पत्रकारिता में संपादकों की दुनिया सत्ता के साथ ही बदल गई…

इस देश की पत्रकारिता में, वह अंग्रेजी की हो, हिंदी की या किसी अन्य भारतीय भाषा की, एक समय संपादक बहुत शक्तिशाली हुआ करते थे. अब वैसे संपादक या तो हैं ही नहीं या हैं तो अधिकांश बंगला, गाड़ी आदि की चाह में इतने अशक्त हो गए हैं कि उनके होने का इसके सिवा कोई अर्थ नहीं रह गया है कि उनके रहते उनके मालिकान को अलग से पीआरओ नहीं रखना पड़ता.

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(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Bill Kerr/Flickr, CC BY-SA 2.0)

नई दिल्ली: गोस्वामी तुलसीदास ने अपने ‘रामचरितमानस’ में लिखा है कि अयोध्या के महाराज दशरथ ने एक दिन स्वभावत: दर्पण में अपना मुख देखकर मुकुट सीधा किया तो पाया कि उनके कान के समीप के बाल सफेद हो गए हैं. इससे उन्हें लगा कि वृद्धावस्था उनको उनके ज्येष्ठ पुत्र राम को युवराज-पद देकर अपने जन्म व जीवन का लाभ लेने का उपदेश दे रही है.

सच कहता हूं, उसी अयोध्या में जिंदगी गारत करते-करते मेरे बाल असमय यानी समय से पहले ही सफेद होने लगे तो मैं भी उम्मीद करने लगा कि किसी न किसी दिन वृद्धावस्था मुझे भी ऐसा कोई उपदेश देने जरूर आएगी.

लेकिन जैसे बालों की सफेदी, वैसे वृद्धावस्था भी एक दिन असमय ही पास आ धमकी और मेरी उपदेश कामना को चिढ़ाती हुई-सी बोली, ‘दशरथ समझते हो अपने को? महाराज हो जो मैं तुम्हें उपदेश दूं? जाओ, नहीं देती. दूं भी क्यों, जब तुम्हारी जिम्मेदारियां ही तुम्हें बूढ़ा होने देने के पक्ष में नहीं हैं? फिर भी दिक् करोगे तो उपदेश के बजाय दो चार नए क्लेश दे दूंगी.’

वह दिन है और आज का दिन है, कानों के आस-पास की कौन कहे, चांद के बाल अब या तो बचे ही नहीं हैं या सफेद हो गए हैं. फिर भी अपना-सा मुंह लिए रोज वहीं, उसी अयोध्या में जीवन की तलाश में दिन-रात एक करने को अभिशप्त हूं, जिसमें दूर-दूर से लोग और भी जानें क्या-क्या तलाशने आते रहते हैं. लेकिन परेशान मत होइए. मैं यह बातें आपके कंधे का सहारा लेकर अपना रोना रोने की सहूलियत हासिल करने के लिए नहीं बता रहा. यह बताने के लिए भी नहीं कि इस तलाश में मैंने कौन-कौन से तीर मार लिए हैं.

वह क्या है कि अब तक के जीवन में पत्र-पत्रिकाओं और पोर्टल्स वगैरह के लिए थोड़ी बहुत कलम घिसाई के अलावा कुछ खास कर नहीं पाया हूं और अपने तमाम तीरों के तुक्के में बदल जाने के कारण, जिसे शिखर कहते हैं, उसे तो दूर से भी नहीं देख पाया हूं. दशक पर दशक बीतते गए हैं, लेकिन संपादकों से मिलती आई थोड़ी पुचकारों और ढेर सारी दुत्कारों के बीच उनकी दुनिया भी मेरे निकट प्रायः अपारदर्शी व अबूझ ही बनी रही है.

वह वैसी ही अबूझ बनी रहती, अगर कुछ रोज पहले एक ‘बंद-बंद’ संपादकप्रवर मुझे फोन करके एकदम से ‘खुल’ नहीं जाते. अब क्या बताऊं आपको कि उनकी मान्यता रही है कि कोई भी पत्रकार देश या उसके किसी प्रदेश की राजधानी अथवा किसी बड़े शहर में नहीं रहता, तो वह न अपनी कस्बाई गंध से मुक्त हो सकता है, न ही अच्छा लिख सकता है.

चूंकि यह नाचीज़ भी ऐसे ही पत्रकारों में शामिल है, इसलिए इससे पहले कभी उनका फोन सुनने का सौभाग्य नहीं पाया. अतएव हैलो करते ही उन्होंने कहा कि मैं फलां बोल रहा हूं, तो एक ही बात मन में आई कि उन्होंने मेरे बालों की सफ़ेदी की कद्र की या उन पर तरस खाया है. इस वयाधिक्य को छोड़ उनकी निगाह में, भला मैं क्या और मेरी औकात क्या?

लेकिन जो भी हो, अब उनका कृतज्ञ होने का मन होता है कि बातचीत में जल्दी ही वे ऐसी ‘खरी-खरी’ और ‘खुली-खुली’ पर उतर आए, जिसे सुनकर लगा कि मुझे अचानक संपादकों की अपारदर्शी दुनिया के आर-पार देख सकने की दृष्टि मिल गई है. चूंकि इस दृष्टि ने ‘जो छिपाने की थी, वो बात बता दी मुझको’, इसलिए सोचता हूं कि उसे आपको भी बता दूं.

वह जो थे एम. चेलापति राव!

लेकिन पहले थोड़ी उधर-उधर की. हम जानते हैं कि इस देश की पत्रकारिता में, वह अंग्रेजी की हो, हिंदी की या किसी अन्य भारतीय भाषा की, एक समय संपादक बहुत शक्तिशाली हुआ करते थे. कहना चाहिए, सर्वशक्तिमान. बहुतों की निगाह में ‘कविर्मनीषी परिभूः स्वयंभू’. कम से कम मुझे जैसों को बाहर-बाहर से कुछ ऐसा ही लगता था.

जब हम पत्रकारिता के छात्र थे, एक प्रशिक्षक हमें 1946 से 1978 तक लखनऊ के अंग्रेजी दैनिक ‘नेशनल हेराल्ड’ के संपादक रहे एम. चेलापति राव के किस्से सुनाया करते थे, जिनमें से एक कुछ इस तरह था:

अपनी धुन के धनी और अपने आदर्शों व नियम-कायदों के पक्के एम. चेलापतिराव किसी को भी, वह कितना भी बड़ा या बलवान क्यों न हो, अपनी पत्रकारीय स्वतंत्रता के आड़े नहीं आने देते थे. किसी को सिर आंखों पर बिठाने का तो खैर सवाल ही नहीं था. यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू को भी, जिनके प्रयत्नों से ‘नेशनल हेराल्ड’ अस्तित्व में आया था, उनसे मिलना हो तो दूसरे मुलाकातियों की तरह अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता था.

एक बार इंदिरा गांधी उनके कार्यालय आईं तो वे उनका स्वागत करने को कौन कहे, शिष्टाचार भेंट के लिए भी अपने कक्ष से बाहर नहीं आए थे. इसके बावजूद नेहरू उनको भारत का सबसे काबिल पत्रकार मानते थे और ‘नेशनल हेराल्ड’ के रजत जयंती समारोह में कहा था कि लोग सोचते हैं कि यह मेरा अखबार है. लेकिन असल में यह चेलापति राव का अखबार है, जिन्होंने इसे इस मुकाम तक पहुंचाया है.

इस सदाशयता के बावजूद चेलापति राव को नेहरू की नीतिगत कमजोरियों को बख्शना गवारा नहीं था और वे उनकी मुखर आलोचना किया करते थे.

‘नौकरी करने दीजिए प्लीज़!’

उक्त संपादकप्रवर का फोन सुनते हुए मुझे यह किस्सा बार-बार याद आता रहा और अब इस नतीजे पर पहुंच गया हूं कि अपनी हिंदी में, कहना चाहिए, उसकी मुख्यधारा पत्रकारिता में, वैसे संपादक या तो हैं ही नहीं या बंगला, गाड़ी व नौकर की चाह में इतने अशक्त हो गए हैं कि उनके होने का इसके सिवा कोई अर्थ नहीं रह गया है कि उनके रहते उनके मालिकों को अलग से पीआरओ नहीं रखना पड़ता.

यह नतीजा गलत निकले तो मुझे बहुत खुशी होगी, लेकिन अभी तो मेरा इस बात की खुशी मनाने का मन हो रहा है कि मुझ जैसे किसी शख्स के बाल धूप में भी सफेद हो जाएं, तो ये संपादक उसके समक्ष अपनी अशक्तता को स्वीकारने लगते हैं.

हां, संपादकप्रवर ने भी स्वीकारा. क्या पता, यह स्वीकार ईमानदार है या नहीं, लेकिन है तो नाउम्मीदी की सांसें कम कर सकता है.

बहरहाल, जैसा कि पहले बता आया हूं, मेरे काले बालों वाले दौर में ये संपादकप्रवर मेरी ‘मेहनत’ को प्रायः कुछ इस तरह घोंट जाते थे कि उसका कुछ पता ही नहीं चलता था. कभी उसकी बाबत पूछ लूं तो दुत्कार भी देते थे. पीठ पीछे कहते थे: ‘कल का लौंडा, चला है कैफियत तलब करने. अरे, पहले दूध के दांत तो टूट जाने देता.’

लेकिन इस बार उन्होंने मेरी भेजी अयाचित सामग्री से ही बात शुरू की, ‘लिखा तो बहुत अच्छा है आपने, बहुत मेहनत की है.. लेकिन माफी चाहता हूं. बहुत असुविधाजनक निष्कर्ष निकाले हैं आपने… प्लीज़, नौकरी करने दीजिए मुझे.’

मैं क्या कहता? इतना भर कह पाया कि ‘आप मुझसे भी ज्यादा असहाय हो गए हैं, तो कोई बात नहीं.’ इस पर वे देर तक अपने भीतर का गुबार निकालते रहे.

फोन काटा तो मुझे याद आया कि ऐसे ही एक और संपादक थे. संपादक तो खैर अभी भी हैं वे, पर मेरे संपादक नहीं रहे. कृपया नाम मत पूछिए. वैसे भी नाम में कुछ नहीं रखा, बोलता तो वास्तव में काम है.

और काम की बात यह कि मनमोहन सिंह के राज में उनकी सरकार की बखिया उधेड़ते-उधेड़ते मैं इन संपादक जी का बहुत प्रिय लेखक हो गया था. किसी हफ्ते उनके लिए कुछ नहीं लिखता तो तकाजा करते. कहते, सत्ता की पोल खोलना तो कोई तुमसे सीखे. मुझे भी खूब मजा आता, प्रासंगिक होना भला किसे अच्छा नहीं लगता?

लेकिन तभी तख्त और ताज बदल गए. लेकिन अफसोस कि मैं नाशुक्रा नहीं बदला. तख्त और ताज दोनों के समक्ष तना और उनका आलोचक बना रहा. पहले की ही तरह.

लेकिन इन संपादक जी ने मुझे छापना बंद किया तो बंद ही कर दिया. एक दिन पूछा कि क्या मैं इतना खराब लिखने लगा हूं तो छूटते ही बोले, ‘अरे भाई, अभी यह सरकार नई-नई आई है और तुम जैसे पापी उसे हनीमून भी नहीं मनाने दे रहे, कोंचे जा रहे हैं.’

ग्यारह साल का हनीमून!

मेरे पास अपना पाप स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं था. लेकिन अब देखता हूं कि ग्यारह साल बीत गए हैं और ‘नई’ सरकार का हनीमून है कि खत्म होने को ही नहीं आ रहा! एक दिन धृष्ट होकर पूछ लिया कि किसी सरकार का इतना लंबा कोई और हनीमून याद है उनको, तो पहले नथुने फड़काए, फिर बोले, ‘आप तो कुछ समझते ही नहीं हैं!… कोई रोज-रोज बलिदान नहीं देता रह सकता. नीम की पत्तियां स्वास्थ्य के लिए कितनी भी लाभदायक हों, उन्हें खाकर पेट नहीं भरा जा सकता और भूख सबको लगती है.’

उनकी बात तो तुरंत समझ गया मैं, लेकिन भूख अभी तक समझ में नहीं आई. इसलिए उस पर दया भी नहीं आई. जो आई, वह थी एक और संपादक की याद.

पहले किसी दिन उन्हें देशांतर यानी विदेशों से संबंधित कोई टिप्पणी भेज दूं तो फोन करके चिढ़ाते, ‘स्वदेशवासियों के दुख-दर्द कम पड़ गए क्या? देश में कोई विषय नहीं बचा? या यह छूट लेना चाहते हो कि दूसरे, दूर-दराज के, देशों से कोई यह कहकर तुम्हारे कान पकड़ने या तुम्हें कठघरे में खड़ा करने नहीं आएगा कि तुमने उसके देश के बारे में पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर गलत-सलत लिख डाला!’

लेकिन इधर देखता हूं कि वे खुद अंतरराष्ट्रीय विषयों के ‘विशेषज्ञ’ हो गए हैं. अपने अखबार में कभी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के प्रधानमंत्री को कोसते हैं, कभी ब्रिटेन के और कभी अमेरिका के राष्ट्रपति की. इन सबसे बहुत शिकायतें रहने लगी हैं उनको. बस, अपने भारत वाले प्रधानमंत्री को छोड़कर. हां, अभी नेपाल को भी छोड़ रखा है उन्होंने.

‘आजकल तो आपने धरती को उसकी धुरी पर पूरे 360 अंश घुमा दिया है!’

मैंने मैसेज किया तो जवाब आया, ‘क्या करूं, अपने वाले के गुन गाते-गाते थक गया हूं और अवगुन गिनाने की राह में बहुत से जोखिम दिखते हैं. खतरे भी और मनाहियां भी.’

यह ईमानदारी भी मुझे भायी. लेकिन रीढ़हीनता को उसकी छाती पर सवार देखकर पहले इरतिजा निशात का शे’र याद आया: कुर्सी है तुम्हारी ये जनाजा तो नहीं है, कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते.

अक्ल पर पत्थर!

फिर एक और संपादक बीस-पच्चीस साल पहले मुझसे प्रायः कहा करते थे कि ‘ना काहू से दोस्ती ना काहू से वैर’ वाली तुम्हारी निर्भीकता किसी दिन तुम्हें बहुत यश दिलायेगी. ऐसे ही लगे रहे तो बहुत ऊंचे जाओगे.’

पर अब वे संपादक कम ‘संरक्षक’ ज्यादा हो गए हैं. कहते हैं कि जो देश-काल कुछ नहीं देखता, जिसे भी देखो, उसी के, यहां तक कि अतुलित बलशालियों के ही पीछे पड़ा रहता है, यह भी नहीं समझता कि सत्ता बहुत शक्तिशाली होती है, उसका तुम्हारे जैसा ही हाल होता है. माया मिल पाती है, न राम. फलस्वरूप एक दिन या तो भूख-प्यास तोड़ देती हैं उसे या किसी चौराहे पर ठोंक दिया जाता है. न कोई अकड़ काम आती है, न कोई साथ देता है. देश और दुनिया अपनी राह चलते रहते हैं.

उनके विपरीत एक और संपादक, जिन्हें मेरे सारे बाल सफेद हो जाने के बावजूद मेरे लिए ‘तुम’ से ‘आप’ पर ‘उतरना’ कुबूल नहीं है, मुझसे प्रायः कहते हैं कि ‘तुम अपने लेखों में कुछ ज्यादा ही अकल लगा देते हो.’ फिर पूछते हैं कि हिंदी में इतनी अक्ल वाली चीजें भला कौन पढ़ता है और ‘ज्ञान’ देते हैं कि कुछ हल्का-फुल्का लिखा करो.

पिछले दिनों पूछ लिया मैंने कि क्या आपने इस निष्कर्ष वाला कोई अध्ययन कराया है कि हिंदी में अक्ल वाली चीजें नहीं पढ़ी जातीं, तो उन्होंने मेरी ओर कुछ ऐसे देखा जैसे कहना चाहते हों कि ‘तुम्हारी अक्ल पर पत्थर पड़ गए हैं!’

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)