श्रीनगर: भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते के तहत आयातित सेबों पर शुल्क छूट ने जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के किसानों और उद्योगपतियों को आने वाले वर्षों में भारी नुकसान की आशंका में घरेलू बागवानी उद्योग को अस्त-व्यस्त कर दिया है.
इस संबंध में विपक्षी दलों, उद्योग विशेषज्ञों और व्यापारियों ने आशंका जताई है कि आयात शुल्क छूट के बाद आने वाले हफ्तों और महीनों में सस्ते अमेरिकी सेब से भारतीय बाजार पट जाएंगे, जिससे जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से आने वाले सेबों की कीमतें गिर जाएंगी.
उल्लेखनीय है कि भारत-अमेरिका समझौते के तहत सेब पर सीमित कोटे के साथ मौजूदा 50% आयात शुल्क को घटाकर 25% कर दिया गया है. इसके अलावा 80 रुपये प्रति किलोग्राम का न्यूनतम आयात मूल्य निर्धारित किया गया है.
केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार, इससे घरेलू सेब उत्पादकों को लाभ होगा.
मंत्री के इस कथन का खंडन करते हुए किसानों के हितों के लिए आवाज़ उठाने वाले 27 संगठनों के प्रभावशाली समूह संयुक्त किसान मंच (एसकेएम) हिमाचल प्रदेश के संयोजक हरीश चौहान ने कहा कि आयात शुल्क में कमी से सरकार को राजस्व का भारी नुकसान होगा.
उन्होंने कहा, ‘आयात शुल्क नीति (एमआईपी) की सिफारिश मंत्रालय द्वारा की जाती है और विदेश व्यापार महानिदेशक द्वारा अधिसूचित की जाती है, लेकिन इसे कभी भी ज़मीनी स्तर पर लागू नहीं किया गया. भारत में अमेरिकी सेबों की कीमत कभी भी 75 रुपये से कम नहीं रही है. आयात शुल्क कम करने से न केवल सरकार को राजस्व का नुकसान होगा, बल्कि इससे हमारे किसानों और घरेलू बागवानी उद्योग पर भी बहुत बुरा असर पड़ेगा.’
जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी राज्य बागवानी मंच के संयोजक हरीश चौहान ने आगे कहा, ‘यह ऐसा ही है जैसे भारतीय किसानों को ब्रिटिश काल की बंदूकें देकर उन्हें आधुनिक हथियारों से लैस अमेरिकी सेना से लड़ने के लिए कहा जाए.’
इस संबंध में सोमवार को जम्मू-कश्मीर विधानसभा में बोलते हुए कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेता एमवाई तारिगामी ने कहा कि व्यापार समझौता देश के बागवानी क्षेत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा.
उन्होंने कहा, ‘कानूनी रूप से गारंटीकृत एमएसपी के अभाव में किसानों को केवल आश्वासन ही मिल रहे हैं, जिनका ज़मीनी स्तर पर कोई क्रियान्वयन नहीं हुआ है. यह व्यापार समझौता न केवल राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था बल्कि विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर की अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ा झटका साबित होगा.’
पिछले कुछ वर्षों में सेब का आयात
केंद्रीय मंत्री गोयल ने बताया कि भारत विश्व स्तर पर सेब का सातवां सबसे बड़ा उत्पादक और एक प्रमुख उपभोक्ता है, जिसकी वार्षिक मांग लगभग 25 लाख मीट्रिक टन है.
उन्होंने आगे कहा कि देश में 20-21 लाख मीट्रिक टन सेब का उत्पादन होता है. भारत ने 2015 में अमेरिका से लगभग 1.05 लाख मीट्रिक टन सेब आयात किए, जो 2018 में बढ़कर 1.47 लाख टन हो गए. 2019 में, अमेरिका द्वारा स्टील और एल्यूमीनियम पर शुल्क बढ़ाने के बाद भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए आयात शुल्क को 50% से बढ़ाकर 70% कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप अमेरिका से सेब का आयात 2022 में लगभग 5,000 मीट्रिक टन और 2023 में लगभग 7,000 मीट्रिक टन तक गिर गया. है.
इसमें से लगभग 80% जम्मू-कश्मीर के बागों में उगाया जाता है, जबकि शेष हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड से आता है.
हरीश चौहान ने बताया कि चार से पांच लाख मीट्रिक टन की कमी को आवश्यकतानुसार लगभग 44 देशों से पूरा किया जाता है.
उनके अनुसार, 2023 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की भारत यात्रा के दौरान केंद्र सरकार ने सेब पर लगाए गए जवाबी आयात शुल्क को वापस ले लिया था. इसके चलते 2024 में अमेरिका से सेब का आयात बढ़कर लगभग 37,000 टन और 2025 में लगभग 60,000 टन हो गया.
चौहान ने कहा, ‘अब हम फिर से 2018 वाली स्थिति में आ गए हैं, जब भारत ने अमेरिका से सेब का सबसे अधिक आयात किया था. आज अमेरिका से सेब की कीमत 50% आयात शुल्क सहित लगभग 143 रुपये प्रति किलो है. अब जब आयात शुल्क सहित इसकी कीमत केवल लगभग 100 रुपये होगी, तो हमारे किसानों को प्रतिस्पर्धा में कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा.’
उन्होंने आगे कहा कि दिल्ली की आज़ादपुर मंडी में आयातित सेबों की अन्य किस्में अमेरिकी सेबों की तुलना में कम दाम पर बिकती हैं. उन्होंने बताया, ‘आज़ादपुर मंडी में ईरानी सेब 60 रुपये में बिकते हैं.’
चौहान को आशंका है कि नई टैरिफ व्यवस्था लागू होने के बाद भारतीय बाज़ार अमेरिकी सेबों से भर जाएंगे, जो जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के सेबों की तुलना में कम पौष्टिक होने के बावजूद उपभोक्ताओं के बीच अधिक लोकप्रिय हैं.
उन्होंने कहा, ‘भारतीय उपभोक्ता फलों के पौष्टिक मूल्य की अपेक्षा उनकी दिखावट से अधिक आकर्षित होते हैं. अमेरिकी सेबों की कम कीमत से स्थानीय सेबों की कीमतों में भी गिरावट आएगी.’
मंत्री गोयल के आश्वासनों के बावजूद हिमाचल प्रदेश के सेब किसान और अन्य उद्योग हितधारक इस मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं.
‘हजारों लोगों की आजीविका खतरे में’
हालांकि, कश्मीर के व्यापारिक संगठन सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की जवाबी कार्रवाई के डर से सतर्क रुख अपना रहे हैं. उत्तरी कश्मीर के एक वरिष्ठ व्यापारिक नेता ने कहा कि वे हिमाचल प्रदेश में ‘मौजूदा स्थिति पर नजर रख रहे हैं’ लेकिन उन्होंने आंदोलन से दूर रहने का फैसला किया है.
उन्होंने कहा, ‘जैसा कि आप जानते हैं, स्थिति अच्छी नहीं है. किसानों से संपर्क करना भी हमारे लिए मुसीबत का सबब बन सकता है.’
हालांकि, विपक्षी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) ने केंद्र सरकार पर कश्मीर के सेब किसानों को अधर में धकेलने का आरोप लगाया है.
वहीं, अवामी इत्तेहाद पार्टी (एआईपी) का कहना है कि अमेरिका-भारत समझौता कश्मीर की बागवानी अर्थव्यवस्था की रीढ़ तोड़ देगा.
कश्मीर के सेब उत्पादकों और व्यापारियों के सबसे बड़े संगठन के अध्यक्ष बशीर अहमद बशीर ने 7 फरवरी (शनिवार) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में कहा कि टैरिफ में छूट से घाटी के बागवानी क्षेत्र के लिए और अधिक मुश्किलें पैदा होंगी.
बशीर ने लिखा, ‘अमेरिका से आयातित सेब सस्ते होंगे और व्यापारी स्वाभाविक रूप से कश्मीर या अन्य राज्यों के सेबों के बजाय उन्हें ही प्राथमिकता देंगे. इससे हमारे किसानों पर बुरा असर पड़ेगा.’
कश्मीर घाटी फल उत्पादक सह विक्रेता संघ के अध्यक्ष बशीर के पत्र में उल्लेख किया गया है कि कश्मीर में सात लाख से अधिक परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बागवानी क्षेत्र से जुड़े हुए हैं.
बशीर ने द वायर को बताया, ‘हम बागवानी उद्योग के हित में और विशेष रूप से घाटी के फल उत्पादकों के हित में आयातित सेबों पर 100% टैरिफ लगाने की मांग कर रहे हैं, लेकिन व्यापार समझौते ने लाखों लोगों की आजीविका को खतरे में डाल दिया है.’
पत्र में आगे कहा गया है, ‘कभी-कभी सेब ईरान से आयात किए जाते हैं, कभी-कभी संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य देशों से भी. इन कदमों से हमारे स्थानीय सेब उद्योग पर लगातार दबाव पड़ रहा है. ऐसे आयातों का प्रभाव स्थानीय सेब उत्पादकों, विशेष रूप से छोटे और सीमांत उत्पादकों को नुकसान पहुंचा रहा है, जो पहले से ही लागत, अनियमित मौसम, कीटों के हमले और परिवहन समस्याओं से जूझ रहे हैं.’
‘बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सामने सरेंडर’
कश्मीर चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष जावेद तेंगा ने दावा किया कि नया व्यापार समझौता कश्मीर के बागवानी उद्योग की रक्षा करेगा.
उन्होंने कहा, ‘मंत्री (गोयल) ने घोषणा की है कि उद्योग को अनुचित मूल्य निर्धारण और अन्य कारकों से बचाने के लिए अमेरिकी सेबों के आयात को एक एमआईपी (मल्टीनेशनल इंपोर्टेड प्रॉडक्ट) के तहत नियंत्रित किया जाएगा.’
हालांकि, देश के किसानों और विपक्षी दलों ने इस समझौते को ‘बहुराष्ट्रीय कृषि दिग्गजों के सामने आत्मसमर्पण’ और भारत की ‘संप्रभुता पर हमला’ करार दिया है.
पीडीपी नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मंत्री नईम अख्तर ने कहा कि यह व्यापार समझौता जम्मू-कश्मीर के सकल राज्य घरेलू उत्पाद में लगभग 8% का योगदान देने वाले बागवानी क्षेत्र को ‘कठिनाई में धकेल देगा’.
उन्होंने कहा, ‘सिर्फ अमेरिका से ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया से सेब भारतीय बाजारों में भर जाएंगे. कश्मीर को इसका जवाब देना होगा क्योंकि यह स्थिति अपरिवर्तनीय है.’
पीडीपी प्रवक्ता मोहम्मद इकबाल ट्रंबू ने रविवार को जम्मू में पत्रकारों से कहा कि केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर के बागवानी क्षेत्र पर इस समझौते के प्रभावों पर विचार किया है. ‘अमेरिका से आयातित कृषि उत्पादों पर शून्य शुल्क लगेगा. जम्मू-कश्मीर में उत्पादित सेब और अखरोट का क्या होगा?’
एक्स पर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार को निशाना बनाते हुए एआईपी नेता अबरार राशिद ने एक पोस्ट में कहा, ‘अमेरिका-भारत व्यापार समझौता कश्मीर की रीढ़ की हड्डी ‘सेब उद्योग’ को तबाह करने पर तुला है. लेकिन हमारे मुख्यमंत्री उमर साहब ने सबसे पहले इस अमेरिका-भारत व्यापार समझौते का स्वागत किया.’
उन्होंने आगे सीएम पर तंज़ कसते हुए कहा, ‘उमर साहब एक दिन बाद गृह मंत्री अमित शाह के बगल में बैठकर जम्मू-कश्मीर में मोदी सरकार की उपलब्धियों का बखान कर रहे थे. लगभग उसी समय, फारूक साहब जम्मू में भजन गाने में व्यस्त थे. लेकिन फारूक साहब और उमर साहब को छोड़कर बाकी सभी भाजपा की बी टीम और आरएसएस के एजेंट हैं.’
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