नई दिल्ली: असम में विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि राज्य में आगामी चुनावों से पहले मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण (एसआर) के दौरान फॉर्म-7 का दुरुपयोग कर वास्तविक नागरिकों को परेशान किया जा रहा है.
टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, फॉर्म-7 का उपयोग मतदाता सूची से नाम हटाने के लिए किया जाता है. इसके माध्यम से कोई भी व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल होने पर आपत्ति दर्ज करा सकता है. इसके तहत मृत्यु या निवास स्थान में परिवर्तन के कारण नाम सूची से हटाने का अनुरोध किया जा सकता है.
एक संयुक्त बयान में वामपंथी दलों (मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी- मार्क्सवादी लेनिनवादी लिबरेशन, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक और एसयूसीआई (सी) ने कहा कि फॉर्म-7 का इस्तेमाल अल्पसंख्यक मतदाताओं को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है.
अखबार के अनुसार, कांग्रेस ने भी बोको-छायगांव में स्थानीय भाजपा नेताओं और अधिकारियों के खिलाफ कथित अवैध नाम कटने-जुड़ने को लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है.
इस संबंध में विपक्षी दलों ने शुक्रवार (23 जनवरी) को चुनाव आयोग से आग्रह किया कि फॉर्म-7 के ‘दुरुपयोग’ के परिणामस्वरूप चल रहे पुनरीक्षण के दौरान किसी भी पात्र मतदाता को मतदाता सूची से न हटाया जाए.
इन दलों ने आपत्तियों और दावों के निपटारे की 2 फरवरी की समय सीमा बढ़ाने की भी मांग की.
‘फॉर्म-7 भरने से नाम स्वतः नहीं हटेंगे’
फॉर्म-7 को लेकर उठ रहे सवालों पर राज्य निर्वाचन विभाग ने सार्वजनिक एडवाइजरी जारी कर स्थिति साफ की है. विभाग ने कहा है कि फॉर्म-7 दाखिल होने से किसी भी मतदाता का नाम अपने आप नहीं हटता. हर आपत्ति पर कानूनी प्रक्रिया के तहत फील्ड वेरिफिकेशन किया जाता है, संबंधित मतदाता को नोटिस देकर सुनवाई का मौका दिया जाता है और उसके बाद ही कोई फैसला लिया जाता है.
इस एडवाइजरी में मतदाताओं से प्रपत्र 6, 7 और 8 के तहत आवेदन जमा करते समय सही जानकारी देने का आग्रह किया गया है. साथ ही चेतावनी दी गई है कि झूठी घोषणाएं करना या जानबूझकर गलत प्रविष्टियां रखना कानून के तहत दंडनीय अपराध हैं, जिनमें लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 भी शामिल है.
रिपोर्ट में विभाग के हवाले से कहा गया है कि संशोधन प्रक्रिया का उद्देश्य एक स्वच्छ, सटीक और समावेशी मतदाता सूची सुनिश्चित करना है और इससे किसी भी मतदाता को चिंतित नहीं होना चाहिए.
इसमें यह भी कहा गया है कि प्रविष्टियों के शामिल होने, बाहर होने या सुधार से व्यथित कोई भी व्यक्ति मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत वैधानिक उपायों का सहारा ले सकता है.
आयोग के अनुसार, सभी आपत्तियों के आवेदनों का निपटारा 2 फरवरी तक कर दिया जाएगा और अंतिम मतदाता सूची 10 फरवरी को प्रकाशित की जाएगी.
विपक्ष की आलोचना
कई राजनेताओं ने आलोचना की है कि इस प्रक्रिया के लिए समय पर्याप्त नहीं है.
इस संबंध तृणमूल कांग्रेस सांसद सुष्मिता देव ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर कहा है कि असम में मतदाता सूचियों का विशेष पुनरीक्षण ‘न केवल जल्दबाजी में किया गया, बल्कि यह बेहद अव्यवस्थित’ भी था.
देव ने अपने पत्र में फॉर्म-7 का मुद्दा उठाया और बताया कि वैध व्यक्तियों के नाम हटाने के लिए इसके तहत ‘बड़ी संख्या में आपत्तियां’ दर्ज की गई हैं.
उनके पत्र में कहा गया है, ‘नाम हटाने के लिए ये फॉर्म-7 आपत्तियां बड़ी संख्या में व्यक्तियों द्वारा दर्ज की गई हैं, और अधिकांश मामलों में शिकायतकर्ता, जिसका नाम फॉर्म में है, या तो लापता है या उसने इन फॉर्मों को दाखिल करने से इनकार कर दिया है.’
उन्होंने आगे लिखा है, ‘हर एक को नोटिस देना और 11 दिनों के भीतर सुनवाई करना एक असंभव कार्य है, जिससे वास्तविक मतदाताओं को प्रभावी सुनवाई से वंचित होना पड़ेगा और इसके परिणामस्वरूप उनके मतदान के लोकतांत्रिक अधिकार का हनन होगा. वास्तविक मतदाताओं में दहशत, व्याकुलता और आक्रोश का माहौल है.’
देव की मांगों में से एक यह भी थी कि चुनाव आयोग सुनवाई और निपटारे की तारीख को सात दिन और बढ़ा दे ताकि लोगों को अपने मतदान के अधिकार का बचाव करने का उचित अवसर मिल सके.
द हिंदू के अनुसार, इसी तरह तीन हफ्ते पहले असम के विपक्ष के नेता देबब्रता सैकिया ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित राज्य की मतदाता सूची में ‘गंभीर अनियमितताओं’ का आरोप लगाया था.
मुख्यमंत्री ने चिंताओं का खंडन किया
वहीं, विशेष पुनरीक्षण को लेकर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने किसी भी तरह की चिंताओं से इनकार करते हुए कहा है कि इसमें कोई विवाद नहीं है.
सीएम शर्मा ने कहा, ‘नोटिस केवल ‘मिया’ यानी बांग्लादेश मूल के मुस्लिम प्रवासियों को भेजे जा रहे हैं, न कि किसी भी आदिवासी, हिंदू या असमिया मुस्लिम समुदाय को.’
अपने बयान में मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया, ‘किसी हिंदू परिवार को नोटिस मिला क्या? किसी असमिया मुस्लिम परिवार को नोटिस मिला क्या? नोटिस सिर्फ मिया लोगों को दिए जा रहे हैं.’ उन्होंने दो टूक कहा, ‘हां, मैं उन्हें परेशान कर रहा हूं, इसमें छिपाने जैसा कुछ नहीं है.’
सीएम हिमंता ने साफ किया कि यह कार्रवाई अवैध प्रवासियों पर दबाव बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा है.
उन्होंने कहा, ‘उन्हें समझना होगा कि असम के लोग किसी स्तर पर उनका विरोध कर रहे हैं. नहीं तो उन्हें बिना किसी विरोध के जीत मिल जाएगी. इसलिए किसी को एसआईआर के तहत नोटिस मिलेगा, किसी को अतिक्रमण के मामले में, तो किसी को बॉर्डर पुलिस की ओर से.’
शर्मा के अनुसार, सरकार असम की ‘जाति’ और पहचान से समझौता नहीं करेगी.
उन्होंने आगे कहा, ‘हम कुछ विरोध प्रदर्शन करेंगे, लेकिन कानून के दायरे में रहकर… हम गरीबों और दलितों के साथ हैं, लेकिन उनके साथ नहीं जो हमारी जाति को नष्ट करना चाहते हैं.’
