2017 से पूरे भारत में तोड़फोड़ में तेज़ी से वृद्धि हुई. लंबे समय से शहरों में लोगों को बेदख़ल किया जाता रहा है लेकिन बुलडोज़र के दंडात्मक इस्तेमाल के कारण इसके दर में गुणात्मक वृद्धि हुई है. इस कार्रवाई में असमान रूप से मुसलमानों को निशाना बनाया गया है.
साल 2022 और 2023 में गिराए गए घरों में से 44% घर मुसलमानों के थे. नियमित रूप से क़ानूनी प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ करके, संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन करके ऐसी कार्रवाई की जाती है. अक्सर विरोध प्रदर्शनों, सांप्रदायिक तनावों के तुरंत बाद ऐसी कार्रवाई की जाती है, या कभी-कभी इसका कोई कारण नहीं होता सिवाय इसके कि पीड़ित मुसलमान थे. छह लेखों की श्रृंखला का यह दूसरा लेख यह बताता है कि बुलडोज़र कैसे बहुसंख्यकवादी राज्य शक्ति का एक उत्सव का प्रतीक बन गया. श्रृंखला का यह पहला लेख यहां पढ़ सकते हैं.)
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ऐसा नहीं है कि बुलडोज़र – बड़े मोटर वाले ट्रॉलर जिसके आगे के हिस्से में मेटल ब्लेड लगा होता है, जो कंस्ट्रक्शन का सामान ले जा सकते हैं और घरों को तोड़ सकते हैं – भारत के गवर्नेंस के पटल पर अभी-अभी आए हैं, और न ही उन्हें अब निर्णायक गवर्नेंस के प्रतीक के तौर पर अपनाया गया है.
दशकों से, बुलडोज़र अनियमित बस्तियों में रहने वाले या सड़क के फ़ुटपाथ पर सामान बेचने वाले शहर के लोगों के लिए डर और ख़ौफ़ का एक स्थायी कारण रहा है. झुग्गी-झोपड़ियों और फ़ुटपाथ पर रहने वाले या सड़क किनारे सामान बेचने वाले लोग भेदभावपूर्ण शहर प्रबंधन नीतियों और योजनाओं के कारण हमेशा ग़ैर-क़ानूनी माहौल में रहने और काम करने के लिए मजबूर हैं.
अक्सर, बहुत कम समय के या बिना किसी नोटिस के और रहने तथा काम करने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था के बिना, बुलडोज़र आते हैं और मिनटों में उनकी पूरी ज़िंदगी की कमाई को नष्ट कर देते हैं. पिछले कुछ सालों में कई अदालती फ़ैसलों में झुग्गी या फ़ुटपाथ पर रहने वाले या सामान बेचने वाले को पर्याप्त नोटिस देने तथा जीने के लिए सही विकल्पों की व्यवस्था करने की ज़्यादा मानवीय प्रक्रिया अपनाने का सुझाव दिया गया है.
शायद ही कभी इन आदेशों की मूल भावना का, या यहां तक कि शब्दों का भी पालन किया जाता है. बुलडोज़र ‘न्याय’ के इस पुराने तरीक़े के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसने शहर की प्लानिंग की गहरी असमानताओं को दूर करने के लिए कुछ नहीं किया है, जो ग़रीब मज़दूरों को क़ानूनी तौर पर इसका हिस्सा बनने से रोकती हैं.
हाल के वर्षों में भारत में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, तोड़फोड़ की घटना में भारी बढ़ोत्तरी देख रहे हैं. हाउसिंग एंड लैंड राइट्स नेटवर्क (एचएलआरएन), एक क़ानूनी एडवोकेसी ग्रुप, ने 2017 से 2023 के बीच बेदख़ली के बढ़ते ट्रेंड की रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिससे 1.68 मिलियन से ज़्यादा लोग प्रभावित हुए हैं.
पूरे भारत में बेदख़ली की संख्या 2019 में 1,07,625 थी जो 2022 में 2,22,686 हुई और 2023 में बढ़कर 5,15,752 हो गई है – दूसरे शब्दों में, पांच सालों में 379% की बढ़ोत्तरी हुई है. आंकड़े बताते हैं कि 2022 और 2023 में जिनके घर तोड़े गए, उनमें से 89% या तो मुस्लिम, अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के थे.
बढ़ती क्रूरता और नए निशाने
जैसा कि पहले भी हुआ है, राज्य द्वारा जबरन बेदख़ली के लिए बताए गए कारणों में स्मार्ट सिटी संबंधी योजनाएं, सड़क विस्तार, राजमार्ग और बुनियादी ढांचा तथा वन संरक्षण शामिल हैं, और कभी-कभी अस्पष्ट रूप से सिर्फ़ ‘अतिक्रमण हटाना’ या ‘शहर का सौंदर्यीकरण’ बताया जाता है.

यह दौर पहले से कहीं ज़्यादा बेवजह और बिना मतलब की क्रूरता के लिए भी जाना जाएगा, जैसा हमने पहले कभी नहीं देखा. फ्रंटलाइन मैगज़ीन में ‘इंडियाज़ बुलडोज़र राज’ शीर्षक से 2024 में प्रकाशित एक कहानी में ये कुछ आवाज़ें थीं:
– शेख़ अकबर अली: ‘पहले, हमने कभी शाम 5 बजे के बाद या सुबह-सुबह बुलडोज़र आते नहीं देखे थे, लेकिन अब यह भी आम बात हो गई है.’ कई लोगों ने तोड़फोड़ के दौरान भारी संख्या में तैनात अर्धसैनिक बल के बारे में बताया.
– दिल्ली के अशोक: ‘वे सिर्फ़ हमें इस जगह से हटाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं, बल्कि यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि यह जगह रहने लायक़ न रहे. हम यहां से कहां जाएंगे? पिछली बार जब वे हमारी झुग्गियों को गिराने आए थे, तो उन्होंने 5-6 फीट गहरा गड्ढा खोद दिया था ताकि हम उस जगह पर अपने घर दोबारा न बना सकें.’
– यमुना के बाढ़ वाले इलाक़े में रहने वाली किसान, रेखा: ‘उन्होंने हमें कई बार हटाने की कोशिश की है. वे गड्ढे खोदते हैं और हमारे ज़रूरी सामान, जिनमें राशन जैसी बेसिक ज़रूरतें भी शामिल हैं, उनमें फेंक देते हैं और फिर उन्हें रेत से भर देते हैं.’
– दिल्ली की एक अनाम महिला: ‘हमें अपना क़ीमती सामान और चीज़ें निकालने का समय भी नहीं दिया गया. मेरे बच्चों की किताबें और यूनिफ़ॉर्म सब चली गईं. जिस दिन तोड़फोड़ हुई, उस दिन बहुत तेज़ बारिश हो रही थी. हमने उनसे गुज़ारिश की कि कम से कम हमें एक दिन का समय दें ताकि हम अपना सामान बचा सकें. लेकिन, हमारे घरों के साथ-साथ हमारे सपने भी टूट गए.’
2023 में वेबसाइट आर्टिकल 14 ने बताया था कि कैसे स्थापित क़ानून के बावजूद, जिसमें तोड़फोड़ से पहले नोटिस देना और प्रभावित लोगों का पुनर्वास करना ज़रूरी है, तीन महीने में तोड़फोड़ की चार बड़ी घटनाओं के बाद भारत की राजधानी में कम से कम 1,600 घर गिरा दिए गए, और लगभग 260,000 लोग बेघर हो गए, अक्सर नोटिस तब दिए गए जब तोड़फोड़ करने वाली टीमें मौके पर पहुंच गईं.

24 फरवरी 2023 को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जी-20 देशों के वित्त प्रमुखों से ‘सबसे कमज़ोर’ लोगों की मदद करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए कहा, जबकि उनकी सरकार ने दिल्ली के कुछ सबसे ग़रीब लोगों के घरों को गिरा दिया, जिनमें सरकारी आश्रय गृहों में रहने वाले लोग भी शामिल थे, जिनमें से कुछ आश्रय गृह को भी गिरा दिया गया था.
दिल्ली के मध्ययुगीन तुग़लकाबाद क़िले के पास एक बस्ती या झुग्गी में, भारी बारिश के बीच रात भर तोड़फोड़ जारी रही, जिससे प्रभावित निवासियों ने पुलिस द्वारा बल प्रयोग की शिकायत की. बीस साल की घरेलू कामगार बिपाशा मंडल ने बताया कि जब बुलडोज़र उनके घर को गिरा रहे थे, उस दौरान एक महिला अधिकारी ने उनके बाल खींचे.
अदालतों से ऊपर बुलडोज़र ‘न्याय’
मध्य प्रदेश के आवास अधिकार कार्यकर्ता आनंद लखन ने फ्रंटलाइन से बात करते हुए न्याय की संभावनाओं को लेकर अपनी निराशा व्यक्त की. उन्होंने कहा कि तोड़फोड़ का शिकार होने वाले लोगों को न्याय दिलाने में अदालतें अतीत की अपनी सक्रिय भूमिका से पीछे हट गई हैं.
लखन ने कहा, ‘हम कोर्ट के न्याय से बुलडोज़र न्याय के दौर में आ गए हैं. शुरू में, हमें लगता था कि हम दया की भीख मांगने के बजाय कोर्ट में पक्के सबूत पेश करके भरोसा कर सकते हैं. हालांकि, सरकार अक्सर इन सबूतों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देती है.’
बुलडोज़र भेजते समय राज्य के अधिकारी संवैधानिक अधिकारों और क़ानून के शासन की ज़रूरतों की परवाह नहीं करते. आख़िर, किसी भी भारतीय क़ानून की किताब में ऐसा कोई क़ानून नहीं है जो राज्य को यह अधिकार देता हो कि सिर्फ़ अपराध करने के लिए वह किसी व्यक्ति की संपत्ति को नष्ट कर दे.
दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश जस्टिस एपी शाह ने कहा कि ‘(सिर्फ़) आपराधिक गतिविधि में शामिल होना कभी भी संपत्ति को गिराने का आधार नहीं हो सकता’.
किसी व्यक्ति ने सच में कोई अपराध किया है या नहीं इस निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए संविधान और क़ानून में एक विस्तृत प्रक्रिया का प्रावधान है जो किसी व्यक्ति को सज़ा देने से पहले आरोपी व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करता है. अब इसे भी लापरवाही से नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.
जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के एक सम्मानित रिटायर्ड जज, मदन लोकुर ने पूछा: ‘किस प्रावधान के तहत (प्रशासन) ऐसे अपराध के लिए उनके घर को गिरा सकता है जो अभी तक साबित नहीं हुआ है?’
घरों को तोड़ने की यह घटना पिछले कई दशकों में भारतीय गणराज्य में बार-बार हुई है. लेकिन बुलडोज़र के इस नए दौर में जो बदला है, वह है बुलडोज़र का निशाना और बहिष्कार वाली नफ़रत की राजनीति के लिए इसका वैचारिक इस्तेमाल.
चुनिंदा, दिखावटी तोड़फोड़
रिकॉर्ड के लिए, नगर निगम और ज़िला अधिकारी ज़्यादातर यह दावा करते रहते हैं कि बुलडोज़र सिर्फ़ ग़ैर-क़ानूनी क़ब्ज़ों के ख़िलाफ़ रूटीन ड्राइव में घरों को तोड़ने के लिए लाए जाते हैं. वे यह नहीं बताते कि सिर्फ़ कुछ संपत्तियों को ही क्यों निशाना बनाया जाता है, जबकि आस-पास की सैकड़ों दूसरी संपत्तियों को छुआ तक नहीं जाता जिनकी क़ानूनी स्थिति भी वैसी ही विवादित होती है.
2025 में, मध्य प्रदेश के उज्जैन और दमोह में – जहां भाजपा की सरकार है – मुस्लिम संदिग्धों को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किया गया, कोड़े मारे गए, परेड कराई गई तथा ‘गाय हमारी माता है’ और ‘पुलिस हमारे पिता हैं’ जैसे नारे लगाने के लिए मजबूर किया गया. इस तरह की शर्मिंदगी की स्वीकार्यता के बाद अपमानित करने का राजनीतिक मुक़ाबला भी शुरू हो गया.
दमोह में, कांग्रेस पार्टी द्वारा शासित नगर परिषद ने उनकी संपत्तियों को तोड़ने का आदेश दिया, जबकि उसी राज्य के छिंदवाड़ा में, हाल ही में गाय की हत्या के एक मामले में हिंदू संदिग्धों को बिना किसी सार्वजनिक तमाशे या ज़्यादा मीडिया कवरेज के गिरफ़्तार कर लिया गया.

प्रशासन पुरानी तारीख़ वाला नोटिस दिखाकर यह काम करती है, और वे इमारतों को अचानक गिराने की वजह भी नहीं बताती, यह भी नहीं बताती कि ऐसा अक्सर सांप्रदायिक झड़पों या मुसलमानों के विरोध प्रदर्शनों के तुरंत बाद क्यों होता है, या कभी-कभी किसी काल्पनिक अपमान के बाद.
उदाहरण के लिए, जैसा कि आर्टिकल 14 ने 2023 में रिपोर्ट किया था, बिना किसी सबूत के आरोपों के आधार पर मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में पुलिस ने तीन मुस्लिम किशोरों को गिरफ़्तार किया, जिन पर हिंदू जुलूस पर थूकने का आरोप था. ढोल और संगीत के साथ नगर निगम के अधिकारियों ने फिर यह दावा करते हुए उनका घर गिरा दिया कि इमारत ‘ख़तरनाक’ थी.
दो पूर्व पुलिस प्रमुखों, एक हाईकोर्ट के जज और एक सुप्रीम कोर्ट के वकील ने कहा कि उज्जैन में घर गिराना ग़ैर-क़ानूनी और असंवैधानिक था. डरा हुआ, चिंतित परिवार सिर्फ़ अपने बच्चों को जेल से बाहर निकालने के बारे में सोच रहा था.
लेकिन ज़्यादातर राजनीतिक नेता खुलकर अपनी ख़ुशी ज़ाहिर कर रहे थे. वे इस बात पर ख़ुश थे कि उन्होंने ग़लत काम करने वालों को मिसाल बनाने और तुरंत सज़ा देने के लिए बुलडोज़र भेजे, और इस तरह इशारों-इशारों में मुस्लिम पीड़ितों के घर गिराने की बात कही.
कई ध्वंस का पैटर्न यह है कि हिंदू धार्मिक जुलूस मस्जिदों के बाहर रुकते हैं, जहां लोग ज़ोरदार म्यूज़िक, एच-पॉप, या हिंदुत्व पॉप गानों पर पागलों की तरह नाचते हैं, इन गानों के ज़रिये मुसलमानों, उनके पैगंबर और उनके धर्म का अपमान किया जाता है और गाली-गलौज की जाती है. इससे आमतौर पर सांप्रदायिक झड़प शुरू हो जाती है. सिर्फ़ एक या दो दिन बाद उन लोगों की प्रॉपर्टी को गिराने के लिए बुलडोज़र आ जाता है जिन्हें पुलिस और स्थानीय प्रशासन हिंसा के लिए ज़िम्मेदार मानता है.
हिंसा में शामिल हिंदू उपद्रवियों को कभी ऐसी सज़ा नहीं मिलती.
एक और आम स्थिति तब होती है जब मुसलमान पैगंबर के सार्वजनिक अपमान या सार्वजनिक पूजा को रोके जाने या मस्जिदों या मज़ारों को गिराए जाने के विरोध में सड़कों पर उतरते हैं. जिन्हें पुलिस और प्रशासन विरोध प्रदर्शनों का नेता और भागीदार मानते हैं उन लोगों के घरों को बर्बाद करने के लिए बुलडोज़र भेजे जाते हैं.
जल्दबाज़ी में और दहशत फैलाने के लिए की जाने वाली दिखावटी तोड़फोड़ में, कभी-कभी जिन संपत्तियों को तोड़ा जाता है, वे उन लोगों की मिलकियत होती ही नहीं, जिन्हें सरकार निशाना बनाना चाहती थी.
प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन
एक मामले में स्थानीय प्रशासन ने दावा किया कि उनके पास यह मानने का कारण था कि जिस आदमी को वे सज़ा देना चाहते थे, उसने उस घर में आंशिक रूप से निवेश किया था जिसे उन्होंने बिना किसी चेतावनी के तोड़ दिया. एक और मामले में, उज्जैन में, एक स्कूली छात्र का घर गिरा दिया गया, जिसने अपने सहपाठी को चाकू मारकर मार डाला था.
राज्य की इन सभी कार्रवाइयों ने बिना किसी झिझक के और खुलेआम प्राकृतिक न्याय के सभी स्थापित सिद्धांतों का उल्लंघन किया. भारत के क़ानूनों में ऐसा कोई क़ानून नहीं है जो राज्य को किसी अपराध के दोषी व्यक्ति की संपत्ति को गिराने का अधिकार देता हो. यह ज़िम्मेदारी राज्य की है कि वह किसी व्यक्ति के अपराध को साबित करने के लिए सबूत इकट्ठा करे और उन्हें कोर्ट में पेश करे.
अगर ट्रायल कोर्ट किसी व्यक्ति को दोषी पाता है, तो भी उसके पास हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का मौक़ा होता है. अगर तीनों चरण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कोर्ट द्वारा दोषी पाया जाता है, तो व्यक्ति को सज़ा दी जा सकती है, लेकिन सिर्फ़ उन्हीं तरीक़ों से जो क़ानूनों में बताए गए हैं.
इन सबके अलावा राज्य को संवैधानिक रूप से नागरिकों की धार्मिक पहचान के आधार पर उन्हें निशाना बनाने और उनके साथ भेदभाव करने से रोका गया है. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा शासित राज्यों में बुलडोज़र देश के नागरिकों के एक वर्ग विशेष पर राज्य के हमले के हथियार बन गए हैं.
क़ानूनी प्रक्रिया का दिखावा भी शायद ही कभी किया जाता है, संवैधानिक निष्पक्षता की तो बात ही छोड़िए, 2019 के बाद कई भाजपा शासित राज्यों में लगातार राज्य सरकारों ने ज़्यादातर मुस्लिम नागरिकों को निशाना बनाया है.

जब संपत्तियों को गिराया जाता है तो माहौल आमतौर पर उत्सव जैसा होता है, अक्सर दर्शक और टेलीविज़न मीडिया ख़ुश होते हैं, और सरकार तथा सत्ताधारी पार्टी के चुने हुए नेता तोड़फोड़ को बहादुरी से भरी और बदले की उचित कार्रवाई बताते हैं, यह बिना अपराध साबित हुए एक तरह की ज़बरदस्त और जश्न वाली गैर-न्यायिक सज़ा है.
ऐसा करके भाजपा सरकारों ने एक लक्ष्मण रेखा पार कर दी है. वे नागरिकों, राजनीतिक विपक्ष और अदालतों को यह बता रहे है कि उन्होंने संवैधानिक शासन तथा धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र दोनों को ख़ारिज कर दिया है. अपने नागरिकों के एक वर्ग के प्रति अपनी खुली दुश्मनी के चलते राज्य ख़ुद ही क़ानून को तोड़ने पर आमादा है.
यह नया ट्रेंड हाल के सालों में मुख्य रूप से मुसलमानों को निशाना बनाकर की जाने वाली दंडात्मक तोड़फोड़ की कार्रवाई में साफ़ बढ़ोत्तरी को दर्शाता है. मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है
उदाहरण के लिए, फ्रंटलाइन ने, 2023 में मध्य प्रदेश के खरगोन; उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, सहारनपुर; हरियाणा के नूंह; और दिल्ली के जहांगीरपुरी सहित कई जगहों पर बेदख़ली और तोड़फोड़ के कई मामलों की रिपोर्ट प्रकाशित की. आर्टिकल 14 ने नियमित रूप से इन तोड़फोड़ तथा अन्य घटनाओं पर नज़र रखी है, जैसे कि अगस्त 2025 में गुजरात में हुई सबसे बड़ी तोड़फोड़ की घटना.
आर्टिकल 14 ने बताया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर, 2025 में ‘अवैध बांग्लादेशियों’ पर कार्रवाई के बाद अहमदाबाद की चंदोला झील के आसपास 12,500 से ज़्यादा घरों को तोड़ दिया गया, जिससे हज़ारों मुसलमान – जिनमें से कई वैध दस्तावेज़ों वाले भारतीय नागरिक थे – बेघर हो गए. बिना किसी नोटिस के इन घरों को गिरा दिया गया, सामान मलबे के नीचे दब गया, और बच्चों को स्कूल से निकाल दिया गया.

जबकि गुजरात सरकार ने दावा किया कि यह ऑपरेशन अवैध प्रवासियों के ख़िलाफ़ था, लेकिन घरों को गिराने, हिरासत में लेने और चुपचाप देश से निकालने की घटनाओं—जिनमें ज़्यादातर बांग्ला बोलने वाले मुसलमान प्रभावित हुए— ने कमज़ोर वेरिफ़िकेशन, भेदभावपूर्ण आवास क़ानूनों तथा बढ़ते डर के माहौल को उजागर किया.
तोड़फोड़ के ज़रिये अक्सर ख़ास समूह को निशाना बनाया जाता है. उदाहरण के लिए, 20 अप्रैल 2022 को हनुमान जयंती जुलूस के दौरान सांप्रदायिक झड़पों के बाद, अर्धसैनिक बलों की 12 कंपनियों के लगाकर नगर निगम के अधिकारियों ने जहांगीरपुरी में मुख्य रूप से मुसलमानों की 25 दुकानें, ठेले और घरों को तोड़ दिया.
ऐसा ही खरगोन में भी हुआ. अप्रैल 2022 में रामनवमी और हनुमान जयंती समारोह के दौरान हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद मुसलमानों के 16 घर और 29 दुकानें तोड़ दी गईं.
फरवरी 2024 की एमनेस्टी इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि तोड़फोड़ की 128 घटनाओं में मुसलमानों को निशाना बनाया गया, जिससे 617 लोग प्रभावित हुए.
जिन संपत्तियों को तोड़ा गया उनमें घर, दुकानें और पूजा स्थल शामिल थे, जो ज़्यादातर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्यों असम, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश, तथा आम आदमी पार्टी (आप) शासित दिल्ली के मुसलमानों के थे.
रिपोर्ट में यह दर्ज किया गया है कि घरों को तोड़ने की कार्रवाई ज़्यादातर मुस्लिम-बहुल इलाक़ों में की गई, मिश्रित इलाक़ों में भी ख़ासकर मुसलमानों की संपत्तियों को निशाना बनाया गया. पास में ही मौजूद हिंदुओं की संपत्तियों को – ख़ासकर गुजरात और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में – छुआ तक नहीं गया.
सबसे ज़्यादा प्रभावित वे समुदाय थे जिनके आसपास हाल ही में हिंदू-मुस्लिम हिंसा के बाद तनाव उत्पन्न हुआ था, अक्सर रमज़ान के दौरान हिंदू समूहों द्वारा उकसावे के बाद, या जहां मुसलमानों ने विरोध प्रदर्शन किया था.
एचएलआरएन के आंकड़ों से पता चलता है कि 2022 और 2023 में बेदख़ल किए गए 7,00,000 से ज़्यादा लोगों में से 44% मुसलमान थे: 23% अनुसूचित जनजाति, आदिवासी और अन्य आदिवासी समूह थे; 17% अन्य पिछड़ा वर्ग थे; और 5% अनुसूचित जाति थे.
इस तरह के चुनिंदा तोड़फोड़ की घटना 2024 में असम में भी हुई. सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार को आदिवासियों के लिए आरक्षित ज़मीन पर घरों को गिराने के लिए अवमानना नोटिस जारी किया, क्योंकि 17 सितंबर 2024 के एक आदेश द्वारा देश भर में तोड़फोड़ पर रोक लगाए जाने के बाद यह घटना हुई थी.
गांव वालों, एक्टिविस्टों और वकीलों ने तर्क दिया कि असम में ज़्यादातर बांग्ला बोलने वाले मुसलमानों को बेदख़ल करना पहले से चली आ रही न्यायिक मिसालों का उल्लंघन था कि लोगों को सार्वजनिक या संरक्षित ज़मीन से कैसे हटाया जाए. उसी ज़मीन पर बने हिंदू घरों को छुआ तक नहीं गया. आर्टिकल 14 की रिपोर्ट में पाया गया कि कुछ लोगों के पास 1920 के दशक के ज़मीन का स्वामित्व था, जब ज़मीन को आदिवासी ज़मीन घोषित नहीं किया गया था.
‘सामूहिक सज़ा का हथियार’
एमनेस्टी इंटरनेशनल की सेक्रेटरी जनरल, एग्नेस कैलामार्ड ने तोड़फोड़ की निंदा करते हुए इसे ‘क्रूर और भयानक’—ग़ैर-क़ानूनी, भेदभावपूर्ण और अन्यायपूर्ण विस्थापन का एक रूप बताया.
जैसा कि फ्रंटलाइन ने लिखा, तोड़फोड़ ‘सामूहिक सज़ा का एक हथियार बन गई है, जो क़ानूनी या प्रशासनिक चिंताओं को दूर करने के बजाय सांप्रदायिक विभाजन को और गहरी करती है. जबकि बेदख़ली अक्सर ऐसे तौर तरीक़े का पालन करती है जो स्पष्ट रूप से सांप्रदायिक और दंडात्मक होते हैं, क़ानूनी प्रक्रिया प्रक्रियात्मक वैधता पर ही केंद्रित रहती है.’
प्रभावित घरों में से कई क़ानूनी तौर पर संदेहास्पद क्षेत्र में आते हैं, ठीक वैसे ही जैसे देश भर में अलग-अलग जाति और धर्म के ग़रीब लोगों के घर होते हैं. हालांकि, कई लोगों ने बताया कि मुस्लिम लोगों की संपत्ति की कथित ग़ैर-क़ानूनी स्थिति का इस्तेमाल चुनिंदा तरीक़े से तोड़फोड़ को सही ठहराने के लिए किया जाता है.
तोड़फोड़ अक्सर मुस्लिम लोगों द्वारा की गई हिंसा के दावों के बाद होती है, भले ही आरएसएस से जुड़े समूह हिंसा भड़काने में शामिल हों. सुप्रीम कोर्ट के वकील चंदर उदय सिंह द्वारा संपादित की गई 2023 की एक रिपोर्ट, रूट्स ऑफ रैथ, में दिखाया गया कि कैसे, 2022 के रामनवमी दौरान, जुलूसों को बार-बार मस्जिदों की ओर मोड़ा गया, जहां तेज़ संगीत बजाए गए और अपमानजनक नारे लगाए गए जिसके बाद छोटी-मोटी झड़पें हुईं.
इसके तुरंत बाद, ख़ासकर भाजपा-शासित राज्यों में, दंगाइयों के रूप में लेबल किए गए मुसलमानों के घरों को तोड़ने के लिए बुलडोज़र आ गए. मुस्लिम विरोध प्रदर्शनों के बाद इसी तरह की दंडात्मक तोड़फोड़ की गई—जैसे कि भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों के बाद प्रयागराज में—या 2023 में उज्जैन की तरह मनमाने ढंग से उन्हें दंडित किया गया. असम में, बांग्ला-भाषी मुसलमानों को बड़े पैमाने पर कथित रूप से ‘घुसपैठिया’ बताकर निशाना बनाया जाता है.
इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया और न्यू इंडियन एक्सप्रेस सहित प्रमुख अख़बारों ने इन कार्रवाइयों को ग़ैरक़ानूनी, दंडात्मक और संवैधानिक मानदंडों के विपरीत बताया.
इंडियन एक्सप्रेस ने जून 2022 में लिखा था कि ‘एक संवैधानिक लोकतंत्र में, बेक़ाबू बुलडोज़र का मतलब है कि राज्य अदालत की अवहेलना कर रहा है, डीएम और एसपी जज और जूरी की भूमिका निभा रहे हैं—और वफ़ादार जल्लाद बन रहे हैं’. इसी रिपोर्ट में यह भी लिखा गया कि जब यूपी के अधिकारी और राजनेता ‘दंगा आरोपियों को ‘शुक्रवार’ का ‘रिटर्न गिफ़्ट’ ‘शनिवार’ को देने की बात करते हैं, (तो) यह सार्वजनिक चर्चा में क्रूरता के एक नए स्तर को दिखाता है’.
‘डार्क कार्निवल’
स्कॉलरों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का तर्क है कि तोड़फोड़ से डर पैदा होता है और दूसरे दर्जे के नागरिक के रूप में मुसलमानों की स्थिति मज़बूत होती है. इस बीच, बुलडोज़र उत्तरी भारत में एक मशहूर प्रतीक बन गया है – यह भाजपा की रैलियों, पॉप संगीत, टी-शर्ट और टैटू में दिखाई देता है, और यहां तक कि न्यू जर्सी में स्वतंत्रता दिवस परेड में भी, जिसका अमेरिकी सीनेटरों ने कड़ा विरोध किया और निंदा की थी.
2022 में संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूतों ने चेतावनी दी थी कि ये ‘जबरन बेदखली और मनमाने ढंग से घरों को गिराना’ दंडात्मक उपाय हैं जो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों का उल्लंघन करते हैं. मानवविज्ञानी थॉमस ब्लोम हैनसेन बुलडोज़र को ‘बदले’ का प्रतीक और राज्य शक्ति का एक ऐसा उपकरण मानते हैं जिसका पक्षपातपूर्ण तरीक़े से इस्तेमाल किया जाता है.
कई लोगों को तोड़फोड़ के ऐसे सार्वजनिक तमाशे इतिहास के विशेष दौर की याद दिलाते हैं, जैसे कि अमेरिका में जिम क्रो की व्यवस्था का दौर – यह बड़े पैमाने पर क़ानूनी नस्लीय अलगाव और अफ़्रीकी अमेरिकियों के ख़िलाफ़ भेदभाव का दौर था, मुख्य रूप से दक्षिणी अमेरिका में, जो मोटे तौर पर 1870 के दशक के आख़िर से लेकर 1960 के दशक के मध्य तक चला – जिसमें भीड़ अल्पसंख्यकों के अपमान और हत्याओं का जश्न मनाती थी.
हैनसेन भारत के बुलडोज़र ‘न्याय’ को ‘हिंदू राष्ट्रवादी प्रोजेक्ट में एक नए चरण’ के संकेत के रूप में देखते हैं. वह कहते हैं कि हिंदुओं का मानना है कि उन्होंने मुस्लिम शासकों के अधीन सदियों तक कष्ट झेला है, जिन्हें एक समान दमनकारी और कट्टर के रूप में दिखाया जाता है. वह आगे कहते हैं कि इन कथित अन्याय के लिए ‘बदले के एक रूप, एक बदला लेने की कल्पना’ के रूप में बुलडोज़र का जश्न मनाया जाता है.
(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक है. लेख के लिए उमैर ख़ान ने शोध सहायता की है. इस लेख के लिए डायसपोरा इन एक्शन फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स से सहयोग मिला है.)
(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)
