झारखंड के स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह को माओवादियों से कथित संबंधों के आरोप में 17 जुलाई 2022 को गिरफ़्तार किया गया था. करीब चार साल से जेल में बंद रूपेश अभी पटना, बिहार के आदर्श केंद्रीय कारा में बतौर विचाराधीन बंदी कैद हैं. उन्होंने जेल की परेशानी, मनमर्जी , भ्रष्टाचार को उजागर करते हुए एक आवेदन पटना के जिलाधिकारी को दिसंबर में ही लिखा था, जिसके ख़िलाफ़ जेल प्रशासन ने अभी तक कोई कदम नहीं उठाया है.
रूपेश इन दिनों कई स्वास्थ्य समस्या से जूझ रहे हैं, जैसे – ट्राइग्लिसराइड्स, हाई कॉलेस्ट्रॉल, साइनस और स्लीप डिस्क. उन्हें कोर्ट आर्डर के बावजूद जेल प्रशासन द्वारा पटना के किसी भी अस्पताल में इलाज के लिए नहीं दिखाया है, न ही उनकी कोई जांच जेल के अंदर या बाहर ही करवाई गई है.
इस संबंध में उन्होंने जिलाधिकारी को एक आवेदन भेजा है, जिसमें आदर्श केंद्रीय कारा, बेऊर, पटना में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार एवं जेल प्रशासन द्वारा बंदियों के शोषण- उत्पीड़न के ख़िलाफ़ दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करने की बात कही है.
इस पत्र में उन्होंने बताया है कि वह 17 अप्रैल, 2023 को पहली बार आदर्श केंद्रीय कारा, बेऊर में आए थे, लेकिन करीब 9 महीने बाद बंदियों के अधिकार के लिए आवाज़ उठाने के चलते उन पर झूठे आरोप लगाकर उन्हें 22 जनवरी, 2024 को शहीद जुब्बा साहनी केंद्रीय कारा, भागलपुर 6 महीने के लिए भेज दिया गया. वहां उन्हें 6 महीने के बदले 20 महीने रखा गया और 23 सितंबर, 2025 को वापस लाया गया, वह भी न्यायालय के दबाव के बाद.
रूपेश का आगे कहना है कि वापस आने के दूसरे दिन ही बिना किसी गलती के उन्हें और उनके साथ भागलपुर से आए सभी बंदियों को सेल (गोल घर-2) में डाल दिया गया, तब से वह वहीं पर हैं.
रूपेश आगे बताते हैं कि अब तक वे बिहार-झारखंड के 6 जेलों में रह चुके हैं और जेल से मिले अनुभवों पर उनकी एक जेल डायरी ‘कैदखाने का आईना’ भी प्रकाशित हो चुकी है. लेकिन अब तक उन्होंने आदर्श केंद्रीय कारा, बेऊर से ज्यादा भ्रष्टाचार कहीं नहीं देखा. इस भ्रष्टाचार के कारण पैसे वाले बंदियों व दबंगों के लिए यह जेल स्वर्ग के समान है, लेकिन आम बंदियों के लिए यह जेल नरक से भी बदतर है.
रूपेश ने अपने पत्र में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर ध्यान आकर्षित किया है…
(1) कारा हस्तक के डाइट-चार्ट के अनुसार भोजन नहीं मिलना- इस जेल में कारा हस्तक के डाइट-चार्ट का बिल्कुल भी पालन नहीं होता है. जैसै – प्रत्येक सोमवार, बुधवार व गुरुवार के सुबह का नाश्ते में 10 रुपये का मौसमी फल मिलना चाहिए, जो कि कभी कभी (महीने में 2-3 दिन) ही मिलता है.
प्रत्येक सोमवार को रात का खाना में 200 ग्राम दूध भी मिलना चाहिए, जो कि कभी नहीं मिलता है. प्रत्येक गुरुवार को रात का खाना में खीर भी मिलना चाहिए, जो कि कभी नहीं मिलती है. प्रत्येक रविवार को सेवई और भुजिया भी मिलना चाहिए, जो कि कभी नहीं मिलती है. प्रत्येक शनिवार को रात का खाना में अंडा करी मिलना चाहिए, यह भी महिना में 2-3 बार ही मिलती है . 70 वर्ष से अधिक उम्र के बंदियों को प्रत्येक दिन 500 ग्राम दूध व 10 रुपये का फल मिलना चाहिए, लेकिन फल किसी को नहीं मिलता है.
(2) कारा हस्तक के अनुसार अन्य सुविधाओं का ना मिलना- जैसे नहाने वाला साबुन, कपड़ा साफ करने वाला साबुन, तेल, दांत साफ करने के लिए दातुन या टूथपेस्ट, ब्रश आदि मिलना चाहिए, लेकिन यहां कुछ भी नहीं मिलता है.
(3) लचर स्वास्थ्य व्यवस्था- कारा अस्पताल में स्वास्थ्य व्यवस्था काफी लचर है. जिस बंदी का इलाज यहां संभव नहीं होता है, उन्हें बाहर के अस्पताल में इलाज कराने हेतु नाकों चने चबाने पड़ते हैं. यहां के चिकित्सक कहते हैं कि कोर्ट के ऑर्डर लेकर आइए तो बाहर के अस्पताल में भेजेंगे, लेकिन खुद से मरीज़ बंदी का मिनट्स कर के कोर्ट को नहीं भेजते हैं कि अमुक बंदी को बाहर के अस्पताल में इलाज की जरूरत है. फलतः बंदियों का रोग असाध्य हो जाता है.
(4) बंदियों द्वारा निजी मेस का संचालन – यहां के दर्जनों वार्डों में दबंग बंदियों द्वारा निजी मेस का संचालन किया जाता है, जिसमें 5-10 हजार रूपये महीना लेकर बंदियों को खाना बेचा जाता है. वे लोग वार्ड में ही हीटर पर लज़ीज़ खाना बनाते हैं. मेस संचालक कारा गोदाम से ही आलू, दाल, आटा, अंडा, चीनी, हरी सब्जी, प्याज आदि खरीदते हैं. मेस संचालक की जेल प्रशासन से मिलीभगत है.
(5) नशा का कारोबार – यहां नशा (गांजा, सिगरेट, खैनी) का व्यापक कारोबार है, जो 10-20 गुणी कीमत पर आसानी से उपलब्ध हो जाता है.
6) मुलाकाती में भ्रष्टाचार – मुलाकाती के लिए जब बंदियों के परिजन ऑनलाईन रजिस्ट्रेशन करते हैं, तो उन्हें समय से कन्फर्मेशन (ओटीपी) नहीं भेजा जाता है. ऐसी स्थिति में भी परिजन मुलाकात के लिए पहुंच जाते हैं तो मुलाकाती पर्ची करने वाले काउंटर पर ओटीपी नहीं होने के कारण मुलाकाती पर्ची काटने से मना कर दिया जाता है, लेकिन जैसे ही कुछ पैसा वहां मौजूद दलाल को दिया जाता है, तुरंत ही ओटीपी भी आ जाता है और मुलाकाती पर्ची भी कर जाता है.
7) गोल घर-02 (उच्च सुरक्षा कक्ष) में व्याप्त समस्याएं – गोल घर-02 में वर्तमान में 87 बंदी हैं, लेकिन उनके नहाने के लिए मात्र एक नल है. इसके चलते बंदी अपने कमरे में लैट्रीन शीट पर बैठकर नहाने के लिए मजबूर होते हैं. गोल घर-02 के निर्माणकाल से ही इसके सभी कमरे में एक वेंटीलेटर था, जिसे एक महीना पहले जेल प्रशासन ने बंद करवा दिया है.
मासूम हो कि गोल घर -2 के किसी भी कमरे में खिड़की नहीं है, मात्र सामने एक दरवाजा है, इसलिए वेंटीलेटर के बंद होने से काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. जेल के सभी वार्डों में टीवी के साथ-साथ जेल रेडियो का भी स्पीकर लगा हुआ है, लेकिन गोल घर-02 में इसमें से कुछ भी नहीं है.
(8) STD बूथ – कारा में 3 STD बूथ हैं, जिसमें से एक स्थायी तौर पर खराब है. बाकी बचे 2 में भी एक अक्सर खराब ही रहता है, जिस कारण बंदियों को काफी परेशानी होती है. साथ ही, बंदियों के परिजनों का मोबाईल नंबर सत्यापित होने में भी 3 से 6 महीने लगते हैं.
(9) पत्राचार की सुविधा का ना होना – बंदियों को अपने परिजनों, वकीलों व दूसरे जेल में बंद केस पार्टनरों से पत्राचार की सुविधा नहीं दी जाती है.
(10) स्नातकोत्तर की पढ़ाई की सुविधा का ना होना – बिहार की राजधानी के जेल के इग्नू स्टडी सेंटर में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की सुविधा का ना होना शर्मनाक है.
(11) लाठी कमान – इस जेल में जेल प्रशासन ने सजावार बंदियों के बीच से एक लाठी कमान बनाया है, जिसके सभी बंदियों को एक-एक लाठी दी गई है और उ्न्हें जेल के विभिन्न जगहों पर तैनात किया गया है, ताकि बंदियों के बीच भय बना रहे. ये लोग बंदियों पर लाठी का प्रहार भी करते हैं.
(12) झूठे आरोप लगाकर बंदियों पर प्रशासनिक लगाकर कारा स्थानांतरण करना – अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाले बंदियों पर झूठे आरोपों के तहत प्रशासनिक लगाकर कारा स्थानांतरण किया जाता है और उक्त कारा पहुंचते ही बंदियों की कारा गेट से लेकर गुमटी तक बर्बरतापूर्वक पिटाई की जाती है. साथ ही, 6 महीने प्रशासनिक अनुशंसा की जगह वर्षों वहीं रखा जाता है. दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि जेल प्रशासन की प्रशासनिक अनुशंसा को बिना जांच किए आपके कार्यालय से भी तत्काल अनुमति मिल जाती है.
रूपेश का कहना है कि जेल में जब भी जांच के लिए कोई अधिकारी आते हैं, तो जेल प्रशासन द्वारा बताए गए या एकत्रित किए गए बंदियों से ही मिलाकर चले जाते हैं और अगर घूमते भी हैं, तो सिर्फ वहां, जहां की सलाह जेल अधिकारी देते हैं.
वे आगे बताते हैं कि इस दौरान जेल के सभी वार्डों में बंदियों को बंद कर ताला लगा दिया जाता है. ऐसा ही, 10 दिसंबर 2025 को मानवाधिकार दिवस के दिन भी किया गया, सिर्फ 200 बंदियों को ही कार्यक्रम में शामिल किया गया, बाकी बंदियों को कार्यक्रम की समाप्ति तक वार्ड में बंद रखा गया.
रूपेश अपने द्वारा लिखे तमाम मुद्दों पर गंभीरतापूर्वक जांच कर दोषी जेल अधिकारियों पर विधिसम्मत कारवाई की मांग करते हैं और कहते हैं कि यह आवेदन यहां के हज़ारों बंदियों की आवाज़ है.
