नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने 9-10 नवंबर 2025 को बेंगलुरु में ‘100 इयर्स ऑफ संघ जर्नी: न्यू होराइज़न्स’ नामक व्याख्यान श्रृंखला के दौरान कई विवादास्पद दावे किए.
उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज के प्रति संघ के रुख, संगठन की कानूनी स्थिति, और मुसलमानों-ईसाइयों की सदस्यता पर सफाई दी. यहां हम राष्ट्रीय ध्वज को लेकर किए उनके दावों का तथ्यात्मक परीक्षण करें.
दावा: ‘संघ ने हमेशा तिरंगे का सम्मान और संरक्षण किया है’
भागवत का कथन:
राष्ट्रीय ध्वज 1933 में डिजाइन किया गया था. ध्वज समिति ने सर्वसम्मति से पारंपरिक भगवा ध्वज की सिफारिश की थी. लेकिन फिर गांधीजी ने हस्तक्षेप किया और कुछ कारणों से उन्होंने तीन रंग, सबसे ऊपर भगवा रखने को कहा. इसकी स्थापना के बाद से, संघ ने हमेशा तिरंगे का सम्मान किया, उसे सम्मान दिया और उसकी रक्षा की.
वास्तविकता: यह दावा गलत और भ्रामक है.
राष्ट्रीय ध्वज का डिजाइन और समिति
राष्ट्रीय ध्वज की यात्रा 1921 से शुरू हुई, जब पिंगली वेंकय्या ने एक तिरंगा प्रस्तावित किया. 1931 में कांग्रेस ने एक ध्वज समिति गठित की, जिसने सफेद, हरे और केसरिया रंग को अपनाया, लेकिन इसमें चरखा था. 1947 में संविधान सभा की ऐड-हॉक फ्लैग कमेटी (अध्यक्ष: राजेंद्र प्रसाद) ने चरखे को अशोक चक्र से बदलने की सिफारिश की.
भागवत का दावा कि ‘1933 में डिजाइन किया गया’ गलत है. यह प्रक्रिया 1921 से शुरू हुई और 1947 में अंतिम रूप लिया गया. इसके अलावा, फ्लैग कमेटी ने ‘सर्वसम्मति से भगवा ध्वज की सिफारिश’ नहीं की थी. 1931 की कांग्रेस समिति ने तीन रंगों (केसरिया, सफेद, हरा) को मंजूरी दी थी, लेकिन सिर्फ केसरिया/भगवा ध्वज नहीं.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तिरंगे के प्रति रुख: ऐतिहासिक विरोध
1947 में आरएसएस की स्थिति स्पष्ट थी, वे तिरंगे के घोर विरोधी थे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ऑर्गनाइज़र ने जुलाई-अगस्त 1947 में कई संपादकीय प्रकाशित किए, जिनमें तिरंगे की निंदा की गई और भगवा ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज बनाने की मांग की गई.
14 अगस्त 1947 के ऑर्गनाइज़र संपादकीय में लिखा गया:
जो लोग भाग्य के झटके से सत्ता में आए हैं, वे हमारे हाथों में तिरंगा दे सकते हैं, लेकिन इसे कभी हिंदुओं द्वारा सम्मानित और स्वीकार नहीं किया जाएगा. तीन शब्द अपने आप में एक बुराई है, और तीन रंगों वाला ध्वज निश्चित रूप से एक बहुत ही खराब मनोवैज्ञानिक प्रभाव उत्पन्न करेगा और देश के लिए हानिकारक है.’
संघ के दूसरे सरसंघचालक केशव बलिराम हेडगेवार ने अपनी किताब बंच ऑफ थॉट्स में लिखा है कि कि हमारे नेताओं ने तिरंगे को स्वीकार कर लिया है. लेकिन यह झंडा न तो हमारी राष्ट्रीय इतिहास और विरासत के आधार पर राष्ट्रीय दृष्टि से प्रेरित है.
1929-30 में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विरोध: जब कांग्रेस ने 26 जनवरी 1930 को ‘स्वतंत्रता दिवस’ के रूप में मनाने और तिरंगा फहराने का आह्वान किया, तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संस्थापक हेडगेवार ने सभी शाखाओं को परिपत्र जारी कर भगवा ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज मानने को कहा, तिरंगे को नहीं.
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आज़ादी के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का रवैया
15 अगस्त 1947 और 26 जनवरी 1950 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय (नागपुर) में तिरंगा फहराया गया, लेकिन उसके बाद 52 साल तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने मुख्यालय पर तिरंगा नहीं फहराया.
2001 में ‘राष्ट्र प्रेमी युवा दल’ के तीन सदस्यों ने जबरन (आरएसएस प्रशासन की इच्छा के खिलाफ) राष्ट्रीय स्मृति भवन पर तिरंगा फहरा दिया था, जिसकी वजह से उन्हें जेल जाना पड़ा था, मुकदमे का सामना करना पड़ा था. हालांकि, 2013 में तीनों को बाइज्जत बरी कर दिया था.
2002 से, संसद में सवाल उठने के बाद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने कार्यालयों में स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराना शुरू किया था.
इसके बाद 2016 में प्रकाशित न्यूजलॉन्ड्री की एक रिपोर्ट में पता चला था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय केशव कुंज में सीआरपीएफ जवान तिरंगा फहराते थे, न कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयंसेवक.
सीआरपीएफ के एक जवान ने बताया था, ‘हम हर साल स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं और उन्हें (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ स्वयंसेवकों) को हमारे साथ शामिल होने के लिए कहते हैं.’
तो इस भागवत का यह दावा कि ‘संघ ने हमेशा तिरंगे का सम्मान किया’ ऐतिहासिक रूप से गलत है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 1947 में तिरंगे का घोर विरोध किया, 1950 से 2002 तक अपने मुख्यालय पर नहीं फहराया, और केवल सार्वजनिक दबाव के बाद अपना रुख बदला.
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सरकारी दवाब में तिरंगे का सम्मान!
30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी हत्या के बाद प्रतिबंध सरदार पटेल (तत्कालीन गृह मंत्री) ने 4 फरवरी 1948 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था. 11 जुलाई 1949 को यह प्रतिबंध तब हटा जब आरएसएस ने संविधान और राष्ट्रीय ध्वज के प्रति वफादारी का वादा किया.
इस तरह सरदार पटेल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर जोर डालकर तिरंगे की उनसे स्वीकृति करवाई, न कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने स्वेच्छा से. यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ‘देशभक्ति’ का नहीं, बल्कि सरकारी दबाव का परिणाम था.
