नई दिल्ली: केंद्रीय विश्वविद्यालय गुजरात (सीयूजी) के साबरमती हॉस्टल में 26-27 जनवरी की दरमियानी रात कथित तौर पर 30-35 लोगों की भीड़ ने छात्रों पर हमला किया. पीड़ित दलित छात्र ने आरोप लगाया है कि इस दौरान उसके साथ शारीरिक हिंसा, जातिसूचक अपमान, अश्लील भाषा और यौनिक धमकियां दी गईं.
आरोप है कि हमला करने वाले छात्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के छात्र संगठन एबीवीपी से जुड़े हैं.
घटना को लेकर पीड़ित छात्र ने विश्वविद्यालय प्रशासन को औपचारिक कानूनी शिकायत भेजते हुए भारतीय दंड संहिता और अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग की है. साथ ही यूजीसी की नई गाइडलाइन को भी लागू करने को जरूरी बताया है.
शिकायतकर्ता राजकरण सिंह सामाजिक प्रबंधन अध्ययन विभाग के प्रथम वर्ष के स्नातक छात्र हैं और साबरमती हॉस्टल में रहते हैं. उन्होंने 28 जनवरी को प्रोवोस्ट, रजिस्ट्रार और डीन ऑफ स्टूडेंट वेलफेयर को ईमेल भेजकर कहा कि विश्वविद्यालय में दाखिला लेने के पहले दिन से ही उन्हें लगातार उत्पीड़न और जाति आधारित अपमान का सामना करना पड़ रहा है.
उनके मुताबिक, 26-27 जनवरी की घटना उसी लंबे उत्पीड़न की परिणति है.
कर्फ्यू के बाद हॉस्टल में घुसी भीड़
शिकायत में कहा गया है कि 26 जनवरी की रात करीब 11:30 बजे, हॉस्टल में कर्फ्यू लग जाने के बावजूद 30-35 लोगों का एक समूह, जिसमें डे-स्कॉलर भी शामिल थे, अवैध रूप से साबरमती हॉस्टल में दाखिल हुआ.
आरोप है कि रात 11:30 बजे से सुबह करीब 3 बजे तक इस समूह ने शिकायतकर्ता और अन्य छात्रों पर सामूहिक रूप से हमला किया. द वायर हिंदी ने अन्य छात्रों से भी संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी.
राजकरण सिंह के अनुसार, उन्होंने और अन्य छात्रों ने स्थिति शांत करने की कोशिश की, लेकिन कुछ लोगों ने लगातार उकसावे और झगड़ा बढ़ाने का काम किया.
शिकायत में कई छात्रों और शोधार्थियों के नाम लेते हुए उनके खिलाफ अलग-अलग आरोप लगाए गए हैं.
पीएचडी स्कॉलर मुन्ना कुमार पर आरोप है कि उन्होंने अत्यंत अश्लील, अपमानजनक और जातिसूचक भाषा का इस्तेमाल किया. उन्होंने छात्रों से कहा कि ‘हम तुम्हारे मुंह में पेशाब करेंगे.’ शिकायत के अनुसार, उन्होंने छात्र को निष्कासन और करियर बर्बाद करने की धमकी भी दी.
जर्मन स्टडीज़ के तीसरे वर्ष के छात्रों पर आरोप है कि उन्होंने शारीरिक हिंसा की और छात्रों को गंदी गालियां दीं. चीनी अध्ययन विभाग के दो छात्रों पर गालियां देने और गैरकानूनी जमावड़े व डराने-धमकाने का आरोप है.
चाइनीज़ स्टडीज के प्रथम वर्ष के एक छात्र पर शिकायतकर्ता ने शारीरिक हमले और जातिसूचक गालियां देने का आरोप लगाया है. शिकायत के अनुसार, छात्र ने शिकायतकर्ता से कहा कि ‘तुम लोग हॉस्टल में मुफ्त में रहते हो, हम पैसे देते हैं और तुम्हें खिलाते हैं.’ इसके साथ ही उन्होंने शिकायतकर्ता को ‘छोटी’ और ‘नीची जाति’ से आने वाला कहकर संबोधित किया.
एक पीएचडी छात्र टप्पू महाराणा पर आरोप है कि वह छात्रों की भीड़ को लगातार उकसाते रहे, विवाद को बढ़ाते रहे और उन्होंने भी पीड़ित को जातिसूचक गालियां दीं.
पीड़ित ने बताया है कि आरोपित छात्रों में से कई अखिल विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से जुड़े हुए हैं. आरोपी मुन्ना कुमार विश्वविद्यालय में एबीवीपी के अध्यक्ष रह चुके हैं.
द वायर हिंदी ने टप्पू महाराणा से इन आरोपों को लेकर संपर्क किया था, हालांकि उन्होंने कोई भी जवाब देने से इनकार कर दिया.
‘आरोपी खुले घूम रहे हैं’
घटना के अगले दिन पीड़ितों ने अपने-अपने विभागाध्यक्षों (एचओडी) को पूरे मामले की जानकारी दी. उनके निर्देश पर औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके बाद एक आंतरिक समिति का गठन किया गया. समिति के समक्ष सभी पक्षों ने अपने बयान दर्ज कराए, लेकिन इसके बाद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है. पीड़ितों का यह भी कहना है कि आरोपी उनसे संपर्क कर यह दावा कर रहे हैं कि उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाएगा.
द वायर हिंदी से बातचीत में राजकरण ने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन के उदासीन रवैये के बाद उन्होंने राज्य की मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के माध्यम से अपनी पीड़ा को मीडिया के सामने रखने का फैसला किया.
5 फरवरी, 2026 को कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ एक प्रेस वार्ता में शिकायतकर्ता ने कहा, ‘पीड़ित का कहना है कि विश्वविद्यालय प्रशासन उन्हें कमेटी की जांच का नतीजा आने का इंतजार करने को कह रहा है. उन्होंने आरोप लगाया, ‘यूनिवर्सिटी में एससी छात्रों का पढ़ना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि जो आरोपी हैं, वो खुले घूम रहे हैं और प्रशासन कोई एक्शन नहीं ले रहा है.’
उन्होंने कहा, ‘वे हमें आइसोलेशन में डालते हैं और हमें नीचा फील कराते हैं. उन्हें क्या दिक्कत है हमसे? हम जानना चाह रहे हैं कि वो हमारे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं.’
पीड़ित ने आरोप लगाया कि 26-27 जनवरी की घटना के आरोपी मुन्ना कुमार और टप्पू महाराणा को विश्वविद्यालय प्रशासन बचा रहा है. छात्र का कहना है कि वे एबीवीपी से जुड़े हुए हैं, इसलिए उन्हें संरक्षण प्राप्त है.
पीड़ित के अनुसार, ‘एबीवीपी से जुड़े ये लोग उन छात्रों को परेशान करते हैं जो किसी भी संगठन से जुड़े हुए नहीं होते हैं या जिनमें उनकी विचारधारा के प्रति सहमति नहीं होती.’
उन्होंने घटना के संदर्भ में कहा, ‘एनएसयूआई के किसी कार्यक्रम के पम्पलेट्स किसी ने हमारे हॉस्टल के फ्लोर पर बिखरा दिए थे. इसके बाद मुन्ना, टप्पू समेत 30-35 लोगों का समूह हॉस्टल में घुसा और हमारे साथ मारपीट की, जातिसूचक गालियां दीं और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया. वे हम पर आरोप लगा रहे थे कि ये पम्पलेट्स हमने फेंके हैं, हमारे मना करने पर भी वे नहीं माने.’
पीड़ित ने एनएसयूआई या किसी अन्य छात्र संगठन से न जुड़े होने का दावा किया है.
प्रशासन पर लापरवाही और पक्षपात के आरोप
छात्र ने अपनी शिकायत में विश्वविद्यालय प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि घटना के दौरान और बाद में प्रशासन की प्रतिक्रिया देर से और उदासीन रही. उन्होंने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय ने जाति आधारित भेदभाव और यौनिक दुर्व्यवहार से संबंधित यूजीसी के अनिवार्य नियमों का पालन नहीं किया और न ही एससी-एसटी शिकायत निवारण समिति या समान अवसर प्रकोष्ठ को सक्रिय किया गया.
पीड़ित का कहना है कि उनकी शिकायत के आधार पर विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा एक कमेटी बनाई गई और 29 जनवरी को बयान दर्ज किया. अब तक कमेटी की तीन बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है.
उन्होंने कमेटी पर निष्पक्ष न होने का आरोप लगाते हुए द वायर हिंदी से कहा, ‘पहले भी कई बार ऐसे जाति आधारित भेदभाव की शिकायत प्रशासन तक जा चुकी है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई. पीएचडी स्कॉलर मुन्ना कुमार और टप्पू महाराणा पहले भी ऐसे मामलों में शामिल रह चुके हैं, लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन हमेशा उन्हें बचा लेती है.’
पीड़ित ने कमेटी के सदस्य और एससी-एसटी सेल के लाइज़न ऑफिसर राजेश कुमार मकवाना पर भी निष्पक्ष न होने का आरोप लगाया है. छात्र का कहना है कि कमेटी द्वारा पीड़ितों से समझौता करने को भी कहा जा रहा है.
राजकरण सिंह ने प्रॉक्टर राजेश मकवाना और हॉस्टल के वार्डन गजेंद्र पर आरोपियों के साथ मिले होने का आरोप लगाते हुए कहा, ‘ये दोनों आरोपियों के पक्ष में झुके हुए हैं, वे आरोपी छात्रों के साथ मिले हुए हैं और हमेशा उन्हें बचा लेते हैं.’
उन्होंने जोड़ा, ‘ये लोग उल्टे-सीधे नियम बना देते हैं और पीड़ितों को ही कहते हैं कि आपकी ये-ये गलती है.’ छात्र ने मांग की है कि केंद्र सरकार द्वारा एक स्वतंत्र कमेटी बनाई जाए, जो मामले की अलग से जांच करे, ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके.
पीड़ित के आरोपों को लेकर जब राजेश मकवाना से सवाल किया गया तब उन्होंने कहा कि मुन्ना कुमार और टप्पू महाराणा का नाम किसी भी शिकायत में पहली बार आया है, और उन्होंने बिल्कुल निष्पक्ष हो कर मामले की जांच की है. उन्होंने द वायर हिंदी से कहा, ‘मैं ख़ुद एससी-एसटी समुदाय से आता हूं और एससी-एसटी सेल से जुड़ा भी हूं, मैं निष्पक्ष जांच करता हूं और पीड़ित छात्रों के साथ खड़ा रहता हूं.’
‘मेरी तहक़ीक़ात में सामने आया कि ये दो गुटों (एनएसयूआई और एबीवीपी) के बीच की लड़ाई थी, और इस दौरान किसी भी तरह की जातिगत टिप्पणी या जाति आधारित हिंसा नहीं हुई है.’
वहीं, द वायर हिंदी ने हॉस्टल के वार्डन गजेंद्र से संपर्क करने की कोशिश की और इन आरोपों को लेकर उन्हें प्रश्न भेजे, लेकिन रिपोर्ट प्रकाशित होने तक उनका जवाब नहीं मिला.
एससी/एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई की मांग
पीड़ित छात्र ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है. साथ ही कहा है कि सभी आरोपित छात्रों को जांच पूरी होने तक तत्काल निलंबित किया जाए, एफआईआर दर्ज की जाए, सीसीटीवी फुटेज की फॉरेंसिक जांच के साथ एक स्वतंत्र जांच समिति गठित की जाए और उन्हें किसी भी प्रकार की शैक्षणिक या प्रशासनिक प्रताड़ना से सुरक्षा का लिखित आश्वासन दिया जाए.
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि घटना से एक घंटे पहले सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिए गए थे. छात्र ने बताया है कि उन्होंने यह शिकायत शिक्षा मंत्रालय और केंद्रीय शिक्षा मंत्री को भी भेजी है और इसे एक औपचारिक वैधानिक रिकॉर्ड के रूप में देखे जाने की मांग की है.
विश्वविद्यालय का पक्ष
केंद्रीय विश्वविद्यालय गुजरात के इंचार्ज कुलपति अतनु भट्टाचार्य के हवाले से विश्वविद्यालय के जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) डॉ. सुनील कुमार शर्मा ने द वायर हिंदी से कहा कि 26 जनवरी की रात साबरमती हॉस्टल में छात्रों के बीच झगड़ा हुआ था. इस घटना के बाद प्रॉक्टोरियल बोर्ड की बैठक बुलाई गई, जिसमें पाया गया कि छात्रों द्वारा अनुशासनहीनता हुई है. इसके बाद मामले को विश्वविद्यालय की डिसिप्लिनरी कमेटी को सौंपा गया.
डॉ. शर्मा के अनुसार, जांच के दौरान एक छात्र ने यह आरोप लगाया कि उसके साथ जाति आधारित भेदभाव हुआ, जिसके बाद मामले को डिसिप्लिनरी कमेटी से एससी-एसटी सेल को भेज दिया गया. उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय एक सरकारी संस्थान है और केंद्र सरकार के अधीन काम करता है, जहां तय प्रक्रियाओं के तहत प्रॉक्टोरियल बोर्ड, डिसिप्लिनरी कमेटी और एससी-एसटी सेल जैसी संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद हैं.
पीआरओ ने बताया कि एससी-एसटी सेल के लायज़न ऑफिसर और प्रॉक्टर प्रोफेसर राजेश मकवाना के अनुसार, एससी/एसटी सेल द्वारा मामले की गहन और निष्पक्ष जांच की गई. जांच के दौरान मौके पर मौजूद छात्रों, शिकायतकर्ता और उसके समूह के छात्रों के बयान दर्ज किए गए.
डॉ. शर्मा ने कहा कि जांच में किसी भी छात्र ने यह नहीं कहा कि मौके पर जाति आधारित भेदभाव हुआ है. उन्होंने बताया कि मोबाइल वीडियो और सीसीटीवी फुटेज भी देखी गई. जांच के निष्कर्ष के आधार पर एससी-एसटी सेल ने पाया कि 26-27 जनवरी की घटना दो गुटों के बीच आपसी मारपीट थी और यह जाति आधारित भेदभाव का मामला नहीं है.
उन्होंने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता राजकरण के साथ शिकायत करने वाले अन्य छात्रों ने लिखित में यह दर्ज कराया है कि उनके साथ कोई जाति आधारित भेदभाव नहीं हुआ.
सीसीटीवी कैमरे बंद किए जाने के आरोपों को खारिज करते हुए पीआरओ ने कहा, ‘सीसीटीवी फुटेज की निगरानी और उसका कंट्रोल छात्रों के पास नहीं होता. इसके लिए अलग से सिक्योरिटी रूम होता है. यह कहना पूरी तरह गलत है कि सीसीटीवी बंद कर दिए गए थे. सीसीटीवी 24 घंटे चालू रहते हैं. उस दिन हॉस्टल के सीसीटीवी बंद नहीं थे और उनकी फुटेज देखी गई है.’
छात्र द्वारा कांग्रेस पार्टी के साथ प्रेस वार्ता करने को लेकर उन्होंने कहा, ‘जब भी ऐसी कोई शिकायत आती है, नियमों के तहत कमेटी बैठती है, सबके बयान दर्ज किए जाते हैं और इस प्रक्रिया में समय लगता है. लेकिन उस छात्र ने बिना इंतजार किए, किसी के बहकावे में आकर, विश्वविद्यालय को सूचित किए बिना सीधे प्रेस कॉन्फ्रेंस की. क्या यह गलत नहीं है? क्या यह विश्वविद्यालय की छवि खराब करना नहीं है?’
टप्पू महाराणा और मुन्ना कुमार पर पूर्व में लगे जाति आधारित भेदभाव के आरोपों पर कार्रवाई न होने के सवाल पर पीआरओ ने कहा, ‘अगर कोई यह कहता है कि उसके साथ भेदभाव हुआ है, तो उसे तय प्रक्रिया के तहत शिकायत दर्ज करानी होती है. जब तक ऐसी कोई शिकायत दर्ज नहीं होती, विश्वविद्यालय ऐसे आरोपों को स्वीकार नहीं कर सकता. हमारे पास पहले ऐसी कोई शिकायत नहीं आई थी.’
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर प्रोफेसर मकवाना ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच करते हैं.
