कविता और संगीत: हमारी सिसकती मानवीयता का आग्रह व सत्यापन

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कविता और संगीत एकांत में आपके सबसे विश्वसनीय और अनाक्रामक शांत सहचर हो सकते हैं. वे आपके एकांत को अपने ढंग से सामुदायिक बना सकते हैं; आपको बाहर और अंदर की, जानी-अनजानी, विपुल और बहुल दुनिया से जोड़ सकते हैं.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

मेरी उमर बमुश्किल सत्ताइस-अट्ठाईस बरस की हुई होगी तब मैं सीधी में कलेक्टर के रूप में नियुक्‍त हुआ. ज़िला मुख्यालय छोटी-सी जगह थी जिसकी कुल आबादी बीच-पचीस हज़ार ही शायद रही होगी. मेरे ज़्यादातर सहयोगी अफसर मुझसे उमर में काफ़ी बड़े थे और उनके साथ दिन भर बिताना भी गरां (भारी) गुज़रता था. शामें अक्सर, इसलिए, अकेली घर पर होती थीं.

एक बड़ा टेप रिकार्डर मेरे पास छोटे मामा का दिया हुआ था. हम अक्सर उसी पर शास्त्रीय संगीत सुना करते थे. पुस्तकों की भी घर में कोई कमी नहीं थी. सो हर शाम काफ़ी समय कविता पढ़ते बीतती थी. तब तक रसरंजन की आदत नहीं पड़ी थी. तो शाम कभी-कभार लेखक-दंपत्ति रमेशचन्द्र शाह और ज्योत्स्ना मिलन के साथ बिताने के अलावा ज़्यादातर कविता और संगीत के साथ ही गुज़रती थी.

पहली बार जीवन में यह अहसास गहरा हुआ कि कविता और संगीत एकांत में आपके सबसे विश्वसनीय और अनाक्रामक शांत सहचर हो सकते हैं. वे आपके एकांत को अपने ढंग से सामुदायिक बना सकते हैं; आपको बाहर और अंदर की, जानी-अनजानी, विपुल और बहुल दुनिया से जोड़ सकते हैं; आपको उसका लगभग बैठे-बिठाए हिस्सा अनायास बना सकते हैं.

हम चुपचाप अपने अंदर जीवन के अपार स्पंदन से भर जाते हैं. यह अनुभव बाद में भी पुष्ट और सशक्त होता रहा है.

इस बीच दुनिया, आसपास की दुनिया, टेलीविजन पर आने वाली दुनिया इतनी अवास्तविक होती गयी है कि उसने आपको, अपनी मटमैली सचाई में, और अकेला कर दिया है. सच्चा जीवन, उसका संस्पर्श और स्पंदन हमसे छूटा सा जा रहा है. ऐसे समय में, एक बार फिर, मैं अक्सर कविता और संगीत की शरण में जाता हूं: वहीं अपने और ज्यादा ज़रूरी, दूसरों के आदमी होने की ऊष्मा, दीप्ति, आभा महसूस होती है.

कविता और संगीत मानो हमारी तरह-तरह से दबायी-छुपायी जा रही मानवीयता का आग्रह और सत्यापन बन जाते हैं. ग़नीमत है कि हमारे पास ये सहारे बचे हुए हैं. वरना ग़ालिब कह गए हैं: ‘आदमी को भी मसस्सर नहीं इन्सां होना’.

कला की आलोचना

जैसा हिंदी साहित्य में हुआ है वैसा ही कुछ कला की ज़्यादातर अंग्रेज़ी में लिखी जा रही आलोचना में हो रहा है. कला को कला की तरह समझने के बजाय अक्सर उसे इतिहास, सामाजिक यथार्थ, इतिहास, स्मृति आदि के रूप में विश्लेषित करने की वृत्ति का वर्चस्व हो गया है. कई बार यह समझ में नहीं आता कि कोशिश इतिहास, ऐतिहासिक स्थितियों और दस्तावेज़ों के माध्यम से कला का अध्ययन करने की है या कि इतिहास को कला, कला संबंधी दस्तावेज़ों और बिंबों के माध्यम से पढ़ने की.

कला हमेशा वेध्य होती है- उस पर सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि शक्तियों का प्रभाव और दबाव पड़ता है. पर क्या कला की अपनी आत्यन्तिक स्वायत्तता भी कुछ होती है? क्या कला अन्य सबका प्रतिबिंबन या प्रश्नांकन भर है, अपने आप में कुछ नहीं? या इतना कम कि उस पर ध्यान देना ज़रूरी नहीं है? सब कुछ का प्रभाव कला पर पड़ता है पर इनमें से किसी पर कला का कोई प्रभाव नहीं पड़ता?

एक और सवाल यह उठता है कि क्या इतिहास कला को हिसाब में लेता है? अगर नहीं तो कला इतिहास को हिसाब में लेने को क्यों बाध्य है? आखि़र सभी विधाएं जीवन और संसार के बारे में होती हैं और वे अपने आप में समान रूप से वैध होती है, अपनी परस्पर निर्भरता के कारण भर नहीं. वे सभी गल्प रचती हैं और उनमें लोकतांत्रिक समकक्षता होती है, होनी चाहिए.

कला अधिकतर व्यक्तिगत उत्पाद होती है. सामग्री वगैरह भले सामूहिक प्रयत्न से उपजती और आती है, बिना व्यक्तिगत प्रतिभा और कौशल के कला संभव नहीं होती. कला के संदर्भ में व्यक्तित्व का अवमूल्यन या उपेक्षा न होती अच्छी आलोचना है, न ही सच्चा इतिहास. सामूहिक कला भी, निश्चय ही, होती है और अजन्ता, एलोरा, खजुराहो-कोणार्क के मंदिर, उदाहरण के लिए, उसका श्रेष्ठ और कालजयी उदाहरण हैं. पर उसे तत्कालीन सामाजिक इतिहास भर से समझना बेहद अपर्याप्त समझ है.

बहुत सारी कला आलोचना में यह पूर्वाग्रह गहरे धंसा हुआ है कि सारे परिवर्तन सामाजिक, जीवन, ज्ञान, राजनीति-आर्थिकी, इतिहास आदि में होते हैं. कला सिर्फ़ इन परिवर्तनों को संबोधित, प्रतिबिंबित करती है. यह धारणा दबे-छुपे यह मानकर चलती है कि मानो कला को स्वयं कुछ परिवर्तन करने का अधिकार या ज़रूरत नहीं है. ऐसे अनेक परिवर्तनों की लंबी सूची बनाई जा सकती है जिसमें वे परिवर्तन शामिल हों जो कला के स्वायत्त और स्वतंत्र रूप से हुए हैं.

एक उदाहरण यह है कि जब मक़बूल फ़िदा हुसैन ने बंगाल शैली की लोकप्रिय पतली-ललित-लयमय रेखा को एक पौरुष भरी मोटी रेखा से अपदस्थ किया तो इसका कोई सामाजिक कारण या प्रयोजन नहीं था.

इन दिनों, ख़ासकर, कला विद्यालयों और विभागों में, कला के अंतरानुशासिकता पर बड़ा जोर है. इसका अधिकतर मतलब कला के इतिहास, सामाजिक विज्ञान, राजनीति आदि के साथ संबंध होता है. सर्जनात्मक अभिव्यक्ति के जो अनेक समवर्ती रूप हैं जैसे कविता, संगीत, नृत्य, रंगमंच उनके साथ कला के संबंध और संवाद का कोई विश्लेषण प्रायः नहीं होता.

यह भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि अंग्रेज़ी में ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं में लिखी जा रही कला-आलोचना ऐसी भाषा, ऐसी अवधारणाओं और आग्रहों के साथ लिखी जाती है जो अपने मूल में अपनी विशिष्ट परिस्थितियों में पश्चिम में विकसित-विन्यस्त हुए हैं. क्या हमारा अपना कला-चिंतन, अपनी युक्तियां और सिद्धांत नहीं रहे हैं? क्या वे सभी आज की कला के लिए अनुपयोगी या अप्रासंगिक हैं?

हमारे किसी मिनिएचर चित्र में एक साथ जीवन या प्रकृति के तीन प्रसंग एक ही सतह पर दिखाए गए हैं तो इस युक्ति से जीवन में एक साथ जो घटता रहता है उसकी तात्कालिकता का जो निदर्शन है, उसके आशयों का क्या हमने विश्लेषण किया है? हम समय या जीवन या अस्तित्व को उसकी संभव समग्रता में चित्रित करने को जो उद्यम करते रहे हैं, क्या वह आज संभव नहीं है? क्या समय का अलग बोध हमारे किसी काम का कला में आज नहीं है?

अंततः कला संसार को देखने-समझने का एक ढंग है जो उतना ही वैध और उचित है जितना और कोई दूसरा ढंग. हमारे कला विद्यालयों और विभागों को शिद्दत से, बौद्धिक और निर्भीक ढंग से कला की स्वायत्तता का फैलाव-बचाव करना चाहिए और कला को इतिहास, समाजविज्ञान, विचारधाराओं द्वारा अपना उपनिवेश बनाने-मानने का प्रतिरोध करना चाहिए.

ये कुछ बातें मुझे सूझीं जब हाल ही में जामिया मिलिया इस्लामिया के कला संकाय में आयोजित एक कला परिसंवाद के शुभारंभ पर कुछ कहने का सुयोग हुआ.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)