श्रम नीति, बिजली संशोधन विधेयक के मसौदे के ख़िलाफ़ एकजुट हुए यूनियन व किसान संगठन

संयुक्त किसान मोर्चा और दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के मंच ने फैसला किया है कि देश के हर ज़िले के श्रमिक और किसान विद्युत संशोधन विधेयक के मसौदे और केंद्रीय श्रम मंत्रालय की श्रम नीति के मसौदे के ख़िलाफ़ राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपेंगे. यह अभियान एक महीने तक चलेगा. उनका कहना है कि केंद्र सरकार की ये नीतियां कॉरपोरेट-समर्थक, श्रमिक-विरोधी और किसान-विरोधी हैं.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

नई दिल्ली: विभिन्न किसान संगठनों के छत्र संगठन संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) और दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों (सीटीयू) के मंच ने फैसला किया है कि देश के हर जिले के श्रमिक और किसान विद्युत संशोधन विधेयक के मसौदे और केंद्रीय श्रम मंत्रालय की श्रम नीति के मसौदे के खिलाफ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ज्ञापन सौंपेंगे.

बताया गया है कि 26 नवंबर को जिला कलेक्टरों के माध्यम से राष्ट्रपति को यह संयुक्त ज्ञापन सौंपा जाएगा.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले सप्ताह आयोजित सीटीयू और एसकेएम की संयुक्त बैठक ने ‘केंद्र सरकार की कॉरपोरेट-समर्थक, श्रमिक-विरोधी और किसान-विरोधी नीतियों को चुनौती देने के लिए एकजुटता के साथ समन्वित और समकालिक कार्रवाई जारी रखने का संकल्प दोहराया.

बैठक में सीटीयू और एसकेएम के मांगों के चार्टर के साथ-साथ सभी जिलों और राज्य मुख्यालयों में उनके सामान्य मुद्दों पर एक महीने का अभियान चलाने का निर्णय लिया गया, जिसका समापन 26 नवंबर को होगा.

संयुक्त बयान में कहा गया, ‘सभी जगह का नेतृत्व भारत के राष्ट्रपति को संबोधित चिंताओं और मांगों का एक ज्ञापन सौंपेगा. बैठक में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की रक्षा के लिए जनता द्वारा अभियान चलाना और केंद्र सरकार की कॉरपोरेट-समर्थक, मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी दमनकारी नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना बेहद ज़रूरी है, जो लगातार प्रतिशोधी और दमनकारी होती जा रही हैं.’

बयान में आगे कहा गया है कि केंद्र सरकार अंतरराष्ट्रीय वित्त के हितों की सेवा कर रही है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ व्यवस्था से भारतीय किसानों, मज़दूरों, छोटे व्यवसायों और व्यापार जगत की रक्षा करने में विफल रही है.

बयान में आगे कहा गया है, ‘सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों और सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण के नए प्रयास किए जा रहे हैं, जिनमें सबसे ताज़ा प्रयास प्रस्तावित विद्युत संशोधन विधेयक 2025 और श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय द्वारा श्रम नीति का मसौदा है. चार श्रम संहिताओं के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए राज्य सरकारों को दरकिनार करने और सरकारी मशीनरी के ज़रिए किसानों की ज़मीन हड़पने की कोशिशें की जा रही हैं.’

श्रम नीति और बिजली संशोधन बिल का विरोध क्यों हो रहा है

बता दें कि मोदी सरकार द्वारा श्रम सुधार के नाम पर लाए गए तीन विधेयकों- औद्योगिक संबंध संहिता बिल 2020सामाजिक सुरक्षा संहिता बिल 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता बिल 2020– को संसद से पारित कराया था.

इन कानूनों के जरिये जहां एक तरफ सरकार ने सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाकर इसमें गिग वर्कर और अंतर-राज्यीय प्रवासी मजदूरों को शामिल करने का प्रावधान किया है, वहीं दूसरी तरफ यह बिना सरकारी इजाजत के मजदूरों को नौकरी पर रखने एवं उन्हें नौकरी से निकालने के लिए नियोक्ता (एम्प्लॉयर) को और अधिक छूट प्रदान कर दिया है.

शेयरिंग इकोनॉमी जैसे- उबर एवं ओला के ड्राइवर, जोमैटो, स्विगी आदि के डिलीवरी पर्सन के रूप में काम करने वाले लोगों को गिग वर्कर कहा जाता है.

इस तरह की नौकरियां ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, इंडिपेंडेंट कॉन्ट्रैक्टर, ऑन-कॉल वर्कर आदि से जुड़ी हुई होती हैं, जहां कर्मचारी कंपनी से बंधे नहीं होते और वे उतने समय के लिए अपना काम चुन सकते हैं, जितने समय तक काम करना चाहते हैं.

विधेयक में सरकार ने हड़ताल पर जाने के मजदूरों के अधिकारों पर अत्यधिक बंदिश लगाने का प्रावधान किया गया है.

इसके साथ ही नियुक्ति एवं छंटनी संबंधी नियम लागू करने के लिए न्यूनतम मजदूरों की सीमा 100 से बढ़ाकर 300 कर दिया गया है, जिसके चलते ये प्रबल संभावना जताई जा रही है कि नियोक्ता इसका फायदा उठाकर बिना सरकारी मंजूरी के ज्यादा मजदूरों को तत्काल निकाल सकेंगे और उसी अनुपात में भर्ती ले लेंगे.

इसके अलावा श्रम मंत्रालय ने संसद में पारित एक संहिता में कार्य के घंटे को बढ़ाकर अधिकतम 12 घंटे प्रतिदिन करने का प्रस्ताव दिया है. अभी कार्य दिवस अधिकतम 10.5 घंटे का होता है.

बिजली वितरण के क्षेत्र में निजी कंपनियों के प्रवेश को सक्षम बनाने वाला विवादास्पद विद्युत संशोधन विधेयक, 2022 विपक्ष के विरोध के बीच लोकसभा में पेश किया गया था.

विधेयक में बिजली वितरण क्षेत्र में निजी कंपनियों के प्रवेश की अनुमति और उपभोक्ताओं को कई सेवा प्रदाताओं में से किसी एक को चुनने का विकल्प देने की बात कही गई है.

आलोचकों का कहना है कि यह विधेयक संविधान के संघीय सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, बिजली क्षेत्र के अंधाधुंध निजीकरण की अनुमति देता है, साथ ही इसके लिए राज्यों के साथ परामर्श को दरकिनार कर दिया गया, जबकि बिजली समवर्ती सूची में उल्लिखित विषय है.

इन विधेयकों का शुरू से ही विपक्ष, विभिन्न संगठनों और किसान विरोध कर रहे हैं.