रोहिन कहें, रोहिणी या जैसा कि कई समझदार लोग कहते हैं, बुद्ध की नदी, भारत के पड़ोसी देश नेपाल में ‘चुरिया-मुरिया’ कहलाने वाली शिवालिक पहाड़ियों से निकली एक अनाम-सी नदी है, जो अपने उद्गम से बहती हुई उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में पहुंचती है तो पश्चिमी राप्ती में मिलकर उसकी सहायक नदी बन जाती है.
बौद्ध ग्रंथों के अनुसार एक समय इस नदी के एक तट पर शाक्य राजवंश (जिसकी राजधानी कपिलवत्थु को अब कपिलवस्तु कहते हैं) और दूसरे तट पर कोलिय राजवंश (जिसकी राजधानी रामग्राम में थी) स्थित था. यह नदी इन दोनों ही राज्यों के किसानों के लिए परंपरा से चला आता एक बड़ा जलस्रोत हुआ करती थी. जब भी वर्षा नहीं होती और सिंचाई के अभाव में फसलें सूखने लगतीं, इसका पानी किसानों के बहुत काम आता.
वैर नहीं, प्रेम!
एक साल वर्षा नहीं हुई और सूखा पड़ गया तो नदी के पानी को लेकर दोनों राज्यों के किसानों में मारामारी मच गई. कोलिय किसानों ने यह देखकर कि नदी में दोनों तरफ के किसानों की जरूरत भर को पानी नहीं है, अपनी जरूरत पहले पूरी करने के लिए उसे अपने खेतों की ओर ले जाने का उपक्रम शुरू कर दिया, तो शाक्य राज्य के किसान इस अंदेशे से परेशान हो उठे कि नदी का पानी न मिलने से उनकी फसलें सूखकर नष्ट हो जाएंगी.
फिर जैसा कि बहुत स्वाभाविक था, दोनों पक्ष नदी के पानी पर पहले अधिकार के लिए वाद-विवाद, गाली-गलौज और झगड़े पर उतर आए. बात दोनों राज्यों के मंत्रियों, फिर उनकी मार्फत शासकों तक पहुंची तो वे परस्पर युद्ध पर आमादा हो गए. रोहिन के तट को युद्धभूमि बनाने की तैयारियां की जाने लगीं.
उस समय शाक्य राज्य का अपना संघ था और जो भी समस्याएं आतीं, उन पर संघ में विचार-विमर्श के जरिए फैसले करने की परंपरा थी.
बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने लिखा है कि इस युद्ध की नौबत आई तो सिद्धार्थ (जो बाद में गौतम बुद्ध नाम से जाने गए) को शाक्य संघ का सदस्य बने आठ साल हो चुके थे.
शाक्य सेनापति ने कोलियों के खिलाफ युद्ध पर विचार के लिए संघ का अधिवेशन बुलाया तो सिद्धार्थ ने उसमें बहुत मुखर होकर अपनी असहमति जताई और जोर देकर कहा कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है. क्योंकि वैर, वैर से नहीं, केवल अवैर (यानी प्रेम) से शांत होता है.
लेकिन वे इससे न तो सेनापति को सहमत कर सके, न ही संघ के बहुमत को. फिर भी उन्होंने अपनी टेक नहीं छोड़ी तो परस्पर हुई लंबी ‘बाता-कहनी’ में कई अप्रिय मोड़ आए, लेकिन अंततः इस पर सहमति हो गई कि सिद्धार्थ प्रव्रज्या लेकर संघ और देश दोनों छोड़कर चले जाएंगे. इस तरह रोहिन के पानी का विवाद उनके महाभिनिष्क्रमण का मूल बन गया.
पालि ग्रंथों में तो इसका जिक्र है ही, उनके आधार पर बौद्ध साहित्य के बाबासाहब और धर्मानंद कोसांबी जैसे अध्येता भी ऐसा ही मानते हैं.
पानी के लिए खून!
यह और बात है कि कुछ अन्य स्रोत इसे दूसरे रूप में भी वर्णित करते हैं. मिसाल के तौर पर यह कि रोहिन के तट पर ध्यान कर रहे गौतम बुद्ध ने दोनों राज्यों की सेनाओं को युद्ध के लिए तत्पर देखा तो उनके मध्य जा खड़े हुए. इस पर दोनों सेनाएं अपनी-अपनी जगह पर जहां की तहां खड़ी हो गईं.
तब बुद्ध ने दोनों राज्यों के राजाओं से पूछा कि यह कैसा झगड़ा है? किस बात के लिए है? राजाओं ने कहा-भंते, कारण तो हम नहीं जानते. इस पर उन्होंने पूछा कि तब कौन जानता है? कारण नहीं जानते तो क्या अकारण तलवारें निकाल ली हैं! इस पर राजाओं ने कहा कि कारण शायद सेनापतियों को पता हो. लेकिन सेनापतियों ने उपसेनापतियों की ओर इशारा कर दिया और उपसेनापतियों ने सैनिकों की ओर.
अंतत: बात नौकरों पर पहुंची, तब कहीं कारण का पता चला. नौकरों ने कहा-भंते पानी के कारण झगड़ा है. बुद्ध ने कहा-पानी के कारण! अजीब बात है! पानी तो सदा से बहता आ रहा है, यहां लड़े तुम आज! ऐसे में झगड़ा पानी के कारण नहीं हो सकता.
नौकरों ने कहा-भंते, झगड़ा इसका है कि पानी का पहले कौन उपयोग करे. बुद्ध ने कहा- पहले कौन के कारण! तब पानी को दोष मत दो. फिर उन्होंने हंसते हुए राजाओं से पूछा-महाराज, पानी का क्या मूल्य है? राजा शरमाते हुए बोले-अल्पमात्र भंते! पानी का भला क्या मूल्य है! इस पर बुद्ध ने प्रश्न किया -और मनुष्यों का? राजाओं का जवाब था-मनुष्य तो अमूल्य है भंते! मनुष्य से ज्यादा मूल्यवान और क्या है!
बुद्ध ने कहा- तो फिर सोचो- अल्पमात्र मूल्य के लिए अमूल्य को मिटाने चले हो? पानी के लिए खून बहाने चले हो?…तुम गिरोगे कटोगे मरोगे; और नदी ऐसी ही बहती रहेगी, उसको पता भी नहीं चलेगा. तुम असार के लिए सार को गंवाते हो? कंकड़-पत्थरों के लिए हीरे-जवाहरात फेंकने चले हो? इसीलिए तुम्हारे जीवन में दुख है, चिंता है, अंधकार है. मुझे देखो मेरे महासुख को देखो, क्या है इसका राज? यही कि मैं वैररहित विहरता हूं. यही कि सार को मैं सार और असार को असार देखता हूं.
बहरहाल, इधर यह नदी इसको लेकर चर्चा में है कि हिंदी के सुपरिचित कवि व संपादक प्रो. सदानंद शाही ‘साखी’ (पत्रिका) और प्रेमचंद साहित्य संस्थान (गोरखपुर) के संयुक्त तत्वावधान में इसके किनारे-किनारे ‘चरथ भिक्खवे-2’ नामक साहित्यिक-सांस्कृतिक यात्रा निकाल रहे हैं, जिसमें अनेक साहित्य-संस्कृति व समाजकर्मी और कवि व प्राध्यापक वगैरह भाग ले रहे हैं.
‘चरथ भिक्खवे’ का अर्थ है: बुद्ध जिस पथ पर गए, उस पर चलना और शाही इस श्रृंखला की पहली यात्रा गत वर्ष 15 अक्टूबर को सारनाथ (बुद्ध के प्रथम उपदेश और धम्मचक्र प्रवर्तन के स्थल) से निकाल चुके हैं. वह यात्रा समूचे बौद्ध परिपथ से होती हुई 25 अक्टूबर को सारनाथ में ही संपन्न हुई थी.
लुप्त नमी की खोज
सदानंद शाही केदारनाथ सिंह की ‘बिना नाम की नदी’ शीर्षक कविता के हवाले से यात्रा के इस दूसरे संस्करण के बारे में बताते हैं कि यात्रा का यह दूसरा संस्करण भी पहले संस्करण की तरह सचल कार्यशाला ही है. वे कहते हैं:
‘हमारा जीवन नदियों से और नदियों का जीवन हमसे कुछ इस तरह जुड़ा हुआ है कि दोनों को अलग नहीं किया जा सकता. यह जुड़ाव जैसे-जैसे विच्छिन्न होता गया है, हमारे जीवन से नमी लुप्त होती गई है. इस यात्रा में, जिसे हम विश्वशांति के लिए साहित्यिक सांस्कृतिक यात्रा कह रहे हैं, रोहिन, जो हमें बुद्ध से भी जोड़ती है और पड़ोसी नेपाल से भी, के साथ चलते हुए उस लुप्त हुई नमी के पुनराविष्कार और बुद्ध की महाकरुणा के अवगाहन का प्रयास कर रहे हैं. यह प्रयास हमारे निकट जीवन की तलाश जैसा है. इसके अलावा यह यात्रा भारत और नेपाल को जानने व समझने की हमारी विनम्र कोशिश भी है.’
इस सिलसिले में वे इतिहास के हवाले से यह बात भी याद दिलाते हैं कि सारी प्राचीन सभ्यताएं नदियों के तटों पर ही विकसित हुईं, क्योंकि वे पीने के पानी, उपजाऊ मिट्टी, परिवहन, और शिकार के अवसर प्रदान करती थीं, जो स्थिर और जटिल समाजों के लिए आवश्यक थे. इसलिए उन सभ्यताओं के बारे में जानना है तो नदियों के पास जाना और उनको जानना चाहिए.
बहरहाल, चरथ भिक्खवे-2 पांच अक्टूबर को रोहिन के मुहाने पर कविता पाठ से आरंभ होकर पाकड़ी वृक्ष, भवानीपुर, कन्या माई, वैरिमाई मंदिर व मंगला पुष्करिणी का भ्रमण करती हुई लुंबिनी से रूपंदेही जाएगी. अगले दिन वह नवलपरासी जिले में रामग्राम स्तूप, वाल्मीकि नगर फारेस्ट रिजर्व और त्रिवेणी का भ्रमण कर शाम पांच बजे भारत में प्रवेश करेगी.
सात अक्टूबर को यह रोहिन की चंदन, प्यासी और महाव नदी आदि धाराओं से गुजरती हुई रतनपुर स्थित रोहिन बराज तक जाएगी और उसके अगले दिन इस बराज से कोहरवल, खोरिया, दसरथपुर, टेढ़ी घाट और कांधपुर तक.
नौ अक्टूबर को कांधपुर वनग्राम से चौक, रामग्राम उत्खनन स्थल, तिनकोनिया और सोनाड़ी माता मंदिर के भ्रमण के बाद यात्री एक गोष्ठी करेंगे. दस अक्टूबर को महराजगंज फरेंदा मार्ग पर रोहिन नदी के साथ दौलतपुर वनग्राम और ग्यारह अक्टूबर को वहां से जंगल अगही, मखनहा और महेसरा ताल होते हुए यात्रा गोरखपुर पहुंचेगी, जिसके अगले दिन वहीं बौद्ध म्यूजियम में संगोष्ठी और कविता पाठ के साथ उसका समारोहपूर्वक समापन होगा.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
