इधर लगता है कि हम भारतीयों की दिलचस्पी अपने इतिहास में कुछ अधिक हो गई है. इसका एक परिणाम या लक्षण यह दिखाई देता है कि अनेक कमपढ़ या अपढ़ नेता या ऐसे ही और लोग लगभग हर रोज़ इतिहास की किसी घटना या तथ्य का उल्लेख या व्याख्या आदि अनेक सार्वजनिक मंचों पर करते नज़र आते हैं.
केंद्रीय सत्ता और अनेक राजसत्ताएं बहुत जतन से पाठ्यपुस्तकों आदि में इतिहास नए सिरे से लिखवा-चला रही हैं. आए दिन टीवी चैनलों पर इतिहास को लेकर बहसें होती रहती हैं. जब यह सब चल रहा है तो, दूसरी ओर, विस्मरण का एक सुनियोजित अभियान भी चल रहा है कि हम बहुत कुछ भूल जाएं, वही याद रखें जो तरह-तरह के नियामक चाह रहे हैं कि हम याद रखेंनई यादें भी फ़ुर्ती से गढ़ी-फैलाई जा रही हैं. लगता है कि हमें इतिहास बुरी तरह से आक्रांत कर रहा है.
इतिहास को लेकर हमारी जानकारी, समझ और व्याख्या कभी एक जैसी नहीं होती, न ही उसे ऐसा होना चाहिए. पर अब तक इतना तो होता रहा है कि जो भी असहमतियां हुई हैं, ठोस साक्ष्य, नई खोजों, नए तथ्यों के आधार पर ही होती रही हैं. आज के दौर में, दुर्भाग्य से, मनगढ़ंत या संघगढ़ंत का वर्चस्व हो गया लगता है. जो हुआ है और जिसके प्रामाणिक साक्ष्य मौजूद और दर्ज़ हैं, सार्वजनिक क्षेत्र में हैं उसको न हुआ मानने और किसी तरह के बौद्धिक और नैतिक रिगर के बिना ख़ारिज करने का उत्साह बहुत बढ़ गया है.
यही नहीं, जो नहीं हुआ, जिसके होने का कोई विश्वसनीय प्रमाण नहीं है, उसको धौंस-डपट से, आत्मविश्वस्त आक्रामकता से मनवाने की वृत्ति ऊरूज पर है. निज़ाम यह मानकर सक्रिय है कि वह इतिहास को मनमाने ढंग से बदल-फेर सकता है; मनगढ़ंत तथ्यों को प्रमाणित तथ्यों की तरह थोप सकता है; नया आख्यान रचकर उसे जनव्यापी बना सकता है.
ग़ौर करने की बात यह है कि इस अभियान में राजनेताओं-गोदी पत्रकारों-अंधभक्तों-अकादेमिकों के साथ-साथ पढ़े-लिखे साधारण नागरिक, हुड़दंगे, बेरोज़गार युवा आदि शामिल हैं. इतिहास बदलना और उसकी किसी दुर्व्याख्या के आधार पर लोगों में प्रतिरोध की भावना उपजाना-उकसाना, लगता है, एक नया रोज़गार बन गया है.
इस व्यापक और दुखद संदर्भ में हाल में कुछ युवा इतिहासकारों के साथ लंबी-खुली चर्चा हुई. हमने यह जानने की कोशिश की कि इतिहास और इतिहास-लेखन को लेकर जो दृश्य बन-उभर रहा है उसके बारे में वे क्या सोचते हैं और उसे लेकर उनकी बेचैनियां, अगर हैं तो, क्या हैं और उन्हें लेकर वे निजी और सामूहिक स्तरों पर किस तरह सक्रिय हैं या होना चाहते हैं. चर्चा में कुछ वरिष्ठ समाजशास्त्री, साहित्य के अध्यापक, कुछ नए शोधार्थी और एक क़ानूनवेत्ता भी शामिल हुए.
बातचीत के दौरान यह बात उभरी, और नैतिक और बौद्धिक संतोष की है, कि अनेक युवा इतिहासकार और अध्येता आज इतिहास का जो दुरूपयोग, उसकी दुर्व्याख्या और तथ्यों-तर्कों-साक्ष्य के बिना उस पर मनगढ़ंत थोपने की लोकप्रिय होती वृत्ति को लेकर क्षुब्ध हैं. वे निजी तौर पर और ज़रूरी हो तो सामूहिक तौर पर भी वैचारिक विमर्श और सोशल मीडिया पर इस सबका प्रत्याख्यान करना चाहते हैं. कुछ कर भी रहे हैं.
इतिहास को उसकी वस्तुनिष्ठता, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता में बचाने की कोशिश व्यापक होना चाहिए. यह बचाना सिर्फ़ इतिहास नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति और स्मृति को बचाने जैसा भी होगा. ऐसी उम्मीद बंधी कि ऐसी कोशिश और संवाद व्यापक स्तर पर किया जा सकता है.
वृक्ष-भर, पक्षी-भर
ज्ञानेन्द्र पति 75 वर्ष के हो गए. उनका पहला कविता संग्रह ‘आँख हाथ बनते हुए’ ‘पहचान’ सीरीज की पहली संख्या में 1970 में प्रकाशित करने का जब मुझे सौभाग्य मिला था तो वे 20 वर्ष के तरुण थे. ज्ञानेन्द्र ने लगभग 60 वर्ष कविता में सक्रिय रहते बिताए हैं.
यह एक लंबी पाली रही है और इस मुक़ाम पर पहुंचते हुए उनकी कविता अपने से या संसार से थकी-ऊबी नहीं है. इसका प्रमाण है इसी वर्ष राधाकृष्ण से आया उनका नया कविता संग्रह ‘कृति और प्रकृति’.
अग-जग को लेकर उनकी बेचैनियां, जीवन से गहरी आसक्ति, हमारे आसपास, ख़ासकर प्रकृति में जो चुपचाप बहुधा अलक्षित ढंग से हो रहा है उसके प्रति सजगता और हमारे सामाजिक जीवन में हो रही उथल-पुथल आदि सभी को उनकी कविता हिसाब में ले रही है. यह भी स्पष्ट है कि ज्ञानेन्द्र प्रकृति को प्राथमिक मानते हैं, कृति बाद में आती है: उनका साहचर्य और संबंध है और उनकी इधर की कविता का अधिकांश प्रकृति के सत्व और मर्म को देखने-समझने से उपजा है.
यह इसलिए महत्व रखता है कि हमारा समय प्रकृति के अपार शोषण और अनियंत्रित विनाश का समय है. हिन्दी कविता में, इन दिनों, पर्यावरण की चिन्ता जब-तब उभरती ज़रूर है पर उसमें मानवीय जीवन के अनिवार्य प्रसंग, प्रकृति से संवाद बहुत कम हो गया है.
ज्ञानेन्द्र की कविता में प्रकृति के क्षरण को लेकर कई चेतावनियां भी हैं. एक यह है:
तुम जो अभी इसे
एक अधपके फल की तरह चूस रहे हो तन्मय
एक दिन बेस्वाद हो जाएगी यह पृथ्वी-तुम्हारे लिए
रसकुण्ड सूख जाएगा
इसके भीतर नहीं, तुम्हारे भीतर.
अन्यत्र वे लगातार प्रकृति में जो चुपचाप घट रहा है उसे मार्मिकता के साथ दर्ज़ करते चलते हैं:
वसंत के बुख़ार से
वसंत के बुख़ार से
वृक्ष धिप रहे हैं
व्यथा के अंगार से
वृक्ष तिप रहे हैं.
पातशाला
कोंपलों के उगने का मौन कोलाहल
पेड़ क्या एक पातशाला है
उसकी रूखी दिगम्बरता को ढांकता आता
एक स्निग्ध हरित उजाला है.
सूर्य उठाता है
सूर्य उठाता है
समुद्र के वक्ष पर
वे हवाएं
जो नौकाओं के पालों में
भर जाती हैं
और मेघों को लाती हैं
मरूओं के मुहाने तक
सूर्य उठाता है
पृथ्वी को वृक्ष-भर
और पृथ्वी
पक्षी-भर उठ जाती है.
ज्ञानेन्द्र पति की कविता का वस्तुजगत् विस्तृत और विपुल है. मिर्च के पौधे, जेठ, जून, धनबाद की सुराही, ढोल-ढमाका, मकर संक्रांति, देवघर, गोपी के फूल, बिजली का खंभा, प्रकाश तरु, बूढ़ी कुर्सी, नटखट आलपिन, साइकिलें, पीपल तले का पम्प, उंटभैये, बिस्तुइया, तिलचिट्टा शिशु, बरामदे का बल्ब, कुकुरझांव, तपस्वी पीपल, लिखनिया दरी, चित्त-धातु, नवोदित चांद का तांबा, इलायची की सुगंध, नागपंचमी, कूड़े का परबत, ललमटिया, कड़कनाथ, शाल-शील, दो का नोट, खारून-खेद, कुशीनारा, ताला आदि सब उनकी कविता में अपनी स्थानीयता और काव्याभा में नज़र आते हैं.
इस वस्तु-जगत् की विपुलता अनेक नए शब्द गढ़ने या बहुतकम पहले कविता में आए शब्दों के प्रयोग की ओर ले जाती है. एक उदाहरण ‘खगडण्डी’ शीर्षक कविता है:
पक्षियों का एक झुण्ड
खगडण्डी खींचता
उड़ता जाता
पीछे-पीछे घुलती रहती आकाश में
उनके गमन की गैल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
