नई दिल्ली: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में साल 2013 हुए दंगों के एक दशक से अधिक समय बीतने के बाद मोहम्मदपुर रायसिंह गांव के दंगे से संबंधित मामले में कानूनी कार्यवाही को समाप्त करते हुए अतिरिक्त ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश (एडीजे) की अदालत ने शनिवार (7 फरवरी) को सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए 23 आरोपियों को बरी कर दिया. इन पर हत्या, आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट का आरोप था.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, भोरा कलां पुलिस थाना क्षेत्र के अंतर्गत मोहम्मदपुर रायसिंह गांव में हुई हिंसा के संबंध में एडीएसजी कोर्ट नंबर 4 द्वारा फैसला सुनाया गया.
मालूम हो कि यह मामला 7 सितंबर, 2013 को ज़िले में भड़की व्यापक सांप्रदायिक हिंसा से संबंधित है, जिसमें कई लोगों की जान चली गई थी. 8 सितंबर को कथित तौर पर एक भीड़ मोहम्मदपुर रायसिंह गांव में घुस गई थी. इस दौरान वहां धार्मिक नारे लगाए और दूसरे समुदाय के लोगों के घरों पर हमला किया था.
अभियोजन पक्ष के अनुसार, भीड़ ने कई घरों में तोड़फोड़ और लूटपाट की और फिर उनमें आग लगा दी थी. हिंसा के दौरान रहीसुद्दीन नाम के एक ग्रामीण की मौत हो गई थी.
पुलिस ने इस मामले में 27 आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था. हालांकि, मुकदमे की सुनवाई के दौरान चार आरोपियों – प्रवीण, नकुल, बबलू और सूरज – की मौत हो गई, जिससे मुकदमे का सामना कर रहे आरोपियों की संख्या घटकर 23 रह गई.
इस मामले में पहली एफआईआर सब-इंस्पेक्टर गंगा प्रसाद ने 1,300 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ हत्या के आरोप में दर्ज कराई थी. एफआईआर में यह भी उल्लेख किया गया था कि पुलिसकर्मियों के वाहनों को भीड़ ने आग लगा दी थी.
इसके बाद रहीसुद्दीन के बेटे हनीफ ने भोरा कलां पुलिस स्टेशन में दूसरी एफआईआर दर्ज कराई, जिसमें भीड़ पर धार्मिक उन्माद फैलाने, हत्या और दंगा करने का आरोप लगाया गया.
वरिष्ठ बचाव पक्ष के वकील सत्येंद्र कुमार सिंह ने बताया कि मामले की सुनवाई अतिरिक्त न्यायाधीश कनिष्क कुमार सिंह ने की. साक्ष्यों और गवाहों के बयानों की जांच के बाद न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा.
न्यायालय द्वारा बरी किए गए आरोपियों में विक्की, बादल, मदन, जय नारायण, ब्रजवीर, विनोद, काला, प्रवीण, अनिल, सुभाष, संजीव, करण, शेर सिंह, ऋषिपाल, सहंसरपाल, प्रमोद, जगपाल, प्रेमपाल, पप्पू, नीतू, भूरा और हरेंद्र शामिल हैं – ये सभी मोहम्मदपुर रायसिंह के निवासी हैं.
अदालत ने यह भी गौर किया कि आरोपियों में से एक अन्य मामले में गैर-जमानती वारंट (एनबीडब्ल्यू) के संबंध में जेल में बंद हैं और उसे अदालत के समक्ष पेश नहीं किया जा सका. लेकिन साम्प्रदायिक दंगे के मामले में अदालत ने उन्हें भी बरी कर दिया गया.
उल्लेखनीय है कि अगस्त और सितंबर 2013 में मुज़फ़्फ़रनगर और आसपास के इलाकों में हुए सांप्रदायिक दंगों में 60 लोगों की जान गई थी और 40,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए थे.
मुज़फ़्फ़रनगर की एमपी/एमएलए अदालत के विशेष न्यायाधीश ने 2013 मुज़फ़्फ़रनगर दंगा से जुड़े एक मामले में 10 अक्टूबर, 2022 को खतौली से विधायक विक्रम सैनी और 11 अन्य लोगों को दो साल के कारावास की सजा सुनाई थी. हालांकि सजा सुनाए जाने के कुछ देर बाद ही जमानत भी दे दी थी.
साल 2019 में मुज़फ़्फ़रनगर की एक अदालत ने सचिन और गौरव की हत्या से संबंधित एक मामले में सात लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.
2013 के मुज़फ़्फ़रनगर दंगों की जांच के लिए 2016 में गठित किए गए जस्टिस विष्णु सहाय जांच आयोग ने हिंसा के लिए खुफिया विफलता और कुछ शीर्ष अधिकारियों की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया था.
साल 2021 में एसआईटी ने कहा था कि दंगों के दौरान हत्या, बलात्कार, डकैती एवं आगजनी से संबंधित 97 मामलों में 1,117 लोग सबूतों के अभाव में बरी हो गए. एसआईटी के अधिकारियों के मुताबिक, पुलिस ने 1,480 लोगों के खिलाफ 510 मामले दर्ज किए और 175 मामलों में आरोप-पत्र दायर किया था.
एसआईटी 20 मामलों में आरोप-पत्र दायर कर नहीं सकी, क्योंकि राज्य सरकार की ओर से उसे मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं मिली. दंगों संबंधित इन 20 मामलों में विधायक और सांसद भी आरोपियों की सूची में हैं.
उत्तर प्रदेश सरकार ने दंगों से जुड़े 77 मामलों को वापस लेने का फैसला किया था, लेकिन अदालत ने उत्तर प्रदेश के मंत्री सुरेश राणा, भाजपा विधायक संगीत सोम समेत 12 भाजपा विधायकों के खिलाफ सिर्फ एक मामला वापस लेने की अनुमति दी थी.
