एफटीआईआई ईटानगर: छात्रों का अधूरे कैंपस में पढ़ाई से इनकार, सेमेस्टर बहिष्कार पर अडिग

भारतीय फिल्म एवं टेलीविज़न संस्थान (एफटीआईआई), ईटानगर का पहला बैच अधूरे कैंपस, बुनियादी ढांचे की कमी और प्रशासनिक अव्यवस्था के खिलाफ तीसरी बार शैक्षणिक हड़ताल पर है. छात्रों का कहना है कि संस्थान वादों पर खरा नहीं उतरा और वे तब तक कक्षाओं में नहीं लौटेंगे, जब तक सभी आवश्यक शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई जातीं.

/
निर्माणाधीन छात्रवास (बाएं) और प्रीव्यू थिएटर (दाएं) | सभी तस्वीरें छात्रों द्वारा उपलब्ध कराई गई हैं.

नई दिल्ली: भारतीय फिल्म एवं टेलीविज़न संस्थान (एफटीआईआई), ईटानगर के पहले बैच ने दूसरे सेमेस्टर में शामिल होने से इनकार कर दिया है. स्क्रीन एक्टिंग और डॉक्यूमेंट्री सिनेमा के लगभग 25-30 छात्रों ने कैंपस की बदहाल स्थिति, अधूरे बुनियादी ढांचे और एक साल से चल रही अव्यवस्था के खिलाफ यह निर्णय लिया है.

छात्रों ने घोषणा की है कि वे तब तक कक्षाओं में नहीं लौटेंगे, जब तक कि संस्थान न्यूनतम शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराता.

द वायर हिंदी से बातचीत में स्क्रीन एक्टिंग की एक छात्रा ने बताया, ‘पहले तो कॉमन मॉड्यूल था तो चल गया लेकिन अब दूसरे सेमेस्टर से स्पेशलाइज़ेशन्स शुरू होगा, उसमें खानापूर्ति नहीं चल सकती.’

उल्लेखनीय है कि इस संस्थान की आधारशिला 9 फरवरी, 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रखी थी. तब सरकार की तरफ से यह संभावना जतायी गयी थी कि 204.32 करोड़ रुपये की लागत के साथ यह संस्थान करीब 25 महीने में तैयार हो जायेगा. 

यानी मार्च 2021 तक संस्थान के इंफ्रास्ट्रक्चर का काम पूरा हो जाना चाहिए था. लेकिन आधारशिला को रखे हुए 82 महीने बीत चुके हैं और कैंपस अधूरा पड़ा है और अब भी समाधान के रूप में अस्थायी/तात्कालिक व्यवस्था की पेशकश की जा रही है, जिसे छात्र स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं.

सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले इस संस्थान का प्रबंधन कोलकाता स्थित प्रतिष्ठित सत्यजीत रे फिल्म और टेलीविजन संस्थान (एसआरएफटीआई) द्वारा किया जाता है. यह एसआरएफटीआई और एफटीआईआई पुणे के बाद भारत का तीसरा राष्ट्रीय फिल्म संस्थान है.

उम्मीदों से उलट 

इस संस्थान को बड़े दावों के साथ लॉन्च किया गया था. इसे भारत के फिल्म-शिक्षा इकोसिस्टम का नया स्तंभ बताया गया, जो पूर्वोत्तर में प्रतिभाओं को राष्ट्रीय मंच देने का वादा करता था. अक्टूबर 2024 में संस्थान के पहले बैच में दो-वर्षीय तीन पीजी डिप्लोमा कोर्स (स्क्रीन एक्टिंग, स्क्रीनराइटिंग और डॉक्यूमेंटरी सिनेमा) में छात्रों को दाखिला दिया गया था.

लेकिन मार्च 2025 में जब छात्र पहली बार कैंपस पहुंचे, तो उन्हें एक ऐसी हकीकत का सामना करना पड़ा जो दावों से बिल्कुल उलट थी. कैंपस का निर्माण अभी भी जारी था, हॉस्टल की इमारत बिखरी हुई थी, और कई जगहों पर बुनियादी सुरक्षा इंतज़ाम तक नहीं थे. छात्रों को गेस्ट हाउस और ट्रांज़िट ब्लॉक्स में रखा गया, यानी उन जगहों पर जो अस्थायी रूप से अतिथि संकायों के लिए बनाए गए थे.

कक्षाएं लाइब्रेरी के कोने में एक छोटी-सी स्क्रीन के सहारे चलाई जाती थीं और बिजली कटौती के कारण अक्सर बीच में रुक जाती थीं. स्क्रीन एक्टिंग विभाग के छात्रों को बिना स्टूडियो, प्रीव्यू थिएटर, मेकअप रूम या डांस स्पेस के काम चलाना पड़ रहा था. डॉक्यूमेंट्री सिनेमा के छात्रों के पास उचित साउंड स्टूडियो, एडिटिंग वर्कस्टेशन और बुनियादी उपकरणों की कमी थी.

नौ महीने में तीसरी एकेडमिक स्ट्राइक

यह गतिरोध अचानक नहीं हुआ है. यह संस्थान के पहले बैच के शुरुआती नौ महीने में तीसरी एकेडमिक हड़ताल है. मई 2025 में दूसरी हड़ताल के दौरान ही छात्रों ने स्पष्ट कर दिया था कि अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुई तो वे दूसरे सेमेस्टर में पढ़ाई नहीं करेंगे. छात्रों का कहना है कि पहले ही उनका एक सेमेस्टर ‘खराब’ हो चुके हैं, और अब बाकी बचे तीन सेमेस्टर्स को ‘संस्थान की उदासीनता’ की बलि नहीं चढ़ने देंगे.

द वायर से बातचीत में डॉक्यूमेंट्री सिनेमा विभाग की एक छात्रा ने कहा, ‘हम चाहते हैं कि हमारी स्पेशलाइज़ेशन्स के लिए आवश्यक सभी अकादमिक इमारतें दूसरी सेमेस्टर की शुरुआत से पहले पूरी तरह तैयार हों. हम पहले सेमेस्टर की तरह किसी भी अस्थायी/तात्कालिक व्यवस्था में पढ़ाई करना स्वीकार नहीं करेंगे. ऐसी परिस्थितियों में हमारी सीखने की गुणवत्ता गंभीर रूप से प्रभावित होती है. इसका असर हमारे करिअर पर पड़ेगा, क्योंकि हमें पेशेवर सेट-अप में आवश्यक प्रशिक्षण और अनुभव नहीं मिल पाएगा.’

डॉक्यूमेंट्री सिनेमा विभाग की एक छात्रा कहती हैं:

जब मैं पहली बार कैंपस पहुंची, तो सबसे पहले जिस चीज़ ने मुझे झटका दिया, वह था कैंपस की हालत. पूरा परिसर किसी निर्माणाधीन जगह जैसा लग रहा था. न कोई मुख्य गेट था, न संस्थान का नाम वाला बोर्ड. ठीक से बाउंड्री या फेंसिंग तक नहीं थी.

इन समस्याओं की जानकारी छात्र लगातार मंत्रालय और एसआरएफटीआई कोलकाता को देते रहे. मार्च 2025 में जब उन्होंने पहली बार एकेडमिक स्ट्राइक किया, तो अधिकारियों ने सुधार का आश्वासन दिया. कुछ मरम्मत कार्य शुरू भी हुए, जिनमें क्लासरूम थिएटर का आंशिक निर्माण शामिल था, जिसके बाद छात्रों ने क्लासेस फिर शुरू कर दीं.

लेकिन यह सुधार अल्पकालिक साबित हुआ. मई 2025 में छात्रों ने फिर एकेडमिक स्ट्राइक किया, इस बार संस्थान के आश्वास दिया कि साल के अंत तक काम पूरा हो जाएगा.

छात्रों ने स्ट्राइक खत्म कर पढ़ाई की और इस तरह पहला सेमेस्टर 8 नवंबर को समाप्त हुआ और उसके बाद छुट्टियां शुरू हो गईं, जो 2 दिसंबर तक चलीं. अब साल का अंत होने को है और संस्थान छात्रों को दूसरे सेमेस्टर के लिए बुला रहा है, लेकिन कैंपस निर्माण का काम अभी पूरा नहीं हुआ है, इसलिए छात्र लौटने को तैयार नहीं है.

कोई स्पष्ट समाधान नहीं

छात्रों की तीसरी एकेडमिक स्ट्राइक के मद्देनज़र 9 दिसंबर को उच्चस्तरीय बैठक हुई, जिसमें छात्रों के साथ हुई इस बैठक में एसआरएफटीआई के वाइस-चांसलर, डीन, सभी विभागाध्यक्ष और एफटीआईआई ईटानगर के फैकल्टी सदस्य शामिल थे. छात्रों ने 11 नवंबर (स्क्रीन एक्टिंग) और 20 नवंबर (डॉक्यूमेंट्री सिनेमा) को अपनी मुख्य मांगें मंत्रालय के सचिव संजय जाजू और एसआरएफटीआई के वाइस-चांसलर समीरन दत्ता को सौंप दी थीं.

हालांकि छात्रों का कहना है कि 9 दिसंबर की बैठक में इन पर बात करने के बजाय सिर्फ अस्थायी, ‘किसी तरह मैनेज कर लो’ जैसे सुझाव दिए गए. बैठक के बाद स्क्रीन एक्टिंग विभाग के छात्रों ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के सचिव संजय जाजू को पत्र लिखकर बताया है कि वे कुलपति प्रो. समीरन दत्ता से हुई बैठक से निराश हैं,

यह बैठक हमारी उन मांगों पर चर्चा के लिए रखी गई थी जिन्हें हमने 11 नवंबर 2025 को लिखित रूप में सौंपा था. लेकिन बैठक में कोई ठोस समाधान नहीं दिया गया. …बैठक में हमें ऐसे सुझाव दिए गए जिनका मतलब था- अधूरे और अनुपयोगी स्थानों में थोड़े बदलाव करके ही हमें पढ़ाई जारी रखनी चाहिए. उदाहरण के तौर पर, हमने अभिनय प्रशिक्षण के लिए समर्पित जगहें मांगी थीं- डांस स्टूडियो, एक्टिंग स्टूडियो और ब्लैक बॉक्स थिएटर. लेकिन जवाब में कहा गया कि लाइब्रेरी की एक मंज़िल (जहां फिलहाल गैर-शिक्षण कर्मचारी बैठते हैं क्योंकि एडमिन ब्लॉक तैयार नहीं है) को डांस स्टूडियो में बदल दिया जाएगा. या फिर सीआरटी रूम को अभिनय गतिविधियों के लिए ‘थोड़ा बदला’ जा सकता है. यह स्पष्ट करता है कि संस्था के पास हमारे विभाग के लिए तीन अलग-अलग, ठीक से बने, पेशेवर कार्यस्थल तैयार करने की कोई ठोस योजना नहीं है.

पत्र में आगे लिखा है, ‘इसी तरह, प्रॉप्स, कॉस्ट्यूम, मेकअप और कारपेंट्री विभागों को भी ‘अभी ज़रूरी नहीं’ कहकर टाल दिया गया, जबकि हमारे पाठ्यक्रम में ये सब अनिवार्य हैं. …पिछली बार भी मंत्रालय ने लिखित आश्वासन दिया था लेकिन वादे पूरे नहीं हुए.’

छात्रों के पास ‘सही पहचान पत्र’ तक नहीं

यह भी गौरतलब है कि एक सेमेस्टर खत्म होने के बाद भी छात्रों के पास नई आईडी कार्ड नहीं है.

दरअसल, नामांकन के दौरान संस्थान का नाम ‘फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट, अरुणाचल प्रदेश’ था. बाद में नाम बदलकर ‘इंडियन फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट, ईटानगर’ कर दिया गया. फिर छात्रों की असहमति के बाद संस्थान का नाम ‘फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया, ईटानगर’ किया गया. लेकिन छात्रों के पास अब भी ‘फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट, अरुणाचल प्रदेश’ वाला ही आईडी कार्ड है.

इस पूरी कवायद से यह भी स्पष्ट होता है कि कैसे संस्थान का नाम और लोगो तय किए बिना ही नामांकन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी.

इसके अलावा संस्थान की अपनी आधिकारिक वेबसाइट नहीं है. प्रोफेशनल पीआर टीम नहीं है. छात्रों के मुताबिक, जब उन्होंने इसे लेकर मीटिंग में सवाल उठाया तो जवाब मिला कि छात्र और शिक्षक मिलकर सोशल मीडिया संभाल लें.

छात्रों ने मीटिंग में 24×7 डॉक्टर, एम्बुलेंस और बुनियादी चिकित्सा सुरक्षा की मांग उठाई, लेकिन इस पर भी कोई समयबद्ध योजना नहीं दी गई.

मंत्रालय के सचिव को लिखे पत्र और द वायर हिंदी से बातचीत में छात्रों ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘वे तब तक लौटकर कक्षाएं शुरू नहीं करेंगे जब तक 11 नवंबर की सभी मांगें पूरी नहीं की जाती.’

सचिव को भेजे पत्र में लिखा है, ‘हम मंत्रालय से मांग करते हैं कि एक स्पष्ट, समयबद्ध एक्शन प्लान जारी किया जाए, जिसमें हर मांग के लिए जिम्मेदार अधिकारी, संसाधन और समयसीमा तय हो. यदि ईटानगर कैंपस को समय पर तैयार नहीं किया जा सकता, तो स्क्रीन एक्टिंग प्रोग्राम को अस्थायी रूप से एफटीआईआई पुणे या किसी पूरी तरह कार्यरत कैंपस में स्थानांतरित किया जाए.’

छात्र छोड़ रहे हैं कोर्स

अक्टूबर 2024 में तीनों कोर्स में कुल 46 छात्रों ने दाखिला लिया था (16 स्क्रीनराइटिंग, 20 स्क्रीन एक्टिंग, 10 डॉक्यूमेंटरी सिनेमा). लेकिन क्लास शुरू होने से पहले ही स्क्रीनराइटिंग के एक छात्र जिग्नेश (गुजरात) ने कोर्स छोड़ दिया था.

द वायर हिंदी से बातचीत में कोर्स छोड़ने का कारण बताते हुए जिग्नेश कहते हैं, ‘एडमिशन के एक महीने बाद क्लास शुरू करने की बात कही गई थी. लेकिन यह मार्च 2025 तक खिंच गया. मैं इतने लंबे समय तक इंतजार नहीं कर सकता है. मैंने इस पढ़ाई के लिए अपनी जॉब छोड़ दी थी. मुश्किल से फीस के पैसे जुटाए थे. मैं घर पर बैठा नहीं रह सकता था.’

जिग्नेश को अपने फैसले पर कोई पछतावा नहीं है. वह अब मुंबई में फिल्मों में काम तलाश रहे हैं.

अब स्क्रीन एक्टिंग के 20 में से तीन छात्र पहले सेमेस्टर के बाद ही कोर्स छोड़कर, एफटीआईआई पुणे जा रहे हैं. दिल्ली निवासी अमित अग्रवाल और बीकानेर (राजस्थान) निवासी अनिल बिश्नोई का चयन दो साल के एक्टिंग कोर्स में हो गया है. मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) की शिवानी दुबे का चयन एक साल के सिनेमेटोग्राफी कोर्स में हो गया है.

पहले बैच के छात्रों से बातचीत में पता चला कि एफटीआईआई (ईटानगर) के करीब दस छात्रों ने एफटीआईआई (पुणे) के लिए प्रयास किया था.

छात्र बताते हैं कि एफटीआईआई (ईटानगर) में पढ़ाई के लिए कोई दिल्ली विश्वविद्यालय की पढ़ाई बीच में छोड़कर आया है, तो कई इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) की नौकरी. लेकिन ये सभी अब मझधार में फंसे हैं.

पहले बैच के तीन कोर्स में से दो (स्क्रीन एक्टिंग और डॉक्यूमेंटरी सिनेमा) के छात्र एकेडमिक स्ट्राइक पर हैं. स्क्रीनराइटिंग के छात्र स्ट्राइक में शामिल नहीं हैं, वे 15 दिसंबर से दूसरे सेमेस्टर में शामिल हो रहे हैं.

‘एफटीआईआई, ईटानगर एक स्कैम है’

मात्र दो महीने में एफटीआईआई, ईटानगर की नौकरी छोड़ने वाली डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर और सिंक साउंड रिकॉर्डिस्ट द वायर हिंदी से बातचीत में कहती हैं, ‘एफटीआईआई, ईटानगर एक स्कैम है. छात्र अपने प्रदर्शनों में इसी शब्द का इस्तेमाल करते हैं, और मैं उनसे सहमत हूं.’ 

नाम न छापने की शर्त पर अपना अनुभव साझा करते हुए वह बताती हैं, उन्होंने मार्च 2025 में बतौर साउंड रिकॉर्डिस्ट नौकरी शुरू और मई 2025 में इस्तीफा दे दिया था.

‘उस नौकरी का विज्ञापन भी स्पष्ट नहीं था. फिर भी मैंने आवेदन किया क्योंकि आप जानते हैं कि फ्रीलांसिंग में आर्थिक चुनौतियां होती है. मैंने सोचा कि यह एक बढ़िया मौका है, मैंने एफटीआईआई पुणे से 2017-18 में पढ़ाई की थी, और अब पढ़ाने का अनुभव लेना चाहती थी. लेकिन जब वहां पहुंची तो हैरान रह गई. वहां कुछ नहीं था. साउंड के लिए कोई साउंड स्टूडियो नहीं. प्रॉपर इक्विपमेंट्स नहीं- रिकॉर्डर था, लेकिन एसडी कार्ड और केबल नहीं था. स्पीकर नहीं था. कोई सिलेबस नहीं था. दो हफ्ते में सब कुछ अरेंज करने और अनपैक करने में लग गया. यह बहुत तनाव भरा था. मैं अभी भी उस ट्रॉमा से उबरने का प्रयास कर रही हूं.’

वह आगे कहती हैं, ‘छात्रों और शिक्षकों को बुला लिया गया था. लेकिन कोई व्यवस्था नहीं थी. वाटर कूलर काम नहीं कर रहा है, तो आपको बजट देना पड़ रहा है और ईटानगर से वॉटर कैन मंगाए जा रहे हैं. कैंपस ईटानगर से डेढ़ घंटे की दूरी पर है. …लोगों की नियुक्ति कर लगी गई थी, लेकिन कोई गाइड करने वाला नहीं थी. कई उपकरणों में लगाने के लिए बैटरी भी चाहिए होती थी, तो मुझे एसआरएफटीआई को ईमेल भेजनी पड़ती थी.’

अपने इस्तीफे का कारण बताते हुए पूर्व अध्यापिका कहती हैं, ‘मई 2025 में जब छात्रों ने दूसरी बार विरोध प्रदर्शन शुरू किया, तब मैंने इस्तीफा दे दिया. बच्चे मूलभूत सुविधाओं के लिए लड़ रहे थे, ऐसे में मैं उन्हें असाइनमेंट नहीं दे सकती थी. मन में एक नैतिक द्वंद्व चल रहा था. यह तब अपने चरम पर पहुंच गया, जब एक बच्चे ने अपनी मानसिक उलझन (डिप्रेशन) को लेकर ईमेल लिखा, संस्थान के पास काउंसलिंग की कोई व्यवस्था नहीं थी. मैंने ईटानगर से मदद बुलाने के लिए हेल्पलाइन नंबर पर कॉल किया था, कितनी मदद मिली पता नहीं. लेकिन मैं कई बच्चों में अवसाद देख पा रही थी. यह सब देखते हुए, वहां रह पाना मुश्किल था.’

स्थिति ऐसी है कि देश के कुछ युवाओं को राष्ट्रीय स्तर के संस्थान का सपना दिखा, अव्यवस्थाओं के मझधार में छोड़ दिया गया. अपना पैसा और जीवन के सबसे उर्जावान उम्र का कीमती वक्त झोंक चुके छात्र निशारा को गोते लगा रहे हैं.

डॉक्यूमेंट्री सिनेमा की एक छात्रा कहती है, ‘मुझे लगता है कि हमारे हालात के बारे में लोगों को एक बात ठीक से पता नहीं चलती कि हर बार ऐसी शैक्षणिक हड़तालों में बैठने का छात्रों पर मानसिक रूप से कितना असर पड़ता है. ऐसे फैसले लेने से पहले हम हमेशा एक अनिश्चित समय की गहराई में झांकते हैं और आने वाली तमाम बाधाओं के लिए खुद को तैयार करते हैं. हर छात्र यहां अपनी ज़िंदगी के बेहद महत्वपूर्ण समय में बहुत कुछ त्यागकर सिर्फ एक चीज़ करने आया है- सीखने के लिए. लोग इस पक्ष को नहीं देखते. हम लगातार आर्थिक दबाव झेलते हैं और अपने परिवारों को समझाते रहते हैं, जो हमारी भविष्य की चिंता करते हैं. जिन अधूरे भवनों की तस्वीरें आप देखते हैं, विडंबना यह है कि वे तस्वीरें हमारे भीतर की मानसिक स्थिति, हमारी अनिश्चितताओं और भविष्य को लेकर डर, को भी कहीं न कहीं दर्शाती हैं.’

संस्थान भी मानता है कि कैंपस अधूरा है

जुलाई 2025 में एसआरएफटीआई की अकादमिक काउंसिल की बैठक में आईएफटीआई, ईटानगर के एडमिशन प्रक्रिया को तब तक रोके जाने को लेकर सहमति बनी थी, जब तक संस्थान का बुनियादी ढांचा पूरी तरह तैयार नहीं हो जाता.

बैठक की कार्यवाही (मिनट्स) में दर्ज हैं, ‘आईएफटीआई, ईटानगर (एफटीआईआई, ईटानगर का पुराना नाम) का इंफ्रास्ट्रक्चर अभी पूरा नहीं हुआ है. हमने पहले बैच की शुरुआत बहुत सीमित संसाधनों के साथ की थी और बीच में ही इंफ्रास्ट्रक्चर पूरा करने का वादा किया गया था, जो दुर्भाग्य से पूरा नहीं हो सका. अधूरी सुविधाओं और अधूरे सेटअप की वजह से छात्रों को लगातार कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. हॉस्टल, मेस, डिजिटल लैब्स और प्रशासनिक भवन जैसी बुनियादी सुविधाएं अभी तक तैयार नहीं हैं. ऐसी स्थिति में आने वाले सत्र में एक और बैच को शामिल करना संभव नहीं है. अगला बैच तभी लिया जाना चाहिए जब भवनों का निर्माण पूरा हो जाए और तकनीकी तौर पर सभी मंज़ूरी मिल जाए. अन्यथा, इससे समस्याएं और बढ़ेंगी और नवनिर्मित संस्थान की छवि को नुकसान होगा.’

बैठक में सभी सदस्यों ने इस मुद्दे पर सहमति जताई थी, इसलिए अक्टूबर 2024 के बाद 2025 में कोई नया बैच नहीं आया.

यह खुलासा छात्रों के लिए सबसे बड़ा झटका था, क्योंकि 2024 के एडमिशन उसी समय हुए थे जब कैंपस की स्थिति इससे भी बदतर थी.

छात्रों का सवाल साफ है: ‘अगर आज कैंपस नए छात्रों के लिए उपयुक्त नहीं है, तो हमें क्यों दाख़िल किया गया जब कैंपस लगभग रहने लायक भी नहीं था?’

इस संस्थान के शिलान्यास से एक दिन पहले 8 फरवरी, 2019 को सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया था, ‘इस संस्थान में प्रशासनिक खंड, कक्षाएं, थिएटर, शैक्षणिक स्टाफ के रहने के लिए स्थान, लाइब्रेरी, मिनी थिएटर, शूटिंग के लिए स्थान, डिजिटल ब्लॉक, साउंड स्टुडियो, कैंटीन और आवासीय परिसर, लड़कों और लड़कियों के लिए छात्रावास, गेस्टहाउस तथा विद्युत उप-केन्द्र, पम्प रूम और जल शोधन केंद्र भी होगा.’

6 साल 10 महीने बाद की हालत यह है कि प्रशासनिक खंड अभी अधूरा बना है. थिएटर अधूरा बना है. पिछले स्ट्राइक के बाद मिनी थिएटर तो बना गया लेकिन वह साउंड प्रूफ नहीं है, स्पीकर ठीक नहीं है.

नवंबर 2025 में छात्रों ने करीब आधा दर्जन ईमेल मंत्रालय और एसआरएफटीआई को भेजे, जिनमें समस्याओं का विवरण, सुरक्षा संबंधी चिंताएं और एक व्यावहारिक कार्ययोजना बनाने का आग्रह शामिल था. छात्रों को किसी पत्र का ठोस जवाब नहीं मिला.

इसके विपरीत, दिसंबर में छात्रों को अचानक एक औपचारिक ईमेल भेजकर 14 दिसंबर तक कैंपस लौटने का निर्देश दे दिया गया. ईमेल में यह नहीं बताया गया कि इंफ्रास्ट्रक्चर या सुरक्षा में क्या सुधार किए गए हैं. छात्रों का कहना है कि यह पत्र उनकी शिकायतों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करता है.

क्या वादे थे, क्या पूरे हुए?

मई 2025 में जब छात्रों ने दूसरी बार एकेडमिक स्ट्राइक किया था, तब छात्रों को मनाने पहुंचे सूचना और प्रसारण मंत्रालय के जॉइंट सेक्रेटरी (फिल्म्स) डॉ. अजय नागभूषण ने कई आश्वासन दिए थे, जिनमें से आज भी कई पूरे नहीं हुए हैं, जैसे- कैंपस डायरेक्टर की नियुक्ति नहीं हुई है. कैंपस की बाउंड्री वॉल नहीं बनी है. छात्रों को नया आईडी कार्ड नहीं मिला है. सुरक्षा के लिए सीआईएसएफ के जवानों को तैनात करने का वादा किया गया था, लेकिन यह वादा भी पूरा नहीं किया गया है.

डॉ. नागभूषण ने वादा किया था कि शिक्षण की प्रभावशीलता को मापने के लिए फीडबैक व्यवस्था लागू किया जाएगा. लेकिन छात्र चार महीने से फैकल्टी फीडबैक फॉर्म मांग रहे हैं, जो अब तक नहीं मिला है.

द वायर हिंदी से बातचीत में एक छात्र ने बताया कि ‘कुछ फैकल्टी की पढ़ाई से छात्र संतुष्ट नहीं हैं. लेकिन हमें फीडबैक फॉर्म ही नहीं मिल रहा है तो हम अपनी बात कैसे रखें. और अब नई भर्ती भी चल रही है, जिसमें पुराने फैकल्टी सदस्यों ने भी आवेदन किया है. फीडबैक रहता तो चयन कमेटी को पता चलता कि आवेदन करने वालों की पढ़ाई से छात्र कितने संतुष्ट हैं.’

किसकी जवाबदेही?

एफटीआईआई ईटानगर समस्याओं के अंबार पर खड़ा है. संस्थान द्वारा तात्कालिक व्यवस्था की पेशकश उसकी असफलता की निशानी है. लेकिन जवाब देने को कोई तैयार नहीं है. हमने एसआरएफटीआई कुलपति प्रो. समीरन दत्ता, मंत्रालय के सचिव संजय जाजू, जॉइंट सेक्रेटरी केके निराला और डॉ. अजय नागभूषण से संपर्क किया. ईमेल के माध्यम से सवाल भेजे. उनके वॉट्सऐप पर ईमेल की सूचना दी. फॉलोअप मैसेज किया. लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. कुलपित ने वॉट्सऐप पर सवाल मांगे, तो वहां भी भेजे गए, लेकिन जवाब नहीं आए.

निर्माण के लिए जिम्मेदार सीपीडब्लूडी (सेंट्रल पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट) के एडीजी विमल कुमार से देरी का कारण जानने के लिए संपर्क किया तो उन्होंने चीफ इंजिनियर से बात करने की सलाह दी.

चीफ इंजीनियर मुकेश ने कहा कि मैं कुछ नहीं कह सकता आप मंत्रालय में बात कीजिए. अपनी गाइडलाइन के मुताबिक, मैं मीडिया से बात नहीं कर सकता. कॉन्ट्रैक्टर मायु तारिंग ने भी कॉल और मैसेज का का जवाब नहीं दिया है. यदि इनमें से किसी का भी जवाब प्राप्त होगा, उसे रिपोर्ट में जोड़ा जाएगा.