नॉर्थईस्ट डायरीः राष्ट्रगान से पहले ‘वंदे मातरम’ के केंद्र सरकार के निर्देश के ख़िलाफ़ नगा छात्र संघ

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में असम, मणिपुर, नगालैंड, त्रिपुरा और अरुणाचल के प्रमुख समाचार.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' के 150 साल पूरे होने पर एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा आधिकारिक कार्यक्रमों और शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रगान से पहले भारतीय राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ गाने या बजाने को अनिवार्य करने संबंधी हालिया निर्देशों का पूर्वोत्तर के प्रभावशाली छात्र संगठन नगा स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) ने कड़ा विरोध किया है.

एनएसएफ ने शुक्रवार (20 फरवरी) को जारी बयान में कहा, ‘यह निर्देश एक सख्त प्राथमिकता क्रम निर्धारित करता है और सबसे जरूरी बात इसे स्कूलों पर लागू करता है. ऐसा निर्देश थोपना नगा समाज की ऐतिहासिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं की अनदेखी करता है. हम भारतीय संविधान के ढांचे, जिसमें अनुच्छेद 51A(क) भी शामिल है, से अवगत हैं, लेकिन हम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि कोई भी प्राधिकरण नगा मातृभूमि पर इस तरह से सांस्कृतिक या विचारधारा के हिसाब से चलने के लिए मजबूर नहीं कर सकती जो हमारे खास इतिहास और पहचान की अनदेखी करे.’

ज्ञात हो कि बीते दिनों 10 पृष्ठों के आदेश में गृह मंत्रालय ने (एमएचए) ने कहा था कि यदि राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ और राष्ट्रगान ‘जन गन मन’ साथ-साथ गाए या बजाए जाते हैं, तो पहले ‘वंदे मातरम’ प्रस्तुत किया जाएगा और इस दौरान श्रोताओं को सावधान मुद्रा में खड़ा रहना होगा.

एनएसएफ ने यह भी कहा कि स्कूलों में दिन की शुरुआत सामूहिक रूप से ‘वंदे मातरम’ गाने से करने तथा राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान को ‘लोकप्रिय बनाने’ संबंधी केंद्र सरकार के निर्देश चिंताजनक हैं.

अपने बयान में संगठन ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘नगा क्षेत्र के स्कूलों में राष्ट्रगान से पहले ‘वंदे मातरम’ के अनिवार्य गायन या वादन से संबंधित कोई गतिविधि नहीं होने दी जाएगी.’

एनएसएफ ने साथ ही नगालैंड बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन (एनबीएसई) से अपील की कि वह अपने अधिकार क्षेत्र में इस प्रोटोकॉल को लागू करने के लिए कोई परिपत्र या अधिसूचना जारी न करे. संगठन ने स्कूल प्रबंधन और प्रशासकों को भी चेतावनी दी कि बिना संबंधित पक्षों से परामर्श और जमीनी परिस्थितियों की समझ के ऐसे दिशानिर्देशों को लागू न किया जाए.

त्रिपुरा: पूर्वोत्तर की आदिवासी भाषाओं पर देवनागरी थोपने की केंद्र की कोशिश की आलोचना

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने शुक्रवार (20 फरवरी) को कहा कि जिन भाषाओं और बोलियों की अपनी निर्धारित लिपि नहीं है, उन्हें देवनागरी लिपि अपनाने पर विचार करना चाहिए.

उनकी यह टिप्पणी त्रिपुरा में कोकबोरोक भाषा की लिपि को लेकर जारी बहस के बीच आई है. राज्य की दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा कोकबोरोक के लिए सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी देवनागरी या बांग्ला लिपि का समर्थन कर रही है, जबकि टिपरा मोथा पार्टी और इंडिजिनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा सहित कई संगठन रोमन लिपि अपनाने की मांग कर रहे हैं.

नॉर्थईस्ट नाउ के मुताबिक, त्रिपुरा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष जितेंद्र चौधरी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की टिप्पणियों की आलोचना करते हुए कहा कि यह पूर्वोत्तर क्षेत्र में एक ही भाषा और लिपि थोपने की कोशिश है, जो सांस्कृतिक विविधता के लिए खतरा बन सकती है.

शाह शुक्रवार को त्रिपुरा दौरे पर पहुंचे थे, जहां उन्होंने हापनिया स्थित अंतरराष्ट्रीय इंडोर प्रदर्शनी केंद्र में आयोजित पूर्वी, पूर्वोत्तरी और उत्तरी क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन का उद्घाटन किया.

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (बीच में), त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा (बाएं) अंतरराष्ट्रीय इंडोर प्रदर्शनी केंद्र में आयोजित पूर्वी, पूर्वोत्तरी और उत्तरी क्षेत्रीय राजभाषा सम्मेलन उद्घाटन के दौरान. (फोटो: पीटीआई)

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई-एम) के राज्य सचिव भी रहे चौधरी ने कहा कि राजभाषा विभाग के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार पर किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन पूर्वोत्तर के समुदायों को अपनी मातृभाषाओं के लिए देवनागरी लिपि अपनाने के लिए बाध्य करना स्वीकार्य नहीं होगा.

पूर्व सांसद और राजभाषा संबंधी समितियों के सदस्य रह चुके चौधरी ने चिंता जताई कि शाह ने पूर्वोत्तर में बोली जाने वाली लगभग 40 भाषाओं को देवनागरी लिपि अपनाने का सुझाव दिया और क्षेत्रीय विकास को इससे जोड़ने की बात कही. उन्होंने इसे भाषाई स्वतंत्रता के लिए ‘गंभीर खतरा’ बताया.

उन्होंने कहा, ‘यह हमारी भाषाई विविधता और सांस्कृतिक विरासत को कमजोर करता है. इस तरह का दृष्टिकोण क्षेत्रीय भाषाओं और परंपराओं के प्रति प्रभुत्ववादी रवैया दर्शाता है, जिसका हम कड़ा विरोध करते हैं.’

चौधरी ने इन विचारों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वैचारिक सोच से भी जोड़ा और कहा कि भाषा और लिपि से जुड़े फैसले लोगों के हाथ में ही रहने चाहिए.

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हर समुदाय को अपनी भाषा और लिपि तय करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए.

उन्होंने कहा, ‘किसी भाषा की लिपि तय करना लोगों का अधिकार है, किसी बाहरी प्राधिकरण का नहीं. किसी भी प्रकार की थोपने की कोशिश को हम अस्वीकार करते हैं.’

कोकबोरोक और रोमन लिपि विवाद

कोकबोरोक भाषी लंबे समय से बांग्ला से रोमन लिपि में बदलाव की मांग कर रहे हैं. हालांकि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार, जिसमें बांग्ला भाषी प्रभावशाली हैं, किसी ‘विदेशी लिपि’ के बजाय भारतीय मूल की लिपि अपनाने पर जोर दे रही है. कुछ हलकों में यह आरोप भी लगाया जाता रहा है कि रोमन लिपि की मांग के पीछे ईसाई मिशनरियों का प्रभाव है, क्योंकि त्रिपुरा की जनजातीय आबादी का एक हिस्सा ईसाई धर्म अपना चुका है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ दिन पहले त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने कहा था कि उनकी सरकार कोकबोरोक के लिए रोमन लिपि को कभी अनुमति नहीं देगी, क्योंकि इससे स्वदेशी परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को खतरा हो सकता है। उन्होंने जनजातीय बुद्धिजीवियों और भाषा विशेषज्ञों को सलाह दी थी कि वे स्वदेशी लिपि विकसित करें, बांग्ला लिपि जारी रखें या देवनागरी जैसी भारतीय मूल की अन्य लिपियां अपनाएं.

उनके इस बयान का टिपरा मोथा पार्टी ने विरोध किया, जो राज्य में भाजपा की सहयोगी है और रोमन लिपि का समर्थन करती है. इसके अलावा यूनाइटेड मूवमेंट फॉर कोकबोरोक जैसे छात्र संगठनों ने भी विरोध प्रदर्शन करते हुए रोमन लिपि की मांग को लेकर मानव श्रृंखला बनाई.

असम के पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा भाजपा में शामिल हुए

असम कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा रविवार (22 फरवरी) को सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)में शामिल हो गए. उन्होंने यहां पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष दिलीप सैकिया की मौजूदगी में सदस्यता ग्रहण की.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, बोरा ने असम भाजपा मुख्यालय ‘वाजपेयी भवन’ में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पार्टी की सदस्यता ली. उनके साथ कांग्रेस के पूर्व कार्यकर्ता संजू बोरा भी भाजपा में शामिल हुए.

भूपेन बोरा और हिमंता बिस्वा शर्मा. (फोटो: पीटीआई)

ज्ञात हो कि भूपने बोरा ने 16 फरवरी को कांग्रेस से इस्तीफा दिया था, हालांकि पार्टी आलाकमान ने इसे तत्काल स्वीकार नहीं किया था. वरिष्ठ नेताओं ने उनके आवास पहुंचकर उन्हें मनाने की कोशिश की थी और राहुल गांधी ने भी उनसे बातचीत की थी.

उन्होंने अपने फैसले पर पुनर्विचार के लिए समय मांगा था, लेकिन अगले ही दिन असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा उनके घर पहुंचे और घोषणा की कि बोरा 22 फरवरी को भाजपा में शामिल होंगे.

यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब 126 सदस्यीय असम विधानसभा के चुनाव मार्च-अप्रैल में होने की संभावना है. सत्तारूढ़ भाजपा के पास वर्तमान में 64 सीटें हैं, जबकि उसके सहयोगी दल – असम गण परिषद (एजीपी), यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) – उसकी ताकत बढ़ाते हैं. कांग्रेस के पास सदन में 26 विधायक हैं और वह अन्य विपक्षी दलों के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है.

जलविद्युत परियोजना के लिए अरुणाचल में काटेंगे 23.4 लाख पेड़, प्रतिपूरक वनीकरण मध्य प्रदेश में

पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति ने अरुणाचल प्रदेश में एनएचपीसी की 1,720 मेगावाट क्षमता वाली कमला जलविद्युत परियोजना के निर्माण को मंजूरी देने की सिफारिश की है, जिसके तहत 23.4 लाख पेड़ों की कटाई होनी है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पेड़ों की इस बड़े पैमाने पर कटाई को लेकर चिंता जताते हुए समिति ने पारिस्थितिकी तंत्र के इकोसिस्टम को ठीक करने के लिए सटीक और सुव्यवस्थित कार्ययोजना तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया है.

अरुणाचल प्रदेश के वन विभाग द्वारा विशेषज्ञ समिति को दी गई जानकारी के अनुसार, राज्य में क्षतिग्रस्त (डीग्रेडेड) वन भूमि उपलब्ध नहीं होने के कारण परियोजना के लिए प्रतिपूरक वनीकरण मध्य प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में किया जाएगा.

(प्रतीकात्मक तस्वीर: द वायर)

23,764.01 करोड़ रुपये की इस परियोजना के तहत 216 मीटर ऊंचा बांध और लगभग 2,600 हेक्टेयर का जलाशय बनाया जाएगा. इसका उद्देश्य कमला नदी के जल का उपयोग करना है, जो सुबनसिरी नदी की दाहिनी सहायक नदी है.

नदी घाटी और जलविद्युत परियोजनाओं से संबंधित विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) ने परियोजना प्रस्तावक एनएचपीसी लिमिटेड को निर्देश दिया है कि अंतिम पर्यावरणीय मंजूरी से पहले सिद्धांततः (इन-प्रिंसिपल) वन स्वीकृति प्राप्त की जाए.

गौरतलब है कि अंतिम पर्यावरणीय स्वीकृति पर्यावरण मंत्रालय द्वारा विभिन्न क्षेत्रीय विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों की समीक्षा के बाद दी जाती है. परियोजना के लिए 3,278 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन के प्रस्ताव का मूल्यांकन मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (एफएसी) करेगी. वन भूमि पर पेड़ों की कटाई दो चरणों में वन डायवर्जन स्वीकृति मिलने के बाद और चरणबद्ध तरीके से ही की जा सकती है.

23,764.01 करोड़ रुपये की यह परियोजना कमला नदी के जल दोहन के लिए प्रस्तावित है, जो सुबनसिरी नदी की दाहिनी सहायक नदी है और अंततः ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली का हिस्सा बनती है. इसके तहत 216 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध बनाया जाएगा. परियोजना अरुणाचल प्रदेश के कामले, क्रा दादी और कुरुंग कुमेय जिलों में फैली होगी तथा इसे बाढ़ नियंत्रण क्षमता वाले भंडारण परियोजना के रूप में तैयार किया गया है.

परियोजना की सामाजिक प्रभाव आकलन (एसआईए) रिपोर्ट के अनुसार, इससे 126 गांवों के कुल 5,440 परिवार प्रभावित होंगे.

ईएसी ने अपने मिनिट्स में कहा, ‘घने वन क्षेत्र में स्थित इस परियोजना के तहत 23,40,213 पेड़ों की प्रस्तावित कटाई को लेकर समिति ने चिंता व्यक्त की. वन स्वीकृति देने से पहले राज्य वन एवं वन्यजीव विभाग, पारिस्थितिकी और वन्यजीव विशेषज्ञों तथा स्थानीय समुदायों से परामर्श कर पर्याप्त शमन और प्रतिपूरक उपायों सहित पारिस्थितिकी पुनर्स्थापन की विस्तृत कार्ययोजना आवश्यक होगी.’

परियोजना के लिए प्रस्तावित 3,278 हेक्टेयर वन भूमि, जिसे उच्च संरक्षण मूल्य वाला क्षेत्र माना गया है, में से 439 हेक्टेयर अत्यंत घना वन तथा 1,119 हेक्टेयर मध्यम घनत्व वाला वन क्षेत्र है.

मध्य प्रदेश में प्रस्तावित प्रतिपूरक वनीकरण खरगोन, ग्वालियर, धार और पन्ना सहित विभिन्न जिलों में किया जाएगा.

कमला जलविद्युत परियोजना सुबनसिरी नदी बेसिन में प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं की श्रृंखला का हिस्सा है. असम-अरुणाचल सीमा पर गेरुकामुख में स्थित 2,000 मेगावाट की लोअर सुबनसिरी परियोजना इसी नदी की मुख्य धारा पर कमला परियोजना के डाउनस्ट्रीम में स्थित है.

हालांकि लोअर सुबनसिरी परियोजना दिसंबर 2025 में कई देरी के बाद चालू कर दी गई थी, लेकिन 31.83 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अनिवार्य प्रतिपूरक वनीकरण अब भी लंबित है, जबकि केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय छह बार रिमाइंडर पत्र भेज चुका है.

पर्यावरणीय मंजूरी की सिफारिश करते समय ईएसी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि परियोजना के लिए वैधानिक वन्यजीव स्वीकृति आवश्यक होगी या नहीं. 28 जनवरी की बैठक से पहले असम के पर्यावरण कार्यकर्ता बिमल गोगोई ने समिति को पत्र लिखकर बताया था कि 2009 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार लोअर सुबनसिरी परियोजना के अपस्ट्रीम आने वाली किसी भी परियोजना पर राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की स्थायी समिति द्वारा विचार किया जाना चाहिए. हालांकि ईएसी के मिनिट्स में वन्यजीव स्वीकृति संबंधी किसी शर्त का उल्लेख नहीं है.

मणिपुर में जातीय हिंसा में घायल भाजपा विधायक वुंगजागिन वाल्टे के निधन पर तीन दिन का राजकीय शोक

मणिपुर सरकार ने भाजपा विधायक वुंगजागिन वाल्टे के निधन पर रविवार (22 फरवरी) से तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है. मई 2023 में राज्य में भड़की जातीय हिंसा के दौरान भीड़ के हमले में गंभीर रूप से घायल होने के बाद उनका लंबे समय से इलाज चल रहा था.

जोमी समुदाय से आने वाले वाल्टे चूड़ाचांदपुर जिले की थानलोन विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करते थे. उनकी शनिवार को मेदांता अस्पताल, गुड़गांव में मृत्यु हो गई, जहां बिगड़ती हालत के कारण इस महीने की शुरुआत में उन्हें पूर्वोत्तर से एयरलिफ्ट कर लाया गया था.

मणिपुर के थानलोन से दिवंगत भाजपा विधायक वुंगजागिन वाल्टे, जो राज्य में जातीय हिंसा के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गए थे. (फोटो: X/@VungzaginValte)

3 मई 2023 को जातीय हिंसा भड़कने के अगले दिन, इंफाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के कार्यालय से लौटते समय उन पर भीड़ ने हमला किया था. हमले में उनके कुकी-जो ड्राइवर की हत्या कर दी गई थी, जबकि उनके मेईतेई सुरक्षा अधिकारी को छोड़ दिया गया था. इस मामले में अब तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है.

जून 2023 में उन्हें इलाज के लिए दिल्ली लाया गया था. अप्रैल 2025 में वे मिजोरम के रास्ते अपने गृह जिले चूड़ाचांदपुर लौटे थे, लेकिन तब तक वे व्हीलचेयर पर निर्भर हो चुके थे और स्पष्ट रूप से बोल भी नहीं पाते थे. करीब दो सप्ताह पहले उनकी तबीयत फिर बिगड़ने पर उन्हें दोबारा दिल्ली लाया गया.

मुख्यमंत्री वाई. खेमचंद सिंह ने शनिवार को गुड़गांव पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दी, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया.

कुकी-जो समुदाय से जुड़े नागरिक संगठनों ने भी वाल्टे के निधन पर गहरा दुख जताया. कुकी-जो काउंसिल ने कहा कि विधायक पर हमले के मामले में अब तक न्याय नहीं मिलना समुदाय में असुरक्षा और अविश्वास की भावना को दर्शाता है. संगठन ने कहा कि उनकी पीड़ा और मृत्यु इस बात की याद दिलाती है कि मेईतेई बहुल इलाकों में कुकी-जो समुदाय खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करता.

वाल्टे स्वयं भी जातीय हिंसा के बाद कुकी-जो समुदाय के लिए अलग प्रशासन की मांग के समर्थक रहे थे. सितंबर में उन्होंने अन्य कुकी-जो विधायकों के साथ प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपकर कहा था कि समुदाय अब मेईतेई समुदाय के साथ ‘एक ही छत के नीचे शांति से नहीं रह सकता.’

मणिपुर में मेईतेई और कुकी-जो समुदायों के बीच हिंसा शुरू हुए लगभग 33 महीने हो चुके हैं, लेकिन दोनों समुदाय अब भी सुरक्षा बलों द्वारा बनाए गए ‘बफर जोन’ से लगभग अलग-थलग हैं. हिंसा से विस्थापित हजारों लोग अब भी राहत शिविरों में रह रहे हैं.

वाल्टे थानलोन से तीन बार विधायक रहे. 2012 से 2017 तक उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता के रूप में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और बाद में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए. 2017-22 के कार्यकाल के दौरान वे कई विभागों के मंत्री भी रहे थे.