बत्तीस वर्ष पहले 20 जुलाई 1993 को अलीपुरद्वार सबडिवीज़न के उत्तरी भाग में, भूटान की पहाड़ियों के तले, कालजानी नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में भीषण वर्षा हुई— 24 घंटों में 99 सेंटीमीटर. फलस्वरूप अगले दिन कालजानी नदी के किनारे बसे अलीपुरद्वार शहर की रक्षा के लिए बना बांध कई जगहों पर टूट गया तथा पूरा नगर जलमग्न हो गया.
अलीपुरद्वार में उस वक्त मुझे सबडिविजनल ऑफिसर (एसडीओ) के पद पर कार्य करते हुए लगभग एक साल हो चुका था. नियमानुसार अब किसी भी दिन पश्चिम बंगाल में कार्यरत भारतीय प्रशासनिक सेवा के हमारे बैच के साथियों की पदोन्नति होनी थी, बस सरकार के आदेश की प्रतीक्षा थी. इस जगह पर मेरा कार्यकाल हमारे कुछ शुभचिंतक अफसरों के आशानुसार घटना मुक्त रहा था. लेकिन तीन दिन से अविराम वर्षा हो रही थी और इसका वेग बढ़ता ही चला जा रहा था.
कालजानी नदी भूटान की पहाड़ियों से चुपके से निकलकर बक्सा व्याघ्र अभयारण्य तथा जलदापाड़ा राष्ट्रीय उद्यान के घने जंगलों के बीच उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है. वनों से बाहर निकल, नदी मचलकर दक्षिण पूर्वी दिशा में बढ़ती है. इसी जगह कालजानी के दाहिने छोर पर बसा है अलीपुरद्वार शहर. वर्ष के नौ महीने नदी का स्तर काफ़ी कम रहता है और यह मंथर गति से चलती है. पर साल के तीन महीनों में – जुलाई से सितंबर तक – जल प्लावित, किनारों की मिट्टी संभाले, पत्थरों को उठाए मतवाली कालजानी बादलों के उन्माद को पृथ्वी पर उतार देती है.
इसलिए तब का सबडिवीज़न और अभी का अलीपुरद्वार ज़िला इन तीन महीनों में अक्सर बाढ़ से पीड़ित रहता है. उत्तर बंगाल में उन दिनों ग्रामीण अंचलों में अधिकतर मकान, विशेषकर गरीबों के घर, बांस और मिट्टी या इन्हें मिलाकर बनाए जाते थे. इसलिए बरसात में इन्हें अक्सर नुक़सान पहुंचता था लेकिन बाढ़ के समय सिर्फ़ क्षति ही नहीं बड़ी संख्या में ऐसे मकान गिर जाते थे.
1978 में राज्य भर में कई जगहों पर बाढ़ के कारण तबाही मची थी जिसका अक्सर ही अलीपुरद्वार के बुजुर्ग ज़िक्र करते थे. लेकिन यहां के वृद्धों का मत था कि 1952 में परिस्थिति उससे भी विषम थी जब पूरा-का-पूरा शहर जलमग्न हो गया था.
18 जुलाई के प्रातः से ही हो रही बारिश ने उस दिन संध्या तक गंभीर रूप धारण कर लिया था. रात भर की मूसलाधार वर्षा के बाद अगले दिन, रविवार 19 जुलाई, को भी बरसात की गति धीमी नहीं हुई थी. सबडिवीज़न के भिन्न भागों से उस दिन सुबह से ही इलाक़े के बीसियों नदियों में जल का स्तर अत्यधिक बढ़ जाने की ख़बर आने लगी थी.
कालचीनी ब्लॉक से बीडीओ का वायरलेस संदेश आया था कि भूटान की सीमा पर बसे जयगांव, झरना बस्ती और धोते बस्ती में जल ठहर गया है और हाशिमारा के पास रास्ता जल मग्न हो गया है. फालाकाटा ब्लाक के बीडीओ ने बताया था कि मसनाई और दुदुआ नदी में पानी लगातार बढ़ता जा रहा है. कुमार ग्राम तथा अलीपुरद्वार 1 ब्लॉक से भी इसी तरह की खबरें आ रही थीं. शहर में भी कई स्थानों पर स्थिति अच्छी नहीं थी.
अलीपुरद्वार नगरपालिका के 15 नंबर वॉर्ड के नव-निर्वाचित वॉर्ड कमिश्नर ने सूचित किया था कि उनके पूरे क्षेत्र में जल जमा हो गया है. इन सभी जगहों पर कच्चे घरों को नुकसान पहुंचने की खबर के साथ-साथ उनमें रहने वाले परिवारों के राहत के लिए तिरपाल और सूखे खाद्य पदार्थ की मांग भी की गई थी.
यह सब देखते हुए 19 तारीख़ की दोपहर बाद मैंने दफ्तर में 24 घंटे कार्य करने वाला नियंत्रण कक्ष आरंभ कर दिया था ताकि समूचे सबडीविज़न की स्थिति पर नज़र रखी जा सके और राहत कार्यों का संयोजन हो सके. सिविल डिफेंस के अधिकारी, जो ऐसे ही राहत कार्यों के लिए नियोग किए जाते थे, तीन पालों में नियंत्रण कक्ष का परिचालन कर रहे थे.
20 तारीख़ की सुबह के लिए मेरी डायरी में दो महत्वपूर्ण कार्य दर्ज थे. पहला, अलीपुरद्वार शहर में एक सिनेमा हॉल को टैक्स न जमा करने लिये बंद करना, और दूसरा नवनिर्वाचित नगरपालिका के सदस्यों को शपथ दिलवानी थी. प्रातः से ही मूसलाधार वृष्टि हो रही थी तथा शहर के विभिन्न जगहों से जल जमाव की खबर आ रही थी.
साढ़े नौ बजे हमारे दफ्तर के एक डिप्टी कलेक्टर और कर्मचारी-दल ने सिनेमा हॉल पहुंचकर अपनी कार्यवाही आरंभ कर दी. ठीक दस बजे मैंने नगरपालिका की सभा कक्ष में सदस्यों को शपथ दिलाने की प्रक्रिया आरंभ की तथा उसके बाद अध्यक्ष, नगरपालिका का भी चुनाव किया गया.
पिछली बार के जनप्रिय अध्यक्ष, श्री मोनोजीत नाग (जो नगर में दोलोन नाग के नाम से जाने जाते थे), ने ही पुनः यह कार्य भार संभाला. अनुष्ठान के आरंभ में ही उनसे बातचीत के दौरान हमने तय कर लिया था कि शपथ ग्रहण की प्रक्रिया शीघ्र पूर्ण कर के हमें शहर के कई वॉर्डों में जल भराव से उत्पन्न हुई स्थिति का युद्ध स्तर पर मुकाबला करना होगा. इसलिए अंत में ज्यों ही दोलोन बाबू ने शपथ ग्रहण की और शपथ पत्र पर हस्ताक्षर किया, हम सभी बिना चाय-पान की औपचारिकता निभाए वहां से चल पड़े.
वापस दफ्तर पहुंचकर मैं अपने कमरे में न जाकर सीधा एक दिन पहले आरंभ किए गए नियंत्रण कक्ष में जा बैठा. मुझे बताया गया कि सुबह से ही सिंचाई दफ्तर, जो बाढ़ नियंत्रण एवं बांधों की मरम्मत के लिए जिम्मेदार था, के किसी भी अधिकारी से टेलीफोन संपर्क नहीं हो पा रहा है. इसलिए न तो विभिन्न नदियों के जल स्तर के बारे में पता चल पा रहा था और न ही संवेदनशील इलाक़ों की अवस्था के बारे में.
मेरे वहां पहुंचने के पश्चात् पांच-छह घंटे तेज़ रफ़्तार से बीते. एक के बाद एक वायरलेस संदेशों की झड़ी लग गई, फोन की घंटी भी लगातार बजती रही. हर ब्लॉक, हर थाने से एक ही तरह का संवाद था: नदियों और पहाड़ी नालों में जल खतरे के स्तर तक पहुंच गया था या पार कर चुका था. कई जगहों में जल प्लावन से जीर्ण मकानों के गिर जाने से विस्थापित लोग राहत शिविरों में शरण ले रहे थे, हर जगह राहत सामग्री की आवश्यकता थी.
अलीपुरद्वार शहर में भी निचले इलाक़ों में जल भर गया था. हर जगह पक्की सरकारी इमारतों में राहत शिविर खोले गए. शहर में भी कुछ जगहों पर पिछली रात से ही राहत शिविरों में लोग शरण ले रहे थे. 20 तारीख की स्थिति ने हमें फिर कुछ और ऐसे मकान खोजने के लिए मजबूर कर दिया. मैंने नए निर्मित अग्निशमन दफ्तर की विशाल इमारत और हैमिल्टन स्कूल के अलावा नौ और संस्थाओं को चुनकर तत्काल वहां राहत शिविर चलाने का निर्देश दिया. लेकिन मुझे लगने लगा कि यह व्यवस्था शायद पर्याप्त न हो.
मूसलाधार वर्षा बिना थमे चलती रही. मेरे पास खबर आने लगी कि शहर के अधिकतर वॉर्डों में भी जल ठहर ही नहीं गया है बल्कि उसका स्तर भी बढ़ता चला जा रहा है. यह मुझे तब पता चला जब मेरे दफ्तर के कुछ अधिकारी और कर्मचारी घर वापस जाने के लिए मेरे पास अनुमति लेने आने लगे— उनके घरों में बिन बुलाए मेहमान की तरह पानी घुस आया था. शहर में बहुत कम गाड़ियां चल रही थीं, और जो चल रही थीं उनमें से अधिकतर प्रशासन की थीं.
लगभग ढाई-तीन बजे मेरे पास नगर पालिका के अध्यक्ष, दोलोन नाग, आए. उनके चेहरे को देखते ही मैं समझ गया कि वे क्या कहेंगे. वो बोले, ‘एसडीओ साहेब, बांधे फाटल धोरेचे (बांध टूट रहा है).’
उस समय मेरा सबसे पहला काम था शहर के हर वॉर्ड में चिह्नित राहत केंद्रों की जानकारी लोगों तक पहुंचाना. हमारे पास सिर्फ़ दो गाड़ियां थीं जिन्हें मैंने उसी समय रवाना कर दिया. दोलोन बाबू ने मुझे बताया कि उन्होंने कई वॉर्डों के सदस्यों को भी अपने-अपने वॉर्डों में यह जानकारी देने का आग्रह किया था तथा वह उसमें लगे हुए थे. फिर भी सारे वॉर्डों में इस विपदा की चेतावनी शायद नहीं पहुंचाई जा सके.
स्थानीय राजनीतिक पार्टियों, सत्तारूढ़ तथा विपक्ष दोनों, के शीर्ष नेता उस समय नियंत्रण कक्ष में मुझसे मिलने पहुंचे. मैंने उनसे अनुरोध किया कि आप सब अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा बांध के टूटने तथा राहत शिविरों की जानकारी लोगों तक पहुंचाएं. किंतु कुछ ही देर में वापस आकर उन्होंने बताया कि वे असमर्थ थे. उन्होंने मुझे यह भी बताया कि ध्वस्त बांध से आया कालजानी का पानी नियंत्रण कक्ष की ड्योढ़ी तक आ चुका था.
जिला कलेक्टर को मैंने पहले ही बांध के टूटने का वायरलेस संदेश भेज दिया था. सोचा अब टेलीफोन से स्थिति के बारे में विस्तार से उन्हें बता दूं. टेलीफोन का चोंगा उठाया तो पता चला कि उसने काम करना बंद कर दिया है. इस बीच वायरलेस से ख़बरें आती जा रही थीं जिससे मुझे ऐसा आभास हो रहा था जैसे मेरे संपूर्ण सबडिवीज़न में भयानक बरसात से प्रेरित व पोषित बाढ़ का तांडव चल रहा है.
ज़िला प्रशासन से संपर्क कटने के बाद मेरे पास राहत की व्यवस्था करने का एक ही उपाय बचा था. मैंने हाशिमारा स्थित सेना के कमान अधिकारी, कर्नल कपूर, को वायरलेस द्वारा बचाव तथा राहत कार्यों के लिए सेना की इकाई को अति शीघ्र अलीपुरद्वार तथा कालचीनी ब्लॉक में भेजने का अनुरोध किया. उस दिन का यह अंतिम वायरलेस मैसेज था, क्योंकि थाने के वायरलेस कक्ष में भी पानी घुस चुका था.
(क्रमशः)
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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