नई दिल्ली: राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की छह सदस्यीय विशेष पीठ ने सोमवार (16 फरवरी) को 81,000 करोड़ रुपये की लागत वाले ग्रेट निकोबार मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को दी गई पर्यावरणीय मंजूरी में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया. पीठ ने कहा कि उसे मंजूरी में ‘पर्याप्त सुरक्षा उपाय’ दिखाई देते हैं और हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, एनजीटी अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की अगुवाई वाली पीठ ने अपने आदेश में परियोजना के ‘रणनीतिक महत्व’ का भी उल्लेख किया. साथ ही, 2023 के एनजीटी आदेश के तहत पर्यावरणीय मंजूरी की पुनर्समीक्षा के लिए गठित उच्चस्तरीय समिति (एचपीसी) द्वारा उठाए गए बिंदुओं पर भी ध्यान दिया.
166 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली इस परियोजना के तहत 130 वर्ग किलोमीटर वन भूमि का डायवर्जन और लगभग दस लाख पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है. इसके अंतर्गत एक ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एकीकृत टाउनशिप, नागरिक और सैन्य हवाईअड्डा तथा 450 मेगावाट क्षमता का गैस और सौर ऊर्जा आधारित संयंत्र बनाया जाना है. केंद्र सरकार ने इस परियोजना को आगे बढ़ाया है, जबकि निकोबारी समुदाय ने अपनी पैतृक भूमि (जो 2004 की सुनामी में तबाह हुई थी) से विस्थापन और संभावित पारिस्थितिक नुकसान को लेकर चिंता जताई है.
विशेष पीठ में न्यायिक सदस्य जस्टिस दिनेश कुमार सिंह और जस्टिस अरुण कुमार त्यागी के अलावा विशेषज्ञ सदस्य ए. सेंथिल वेल, अफरोज अहमद और ईश्वर सिंह शामिल थे. अधिकरण ने माना कि परियोजना के रणनीतिक महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन आइलैंड कोस्टल रेगुलेशन ज़ोन (आईसीआरजेड) अधिसूचना की शर्तों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. पीठ ने कहा कि इस मामले में ‘संतुलित दृष्टिकोण’ अपनाने की आवश्यकता है.
इस आदेश के साथ एनजीटी ने उन याचिकाओं का निस्तारण कर दिया, जिनमें 2019 की आईसीआरजेड अधिसूचना के उल्लंघन और 2023 के एनजीटी आदेश के अनुपालन न होने के आरोप लगाए गए थे. पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष कोठारी ने दायर याचिकाओं में दावा किया था कि प्रस्तावित परियोजना का एक हिस्सा (करीब 700 हेक्टेयर) प्रतिबंधित तटीय क्षेत्रों में आता है, जहां विकास कार्यों की अनुमति नहीं है.
भविष्य की परियोजनाओं के लिए बना संदर्भ बिंदु!
एनजीटी का यह आदेश महत्वपूर्ण माना जा रहा है और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में प्रस्तावित रणनीतिक परियोजनाओं के लिए भविष्य में एक संदर्भ बिंदु बन सकता है. ‘संतुलित दृष्टिकोण’ इस फैसले की केंद्रीय अवधारणा रही.
अपने आदेश में अधिकरण ने तीन प्रमुख मुद्दों पर विचार किया,मूंगा चट्टानों (कोरल) की सुरक्षा; क्या परियोजना को सीमित आधारभूत आंकड़ों के आधार पर मंजूरी दी गई; और क्या परियोजना का कोई हिस्सा प्रतिबंधित या संरक्षित तटीय क्षेत्रों में आता है. साथ ही, 2022 की पर्यावरणीय मंजूरी में लगाए गए शर्तों के पालन की भी समीक्षा की गई.
आईसीआरजेड क्षेत्र में परियोजना के आने के सवाल पर एनजीटी ने पूर्व पर्यावरण सचिव लीना नंदन की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट पर भरोसा किया और निष्कर्ष निकाला कि परियोजना का कोई हिस्सा प्रतिबंधित क्षेत्र में नहीं आता. यह समिति अप्रैल 2023 के एनजीटी आदेश के अनुपालन में गठित की गई थी, ताकि पर्यावरणीय मंजूरी से जुड़े कुछ अनुत्तरित सवालों की समीक्षा की जा सके. सुनवाई के दौरान पर्यावरण मंत्रालय ने गोपनीयता और रणनीतिक हितों का हवाला देते हुए एचपीसी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की. अधिकरण ने केंद्र द्वारा हलफनामे में प्रस्तुत निष्कर्षों पर भरोसा किया.
अधिकरण ने केंद्र के उस आश्वासन को भी दर्ज किया, जिसमें कहा गया कि प्रस्तावित मास्टर प्लान के तहत तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरजेड-1ए और 1बी) में आने वाले बंदरगाह के हिस्सों को संशोधित मास्टर प्लान से बाहर रखा जाएगा.
एनजीटी ने अपने आदेश में कहा कि पर्यावरणीय मंजूरी में ‘पर्याप्त सुरक्षा उपाय’ शामिल हैं और हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता. अदालत ने यह भी दर्ज किया कि लेदरबैक समुद्री कछुए, निकोबार मेगापोड, खारे पानी के मगरमच्छ, रॉबर क्रैब, निकोबार मकाक और अन्य स्थानिक पक्षी प्रजातियों की सुरक्षा के लिए विशेष शर्तें तय की गई हैं.
अधिकरण ने स्पष्ट किया कि सरकार पर्यावरणीय मंजूरी की शर्तों से बंधी हुई है और उनके उल्लंघन की अनुमति नहीं दी जा सकती.
साथ ही, एनजीटी ने पर्यावरण मंत्रालय को निर्देश दिया कि प्रस्तावित निर्माण कार्य, जिसमें तटीय विकास गतिविधियां भी शामिल हैं, से समुद्री किनारों में बदलाव न हो. आदेश में कहा गया कि द्वीप की तटरेखा की रक्षा की जाएगी और रेतीले समुद्र तटों का नुकसान नहीं होने दिया जाएगा, क्योंकि यही तट कछुओं और पक्षियों के प्रजनन स्थल हैं और द्वीपों की सुरक्षा भी करते हैं.
मूंगा चट्टानों के मुद्दे पर अधिकरण ने भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) की पूर्व प्रस्तुतियों को ध्यान में रखते हुए कहा कि परियोजना क्षेत्र में कोई प्रमुख कोरल रीफ मौजूद नहीं है. जहां बिखरी हुई मूंगा चट्टानें हैं, उन्हें वैज्ञानिक सुझावों के अनुरूप स्थानांतरित किया जाएगा. अधिकरण ने मंत्रालय को निर्देश दिया कि तटीय क्षेत्र में कोरल की सुरक्षा और वैज्ञानिक तरीकों से उनके पुनर्जीवन के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाएं.
