मध्य प्रदेश बाघ आवास क्षेत्रों में इंफ्रा, खनन प्रोजेक्ट को मंज़ूरी; राजाजी रिज़र्व में रोपवे को भी हरी झंडी

राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति ने मध्य प्रदेश के बाघ आवास क्षेत्रों में तीन परियोजनाओं के कोर क्षेत्र में भूमिगत जल पाइपलाइन तथा बरना बांध से संबंधित ढांचागत निर्माण कार्यों को मंज़ूरी दी है. साथ ही, उत्तराखंड के राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के कोर क्षेत्र में रोपवे परियोजना को भी स्वीकृति दी गई है. मध्य प्रदेश के फेन वन्यजीव अभयारण्य के ईको-सेंसिटिव ज़ोन में दो बाक्साइट खनन परियोजनाओं को भी मंज़ूरी की सिफ़ारिश की है.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: विकिपीडिया)

नई दिल्ली: राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति ने मध्य प्रदेश के बाघ आवास क्षेत्रों में तीन परियोजनाओं – ग्रेटर पन्ना लैंडस्केप, संजय डबरी टाइगर रिज़र्व और रातापानी टाइगर रिज़र्व – को मंजूरी दे दी है. इसके अलावा, उत्तराखंड के राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के कोर क्षेत्र में एक रोपवे परियोजना को भी स्वीकृति दी गई है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, 9 दिसंबर को हुई बैठक की कार्यवाही के अनुसार, समिति ने सतना के आरक्षित वन क्षेत्र में एक चूना पत्थर खदान को मंजूरी देने की सिफारिश की. परियोजना प्रस्ताव के मुताबिक, पन्ना टाइगर रिज़र्व की टाइगर संरक्षण योजना के तहत स्वीकृत वन्यजीव कॉरिडोर के भीतर तथा उसके आसपास की 266.302 हेक्टेयर राजस्व भूमि पट्टे पर दी जाएगी.

यह कॉरिडोर पन्ना, बांधवगढ़ और संजय टाइगर रिज़र्व के आवास क्षेत्रों को आपस में जोड़ता है.

अन्य दो टाइगर रिज़र्व – संजय डबरी और रातापानी – में भूमिगत जल पाइपलाइन तथा बरना बांध से संबंधित ढांचागत निर्माण कार्यों को मंजूरी दी गई है.

वहीं, उत्तराखंड के राजाजी टाइगर रिज़र्व के कोर क्षेत्र की 4.54 हेक्टेयर भूमि का उपयोग ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट से नीलकंठ महादेव मंदिर तक रोपवे निर्माण के लिए स्वीकृत किया गया है.

समिति ने छत्तीसगढ़ से सटे मध्य प्रदेश के मंडला ज़िले में स्थित फेन वन्यजीव अभयारण्य के ईको-सेंसिटिव ज़ोन में दो बाक्साइट खनन परियोजनाओं को भी मंजूरी की सिफारिश की है.

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने कहा कि यद्यपि ये खनन पट्टे संरक्षित क्षेत्रों के कोर या बफ़र ज़ोन में नहीं आते, लेकिन फेन अभयारण्य, कान्हा टाइगर रिज़र्व और कान्हा-अचानकमार कॉरिडोर के निकट होने के कारण पारिस्थितिक सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं.

अक्टूबर में 266.3 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले AAA रिसोर्स लिमिटेड के चूना पत्थर खदान पट्टे का निरीक्षण केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण, वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया और मध्य प्रदेश वन विभाग की समिति द्वारा किया गया.

निरीक्षण में पाया गया कि खनन पट्टे का कुछ हिस्सा निर्धारित बाघ कॉरिडोर के भीतर आता है. पट्टे का दक्षिणी हिस्सा घने वनों से जुड़ा है और बाघों के आवाजाही के लिए उपयुक्त मार्ग है, जबकि उत्तरी हिस्सा खंडित है.

परियोजना की सिफारिश करते समय समिति ने कहा कि दक्षिणी कॉरिडोर से बाघों की आवाजाही सुनिश्चित करना और उसे मज़बूत बनाना आवश्यक है. इसके लिए खनन गतिविधियों को सीमित रखना और आवास सुधार उपाय करना ज़रूरी होगा.

रोपवे परियोजना पर चर्चा के दौरान उत्तराखंड के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक ने प्रस्ताव को उचित ठहराया. उनका कहना था कि इससे कांवड़ यात्रा के दौरान होने वाली ट्रैफ़िक भीड़ कम होगी और तीर्थयात्रियों द्वारा उपयोग की जाने वाली वन क्षेत्र से होकर गुजरने वाली सड़क पर वाहनों का दबाव घटेगा.

विशेषज्ञ सदस्य रमण सुकुमार ने कहा कि पारिस्थितिक दृष्टि से यह प्रस्ताव विचार योग्य है.

इस परियोजना को इस शर्त के साथ मंजूरी दी गई कि उत्तराखंड सरकार वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया से क्षेत्र में वन्यजीवों की आवाजाही का अध्ययन करवाए और निर्माण गतिविधियों से पड़ने वाले प्रभाव को कम करने के उपाय सुझाए.

उधर वन भूमि कब्जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को फटकारा, जांच के आदेश

इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उत्तराखंड में वन भूमि पर कब्जे के मामलों को लेकर राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई और कहा कि राज्य सरकार और उसके अधिकारी ‘मूकदर्शक’ बने बैठे हैं. इसके साथ ही अदालत ने स्वतः संज्ञान मामला दर्ज किया.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की अवकाश पीठ ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव को जांच समिति गठित करने और रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया.

पीठ ने कहा, ‘हमें यह देखकर झटका लगा है कि उत्तराखंड राज्य और उसके अधिकारी तब भी चुपचाप बैठे हैं जब उनके सामने वन भूमि पर कब्जा किया जा रहा है. इसलिए हम स्वतः संज्ञान लेते हैं. उत्तराखंड के मुख्य सचिव और प्रमुख वन संरक्षण सचिव को तथ्य-जांच समिति बनाने और रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाता है. निजी पक्षों को किसी तीसरे पक्ष के अधिकार बनाने से रोका जाता है और किसी भी तरह का निर्माण कार्य नहीं होगा.’

शीर्ष अदालत ने आगे कहा कि आवासीय मकानों को छोड़कर अन्य खाली भूमि का कब्ज़ा वन विभाग ले.

सुप्रीम कोर्ट उत्तराखंड में वन भूमि के एक बड़े हिस्से पर अवैध कब्ज़े से संबंधित अनीता कंडवाल की याचिका पर सुनवाई कर रहा था.