गुरुकुलों के दौर की बात है, जब शिक्षक आम तौर पर गुरु कहलाते थे. खास तौर पर तो खैर, अभी भी कहलाते हैं. एक गुरुकुल में दीक्षांत के बाद गृहस्थाश्रम में प्रवेश की गुरुआज्ञा पा चुके छात्र अपने-अपने घर जाने लगे तो जानें क्यों, उनमें से एक को वह आज्ञा पर्याप्त नहीं लगी. वह फिर से गुरु के पास जा पहुंचा और उनका चरण स्पर्श करके निवेदन किया, ‘आशीर्वाद दीजिए गुरुवर!’
गुरु ने सायास उसे ऊपर से नीचे तक देखा, फिर पल भर कुछ सोचा और कहा, ‘नहीं-नहीं, अभी तुम्हारी शिक्षा पूरी नहीं हुई. इसलिए तुम एक साल और रुको. अगले साल देखेंगे.’
छात्र खुशी-खुशी रुक गया. लेकिन गुरु ने अगले दीक्षांत के बाद भी उसे नहीं जाने दिया. उसके अगले साल आशीर्वाद मांगने पर भी वही बात दोहरा दी कि अभी उसकी शिक्षा पूरी नहीं हुई, तो उसके भीतर विद्रोह जाग उठा. सोचने लगा- कैसा गुरु है यह? मेरे साथ इस गुरुकुल में आए अनेक छात्रों ने गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर शादियां रचा लीं. कई तो बाप भी बन गए. लेकिन यह न मुझे आशीर्वाद देता है, न जाने देता है. मेरी शिक्षा को पूरी हुई ही नहीं मानता!
सोचते-सोचते गुरुकुल उसे जेलखाना लगने लगा और रात होते-होते उसकी उद्विग्नता इतनी बढ़ गई कि प्रतीक्षा करने लगा कि कब वहां सब लोग सोयें और कब वह वहां से निकल भागे. बिना गुरु की आज्ञा और आशीर्वाद के.
जैसा कि बहुत स्वाभाविक था, अगली सुबह उसे वहां न पाकर गुरुकुल में भरपूर खलबली मची. क्योंकि इससे पहले किसी छात्र ने कभी भी गुरु की आज्ञा का ऐसा ‘अनादर’ नहीं किया था.
लेकिन यह क्या, कुछ छात्रों ने पूछा कि गुरुजी, क्या हम उसे ढूंढकर लाएं और आपके समक्ष दंड के लिए प्रस्तुत करें, तो गुरुजी मुस्कुराने लगे. फिर बोले, ‘नहीं भाई, नहीं. इसी दिन की तो मुझे प्रतीक्षा थी. आज उसने अपने तई एक फैसला किया और उस पर अमल करने में भी कमजोरी नहीं दिखाई.
जाहिर है कि अब परिपक्व हो गया वह. अब उसे कभी किसी के आशीर्वाद की आवश्यकता महसूस नहीं होगी क्योंकि उसने उसके बगैर फैसले करना सीख लिया है. आज उसकी शिक्षा पूरी हो गई है.’
इन पंक्तियों के लेखक के एक शिक्षक प्रायः हर शिक्षक दिवस पर अपने छात्रों को यह कथा सुनाते और कहते थे कि शिक्षक का काम छात्रों को अपने आशीर्वाद का मोहताज बनाना नहीं बल्कि अपने बूते अपने भविष्य के निर्धारण में सक्षम बनाना है. ताकि वे चरण ही छूते न रह जाएं, कान काटने की राह पर चल सकें.
ज्ञान के दीप जलाने पर दंड
लेकिन अब शायद ही कोई शिक्षक ऐसा कहने का साहस करता हो. करे भी कैसे, उसे ऐसी परिस्थितियों के हवाले कर दिया गया है कि अपने छात्रों को ‘कांवड़ लेने मत जाना, तुम ज्ञान के दीप जलाना’ सिखाने पर भी सजा मिलने लगी है.
तिस पर समाज में ऐसी स्थितियां पैदा कर दी गई हैं कि क्या शिक्षक, क्या छात्र और क्या अन्य काम धंधे करने वाले, सबके लिए ठीक से कर्तव्यनिर्वहन कठिन हो चला है. इसके चलते उनका जो नैतिक बल पहले ज्यादातर जगहों पर उनके काम आता था, अब कहीं काम नहीं आता. क्या आश्चर्य कि इसके चलते शिक्षकों व छात्रों के संबंध भी ‘नैतिक’ नहीं रह गए हैं, प्रोफेशनल हो गए हैं या फिर दिखावे के.
हिंदी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह इस स्थिति के अनर्थों को एक उदाहरण के सहारे समझाया करते थे:
मैं एक कॉलेज का प्राचार्य था तो एक दिन जिस जिले में वह कॉलेज था, उसके पुलिस प्रमुख ने सूचना दी कि मेरे कॉलेज का एक छात्र रात को डकैतों के एक नामी गिरोह के साथ डकैतियों में शामिल होता है. मैंने कहा कि मुझे इस बाबत कोई जानकारी नहीं है, लेकिन आप छात्र का नाम बताइए, मैं उसके विरुद्ध जो भी कार्रवाई या आपकी जो भी मदद कर सकता हूं, करूंगा.
इसके बाद मैं अपने कक्ष में बैठा ही था कि देखा- एक छात्र निहायत शर्माया और ग्लानिग्रस्त-सा चला आ रहा है. उसने मेरे पास आकर कहा- ‘सर, मैं अपने किए पर बहुत शर्मिंदा हूं. इस कारण नहीं कि मेरे किए की पोल खुल गई है. इस कारण कि मेरे कारण आप जैसे कर्तव्यनिष्ठ प्राचार्य को शर्मिंंदगी झेलनी पड़ी और कॉलेज की प्रतिष्ठा का भी हनन हुआ. मैं समझता था कि न मैं पकड़ा जाऊंगा और न आप को यह बात पता चलेगी.’
फिर उसने मुझे वचन दिया कि अपना शर्म से नीचा सिर ऊंचा करने के लिए वह पश्चाताप करेगा.
आज ऐसी मिसालें दुर्लभ हो गई हैं, जबकि थोड़ा पीछे जाकर देखें तो महात्मा गांधी अपने छात्र जीवन के एक ऐसे वाकये का जिक्र कर गए हैं, जो बताता है कि शिक्षकों को ऐसे ईमानदार छात्र भी मिला करते थे, जिन्हें उनके अनैतिक प्रोत्साहनों को स्वीकार करने में हिच होती थी. यह हिच कई बार उनके शिक्षकों के नैतिक बने रहने की प्रेरणा भी बन जाया करती थी.
बहरहाल, वाकया तब का है, जब महात्मा राजकोट के हाई स्कूल में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. एक दिन शिक्षा विभाग का इंस्पेक्टर स्कूल का मुआयना करने आया और उसने नवीं कक्षा के छात्रों को अंग्रेजी का श्रुतलेख (इमला) बोला. इसमें उसने जो पांच शब्द बोले, उनमें एक शब्द ‘केटल’ भी था. महात्मा (तब मोहनदास) इस शब्द को सही-सही नहीं लिख पाए.
उनके शिक्षक की नजर उनकी कॉपी पर पड़ी तो उन्होंने बूट की ठोकर से इशारा किया कि उनके बगल वाले छात्र ने उस शब्द की स्पेलिंग ठीक लिखी है और उसकी नकल कर वे अपनी ग़लती ठीक कर लें. लेकिन मोहनदास ने समझा कि शिक्षक बूट की ठोकर से उन्हें सचेत कर रहे हैं कि किसी की नकल न करें.
पूरी कक्षा में सिर्फ वही एक छात्र थे, जिसने केटल की स्पेलिंग गलत लिखी. इसलिए इंस्पेक्टर के जाने के बाद शिक्षक ने उन्हें गुस्से से झिड़ककर कहा, ‘मोहनदास, लगता है, तुझमें अक्ल ही नहीं है.’ लेकिन इस पर मोहनदास ने कहा कि, ‘सर, मैं नकल करके सही स्पेलिंग लिख भी देता, तो गलती ही करता’ तो उन्होंने अभिभूत होकर उनको गले से लगा लिया.
ऐसे शिक्षक छात्र संबंध!
लेकिन अब? गिरावट यहां तक आ पहुंची है कि कई छात्रों और शिक्षकों का नाता ऐसा हो चला है कि एक लाइटर जलाता है तो दूसरा सिगरेट सुलगाता है. सत्तादल के संगठनों से जुड़े छात्र अपने दल के राजनीतिक एजेंडे की पूर्ति के लिए कर्तव्यनिष्ठ शिक्षकों के विरुद्ध शिकायतें दर्ज कराकर उन्हें कर्तव्यपालन से रोकने व प्रताड़ित करने की सीमा तक ‘आजाद’ हैं, जबकि शिक्षक कैसा भी घटिया व भगवा पाठ्यक्रम और पुस्तकें पढ़ाने को अभिशप्त हैं.
यह ठीक है कि शिक्षकों के एक वर्ग के वेतन भत्ते ठीक-ठाक कर दिए गए हैं, लेकिन कर्तव्यपालन की सहूलियतों के लिहाज से उनका हाल ही उतना ही बद है, जितना बेहद अपर्याप्त वेतन पर काम करने को अभिशप्त शिक्षकों का.
लेकिन यहां यह समझना भी गलत होगा कि शिक्षा का भगवाकरण या बाजारीकरण ही शिक्षा और शिक्षकों की इकलौती या दुलौती मुसीबतें हैं. इनके अनर्थ तो अपनी जगह गुल खिला ही रहे हैं, रोजगारपरक शिक्षा के नाम पर जिस तरह शिक्षा से रोजगार सृजन का काम लेने की कोशिश की जा रही है (जो वास्तव में अर्थव्यवस्था का दायित्व है), उससे शिक्षा और शिक्षकों का हाल और बुरा हो गया है.
कहां तो शिक्षा को ज्ञान, आनंद व मुक्ति का वायस और शिक्षकों को इसका अग्रदूत बनकर अपने छात्रों को अंधकार से प्रकाश, भय से निर्भयता और बंधनों से मुक्ति की ओर यात्रा करानी थी और कहां बरबस अर्थव्यवस्था का काम करते हुए वे ‘माया मिली न राम’ की स्थिति में जा फंसे हैं. फलत: न उनसे रोजगार निर्माण हो पा रहा है, न मनुष्य निर्माण.
याद कीजिए, कभी राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने इसलिए शिक्षा के नाश की कामना की थी कि वह नौकरी के लिए होकर रह गई थी और आज शिक्षा को इसलिए कोसा जा रहा है कि वह बेरोजगारों की फौज पैदा कर रही और नौकरियां मिलने में सहायक नहीं रह गई है!
कभी लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति की यह कहकर आलोचना की जाती थी कि वह सिर्फ क्लर्क पैदा करती है, जबकि आज सारा जोर ऐसे शिक्षा संस्थानों पर है जो बड़ी व बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए कारकुन पैदा कर रहे हैं. इसके चलते दूसरे संस्थानों और विश्वविद्यालयों की हालत कितनी खस्ता हो चली है, यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है.
तोते की शिक्षा
ऐसे में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की एक कहानी याद आती है, जिसमें एक राजा को ‘शास्त्रों व कानून-कायदों से अनजान एक आजाद तोते का गाना, उछलना-फुदकना और बागों के फल खाना पसंद नहीं आया तो उसने मंत्री को बुलाकर उसको शिक्षित करने का आदेश दे दिया.
इस आदेश के पालन की जिम्मेदारी निभाते हुए राजा के भांजों द्वारा सोने का एक सुंदर पिंजरा बनवाकर तोते को उसमें कैद कर दिया गया क्योंकि पंडितों ने उसके घोंसले के छोटे आकार-प्रकार व घास-फूस को ही उसकी शिक्षा के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बताया था.
फिर पंडित उसे पढ़ाने बैठे तो उन्हें इसके सिवाय और कोई तरीका समझ में नहीं आया कि पोथियों के पन्ने फाड़-फाड़कर उसके मुंह में ठूंसते रहें. तोते ने इसका प्रतिरोध किया तो कोतवाल के आदेश पर उसके पंखों को काट दिया गया. ताकि वह न फड़फड़ा सके, न उड़ न सके. उसके पिंजरे के चारों ओर लोहे की जंजीरें भी लगा दी गईं.
बेचारा तोता इस प्रताड़ना के बावजूद कोई शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाया और मर गया तो राजा के भांजों ने खुश होकर राजा से कहा कि उसकी शिक्षा पूरी हो गई है.
राजा तोते को देखने आया और उसके शरीर को दबाने लगा, तो उसमें कोई और हरकत तो नहीं हुई, उसके पेट में पोथियों के सूखे पन्ने खरखराते रहे. इस बीच उसकी शिक्षा पर कितने स्तरों पर कितने धन का वारा-न्यारा हो चुका, कहानी में इसकी अलग ही कहानी है.
सोचिए जरा, राजाओं के काल के ऐसे जड़ व अवैज्ञानिक हालात को हम लोकतांत्रिक भारत के पचहत्तर सालों में कितना बदल पाए हैं? अगर बदलाव की गति और स्तर संतोषजनक नहीं हैं, जिसके चलते शिक्षा का फोकस बदल ही नहीं पा रहा तो किसी अच्छे की आशा क्योंकर की जा सकती है?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
