब में इन दिनों ‘ज़मीन प्राप्ति संघर्ष समिति’ द्वारा भूमिहीन दलित किसानों द्वारा किए जा रहे आंदोलन के बारे में आपने कहीं सुना है? हालांकि वह तो ‘अहिंसक-आंदोलन’ है.)

जनतंत्र अपने द्वारा किए गए न्याय और बराबरी के वादों पर जब तक अमल नहीं करेगा, जब तक वह शोषित जनता से संवाद करने के लिए पुलिसिया दस्तों का इस्तेमाल करेगा, जब तक विचार से बढ़कर व्यवहार में जनतंत्र यह साबित नहीं कर देता कि हर किसी का खून उसके लिए बराबर है, तब तक न केवल क्रांति का ख़्याल बल्कि मेहनतकश और शोषित वर्ग द्वारा क्रांति के लिए प्रयास भी स्वभाविक तौर पर जारी रहेंगे. 

नेहरू के समय भारत में जनतंत्र 

इस श्रृंखला को समझने के लिए अपूर्वानंद द्वारा लिखे एक और लेख ‘नेहरू के बाद भारत में जनतंत्र’ का सहारा ले सकते हैं. इस लेख के लिए आलोचक मराठी कवि नारायण सुर्वे की अंग्रेज़ी में अनूदित कविता के हिंदी अनुवाद सहित, धूमिल और नागार्जुन की नेहरू की मृत्यु पर लिखी कविताओं का सहारा लेते है.

इन कविताओं की ‘आलोचना’ से अपूर्वानंद यह स्थापित करना चाहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र का एक प्रकाशमान युग था. नेहरू की मृत्यु के साथ उस समय के कवियों ने उस प्रकाशमान युग के ख़त्म हो जाने की संभावना जतायी थी. 

इस टिप्पणी में लेखक दो गलती कर रहे हैं- वह भारत में एक सुदृढ़ लोकतंत्र की स्थापना को महज़ एक व्यक्ति के विचारों तक सीमित कर देते है, जबकि लोकतंत्र की स्थापना एक प्रधानमंत्री के विचारों से कहीं बढ़कर संस्थाओं के व्यवहार का मामला है.

दूसरी तरफ, वह एक ऐतिहासिक समय की व्याख्या पर टिप्पणी के लिए स्रोत के तौर पर कुछ कविताओं को चुनते हैं. जबकि होना ये चाहिए था उस पूरे दौर के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास के साथ इन कविताओं को पढ़ा जाना चाहिए था. क्या नेहरू को लोकतांत्रिक दिखाने और उसके बाद लोकतंत्र पर छाने वाले अंधकार के बारे में बात करने के लिए, कुछ कविताओं का सहारा लेना पर्याप्त है? 

 नेहरू के नेतृत्व वाला भारतीय राज्य कितना लोकतांत्रिक था, इस सवाल को दो स्तरों पर समझा जा सकता है- पहला जनतांत्रिक आदर्शों की तुलना के सहारे, दूसरा किसी अन्य समय (वर्तमान समय भी हो सकता है) की तुलना के सहारे. ज़ाहिर तौर पर आज हमें लोकतंत्र में कुछ ज़्यादा सिकुड़न दिखाई देती है, लेकिन इसके सहारे हम यह नहीं कह सकते कि नेहरू के नेतृत्व वाला भारत अपने आप में बहुत जनतांत्रिक था.

हैदराबाद में रजाकारों की हत्या, तेलंगाना आंदोलन का दमन, शेख़ अब्दुल्ला की गिरफ़्तारी और केरल की पहली ग़ैर-कांग्रेस सरकार को गिराया जाना वे घटनाएं है जिसे उदारवादी संसदीय लोकतंत्र के मानदंडों पर भी अपराध घोषित किया जाएगा. अगर उस समय के कवि यह देख नहीं पा रहे थे तो क्या उन्हें ‘जनता की आवाज़’ कहा जा सकता है? 

और अगर नेहरू के बाद के दौर में अंधेरा है तो वह कौन-सा अंधेरा है जो मुक्तिबोध की कविताओं में अभिव्यक्त हो रहा है. क्या उस अंधेरे में इस बात के संकेत नहीं है कि मुक्तिबोध द्वारा उच्च प्राथमिक कक्षाओं के लिए लिखी किताब ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’ पर दक्षिणपंथी आपत्ति के बाद वहां की कांग्रेस सरकार किताब को प्रतिबंधित करती है. जिसके ख़िलाफ़ चले मुकदमे के बीच ही मुक्तिबोध बीमार हो कर दुनिया से चले जाते हैं.

‘द वायर हिंदी’ पर अपूर्वानंद का एक और लेख है, जो मुक्तिबोध के स्मरण के तौर पर लिखा गया है. जिसमें मुक्तिबोध और नेहरू के जन्मदिनों के आस-पास होने के संयोग से वो मुक्तिबोध के विषय में नेहरू का प्रवेश करवाते हैं. और बाद के लेख में मुक्तिबोध के ज़रिए नेहरू को अनावश्यक तौर पर महिमामंडित करते हैं. 

अपूर्वानंद की ‘नेहरू प्रवृत्ति’ के संकेत सदी की शुरुआत में ‘जनसत्ता’ में देखने को मिल जाते हैं, जो ‘द वायर हिंदी’ के पन्नों में आकर सघन होते जाते हैं. लेकिन अपनी इस प्रवृत्ति के लिए हिंदी के सबसे सघन और जनवाद के प्रति प्रतिबद्ध मुक्तिबोध की कमजोर व्याख्या के इस्तेमाल करने को ‘बौद्धिक-वफादारी’ जैसे शब्द युग्म से ही समझा जा सकता है. 

इस श्रृंखला के ज़रिए हिंदी लोकवृत के सबसे दृश्यमान आलोचक हमारे समय के जनतांत्रिक संकट की, उसके लक्षणों से ठीक से पहचान कर रहे है, लेकिन उनके आग्रह और वफ़ादारियां इस संकट की उत्पत्ति और विकास की समझ बनाने में बाधा हैं.  जनवाद के बगैर आर्थिक असमानता वाले समाज में, ‘जनतंत्र’ की स्थापना एक उदारवादी फैंटसी से बढ़कर कुछ नहीं है. ऐसे समाज में आप ‘जनतंत्र’ शब्द से एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग को शासित और शोषित करने की औपचारिक संसदीय राजनीतिक प्रणाली को तो संबोधित कर सकते हैं, लेकिन एक सामाजिक मूल्य-बोधक शब्द के तौर पर प्रयुक्त होने वाला ‘जनतंत्र’ यहां सर्वथा अनुपस्थित होगा. इसी सूत्र से आप अपूर्वानंद द्वारा इस्तेमाल किए गए ‘लोकतंत्र के अधूरेपन’ और ‘पूंजीवाद की निर्विकल्पता’ जैसे मंतव्यों को भी समझ सकते हैं. 

(विभांशु कल्ला समसामयिक विषयों पर लिखते हैं.)