नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने केंद्र सरकार के अनुरोध पर हाईकोर्ट के एक जज के प्रस्तावित तबादले में बदलाव करने के हालिया कॉलेजियम के फैसले पर चिंता जताई है.
रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा कि न्यायिक तबादलों और नियुक्तियों के मामलों में कार्यपालिका (सरकार) की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए.
उल्लेखनीय है कि पुणे के आईएलएस लॉ कॉलेज में ‘संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक शासन’ विषय पर आयोजित जीवी पंडित स्मृति व्याख्यान में बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि कॉलेजियम द्वारा यह दर्ज करना कि स्थानांतरण प्रस्ताव केंद्र सरकार के अनुरोध पर किया गया था, ‘संवैधानिक रूप से स्वतंत्र प्रक्रिया मानी जाने वाली इस प्रक्रिया में कार्यपालिका के दखल का स्पष्ट संकेत है.’
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने किसी न्यायाधीश का नाम लिए बिना इस कदम के निहितार्थों पर सवाल उठाए.
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा, ‘किसी न्यायाधीश को सिर्फ इसलिए एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय में क्यों स्थानांतरित किया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने सरकार के खिलाफ कुछ असुविधाजनक आदेश पारित किए थे? क्या इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती?’
उन्होंने यह सवाल उठाते हुए चेतावनी दी कि इस तरह की कार्रवाई संविधान के एक मूलभूत सिद्धांत पर प्रहार करती है.
रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस भुइयां की ये टिप्पणियां अक्टूबर के उस फैसले से संबंधित हैं जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय से छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने के अपने प्रारंभिक प्रस्ताव को संशोधित करते हुए, उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की सिफारिश की थी.
कॉलेजियम के प्रस्ताव में कहा गया है कि यह बदलाव ‘सरकार द्वारा पुनर्विचार के अनुरोध पर’ किया गया है.
लाइव लॉ के अनुसार, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में जस्टिस श्रीधरन कॉलेजियम के सदस्य बन जाते, जबकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वरिष्ठता में उनके सातवें स्थान पर होने की संभावना है.
तबादले केवल ‘न्याय के बेहतर प्रशासन’ के लिए किए जाते हैं: जस्टिस भुइयां
लाइव लॉ के मुताबिक, जस्टिस भुइयां ने दोहराया कि स्वाभाविक रूप से, केंद्र सरकार उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के तबादलों और तैनाती के मामले में कोई दखल नहीं दे सकती. वह यह नहीं कह सकती कि अमुक न्यायाधीश का तबादला किया जाना चाहिए या नहीं. यह न्यायपालिका का अपना अधिकार क्षेत्र है.
उन्होंने आगे कहा कि तबादले केवल ‘न्याय के बेहतर प्रशासन’ के लिए किए जाते हैं, न कि न्यायाधीशों को दंडित करने के साधन के रूप में.
जस्टिस भुइयां के अनुसार, ‘जब कॉलेजियम यह मानता है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश का तबादला केंद्र सरकार के अनुरोध पर किया जा रहा था, तो यह कार्यपालिका के प्रभाव का एक स्पष्ट अतिक्रमण दर्शाता है, जबकि संवैधानिक रूप से यह एक स्वतंत्र प्रक्रिया होनी चाहिए, जिसे कार्यपालिका और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त रखने के लिए बनाया गया है.’
कॉलेजियम प्रणाली के उद्देश्य पर जोर देते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि इसका गठन न्यायिक नियुक्तियों और तबादलों को कार्यपालिका के दबाव से बचाने के लिए किया गया था, और चेतावनी दी कि किसी भी प्रकार का बदलाव इसकी अखंडता को कमजोर करता है.
उन्होंने आगे कहा, ‘अब जबकि न्यायपालिका ने कॉलेजियम प्रणाली को बदलने के सरकार के प्रयास को विफल कर दिया है, न्यायपालिका विशेष रूप से कॉलेजियम के सदस्यों के लिए, यह सुनिश्चित करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि कॉलेजियम स्वतंत्र रूप से कार्य करता रहे.’
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न्यायपालिका की अखंडता को ‘हर कीमत पर बनाए रखा जाना चाहिए.’
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि न्यायिक स्वतंत्रता के लिए खतरे ‘अंदर से’ आ सकते हैं, और न्यायाधीशों से राजनीतिक या वैचारिक पूर्वाग्रह से बचने का आग्रह किया.
जस्टिस भुइयां ने कहा, ‘यह लोकतंत्र के लिए एक दुखद दिन होगा यदि किसी मामले का परिणाम केवल यह जानकर ही अनुमानित हो जाए कि कौन सा न्यायाधीश या पीठ इसकी सुनवाई कर रही है.’
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक स्वतंत्र न्यायपालिका ‘अपरिवर्तनीय’ है.
