एनआईए के मुकदमों से जुड़े वकील ‘दोषी याचिकाओं’ का खेल बखूबी समझते हैं

आतंकवाद के आरोपी अपने मुवक्किलों द्वारा दोषी याचिकाएं देने के बाद भी उनका पक्ष लेने को लेकर वकीलों के पास अलग-अलग कारण हैं, लेकिन वे सब इस बात पर सहमत हैं कि एनआईए ही इन याचिकाओं को बढ़ावा दे रही है और यहां तक कि उसके लिए दबाव भी बना रही है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

(यह रिपोर्ट पुलित्जर सेंटर फॉर क्राइसिस रिपोर्टिंग के सहयोग से की जा रही ‘द वायर’ की ‘द फोर्स्ड गिल्ट प्रोजेक्ट’ श्रृंखला का तीसरा भाग है. पहले और दूसरे भाग को यहां पढ़ा जा सकता है.)

नई दिल्ली: पटना जिला अदालत की सुबहें एक जैसी होती हैं. सुबह 10:30 बजे तक पुलिस की वैन अदालत परिसर में कतार से खड़ी हो जाती हैं, जिनसे पुराने और नए कैदियों को बाहर निकाला जाता है. लंबी रस्सी वाली हथकड़ी में बांधकर उन्हें अदालत के समक्ष समय-समय पर होने वाली सामान्य पेशी के लिए ले जाया जाता है, उन्हें फिर उसी वैन में वापस ठूंस दिया जाना होता है और वापस या तो पुलिस हिरासत में या पटना की बेउर सेंट्रल जेल में भेज दिया जाता है.

इस भीड़ के बीच से लीगल एड (विधिक सहायता) वकील गणेश तिवारी को सावधानीपूर्वक एक समूह के पीछे पहली मंजिल की तरफ जाते हुए देखा जा सकता है, जहां राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की अदालतें स्थित हैं.

अक्सर एनआईए द्वारा आरोपी बनाए जाने वाले दूर-दराज के राज्यों से आते हैं. इनमें से कई, खासकर दक्षिणी और पूर्वी राज्यों से आने वाले स्थानीय भाषाएं नहीं बोल पाते. उनके परिवार वाले, जो प्रायः गरीब होते हैं, लंबी दूरियां तय कर पाने या फिर सालों-साल चलने वाले कानूनी मुकदमों को लड़ने के लिए काबिल वकील खोज पाने में असमर्थ होते हैं. ज्यादा विकल्प न होने के कारण वे वकील नियुक्त करने का काम अदालत पर ही छोड़ देते हैं. यहीं वकील तिवारी इस तस्वीर में शामिल होते हैं.

विधिक सहायता, एक संविधान प्रदत्त अधिकार है, जो किसी व्यक्ति को तब मुहैया कराया जाता है, जब वह अपने लिए खुद वकील का खर्च उठा पाने की स्थिति में नहीं होता है. वकील तिवारी पटना के जिला अदालत के पैनल के सीनियर वकीलों में से एक हैं और वे मुख्य तौर पर यूएपीए (गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम) के तहत बनाए गए आरोपियों के मुकदमों को संभालते हैं.

हालांकि, तिवारी की नियुक्ति सरकार द्वारा हुई है, लेकिन एक विधिक सहायता वकील के रूप में उनका काम अपने मुवक्किल की पैरवी करना है. लेकिन उनके लिए ऐसा करने का मतलब ज्यादातर मामलों में अपने मुवक्किलों को अपना अपराध स्वीकार करने के लिए राजी करना है. उनका तर्क है, ‘ये मामले काफी लंबे समय तक चलते हैं. इसलिए मैं उन्हें समझाता हूं कि उनके पास अनिश्चितता को कम करने का एक रास्ता है. दोषी याचिका दायर करना उनका एकमात्र विकल्प है.’

द वायर से बात करते हुए तिवारी ने दावा किया कि करीब छह मामलों में, जिनमें से सभी जाली नोटों से जुड़े थे, उन्होंने अभियुक्तों की दोषी याचिका आवेदन लिखने में मदद की.

उनका कहना है कि इन आवेदनों को तैयार करने में कभी-कभी एनआईए अधिकारियों के साथ ‘परामर्श’ भी किया जाता है.

हालांकि, ऐसे आरोपों पर एनआईए प्रवक्ता काफी मजबूती से एजेंसी का बचाव करते हैं और कहते हैं कि एजेंसी की इस प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं होती है और दोषी याचिका दायर करने का फैसला पूरी तरह से अभियुक्त का होता है और यह अदालत के विवेकाधिकार के तहत आता है.

वकील तिवारी को अपने मुकदमों के ‘त्वरित निपटारे’ पर भी गर्व है. उन्होंने द वायर से कहा, ‘मेरे मुकदमे घिसटते नहीं रहते हैं. मैं यह सुनिश्चित करता हूं कि मेरे मुकदमों का शीघ्रता से निपटारा हो जाए.’

तिवारी मुकदमों के जल्दी पूरा होने के लिए अपनी पीठ थपथपाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इस तरह बचाव पक्ष एनआईए के लिए अधिकतम संभव दोषसिद्धि दर सुनिश्चित करता है, इस बात की परवाह किए बगैर कि मामलों में उसके मुवक्किल की वास्तविक भूमिका क्या थी.

जैसा कि द वायर ने अपनी इस सीरीज में अब तक दिखाया है, पटना में तिवारी के काम करने का तरीका वास्तव में पूरे भारत से उभरने वाले एक सामान्य ट्रेंड का हिस्सा है. लेकिन वकीलों का इस दोषी याचिका वाली रणनीति में मुवक्किलों की मदद करने के पीछे अलग-अलग वजहें हैं.

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दिल्ली में एमएस खान यूएपीए से जुड़े मुकदमों में एक जाना-पहचाना नाम है. पटियाला कोर्ट परिसर में उनका छोटा सा चैंबर गहमागहमी वाली जगह है. यहां यूएपीए के तहत आरोपित अभियुक्तों के परिवार वाले उनसे हर रोज मिलने आते रहते हैं.

दूसरी पीढ़ी के वकील खान उनके पास यूएपीए मुकदमों की संख्या पर गर्व करते हैं. उनका कहना है, ‘व्यावहारिक तौर पर एनआईए और दिल्ली की स्पेशल सेल द्वारा जांच किए जा रहे यूएपीए के लगभग सभी मुकदमों में मैं एक या दो अभियुक्तों की पैरवी कर रहा हूं. यह तथ्य है कि खान के पास आतंकवाद से जुड़े सर्वाधिक मामले हैं, लेकिन यह भी सच्चाई है कि उनके मुवक्किलों द्वारा दोषी याचिका दायर किए जाने वाले मामलों की संख्या भी काफी ज्यादा है.’

वे कहते हैं, ‘मैं वही करता हूं, जैसा मेरे मुवक्किल कहते हैं.’ लेकिन ऐसा मालूम पड़ता है कि उन्हें इस बात का भी इल्म है कि उनके मुवक्किल यह फैसला स्वतंत्र तरीके से नहीं कर रहे हैं.

खान कहते हैं कि एक दशक के समय में – जब से दोषी याचिका दायर करने का प्रचलन बढ़ा है, उनमें इस बात की सटीक समझ बनी है कि कैसे एजेंसी आरोपियों को यह याचिका दायर करने के लिए ‘तैयार’ करती है. उनका दावा है कि, ‘तिहाड़ जेल में एनआईए अधिकारियों का आना-जाना बना रहता है. मेरे ज्यादातर मुवक्किलों से एनआईए अधिकारी जेल में मुलाकात करते हैं और उन्हें कम सजा का प्रस्ताव देते हैं.’

इस दावे के जवाब में एनआईए के प्रवक्ता ने साफ जौर पर एनआईए अधिकारियों के जेल में किसी अभियुक्त से मिलने और उनसे दोषी याचिका के बाबत बात करने से इनकार किया. एजेंसी के प्रवक्ता ने कहा, ‘हमारे अधिकारी अदालत के समुचित आदेश के बिना किसी अभियुक्त से नहीं मिलते हैं.’

दिल्ली का कानूनी जगत यूएपीए को लेकर खान के तरीके को आलोचनात्मक नजरिए से देखता है. द वायर  ने जिन वकीलों से मुलाकात की, उनमें से कई ने खान पर एनआईए के संदेशवाहक के तौर पर काम करने का आरोप लगाया. खान को इस आलोचना की जानकारी है.

उनका कहना है, ‘मुझ पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन यह याद रखना भी जरूरी है कि मैं उन वकीलों में भी हूं, जिनके मुवक्किलों के बरी होने की दर भी समान रूप से काफी ऊंची है. लेकिन इस बारे में कोई भी बात नहीं करता है.’

दोषी याचिका वाले मामलों का अध्ययन करने के दौरान द वायर  ने यह पाया कि सबसे ज्यादा आरोपी दूसरे राज्यों के हैं. आतंकी अपराध की प्रकृति ही ऐसी है कि इसकी जांच अंतरराज्यीय होती है, जिसमें कई आरोपी शामिल होते हैं. अपनी स्थापना के बाद कई वर्षों तक एनआईए दिल्ली में मुकदमे दर्ज करती रही, जहां उसका मुख्यालय है. इसका मतलब यह हुआ कि सभी आरोपियों को एजेंसी के मुख्यालय दिल्ली में स्थानांतरित किया गया और उन्हें भारी भीड़ के लिए कुख्यात तिहाड़ जेल में बंद किया गया.

2023 के प्रिजन स्टैटिक्स इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक 200.2 प्रतिशत के साथ दिल्ली की जेलों में सबसे ज्यादा भीड़ है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

एनआईए के मुकदमे अपनी सुस्त चाल के लिए बदनाम हैं. खान कहते हैं कि ऐसा इस तथ्य के बावजूद है कि एनआईए कानून (धारा 19) और अपराध प्रक्रिया संहिता (अब भारत नागरिक सुरक्षा संहिता या बीएनएसएस) (धारा 309), दोनों ही में त्वरित सुनवाई का आदेश दिया गया है.

दिल्ली में एनआईए के लिए चिह्नित अदालतों की संख्या सिर्फ दो है. इन अदालतों में सिर्फ एनआईए जांच वाले मुकदमे ही नहीं, बल्कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के अधीन मुकदमों की भी सुनवाई होती है. सिर्फ दिल्ली में ही 300 से ज्यादा मामले हैं, जिनकी जांच एनआईए द्वारा की गई और जिन पर सुनवाई अभी लंबित है. इन मामलों के आरोप पत्र बहुत ज्यादा पन्नों वाले हैं. जांच के दौरान एजेंसी कई गवाहों की गवाहियां  दर्ज करती है, जिनमें से कई किसी आरोपी के खिलाफ लगाए गए किसी एक आरोप के पक्ष में दिए गए होते हैं. इन हालात में रोज की सुनवाई की गुंजाइश काफी कम हो जाती है, भले ही इसका प्रावधान कानून में किया गया है.

2022 में खान ने दिल्ली के कुछ अन्य वकीलों के साथ मिलकर एनआईए अदालतो में भीड़ कम करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. लेकिन क्या इससे स्थिति में कोई बदलाव आया? खान का उत्तर है, ‘नहीं’.

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केरल के कोच्चि में कई आतंकवाद से जुड़े कई मुकदमों की पैरवी कर रहे वकील मोहम्मद सबाह कहते हैं, ‘मामलों की संख्या बढ़ती ही जा रही है, जिससे हमारे मुवक्किलों के लिए धैर्य बनाए रखना मुश्किल हो जाता है.’

कई मामलों, जिनमें सबाह डिफेंस वकील की भूमिका मे थे, में उनके मुवक्किलों ने आखिरकार दोषी याचिकाओं का रास्ता अपनाया – जिसने उनके सामने एक नैतिक दुविधा को जन्म दिया. वे कहते हैं, ‘जब मैं इन मामलों को लेता हूं, तब मैं एक व्यापक कानूनी रणनीति तैयार करता हूं. लेकिन जब मुकदमा आगे नहीं बढ़ता है, तब अभियुक्त उस विकल्प को आजमाने के लिए तैयार हो जाते हैं, जिससे उनके कैद से छूटने की उम्मीद बंधती है. दोषी याचिका देना, उनके पास एकमात्र विकल्प बचता है.’

सबाह कहते हैं कि कोई मुकदमा अपने हाथ में लेने के बाद वे अपने मुवक्किलों का साथ निभाते हैं. उनका कहना है, ‘मैं उनके निर्देशों के अनुसार काम करता हूं और अदालत में उन्हें कम सजा दिलाने की कोशिश करता हूं. यह बात मायने नहीं रखता है कि मैं उनके आवेदनों से सहमत हूं या नहीं. मायने यह रखता है कि मैं अपना काम ईमानदारी से कर रहा हूं या नहीं.’

उन 133 मुकदमों में जिनमें एनआईए अदालतों द्वारा फैसला सुनाया गया है (एनआईए की वेबसाइट पर अपनी स्थापना से लेकर 30 सितंबर, 2025 तक के आंकड़ों के मुताबिक) एजेंसी करीब 54 मामलों में बहस पूरी होने से पहले या सबूतों के आधार पर दोषसिद्धि हासिल करने की जगह अभियुक्तों द्वारा दोषी याचिका दायर करने के आधार पर दोषसिद्धि हासिल करने में कामयाब रही है. यह कुल मामलों का 40.6 प्रतिशत है, जो कि राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है.

हालांकि कोई ऐसा समग्र आंकड़ा नहीं है, जिससे एनआईए के ‘सफल’ रिकॉर्ड की आसानी से तुलना की जा सके, लेकिन हमने इस सीरीज के पहले भाग में दोषी याचिका दायर करने और ‘प्ली बारगेनिंग’ (एक प्रक्रिया जिसमें सजा में नरमी के बदले दोषी याचिका दी जाती है) में अंतर को देखा था- विधि मंत्रालय की एक हालिया रिपोर्ट में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के हवाले से बताया गया है कि देशभर में ट्रायल अदालतों में जाने वाले मुकदमों के सिर्फ 0.11 प्रतिशत का निपटारा प्ली बारगेनिंग द्वारा किया गया.

अलपुझा के वकील और एनआईए के पूर्व लोक अभियोजक एस. अब्दुल खादर कुंजू कहते हैं, एनआईए की क्षमता जांचने के लिए पूरी प्रक्रिया से गुजरने वाले मुकदमों का अध्ययन किया जाना चाहिए.

कुंजू का कहना है कि एनआईए द्वारा निचली अदालतों में दोषसिद्धि पा लेने के बाद भी इनमें से ज्यादातर मुकदमे उच्चतर न्यायालयों में नहीं टिक पाते हैं. वे 2006 के कोझिकोड दोहरे धमाके केस की मिसाल देते हैं.

2022 में जांच में गलतियां बताते हुए केरल हाईकोर्ट ने कहा, ‘जांचकर्ताओं ने आरोपियों के बयानों की पुष्टि करने के लिए बाहर निकल कर स्वतंत्र तरीके से सबूत इकट्ठा करने की जहमत नहीं उठाई. हालांकि हम यह कयास नहीं लगाना चाहते हैं कि उनसे भेद निकलवाने के लिए क्या ‘लाल मिर्च’ का इस्तेमाल किया गया था! मामले को अंजाम तक पहुंचाने की व्यग्रता में, हम यहां ‘व्यग्रता’ शब्द का इस्तेमाल कर रहे हैं, क्योंकि हमें नहीं लगता है कि एनआईए के अधिकारी इस विषय से संबंधित कानून से नावाकिफ होंगे. यहां तक कि उन्होंने अभियुक्तों द्वारा दिए गए कबूलनामों को भी दर्ज कर लिया, जबकि एविडेंस एक्ट की धारा 25 और 26 के तहत यह स्पष्ट तौर पर अस्वीकार्य है.’

यहां ‘लाल मिर्च’ का यहां अर्थ आरोपियों से कबूलमाना लिखवाने के लिए जबरदस्ती करना या कठोर तरीके अपनाना है.

एनआईए और इसकी सहयोगी सरकारी आतंक निरोधी एजेंसियों पर वकीलों, गिरफ्तार किए गए आरोपियों और उनके परिवार वालों द्वारा न्यायेतर कबूलनामा लिखवाने, दबाव डालकर अभियुक्तों से दोषी याचिका दायर करवाने या यहां तक कि उन्हें ‘अप्रूवर’ बनाने का आरोप लगाया जाता रहा है.

2019 में एक सुरक्षा प्राप्त गवाह (प्रोटेक्टेड विटनेस) को आईएसआईएस में उनकी कथित भूमिका के लिए ट्रायल का सामना कर रहे अपने दो कथित पूर्व सहयोगियों के खिलाफ गवाही देने के लिए मुंबई के एनआईए कोर्ट में लाया गया था. 2015 का यह मामला पहले महाराष्ट्र के एंटी टेररिज्म स्क्वाड (एटीएस) के पास था और कुछ महीनों के भीतर इस मामले को एनआईए को भेज दिया गया था.

उस नौजवान गवाह ने अन्य आरोपियों – मोहसिन सैयद और रिजवान अहमद के साथ अपनी नजदीकियों के बारे में विस्तार से बताया. उसने बताया कि आईएसआईएस से प्रेरित होकर इन तीनों ने कैसे मुंबई के मालवणी स्थित अपने घरों को छोड़ा था. शुरुआत में अपने बयान में इस गवाह ने अभियोजक की बात  का का समर्थन किया था, लेकिन बचावकर्ता वकील अब्दुल वहाब खान द्वारा सबूतों के साथ इसका प्रतिवाद किए जाने पर वह टूट गया.

उसने न्यायालय को बताया कि उसे और उसकी एक साल की बेटी को कथित तौर पर किस तरह की प्रताड़ना का सामना करना पड़ा था. अपने बयान में उसने बताया कि 2016 की शुरुआत में उसे एटीएस के जूहू स्थित दफ्तर में बुलाया गया जहां उसकी बेटी को निर्वस्त्र करके कार के तपते बोनेट पर बिठाया गया था. उसकी गवाही में लिखा गया है, ‘मेरी बेटी के अंतर्वस्त्र निकालकर उसे कार के बोनेट पर बिठाया गया. वह दो-तीन घंटे तक रोती रही, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की. मुझे कहा गया कि मेरा एनकाउंटर कर दिया जाएगा और मेरे बच्चे अनाथालय में होंगे.’

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

उस गवाह का यह भी कहना है कि उसे बेरहमी से मारा गया था और उसे यह धमकी दी गई थी कि अगर वह जांच में सहयोग नहीं करेगा तो वह जेल में वर्षों तक सड़ता रहेगा. उसका आरोप है कि उसे एक प्रिंटेड दस्तावेज पर दस्तखत करने के लिए मजबूर किया गया था, जिसे बाद में सैयद और अहमद के खिलाफ उसके बयान के तौर इस्तेमाल किया गया.

कोर्ट में अपनी गवाही में उसने कहा कि इस प्रताड़ना को सह पाने में असमर्थ होकर उसने खुदकुशी की कोशिश की. वह एक सरकारी अस्पताल में कई दिनों तक बेहोश पड़ा रहा. वहां एटीएस के अधिकारी उसके साथ लगातार मौजूद रहे, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं मैं अपने साथ किए गए दुर्व्यवहार की शिकायत न कर दूं. इसने उसके और उसकी पत्नी पर और दबाव डालने का काम किया.

बाद में एनआईए अदालत में अपनी गवाही देने के दौरान इस गवाह ने एटीएस पर ऐसा अतिवादी कदम उठाने पर मजबूर करने का आरोप लगाया. उसके आरोप एनआईए के खिलाफ न होकर एटीएस के खिलाफ थे, जिसके पास शुरुआत में इस मामले की जांच का जिम्मा था. लेकिन स्वतंत्र जांच एजेंसी एनआईए ने अपने पास मामला आने के बाद भी इन आरोपों की जांच नहीं की. जबकि कानूनी तौर पर इस आरोप का – कि एटीएस ने आरोपी व्यक्ति की बच्ची का यौन उत्पीड़न किया था, संज्ञान में लिया जाना अनिवार्य है और जांच एजेंसी एनआईए ऐसा करने के लिए कानूनी तौर पर जिम्मेदार थी.

लेकिन इन गंभीर आरोपों का संज्ञान लेने – इसे आधारहीन बताने या इसे स्वीकार करने की जगह –  इसने उल्टे बचार्वकर्ता वकील पर यह आरोप लगाया कि वह कोर्ट में इस मसले को उठाकर ‘मुकदमे को भटकाने’ की कोशिश कर रहे हैं.

गवाह ने न सिर्फ अपने साथ बल्कि अपनी छोटी बच्ची के साथ की गई क्रूरता के बारे में बताया था. बाल अधिकार वकील पर्सिस सिधवा का कहना है कि एक बच्चे को निर्वस्त्र करने और उसे प्रताड़ना देना यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 के तहत साफ तौर पर यौन अपराध का मामला था.

पॉक्सो अधिनियम यह अनिवार्य करता है कि कोई भी व्यक्ति इस अपराध के बारे में जानकारी होने पर फौरन इसकी शिकायत दर्ज कराएगा. इस मामले में गवाह ने ट्रायल कोर्ट को इस कथित यौन हमले के बारे में सूचित किया था. इस लिहाज से इस मामले को बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए आयोग (कमीशंस फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स) अधिनियम, 2005 के तहत हर जिले में स्थापित बाल अदालत में भेजा जाना चाहिए था. सिधवा कहते हैं कि जांच और ट्रायल से पहले यौन मकसद का निर्णय नहीं किया जा सकता है. सिर्फ पॉक्सो कानून ही नहीं, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट और तत्कालन इंडियन पैनल कोर्ड (अब भारतीय न्याय संहिता) की धाराओं के तहत भी दर्ज किए जाने लायक है.

गवाह द्वारा बयान दिए जाने के बाद वकील अब्दुल वहाब खान ने मुस्तैदी से कोर्ट में यह आवेदन दिया कि इस बयान को पॉक्सो कोर्ट में आगे भेज दिया जाए. लेकिन एनआई जज एटी वानखेड़े ने इस आवेदन को खारिज कर दिया और एनआईए के इस दावे को स्वीकार कर लिया कि यह यह ‘ट्रायल को लटकाने की चाल’ है. बाद में खान ने बॉम्बे हाईकोर्ट में एक अपील दायर की, जिसे उन्होंने 2025 अगस्त में वापस ले लिया.

खान ने द वायर को बताया, ‘चूंकि मोहसिन सैयद और रिजवान अहमद ने दोषी याचिका दायर कर दी है और मैं अब उनकी पैरवी नहीं कर रहा हूं इसलिए हाईकोर्ट में इस अर्जी का कोई मतलब नहीं रह गया है. इसलिए यह अर्जी वापस ले ली गई.

वह गवाह अब भी मलवाणी में रह रहा है और रोजी-रोटी के लिए फलों की रेहड़ी लगाता है.

इसी बीच, 2021 में सात साल तक फैसले का इंतजार करते हुए दो आरोपियों, सैयद और अहमद ने दोषी याचिक दायर कर दी. अदालत ने उन्हें आठ साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई, जिसमें से जेल में उनके बिताए उनके सात साल हटा दिए गए.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

इस मुकदमे की पैरवी करने के लिए मुंबई के एनजीओ जमायत उलेमा-ए-हिंद द्वारा नियुक्त वकील खान ने आरोपियों द्वारा दोषी याचिका दायर करने के बाद इस मामले से खुद को अलग कर लिया. चूंकि यह एनजीओ केवल वैसे ही मामले अपने हाथ में लेता है, जिनके बारे में उसे यह भरोसा होता है कि आरोपी बेगुनाह हैं और उन्हें गलत तरीके से फंसाया गया है, इसलिए आरोपियों द्वारा दोषी याचिका देने के बाद खान इस मामले से हट गए. इसके बाद एके बुखारी को उनकी दोषी याचिका आवेदनों पर आगे की कार्रवाई के लिए वकील नियुक्त किया गया.

इस एनजीओ के साथ काम करने वाले कानूनी सलाहकार शाहिद नदीम, जो इस संगठन द्वारा देखे जा रहे सभी मामलों की निगरानी करते हैं, ने द वायर  को बताया कि उनका संगठन किसी आतंकी मामले में किसी दोषी व्यक्ति की पैरवी करने को ‘नैतिक रूप से गलत’ मानता है.

उन्होंने कहा, ‘कई मामलों में हमें यह भली-भांति मालूम होता है कि आरोपी व्यक्ति ने अंतिम उपाय के तौर दोषी याचिका देने का चुनाव किया है. लेकिन एक बार किसी व्यक्ति द्वारा इस रास्ते का चुनाव करने के बाद हम उससे अपना संबंध बनाए नहीं रख सकते हैं. इसलिए हम मामले से अलग हो गए.’

वे आगे कहते हैं, ‘हालांकि यह दिलचस्प है कि एक बार जब कोई आरोपी दोषी याचिका देने के लिए राजी हो जाता है, तो उसे अपना केस लड़ने के लिए तुरंत एक नया वकील मिल जाता है.’

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नई दिल्ली की क्रिमिनल लॉयर दीक्षा द्विवेदी कहती हैं, एनआईए मुकदमों में दोषी याचिका दायर करने की दिल्ली की अदालतों में खूब चर्चा है. उनका कहना है, ‘यह चलन इतना आम हो गया और इसे इस तरह से नियमों को ताक पर रख कर किया जाता है कि लोगों को हैरानी होती है कि क्या दोषी याचिकाएं ही एनआईए के लिए मुकदमों के निपटारे का एकमात्र तरीका रहा गया है.’

समय के साथ द्विवेदी ने एक मानक तरीका तय कर लिया है. जब उनका कोई मुवक्क्लि दोषी याचिका दायर करने की अपनी इच्छा प्रकट करता है, तो वे इसके परिणामों के बारे में उनसे विस्तार से बात करती हैं. उनका कहना है, ‘हाल ही में एनआईए ने मेरे एक मुवक्क्लि से दिल्ली में संपर्क किया. मैंने अपने मुवक्क्लि और उसके अभिभावकों से बात की और उन्हें बताया कि एनआईए वास्तव में क्या चाह रही है. आखिर में उसने दोषी याचिका न देने का निर्णय किया.’

लेकिन उनके पास आने वाले हर मुकदमे में ऐसा नहीं होता है. कुछ मुकदमों में अपनी लंबी कैद के दौरान जब किसी व्यक्ति को दोषी याचिका के विकल्प के बारे में पता चलता है तो वे अपने स्तर पर ही फैसला ले लेते हैं. वे कहती हैं, ‘ऐसे मामलों में मैं इतना ही कर सकती हूं कि उनके साथ जबरदस्ती नहीं की जाए और उनके लिए यह नुकसानदेह सौदा न साबित हो.’

द्विवेदी ने इस बात पर जोर दिया कि उनकी वफादारी पूरी तरह से उनके मुवक्किलों के पक्ष में होती है. वे कहती हैं, ‘दोषी याचिकाओं के बारे में मेरी निजी सोच कोई मायने नहीं रखती, जब मुझे उनके द्वारा झेली जाने वाली कठोर सच्चाइयों के बारे में पता है. उन्हें लंबी कैद की तकलीफ से गुजरना पड़ता है और उनका चयन अक्सर अपनी आजादी पाने के लिए उनके पास बचा हुआ आखिरी विकल्प होता है. लेकिन मैं यह सुनिश्चित करती हूं कि मेरे मुवक्क्लि को मैं सारी बातें समझाऊं – यानी अधिकतम सजा मिलने की संभावना और इससे लगने वाला लांछन इत्यादि.’

सुनवाई पूरी होने से पहले दोषी याचिकाएं देने के बढ़ते चलन ने वकीलों को बड़ी दुविधा में डाल दिया है. एक तरफ उनके सामने अपने मुवक्किलों का बचाव करने की नैतिक जिम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ उन्हें मुकदमों के बोझ से दबी न्यायपालिका की कठोर सच्चाइयों का भी पता है.

एक शीर्ष आतंकवाद विरोधी एजेंसी की पहचान रखने वाली एनआईए समय के साथ तर्कसंगत संदेह से परे दोषसिद्धि की जगह न्यायेतर कबूलनामों, गवाहियां तैयार करने और स्वैच्छिक दोषी याचिकाओं पर निर्भर होती गई है. विडंबना यह है कि एजेंसी जिन दोषसिद्धियों पर गर्व करती है, वे उन्हीं ‘खतरनाक आतंकवादियों’ के बयानों पर टिकी हैं, जिनके जुर्म को साबित करने के लिए एजेंसी का गठन किया गया था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)