अपनी हिंदी में ‘राजा बोला…’ से शुरू होने वाली एक लोकप्रिय कविता है. उसमें राजा के सुबह-सुबह ‘रात है…’ कहते ही रानी, मंत्री व सभासद (यानी दरबारी) वगैरह सब के सब ‘रात है, रात है’ कहते हुए उसकी हां में हां मिलाने लग जाते हैं.
पाठभेद से कोई इस कविता को गोरख पांडे की बताता है तो कोई गोबिंद प्रसाद की और जब-तब इसे लेकर विवाद भी खड़ा हो जाता है. लेकिन इस बात को लेकर कभी कतई कोई विवाद नहीं होता कि राजा सुबह-सुबह तो क्या, भरी दोपहरी को भी रात बताने लग जाए तो खुशामदी मंत्री, संतरी व दरबारी उसको यह बताने की हिम्मत नहीं कर पाते कि ‘नहीं हुजूर, इस वक्त रात नहीं, दोपहर है.’
इसलिए नहीं कि उनके बीच प्रेमियों-प्रेमिकाओं जैसा कोई ‘तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे’ या ‘अपनी जुबां से आपके जज़्बात कहेंगे’ जैसा करार होता हो और वे उसके टूटने को लेकर डर जाते हों. वे यह खुशामद सिर्फ स्वामिभक्ति या राजभक्ति से प्रेरित होकर भी नहीं ही करते. फिर? आइए, नवाबों के जमाने की सूबा-ए-अवध की एक नजीर से समझते हैं.
जानकार बताते हैं कि ‘नवाब’ शब्द राजा का पर्याय नहीं होता लेकिन इस सूबे की गंगा-जमुनी तहजीब के पैरोकारों ने जैसे शादी के साथ बियाह, वैसे ही राजा के साथ नवाब बोलकर उन्हें समानार्थी बना डाला है. इतना ही नहीं, नवाब गाजीउद्दीन हैदर (1769-1827) के वक्त अंग्रेजों की शह से नवाबों को राजा तो खैर क्या चीज़ है, बादशाह बनाने की परंपरा शुरू हुई तो वह भी कुछ कम ‘समृद्ध’ नहीं हुई थी.
इसी परंपरा के तहत आठ जुलाई, 1837 को मुहम्मद अली शाह सूबे के बादशाह (हां, नवाब नहीं, दिल्ली की मुगल सल्तनत के दबदबे से आज़ाद बादशाह) बने तो उन्हें जो भांति-भांति के ढेर सारे नजराने हासिल हुए, उनमें एक विलायती कुत्ता भी था.
कुत्ते को गुलकंद और गुलाबजल
बताते हैं कि इस कुत्ते का डील-डौल देखकर वे इतने खुश हुए थे कि उसकी चौबीसों घंटे देखभाल के लिए दो नौकर तो नियुक्त कर ही दिए थे, उसे ‘गिजा’ खिलाने के लिए खजाने से एक रुपया रोज देने का हुक्म भी दे डाला था.
गौरतलब है कि उस दौर में एक रुपये में एक आदमी पखवारे भर दोनों जून भरपेट भोजन कर सकता था. लेकिन कुत्ता तो कुत्ता, वक्त-बेवक्त की उसकी भौं-भौं ने जल्दी ही मुहम्मद अली को खिझाकर रख दिया.
दरअसल, रात को जैसे ही वे नींद के आलम में जाने को होते, कुत्ते को अपना चौकसी का फर्ज याद आ जाता. फिर तो वह हर आहट पर भौंकता और उनकी नींद हराम करता रहता. इस चक्कर में बेचारे कई दिन उनींदे रह गए तो कुत्ते की देखभाल करने वाले दोनों नौकरों को बुलाकर उसकी बेहूदगी पर खासी नाराजगी जताई और हर हाल में उसकी भौं-भौं रोकने को कहा. यह भी पूछा कि कहीं उसका पेट भरने के लिए दी जा रही एक रुपये की रकम कम तो नहीं पड़ जाती और वह भूख के मारे तो नहीं भौंकता रहता?
एक सयाने दरबारी ने उनकी बात फौरन लपक ली और सुझाव दे डाला कि कुत्ते को रोज एक सेर गुलकंद और एक बोतल गुलाब जल खिला-पिलाकर रखा जाए तो उसका भौंकना कम भले न हो, सुरीला जरूर हो जाएगा. क्योंकि गुलकंद और गुलाब जल के असर से धीरे-धीरे उसका गला मीठा हो जाएगा. बादशाह ने दरबारी के सुझाव पर फौरन अमल का फरमान सुना दिया.
फिर क्या था, गुलकंद व गुलाबजल हजम करने के लिए वह सयाना दरबारी खुद कुत्ता बन गया. रात जैसे ही बादशाह आरामगाह में जाते, नौकरों से कहकर वह कुत्ते को कहीं दूर बंधवा देता और अलस्सुबह फिर ड्यौढ़ी पर ला खड़ा करवाता.
विडंबना यह कि इसके बावजूद बादशाह की नींद में खलल बदस्तूर रहा. अलबत्ता, इस बार उसका कारण वह कुत्ता नहीं , बल्कि सियार थे.
दरअसल, उनके महल के पास से ही गोमती बहती थी, जिसके दूसरे किनारे पर खेतों के पार घना जंगल था. सर्दी की लंबी रातों में सियार घने जंगल से निकलकर खेतों में आते और हुआं-हुआं करने लगते. इससे बादशाह की नींद टूट जाती और वे बेचैन हो जाते. आजिज आकर एक दिन उन्होंने उसी दरबारी से पूछा, ‘आखिर ये सियार रात-रात भर ‘हुआं-हुआं’ क्यों करते रहते हैं?’
इस बार दरबारी ने कहा, ‘क्या करें हुजूर, सर्दी के सताये हुए हैं बेचारे और उनके पास उससे निजात पाने के लिए इमदाद की फरियाद आपके कानों तक पहुंचाने का बस यही एक तरीका है.’
सितारों को कंबल
दूसरा दरबारी उसका भी बाप था. उसने फौरन सियारों में कंबल बंटवाने की तजवीज पेश कर दी. कह दिया कि ‘इससे सियारों का भला तो होगा ही, जहांपनाह को सवाब भी मिलेगा.’ फिर बताया कि जंगल में सियारों की कुल संख्या पांच सौ के आसपास ही होगी. बादशाह ने खजांची से कहकर फौरन पांच सौ कंबलों की कीमत इस दरबारी के हवाले करा दी.
लेकिन सियारों को कंबल भला कैसे बंटते? वे पहले की ही तरह हुआं-हुआं करके गजर-दम मचाते रहे. इससे नाराज बादशाह ने उस दरबारी को तलब किया और पूछा, ‘ये नामुराद कंबल पाने के बावजूद कयामत क्यों बरपा किए हुए हैं?’
उन्हें जवाब मिला, ‘हुजूर, उन बदनसीबों में किसी और बादशाह ने कभी कंबल नहीं बंटवाये. इसलिए अब वे खुश होकर आपका शुक्रिया अदा कर रहे हैं और चाहते हैं कि आपकी इस दरियादिली की खबर सारे जहान को हो जाए.’
इसके बाद क्या हुआ, यह तो नहीं पता, लेकिन जानकार बताते हैं कि जिस विलायती कुत्ते को रोज एक सेर गुलकंद और एक बोतल गुलाब जल ‘खिलाया-पिलाया’ जाता था, 1840 में उसके मर जाने के दो साल बाद तक शाही खजाने से उसके नाम पर दो नौकरों की तनखाहें और रोजाना एक रुपया, एक सेर गुलकंद व एक बोतल गुलाब जल दिया जाता रहा. मुहम्मद अली शाह के बेटे अमजद अली शाह की बादशाहत के वक्त भेद खुला तो यह सिलसिला बंद हुआ.
समझ गए होंगे आप, मंत्री तो क्या, सयाने दरबारी तक अच्छी तरह जानते हैं कि उनको ऐसे ‘फायदे’ राजा के ‘रात है’ कहते ही खुशी-खुशी ‘रात है’ कह देने से ही मिल सकते हैं. इसलिए इसके लिए जितनी भी दूर की कौड़ी ले आनी पड़े, वे ले आते हैं. ऐसे में राजा को यह बताकर कि हुजूर, इस वक्त रात नहीं, सुबह या कि दोपहर है, वे खुद अपने फायदों के आड़े क्यों आयें भला? और वे न आएं, तो संतरियों की भला उनके आगे क्या बिसात?
अब एक मंत्री का वाकया भी पढ़ लीजिए. यह तो आप जानते ही होंगे कि नवाबों के राज में मंत्री वजीर कहलाते थे. इतना और जान लीजिए कि गाजीउद्दीन हैदर के वक्त वजीर आगामीर के साथ उनकी जोड़ी ऐसी ‘अजब-गजब’ थी कि लखनऊ में कई लोग उसे अभी भी याद करते हैं.
इसमें गाजीउद्दीन का ‘अजब’ यह कि वे गुस्साते तो आगामीर की वजारत का कतई लिहाज न करते और उन पर ताबड़तोड़ थप्पड़ व घूसे बरसाने लगते.
एक बार तो उन्होंने एक बावर्ची की इस शिकायत पर भी उन्हें पीट डाला था कि ‘वजीर साहब ने हुजूर के परांठे पकाने के लिए दिए जाने वाले घी की मात्रा घटाकर एक चौथाई कर दी है.’ तब गाजीउद्दीन ने उनको झिड़ककर यह तक कह दिया था, ‘खुद तो सारी सल्तनत लूटे जाते हो और बावर्ची थोड़ा ज्यादा घी ले लेता है तो बर्दाश्त नहीं कर पाते.’
वजीर का गजब!
लेकिन आगामीर का ‘गजब’ भी कुछ कम न था. बार-बार पिटने के बावजूद उन्होंने कभी ‘उफ’ तक नहीं किया, न ही वजारत छोड़ी. गाजीउद्दीन भी ‘सल्तनत की लूट’ के बावजूद उन्हें लम्बे वक्त तक सहते रहे.
किस्साकोताह, आगामीर गाजीउद्दीन के बचपन के दोस्त थे. इसलिए उन्होंने गद्दी पर बैठते ही उनको वजीर बना दिया था. गो कि वे उनकी रग-रग से वाकिफ थे. बाद में अंग्रेज गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्ज के बहकावे में आकर गाजीउद्दीन ने खुद को ‘दिल्ली के दबदबे से आजाद अवध का स्वतंत्र बादशाह’ घोषित कर दिया तो आगामीर यह सोचकर सबसे ज्यादा खुश हुए थे कि बे-लगाम बादशाह की लगाम अब एकमात्र उन्हीं के हाथ रहेगी.
प्रसंगवश, मीर तकी तुर्कमानी के बेटे आगामीर का माता-पिता का दिया नाम सैयद मुहम्मद खां था. वजीर बने तो उन्हें मोतमउद्दौला मुख्तार-उल-मुल्क सैयद मुहम्मद खां बहादुर उर्फ आगामीर का खिताब मिला, जो बाद में आगामीर भर रह गया.
इतिहासकार बताते हैं कि उन्होंने ऐसी ‘विलक्षण’ बुद्धि पाई थी, जो सूबे का खजाना भरने की करामातों में तो उनकी मदद करती ही थी, अपना घर भरने से भी मना नहीं करती थी.
अपनी वजारत के दौरान उन्होंने सूबे का खजाना इतना भर दिया था कि उससे उन दिनों खस्ताहाल ईस्ट इंडिया कंपनी को बड़े-बड़े कर्ज दिए जाते थे. उन्होंने लखनऊ में अपने नाम की एक ड्योढ़ी भी बनवाई थी, जो आज उसके एक मुहल्ले का नाम है.
यह ड्योढ़ी बन रही थी तो उन्होंने एक इत्रफरोश से उसका सारा इत्र खरीदकर गारे में मिलवाया और उसी से दीवारों का पलस्तर करवाया था. ताकि दीवारें दूर-दूर तक खुशबू बिखेरती रहें. उन्होंने अपने नाम से एक सराय भी बनवाई थी.
लखनऊविद योगेश प्रवीन ने, जो अब इस संसार में नहीं हैं, अपनी पुस्तक ‘नवाबी के जलवे’ में लिखा है कि एक समय सूबे में आगामीर की मर्जी के बगैर पत्ता तक नहीं हिलता था और उनकी करामातों की चहुंओर चर्चा होती थी. लेकिन बादशाह ने एक ऐसे आदमी से खुश होकर उसे दरबार में नौकरी देनी चाही, जो आगामीर के कई भेद जानता था और उन्हें बादशाह पर खोल सकता था, तो आगामीर परेशान हो उठे. इसलिए उन्होंने पहले तो मामले को भरपूर टाला, ऐसे इंतजाम कर दिए कि वह आदमी बादशाह के आसपास भी न फटक सके, फिर बादशाह से कह दिया कि ‘वह खुदा को प्यारा हो गया.’
लेकिन एक दिन बादशाह सुबह की सैर पर गए तो वह आदमी उन्हें दिख गया. उन्होंने आगामीर से उसे बुलाने को कहा तो उन्होंने उनसे पूछा, ‘कैसे बुलाऊं हुजूर? उसे तो आप अपने चश्म-ए-गैब (अलौकिक दृष्टि) से देख रहे हैं. मैं गरीब ऐसा चश्म-ए-गैब कहां से लाऊं, जिससे रूहें देख सकूं?’
उन दिन तो खैर बात बन गई, लेकिन पानी सर से ऊपर हो गया तो बादशाह ने उन्हें बर्खास्त कर दिया. फिर भी वे नहीं सुधरे. लखनऊ के चौक में यह प्रचार कर लोगों से धनउगाही करने लगे कि बादशाह उधर से ही नहर निकालने का मंसूबा बना रहे हैं. नहर निकलती तो वहां के बाशिंदे बेघर-बेदर हो जाते. इसलिए उन्होंने चांदी के सिक्कों से भरे तोड़े (थैले) आगामीर की नजर करने शुरू कर दिए.
इस प्रार्थना के साथ कि जैसे भी बने, बादशाह का मंसूबा बदलवाएं. लेकिन वजारत की तनखाह से कई गुनी यह रकम आगामीर को फली नहीं. बात बादशाह तक पहुंची तो उन्होंने खीझकर उन्हें सूबे से निर्वासित कर दिया. निर्वासन में ही कानपुर में उनका इंतकाल हो गया.
राजा… पहाड़ के नीचे!
अभी यह बात बाकी है कि कोई राजा सुबह-सुबह ‘रात है’ क्यों कहता है भला? इसका जवाब तो बहुत सीधा सा है, लेकिन सीधे देने पर शायद हजम न हो.
इसलिए इतना बताकर बात को खत्म कर देते हैं कि जिन राजाओं को प्रजापालन से ज्यादा प्रजा पर नाना प्रकार के अत्याचार कर उसे सताने और धर्म, शील व सदाचार के सिर पर पाद-प्रहार के लिए जाना जाता है, एक समय उनको राजा बनने के लिए राजाधिराज, बादशाह या उनके प्रतिनिधि के बाएं पैर के अंगूठे से अपना राजतिलक कराना पड़ता था और वे खुशी-खुशी खुद को इसके लिए ‘प्रस्तुत’ कर देते थे. बिना इस सवाल से गुजरे कि इस तरह किया गया राजतिलक राजतिलक है, अपमानतिलक या पादतिलक?
सोलहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अवध की नरवलगढ़ नामक रियासत ऐसे राजतिलक समारोहों की केंद्र हुआ करती थी, क्योंकि उसके प्रमुख को दिल्ली के बादशाह से हिंदुस्तान के बादशाह-ए-दोयम (सेकेंड किंग आफ इंडिया) का दर्जा प्राप्त था और इस लिहाज से वे भी ‘राजाधिराज’ थे.
राजा बनने के अभिलाषियों में वे जिसे भी उपकृत करना चाहते, अपने बाएं पैर के अंगूठे को उसके माथे तक ले जाकर उसका राजतिलक कर देते. अकेले में नहीं, बाकायदा समारोह आयोजित करके सबके सामने.
समारोह में राजाधिराज सवा लाख अशर्फियों से निर्मित ऊंचे चबूतरे पर खड़े होते, तो उसके नीचे खड़ा राजा पद का अभिलाषी बेसब्र होकर उनके बायां पैर उठाने का इंतजार करता. जैसे ही वे वह पैर उठाते और उसके बाएं अंगूठे से सुनहरे तिलक पात्र में रखी सामग्री उसके माथे पर छुआते, वह निहाल हो उठता.
कौन जाने, राजाओं द्वारा सताई गई प्रजा को यह देखकर ऊंट को पहाड़ के नीचे आता देखने जैसा सुख मिलता रहा हो!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
