छठ: सूरज की स्मृति और प्रवासी की घर वापसी

छठ केवल पूजा का नहीं, बल्कि घर लौटने, पहचान हासिल करने और सवाल पूछने का पर्व है. शारदा सिन्हा सिर्फ सूरज की आराधना नहीं करती थीं, उनके गीत रेलगाड़ियों के डिब्बों में, आंगन की हवा में, रेडियो पर बजते थे. उनकी आवाज़ पीढ़ियों को जोड़ती थी. उंनका संगीत घर का मानचित्र बन जाता था.

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भोर से पहले शारदा सिन्हा के गीत छठ के घाटों पर पहुंच जाते हैं. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

केलवा के पात पर उगेलन सूरज देव…’

‘उग हो सुरुज देव…’

भोर से पहले शारदा सिन्हा के गीत छठ के घाटों पर पहुंच जाते हैं. सूरज की पहली किरण पानी में चमकती है. हवा में अगरबत्ती और गुड़ की खुशबू घुलती है. बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, नेपाल की तराई, सब जग उठते हैं. दूर बसे प्रवासियों के लिए भी यह घर लौटने का समय है. छठ पूजा सिर्फ अनुष्ठान नहीं, ध्वनि, सुगंध और सूर्य में बसा अपनापन है.

बिहार की नदियां हिमालय से निकलती हैं. कमला, कोसी, बलान, अधवारा समूह की नदियां और धार आदि हमारी गीतों और स्मृतियों को साथ लिये बहती हैं.

छठ के समय ये नदियां मंदिर में बदल जाती हैं. भोर की पहली गुलाबी रोशनी में महिलाएं रंग-बिरंगी साड़ियों में, सिर ढंके हुए, ठंडे पानी में पैर रखते हुए, बांस की टोकरी में फल, ठेकुआ और दीए संतुलित करती हैं. पुरुष चुपचाप खड़े होते हैं और कभी-कभी गुनगुनाते हैं:

सकल जग तारिणी हे छठी माता, सबक शुभकारिणी हे छठी माता

सूर्यास्त के समय, जब पहला अर्घ्य उठता है, मौन छा जाता है. पानी सुनहरी रोशनी में झिलमिलाता है; हवा में गुड़ और गन्ने की खुशबू. भक्त झुकते हैं, गीत मद्धिम पड़ते हैं, नदी याद करती है. दीप और पानी, स्मृति और प्रवास की इस झिलमिलाहट में उन लोगों की कहानी है, जिन्होंने कभी विश्वास करना नहीं छोड़ा कि उजाला साझा किया जा सकता है.

छठ पूजा सबसे शुद्ध रूप में होती है, ना मूर्ति, ना पुजारी, केवल पानी, सूर्य और आभार. यह शायद भारत का सबसे पारिस्थितिक त्योहार है, जहां प्रकृति की पूजा लोक की पूजा बन जाती है.

धर्म से भी पुरानी आस्था और स्मृति

मंदिरों के बनने से बहुत पहले यह रिवाज मौजूद था. इसके जड़ छठी मैया के स्तोत्रों में हैं, बिहार की कृषि भूमि में हैं, जहां जीवन का आधार हमेशा सूर्य और पानी रहा. आभार अनुष्ठान बन गया; अनुष्ठान पहचान बन गया.

फलों, बांस और मिट्टी के दीयों की सजावट, उपवास की अनुशासनिकता और तालाबों की सफाई, ये सब प्रकृति के अनुकूल हैं. जो शहर अब सस्टेनेबल प्रैक्टिस कहते हैं, वह ग्रामीण आस्था की भाषा है.

छठ को सद्भाव और समानता का प्रतीक कहा जाता है, लेकिन यह भी सच है कि अक्सर दलितों के घाट अलग होते हैं. इस तरह सामाजिक कुरीति पर्व पर हावी हो जाती है.

सूर्य की अराधना करती महिलाएं. (फोटो: पीटीआई)

गांव से महानगर तक लौटने की यात्रा और छठ की स्मृति

छठ यात्रा करती है-रेल के डिब्बों में ठेकुआ, नारियल और यादों के साथ. जहां भी बिहारी या पुरबिया जाते हैं, छठ उनके साथ चलता है. पटना, दरभंगा या आरा से निकले लोग जब दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, सूरत या बेंगलुरु में छोटे-छोटे घाट बनाते हैं, तो वे शहरों में अपने गांव की मिट्टी बसाते हैं.

दिल्ली की यमुना हर साल गंगा बन जाती है, जुहू बीच और दादर की गलियां गांवों की चौपालों में बदल जाती हैं. कोलकाता की हुगली, सूरत के टैंक, बैंगलोर की झीलें-सब स्मृतियों के जलाशय बन जाती हैं. प्रवासी यमुना को गंगा, वर्षा टैंक को कमला, और स्मृतियों को भूगोल बना लेते हैं. 

यह आस्था सीमाओं के पार भी बहती है. मधुबनी से मैनहैटन, पटना से पर्थ, दरभंगा से दुबई तक-छठ का सूरज हर टाइमज़ोन में एक-सा उगता है. न्यू जर्सी की झीलों, लंदन और टोरंटो के पार्कों, दोहा और अबूधाबी के इस्पाती टबों या पूलों में भी वही अर्घ्य चढ़ता है. शारदा सिन्हा की आवाज़ यूट्यूब के ज़रिए गांवों और समुद्रों के बीच सेतु बन जाती है.

दूसरी पीढ़ी के बच्चे, जिन्होंने कभी करेह, सोन या गंगा नहीं देखी, इस पर्व में अपने माता-पिता की कहानियां सुनते हैं-मिट्टी, संघर्ष और पहचान की. उनके लिए छठ उस घर की खिड़की है, जहां वे लौट नहीं सकते, पर जिसे अब भी अपना मानते हैं.

जहां भी बिहारी या पुरबिया जाते हैं, छठ उनके साथ चलता है.

इस बार सूर्योपासना के साथ राजनीतिक तपिश बढ़ रही है. छठ और विधानसभा चुनाव दोनों बिहार की नब्ज़ पर एक साथ दस्तक दे रहे हैं.

दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों में छठ अब ‘अस्मिता की राजनीति’ का प्रतीक भी बन गया है. नदी के किनारे और समुद्र तटों पर बने अस्थायी घाट बिहार की सांस्कृतिक और राजनीतिक शक्ति के मंच हैं. राजनीतिक दल अब इस भावनात्मक ऊर्जा को अनदेखा नहीं कर सकते. यह प्रवासी मतदाता की सांस्कृतिक और चुनावी ताक़त का संकेत है. इस बार प्रवासी बिहारी जब घर लौट रहा है, उसके पास छठ का बुलावा है और साथ ही मतदान का दायित्व भी.

शारदा सिन्हा के छठ गीत आज भी इस महापर्व की जान हैं.

सूरज को जो हम अर्पित करते हैं

शारदा सिन्हा जब गाती थीं, वह सिर्फ सूरज की आराधना नहीं करती थीं, वह त्योहार की आत्मा बन जाती थीं. उनके गीत रेलगाड़ियों के डिब्बों में, आंगनों की हवा में, रेडियो पर बजते थे. उनकी आवाज़ पीढ़ियों को जोड़ती थी; लोकसंगीत उनके सुरों में घर का मानचित्र बन जाता था.

छठ की मेरी आदिम स्मृति दादी की है, तालाब के किनारे दीप जलाते हुए, उसका प्रतिबिंब ठहरे जल में थरथरा रहा था. महिलाएं गा रही थीं, उनकी आवाज़ें लहरों की तरह उठती-गिरतीं, सोना सटकुनिआ हो दीनानाथ, घूमै छह संसार… बचपन में ही समझ गया था, यह मौन भी एक प्रार्थना है.

अब वही तट यादों में है. छठ आता है, घाट सजते हैं, लेकिन कुछ अनुपस्थित है, शारदा सिन्हा की वह आवाज़. दशकों तक वह छठ थींइसकी धुन और मातृभाषा. उनके बिना भोर थोड़ी कम उजली लगती है, हवा में एक स्वर कम है. 

अब वह हमारे बीच नहीं हैं. घाटों पर उनके रिकॉर्डिंग वाले लाउडस्पीकर बजते हैं. जब उनका स्वर उठता है:हे गंगा मैया, पूजे चरण तहार…’ 

कुछ महिलाएं अपनी आंखें पोंछती हैं. सूरज उगता है. स्मृति गीत को जीवित रखती है. गायिका चली गई, लेकिन यादें बनी रहती हैं.

मैं अब वर्षों से घर से दूर हूं. उस तालाब से जहां परिवार हाथ जोड़कर खड़ा होता था, जहां दीपक ठंडी हवा में कांपते थे. बैंगलोर में ऐसे घाट नहीं, न गुड़ की गंध, न गन्ने की पत्तियों की सरसराहट. फिर भी, जब सूरज टावरों के पीछे डूबता है, मैं आंखें बंद करता हूं-और वही स्वर लौट आता है. वही जो गांव के लाउडस्पीकरों से खेतों तक  ध्वनित था, जिसने त्योहार को सांस दी थी.

(आशुतोष कुमार ठाकुर एक मैनेजमेंट प्रोफेशनल हैं, साहित्य और कला पर नियमित लिखते है.)