2017 से पूरे भारत में तोड़फोड़ में तेज़ी से वृद्धि हुई. लंबे समय से शहरों में लोगों को बेदख़ल किया जाता रहा है लेकिन बुलडोज़र के दंडात्मक इस्तेमाल के कारण इसके दर में गुणात्मक वृद्धि हुई है. इस कार्रवाई में असमान रूप से मुसलमानों को निशाना बनाया गया है.
योगी आदित्यनाथ के शासन काल में उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाले औज़ार से बदलकर मुसलमानों को सामूहिक रूप से दंडित करने वाला हथियार और राजनीतिक नाटक का हिस्सा बन गया. यह तरीका एक राष्ट्रीय मॉडल बन गया, जिसे भाजपा ने सराहा और दूसरे भाजपा शासित राज्यों तथा कांग्रेस शासित कर्नाटक में भी अपनाया गया. इस पूरी प्रक्रिया में बहुत कम न्यायिक निगरानी थी. पीड़ितों और गवाहों ने डर, अपमान और घरों को गिराए जाने के बारे में बताया, जबकि अधिकारियों ने घरों को गिराने की कार्रवाई को एक सार्वजनिक तमाशा बना दिया.
छह लेखों की श्रृंखला का यह तीसरा लेख यह बताता है कि कैसे एक हिंदू ‘योगी’ ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई के तौर पर बुलडोज़र के ग़ैर-क़ानूनी इस्तेमाल का राष्ट्रीय मॉडल तैयार किया. श्रृंखला का पहला और दूसरा लेख यहां पढ़ सकते हैं.
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नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में आपराधिक ठिकानों को गिराने के एक टूल के तौर पर जिस बुलडोज़र कार्रवाई की शुरुआत हुई, वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में निशाना बनाकर की जाने वाली तोड़फोड़, मुसलमानों को सामूहिक रूप से दंडित करने और देश भर में राजनीतिक ड्रामे के एक मॉडल में बदल गया है.
अक्सर पहले से नोटिस देने तथा पुनर्वास के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करके की जाने वाली तोड़फोड़ की परिघटना तेज़ी से भाजपा शासित राज्यों जैसे दिल्ली, मध्य प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, असम, उत्तराखंड तथा गुजरात; जम्मू और कश्मीर, जहां केंद्र सरकार कई नीतियां तय करती हैं; और, हाल के मामलों में, कांग्रेस शासित कर्नाटक तक फैल गईं.
इस संबंध में स्तंभकार और मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के डॉक्टोरल स्कॉलर फ़हद ज़ुबेरी ने मई 2023 में लिखा, ‘राज्य ने अब एक टूलकिट बनाया है – निशाना बनाकर तोड़फोड़, जबरन विस्थापन, और डेमोग्राफ़िक इंजीनियरिंग – न सिर्फ़ राजनीतिक प्रभाव को मज़बूत करने और चुनावी नतीजों को अपने पक्ष में करने के लिए, बल्कि लोगों के मन में लगातार नफ़रत भरने के लिए. इससे एक ऐसी सामूहिक हिंदुत्ववादी सोच निर्मित की जा रही है जिससे मुसलमानों को व्यवस्थित तरीके से मिटाया जा सके.’
दिल्ली के तुग़लकाबाद झुग्गियों में रहने वाले लोग, जिन्हें 2023 में बेदखली का नोटिस मिला और तोड़फोड़ की गई, उन्होंने अधिकारियों से कहा, ‘उन्हें पता लगाना चाहिए कि मुसलमान कौन हैं और उन्हें हटाना चाहिए, हमें क्यों?’ उनमें से कई हिंदू थे और लंबे समय से भाजपा के समर्थक थे.
इस मामले को लेकर स्थानीय भाजपा वोटर सुषमा दत्त ने द क्विंट के साथ अपनी उलझन साझा करते हुए कहा, ‘हम रोहिंग्या या बंगाली मुसलमान नहीं हैं. सरकार को उनसे दिक़्क़त है. लेकिन हमें क्यों परेशान कर रहे हैं? अगर वे मुसलमानों को हटाना चाहते हैं, तो हटाएंं. हम तो हिंदू हैं.’
संदेश यह था: बुलडोज़र एक हथियार है, क़ानून का निष्पक्ष साधन नहीं.
यूपी मॉडल
इस हथियार के इस्तेमाल का तरीका जुलाई 2020 में यूपी के गैंगस्टर विकास दुबे के ख़िलाफ़ पुलिस ऑपरेशन के दौरान देखा जा सकता है. दुबे ने रास्ते में बुलडोज़र खड़ा करके पुलिस की गाड़ियों रोक दिया इसके बाद उसके गैंग को लोगों ने आठ पुलिस अधिकारियों की हत्या कर दी.
इसके जवाब में, योगी आदित्यनाथ के प्रशासन ने दुबे के बड़े घर को उसी बुलडोज़र से गिरा दिया जिसने क़ाफ़िले को रोका था, और इसे टेलीविज़न पर लाइव दिखाया गया. इसके बाद पुलिस ने दुबे को गोली मार दी, पुलिस पर ग़ैर-न्यायिक हत्या का आरोप लगा था.
आदित्यनाथ – जो लगभग 11वीं सदी के शैव संप्रदाय के एक मठ के महंत हैं – ने इन कामों को क़ानून-व्यवस्था के प्रदर्शन के तौर प्रस्तुत किया और सार्वजनिक रूप से इसका उत्सव मनाया. हज़ारों ग़ैर-न्यायिक पुलिस मुठभेड़ों के साथ-साथ कथित गैंगस्टरों, जैसे मुख़्तार अंसारी, आज़म ख़ान और अतीक़ अहमद की संपत्तियों को भी गिराया गया.
ढहाए गए घरों की तस्वीरें और संपत्ति को नाटकीय तरीके से नष्ट करने का दृश्य जल्दी ही लोकप्रिय तमाशे में तब्दील हो गया. जल्द ही, बुलडोज़र एक राजनीतिक प्रतीक बन गया. 2022 की शुरुआत में विधानसभा चुनाव के दौरान आदित्यनाथ ने ख़द को ‘बुलडोज़र बाबा’ कहलवाना शुरू कर दिया, हालांकि उनके प्रतिद्वंद्वी अखिलेश यादव ने शुरू में व्यंग्यात्मक तरीके से इसका इस्तेमाल किया था.
भाजपा मार्च 2022 में 41% वोट शेयर के साथ सत्ता में वापस आई, और जीत के जुलूसों में पार्टी के झंडों से सजे बुलडोज़रों के क़ाफ़िले शामिल थे. हिंदुत्व पॉप म्यूज़िक ने इस कहानी को और आगे बढ़ाया, मर्दाना, ग़ैर समझौतावादी न्याय के प्रतीक के रूप में बुलडोज़र का महिमामंडन किया. एक पॉपुलर गाने में कहा गया: ‘बुलडोज़र बाबा चांप रहे हैं, माफ़िया हांफ रहे हैं.’
मुसलमानों को सज़ा देना
बुलडोज़र का राजनीतिक ड्रामा जल्द ही सांप्रदायिक राजनीति में परिवर्तित हो गया. मई 2022 में भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा द्वारा पैगंबर मुहम्मद के अपमान के बाद उत्तर प्रदेश में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए. प्रशासन ने सहारनपुर शहर से शुरू करके कई शहरों के मुसलमानों के घरों को गिराकर इसका जवाब दिया.
अधिकारियों ने दावा किया कि वे दंगा करने वालों को सज़ा दे रहे थे, लेकिन ज़्यादातर पीड़ित आम मुसलमान थे.
जून 2022 में कानपुर में मोहम्मद इश्तियाक़ का घर इसलिए गिरा दिया गया क्योंकि पुलिस को शक था कि उनके घर को बनाने में एक दंगाई ने पैसा लगाया है, और एक्टिविस्ट जावेद मोहम्मद जैसे लोगों, उनके परिवार वालों और घर की महिलाओं तक को हिरासत में लिया गया तथा उनके घरों को गिराने का लाइव प्रसारण किया गया.
उनकी बेटी अफ़रीन फ़ातिमा ने टाइम मैगज़ीन में लिखा, ‘क्या आपने कभी सोचा है कि भारत जैसे अघोषित हिंदू राष्ट्र में मुस्लिम होने का क्या मतलब होता है? लगातार अपमानित होना, नीचा दिखाया जाना और क्रूरता का शिकार होना? राज्य द्वारा अपनी आत्मा को नष्ट किए जाते हुए देखना? और कभी-कभी, अपना घर भी?’
फ़ातिमा ने बताया कि कैसे उनका 20 साल पुराना घर, जिसके काग़ज़ात पूरे थे और जो क़ानूनी तौर पर उनकी मां के नाम था, उसे अचानक ‘अवैध’ बताकर तोड़ दिया गया, जबकि राज्य से संबद्ध मीडिया ने इस तोड़फोड़ का जश्न मनाया.
न्यायिक समुदाय ने इस पर ध्यान दिया. सितंबर 2022 में बारह जाने-माने जजों और वकीलों ने देश के मुख्य न्यायधीश एनवी रमना को याचिका दी, जिसमें चेतावनी दी गई कि उत्तर प्रदेश सरकार की मिलीभगत वाली कार्रवाई ‘सामूहिक ग़ैर-न्यायिक सज़ा’ के बराबर है और यह ‘क़ानून के शासन का एक अस्वीकार्य उल्लंघन’ है.
फिर भी, मुस्लिम निवासियों में डर बना रहा. जैसा कि कम्युनिटी लीडर मोहम्मद राशिद ने अगस्त 2025 में कहा: ‘उत्तर प्रदेश में जब भी किसी हिंदू और मुस्लिम के बीच कोई विवाद होता है, तो बुलडोज़र सिर्फ़ एक तरफ़ भेजा जाता है. यह पैटर्न पूरे राज्य में दिख रहा है, और इससे मुसलमानों में डर पैदा हो रहा है.’
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनवरी 2023 में आदित्यनाथ के इस तरीके का समर्थन किया और विवादों को संभालने की दिशा में उन्हें एक उदाहरण के तौर पर पेश किया.
मोदी ने कहा, ‘अगर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस सत्ता में आते हैं, तो रामलला फिर से टेंट में होंगे, और वे राम मंदिर पर बुलडोज़र चलाएंंगे. उन्हें योगीजी से ट्यूशन लेनी चाहिए कि बुलडोज़र कहां चलाना है और कहां नहीं.’
यूपी के बाहर बुलडोज़र की राजनीति
बुलडोज़र की लोकप्रियता ने मध्य प्रदेश, गुजरात, असम और हरियाणा सहित भाजपा शासित दूसरे राज्यों में भी लोगों को इसकी नकल करने के लिए प्रेरित किया.
मध्य प्रदेश के भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने मार्च 2022 में अपने बंगले के बाहर बुलडोजरों की एक लाइन खड़ी कर दी थी, जिस पर एक बिल बोर्ड लगा था जिस पर चेतावनी लिखी थी: ‘बेटी की सुरक्षा में बनेगा जो रोड़ा, मामा का बुलडोज़र बनेगा हथौड़ा.’
मध्य प्रदेश में ज़्यादातर मुसलमानों को तोड़फोड़ का निशाना बनाया गया. अगस्त 2022 में न्यूज़लॉन्ड्री के एक सर्वे में पाया गया कि 332 तोड़ी गई संपत्तियों में से 223 मुसलमानों की थीं. इनमें से कई तोड़फोड़ छोटी-मोटी सांप्रदायिक झड़पों के बाद हुईं, जैसे खरगोन, मंदसौर और डिंडोरी में, या फिर अंतरधार्मिक शादियों, कथित छेड़छाड़ की घटनाओं या हिंसा की घटनाओं के कारण हुईं.
लगभग हर मामले में, स्थानीय अधिकारियों ने – न कि किसी अदालत ने – दोष तय किया और तोड़फोड़ का आदेश दिया, एक ऐसा पैटर्न जिसका वर्णन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने 2024 में जारी अपनी एक रिपोर्ट में किया, जिसका शीर्षक था ‘If you speak up, your house will be demolished: Bulldozer injustice in India’ (‘अगर आप आवाज़ उठाएंंगे, तो आपका घर गिरा दिया जाएगा: भारत में बुलडोज़र का अन्याय’).
जिस रिपोर्ट में ऐसे 128 मामलों का उल्लेख किया गया है जिसमें बिना किसी उचित प्रक्रिया, जैसे कि पहले से नोटिस देना, सलाह-मशविरा करना, या क़ानूनी उपाय आदि के दंडात्मक तोड़फोड़ की कार्रवाई की गई. पीड़ितों के पास अक्सर मालिकाना हक़ साबित करने वाले क़ानूनी दस्तावेज़ होते थे, फिर भी उन्हें अपने घरों और दुकानों को बुलडोज़र से ढहाते हुए देखने के लिए मजबूर किया गया, अक्सर डीजे संगीत या ढोल बजाकर ये कार्रवाई की गई.
मानवीय नुकसान तो कहीं अधिक था
मध्य प्रदेश के डिंडोरी ज़िले में स्थानीय अधिकारियों ने हलीम ख़ान के घर और तीन दुकानों को गिरा दिया. ऐसा इसलिए किया गया कि कथित तौर पर उनके बेटे ने एक हिंदू महिला के साथ महिला के परिवार की मर्जी के विरुद्ध शादी की थी, जबकि उनके बेटे को सज़ा नहीं हुई थी और न ही कोई क़ानूनी प्रक्रिया पूरी की गई थी.
इस तोड़फोड़ को अधिकारियों ने सोशल मीडिया पर प्रसारित किया और यह सब कुछ सांप्रदायिक दबाव की वजह से हुआ, न कि किसी कोर्ट के आदेश पर. इससे यह पता चलता है कि ऐसी सज़ा वाली तोड़फोड़ में प्रशासनिक कार्रवाई ने न्यायिक पर्यवेक्षण की जगह ले ली है.
ख़ान ने अगस्त 2022 में द वायर को बताया, ‘उन्होंने मुझे कई दिनों तक जेल में रखा और मेरे बेटे के प्रेम प्रसंग के कारण मेरा घर बुलडोज़र से गिरा दिया.’ उज्जैन में अगस्त 2022 में, एक धार्मिक जुलूस पर थूकने के आरोप में तीन मुस्लिम लड़कों को हिरासत में लिया गया, और उनमें से एक के पिता का तीन मंज़िला घर गिरा दिया गया.
रायसेन में एक मुस्लिम युवक पर उत्पीड़न का आरोप लगा और उस पर जवाबी कार्रवाई हुई, जिसके बाद अधिकारियों ने सामूहिक सज़ा के तौर पर दर्जनों मुस्लिम घरों को गिरा दिया.
यह ट्रेंड गुजरात और दिल्ली तक फैल गया. अप्रैल 2023 में खंभात में रामनवमी के अवसर पर हुई झड़प के बाद मुसलमानों की दुकानें और गोदाम तोड़ दिए गए, जबकि हिंदुओं की संपत्तियों को छुआ तक नहीं गया. हिम्मतनगर और दिल्ली के जहांगीरपुरी में भी कुछ ऐसा ही हुआ.
20 दिसंबर 2025 और 8 जनवरी 2026 को कांग्रेस शासित कर्नाटक में भी तोड़फोड़ हुई, जिसमें ज़्यादातर मुसलमान प्रभावित हुए. पहले राउंड में लगभग 300 घर गिराए गए जिनमें से ज़्यादातर मुस्लिम प्रवासियों के घर थे और दूसरे राउंड में लगभग 60 घर गिराए गए.
दोनों जगह के निवासियों ने आरोप लगाया कि उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया और सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के आलोक में पहले से कोई पुनर्वास योजना नहीं बनाई गई.
दिसंबर में हुई तोड़फोड़ के बाद कई निवासियों ने कहा कि वे राज्य की राजधानी बेंगलुरु के उस इलाके में दो दशकों से ज़्यादा समय से रह रहे थे.
केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा कि कांग्रेस का यह क़दम ‘उत्तर भारत में संघ परिवार द्वारा लागू की गई अल्पसंख्यक विरोधी आक्रामक राजनीति’ जैसा था.
विजयन ने फ़ेसबुक पर एक पोस्ट में लिखा, ‘कर्नाटक की राजधानी में उस फ़कीर कॉलोनी और वसीम लेआउट को बुलडोज़र से गिराने की कार्रवाई बहुत चौंकाने वाली और दर्दनाक है, जहां मुस्लिम लोग सालों से रह रहे हैं.’
दिल्ली में तोड़फोड़
बुलडोज़र को देश की राजधानी तक पहुंचने में ज़्यादा समय नहीं लगा. 16 अप्रैल 2022 को भी इसी तरह की सांप्रदायिक झड़प हुई, जब जहांगीरपुरी में हनुमान शोभायात्रा एक मस्जिद के सामने से गुज़री. इसमें शामिल लोगों ने ‘जिसको देश में रहना होगा, जय श्री राम कहना होगा’ जैसे नारे लगाए.
उन्होंने तेज़ संगीत बजाया, जिससे स्थानीय मुस्लिम भड़क गए और पत्थरबाज़ी तथा हिंसा शुरू हो गई, जिसमें सात पुलिस अधिकारियों सहित नौ लोग घायल हो गए.
तीन दिन बाद बुलडोज़र आ गए. ज़्यादातर मुसलमानों के घर और दुकानें उनके सामने ही तोड़ दिए गए. भाजपा के नेतृत्व वाली नॉर्थ दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने नौ बुलडोज़र लगाए, और ऑपरेशन की देखरेख के लिए 400 पुलिसकर्मी तथा अतिरिक्त सुरक्षा की मांग की – यह जहांगीरपुरी में हुई सांप्रदायिक झड़प के तुरंत बाद चलाए गए अभियान का हिस्सा था.
वकील सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, और अभियान पर रोक लगाने की गुहार लगाई. कोर्ट ने 20 अप्रैल 2023 को रोक लगाने का आदेश दिया, लेकिन तब तक ग़रीब निवासियों की कई संपत्तियां पहले ही मलबे में तब्दील हो चुकी थीं.
गवाहों का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी बुलडोज़र क़रीब डेढ़ घंटे तक चलते रहे, और यह सब टीवी कैमरों के सामने हुआ – यह एक ऐसी अवज्ञापूर्ण कार्रवाई थी जिसका पूरे देश में प्रसारण हुआ.
सीपीआई (एम) नेता वृंदा करात बुलडोज़र के सामने खड़ी हो गईं, सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर दिखाते हुए कहा, ‘उन्होंने चुनिंदा तरीके से बुलडोज़र चलाया है.’
वहीं, दिल्ली भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने जवाब दिया, ‘अगर आप पत्थर फेंकना चाहते हैं, तो अवैध बिल्डिंग में न रहें.’
सितंबर 2023 में जी-20 समिट से पहले देश की राजधानी को ‘सुंदर बनाने’ की कोशिश में एक बार फिर से बुलडोज़र राज को बढ़ावा मिला. इस बार सिर्फ़ मुसलमान निशान पर नहीं थे. एक सदियों पुरानी मुस्लिम दरगाह को गिरा दिया गया.
दरगाह के केयरटेकर ने रोते हुए कहा, ‘मुझे बताओ, पहले फ़ुटपाथ आया था या यह 400 साल पुरानी दरगाह?’
(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक है. लेख के लिए उमैर ख़ान ने शोध सहायता की है. इस लेख के लिए डायसपोरा इन एक्शन फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स से सहयोग मिला है.)
(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)
