नई दिल्ली: इस महीने की 16 तारीख को देश की शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के अक्टूबर 2025 के एक फ़ैसले को चुनौती देने वाली याचिका को ख़ारिज कर दिया. उस फ़ैसले में हाईकोर्ट ने कहा था कि राज्य के कांकेर ज़िले के आठ गांवों में, पादरियों और ‘धर्मांतरित ईसाइयों’ के प्रवेश पर रोक लगाते हुए लगाए गए होर्डिंग ‘असंवैधानिक नहीं’ हैं.
यह घटनाक्रम पिछले साल का है जब जून 2025 के मध्य में छत्तीसगढ़ के कांकेर ज़िले के कई आदिवासी इलाक़ों के गांवों में ईसाई पादरियों और ‘धर्मांतरित ईसाइयों’ के प्रवेश पर रोक लगाने वाले पोस्टरों/होर्डिंग का मामला सामने आया.
हाईकोर्ट के समक्ष दायर याचिका के अनुसार, 25 जून, 2025 को जिले के कुदाल गांव और 26 जून 2025 को पारवी गांव में ग्राम सभाओं की बैठकें हुईं, जिनके बाद ऐसे प्रस्ताव पारित किए जाने का दावा किया गया जिनमें ईसाई पादरियों के गांवों में प्रवेश पर रोक लगाने की बात कही गई.
इन बैठकों के बाद अगस्त 2025 के दूसरे हफ्ते से कांकेर ज़िले के कई गांवों में बड़े-बड़े बोर्ड और होर्डिंग लगाए जाने लगे, जिन पर लिखा गया कि संबंधित गांव पांचवीं अनुसूची क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं और इसलिए पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा) के तहत ग्राम सभा को अपनी संस्कृति, परंपराओं और पहचान की रक्षा का अधिकार है. इसी आधार पर पोस्टर में यह घोषणा की गई कि ईसाई पादरियों और ‘धर्मांतरित आदिवासी ईसाइयों’ का गांव में प्रवेश प्रतिबंधित है.
दिलचस्प पहलू यह है कि जिस प्रस्ताव का हवाला देते हुए यह तुरत-फुरत कार्रवाई की गई, उसकी प्रति जिला पंचायत के रिकॉर्ड में नहीं है.

याचिका के मुताबिक़, कम से कम आठ गांवों – कुदाल, पारवी, जुनवानी, घोटा, घोटिया, हवेंचुर, मुसुरपुट्टा और सुलांगी में ऐसे होर्डिंग लगाए गए. कुछ पर यह भी लिखा गया कि प्रलोभन देकर आदिवासियों का धर्मांतरण किया जा रहा है, जिससे गांव की पारंपरिक संस्कृति और सामाजिक ढांचे को नुकसान पहुंच रहा है. इसी कथित खतरे के आधार पर पादरियों और दूसरे गांवों से आने वाले ‘धर्मांतरित ईसाइयों’ को गांव में प्रवेश करने से रोका गया.
याचिका में यह भी कहा गया कि इन निर्देशों का असर सिर्फ़ बाहरी लोगों पर नहीं, बल्कि उन्हीं गांवों में रहने वाले ईसाई परिवारों पर भी पड़ा, जिन्हें सामाजिक बहिष्कार और दबाव का सामना करना पड़ा.
‘ईसाई समुदाय के लोगों में भय’
इन पोस्टरों का ज़मीनी स्तर पर पड़े प्रभाव को लेकर याचिकाकर्ता डिगबल टांडी ने गंभीर आरोप लगाए. कांकेर ज़िले के निवासी टांडी ने 10 सितंबर 2025 को छतीसगढ़ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की, जिसमें कहा गया कि ऐसे पोस्टर लगने के बाद पादरियों को न केवल दूसरे गांवों में जाने से रोका गया, बल्कि कई मामलों में उन्हें उनके अपने गांवों में भी प्रवेश नहीं करने दिया गया.
याचिका के अनुसार, इन प्रतिबंधों का सीधा असर ईसाई समुदाय की धार्मिक गतिविधियों पर पड़ा. कई गांवों में प्रार्थना सभाओं में बाधा डाली गई और ईसाई परिवारों को सामाजिक दबाव, डर और बहिष्कार का सामना करना पड़ा.
याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि इन पोस्टरों के कारण ईसाई समुदाय के लोगों में भय का माहौल बन गया और वे किसी अप्रिय घटना या हिंसा की आशंका के चलते उन गांवों में जाने से बचने लगे, जहां वे पहले नियमित रूप से जाया करते थे.
याचिका में यह भी कहा गया कि इन होर्डिंग्स ने ईसाई नागरिकों के धर्म की स्वतंत्रता और देश में स्वतंत्र रूप से घूमने के अधिकार का हनन किया है. याचिकाकर्ता के अनुसार, यह केवल धार्मिक आज़ादी का नहीं, बल्कि नागरिक गरिमा और सुरक्षा का भी सवाल है.
याचिका में यह तर्क भी दिया गया कि ग्राम सभा को पेसा क़ानून के तहत जल, जंगल और ज़मीन से जुड़े मामलों तथा परंपराओं की रक्षा का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों से ऊपर नहीं हो सकता. याचिका में साफ़ तौर पर कहा गया कि किसी व्यक्ति को केवल उसके धर्म के आधार पर गांव में प्रवेश से रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 19(1)(d) (आवागमन की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) का उल्लंघन है.
याचिका में हाईकोर्ट से मांगी गई राहत इस प्रकार है:
(i) मामले से संबंधित सभी प्रासंगिक अभिलेख तलब किए जाएं.
(ii) गांवों में लगाए गए होर्डिंग्स को असंवैधानिक, अवैध तथा भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 और 19(1)(d) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन घोषित किया जाए.
(iii) प्रतिवादी पक्षों को उपर्युक्त अवैध होर्डिंग्स हटाने का निर्देश दिया जाए.
(iv) प्रतिवादी प्राधिकारियों, विशेष रूप से ज़िला कांकेर के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक, को निर्देश दिया जाए कि वे उन गांवों का दौरा करें जहां उपर्युक्त होर्डिंग्स लगाए गए हैं और विभिन्न समुदायों के बीच शांति और सौहार्द की बहाली के लिए ग्रामीणों/हितधारकों के साथ बैठक आयोजित करें, ताकि कांकेर ज़िले में ईसाई समुदाय के बीच सुरक्षा की भावना स्थापित हो सके.’

ग्राम सभा की प्रक्रिया, प्रशासन को ज्ञापन और आरटीआई
डिगबल टांडी ने याचिका में यह आरोप भी लगाया कि कई गांवों में जिन ग्राम सभा प्रस्तावों का हवाला देकर पोस्टर लगाए गए, वे तय क़ानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना पारित किए गए थे. हवेंचुर गांव के संबंध में याचिका में कहा गया कि वहां ग्राम सभा की बैठक के बारे में कोई घोषणा नहीं की गई थी और स्थानीय निवासियों को यह नहीं पता था कि कोई ऐसी बैठक हुई है.
याचिकाकर्ता का दावा है कि कुछ मामलों में कुछ लोगों ने ग्राम सभा के नाम पर फैसले थोपे और बाद में उन्हें पूरे गांव का निर्णय बताकर लागू किया गया.
इन घटनाओं के बाद 11 अगस्त 2025 को डिगबल टांडी ने अन्य नागरिकों के साथ मिलकर ज़िला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और उपखंड अधिकारी, कांकेर को एक लिखित ज्ञापन सौंपा. इस ज्ञापन में मांग की गई कि ग्राम सभाओं द्वारा पारित बताए जा रहे प्रस्तावों और उनके आधार पर लगाए गए पोस्टरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए.
इसमें कहा गया कि ये प्रस्ताव मनमाने, भेदभावपूर्ण और लोकतांत्रिक मूल्यों के ख़िलाफ़ हैं तथा पेसा क़ानून के तहत ग्राम सभाओं को दिए गए अधिकारों का दुरुपयोग है.
याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि इन होर्डिंग्स को लगाने के पीछे सरकारी तंत्र की भूमिका हो सकती है. इसके समर्थन में याचिकाकर्ता ने 14 अगस्त 2025 को पंचायत निदेशक द्वारा जारी एक सर्कुलर का हवाला दिया, जिसमें उन ज़िलों की ज़िला पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों को ग्राम सभाओं में ‘जल, जंगल, ज़मीन’ और संस्कृति की रक्षा से जुड़ी शपथ दिलाने के निर्देश दिए गए थे जहां पेसा लागू था.
याचिका के अनुसार, इस सर्कुलर से पहले ही सत्तारूढ़ दल से जुड़े कुछ लोगों ने आदिवासी ग्रामीणों को इस तरह के पोस्टर लगाने के लिए उकसाया और पेसा क़ानून का इस्तेमाल ईसाई समुदाय के ख़िलाफ़ धार्मिक नफ़रत फैलाने के लिए किया गया.
ग्राम सभा के जिस आदेश का हवाला दिया, उसका अता-पता नहीं!
इसी बीच, 27 अगस्त 2025 को डिगबल टांडी ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत ज़िला पंचायत, कांकेर से यह जानकारी मांगी कि क्या किसी ग्राम सभा ने आधिकारिक रूप से ईसाई पादरियों या ईसाइयों के प्रवेश पर रोक लगाने का प्रस्ताव पारित किया है.
13 अक्टूबर 2025 को मिले जवाब में कहा गया कि इस तरह का कोई प्रस्ताव ज़िला पंचायत के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है. याचिका में कहा गया कि इसके बावजूद गांवों में पोस्टर लगे हुए हैं और उन्हीं के आधार पर प्रतिबंध लागू किए जा रहे हैं.
याचिकाकर्ता ने ग्राम पंचायत की ग्राम सभा के इन प्रस्तावों की प्रति हासिल करने की भी कोशिश की. जब उन्हें इन प्रस्तावों की प्रतियां देने से इनकार कर दिया.
हाईकोर्ट का आदेश और धर्मांतरण पर टिप्पणियां
इस मामले की सुनवाई के बाद छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 28 अक्टूबर, 2025 को पोस्टरों को हटाने या उन्हें असंवैधानिक घोषित करने का कोई आदेश नहीं दिया. अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि प्रलोभन या धोखाधड़ी के ज़रिये जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए लगाए गए होर्डिंग्स को असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता और ये संबंधित ग्राम सभाओं द्वारा आदिवासी समुदायों तथा स्थानीय सांस्कृतिक विरासत के हितों की रक्षा के लिए एक एहतियाती उपाय के रूप में लगाए गए प्रतीत होते हैं.
अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास छत्तीसगढ़ पेसा नियम, 2022 के तहत वैकल्पिक वैधानिक उपाय मौजूद हैं.
कोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता नियम 14(1) के तहत ग्राम सभा के पास जा सकते हैं और यदि वे फिर भी संतुष्ट नहीं होते, तब नियम 14(2) के तहत उपखंड अधिकारी (राजस्व) के समक्ष अपील कर सकते हैं. साथ ही अदालत ने कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं को गांव में प्रवेश से रोके जाने या किसी तरह के खतरे की आशंका है, तब वे पुलिस से सुरक्षा मांग सकते हैं.
सुनवाई के दौरान और आदेश में हाईकोर्ट ने धर्मांतरण को लेकर विस्तृत टिप्पणियां कीं. अदालत ने कहा कि भारत में धार्मिक धर्मांतरण लंबे समय से एक संवेदनशील सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा रहा है, विशेषकर गरीब, अशिक्षित आदिवासी और ग्रामीण आबादी के बीच.
कोर्ट के अनुसार, जब धर्मांतरण व्यक्तिगत आस्था का विषय न रहकर प्रलोभन, दबाव या शोषण का रूप ले लेता है, तब यह सामाजिक सौहार्द और आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान के लिए ख़तरा बन जाता है. अदालत ने कहा कि ऐसे हालात गांवों में तनाव, सामाजिक बहिष्कार और कभी-कभी हिंसक टकराव तक को जन्म दे सकते हैं.
‘पोस्टर्स मौलिक अधिकारों के विरुद्ध’
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की वकील और पीयूसीएल, छत्तीसगढ़ की सदस्य शालिनी गेरा का कहना है कि गांवों में लगाए गए पोस्टर सीधे तौर पर मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हैं.
उन्होंने द वायर हिंदी से कहा, ‘वे पोस्टर्स मौलिक अधिकारों के विरुद्ध हैं. पेसा क़ानून ग्राम सभा को ऐसा कोई प्रस्ताव पारित करने की अनुमति नहीं देता है, जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो.’
उन्होंने कहा कि इन पोस्टरों को जिस तरह से ज़मीन पर लागू किया जा रहा है, उसका असर सिर्फ़ काग़ज़ी नहीं है. ईसाई समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा लगातार बढ़ रही है.
गेरा ने इसे पहले से देखे गए पैटर्न से जोड़ते हुए कहा, हम पहले भी ईसाइयों के ख़िलाफ़ हिंसा देख चुके हैं. यह उसी प्रवृत्ति का हिस्सा है. इसलिए यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि हाईकोर्ट ने उस सामाजिक संदर्भ को नज़रअंदाज़ कर दिया, जिसमें यह सब हो रहा है.
हाईकोर्ट द्वारा पोस्टरों को ‘एहतियाती कदम’ बताए जाने पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा, ‘हाईकोर्ट ने कहा है कि यह सिर्फ़ एक एहतियाती क़दम है. लेकिन मुझे समझ नहीं आता, किस बात को पहले से रोकने के लिए? आख़िर वे किस चीज़ को रोकना चाहते हैं?’ इस वक़्त हालात यह हैं कि जो लोग चर्च जाते हैं, उन्हें सचमुच उनके घरों से बाहर निकाल दिया जा रहा है.’
उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि संस्कृति और परंपरा की रक्षा के नाम पर मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट में चुनौती और मौजूदा स्थिति
हाईकोर्ट के इस आदेश को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. हालांकि, शीर्ष अदालत ने भी इस विशेष अनुमति याचिका को ख़ारिज कर दिया.
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को पेसा नियमों के तहत वैधानिक प्राधिकरण के पास जाने की स्वतंत्रता दी है.
लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि हाईकोर्ट के समक्ष दायर याचिका का दायरा सीमित था. लेकिन सुप्रीम कोर्ट में याचिका के दौरान कई नए तथ्य और पहलू जोड़े गए हैं, और ऐसे में दोबारा हाईकोर्ट का रुख किया जा सकता है.
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने आदिवासी इलाकों में मिशनरी गतिविधियों को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणियों पर कहा कि कोर्ट ने बिना किसी ठोस सामग्री के ये टिप्पणियां की हैं. उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि याचिकाकर्ताओं को ग्राम सभा या किसी अन्य प्राधिकरण के पास जाने के लिए क्यों कहा जा रहा है.
गोंजाल्विस ने अदालत का ध्यान अन्य लंबित मामलों की ओर भी केंद्रित किया, जिनमें प्रार्थना सभाओं के दौरान पादरियों पर हुए लगभग 700 कथित हमलों और ईसाई धर्म अपनाने वाले आदिवासियों के अंतिम संस्कार को लेकर विवादों से जुड़े मामले शामिल हैं. उन्होंने यह दावा भी किया कि पिछले 10 वर्षों में छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण के किसी भी मामले में एक भी दोषसिद्धि नहीं हुई है.
इस दौरान जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा, ‘आपको नियमों के तहत उचित प्राधिकरण के पास जाना चाहिए था, वहां इस मामले की जांच हलफ़नामों, सामग्री और साक्ष्यों के आधार पर की जाती.’
हालांकि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों के आदेशों के बाद भी यह मामला एक बुनियादी सवाल छोड़ रहा है कि क्या पेसा क़ानून और पांचवीं अनुसूची के तहत ‘संस्कृति की रक्षा’ के नाम पर किसी नागरिक या समुदाय के धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों को सीमित किया जा सकता है.
याचिका में लगाए गए आरोपों के अनुसार, ज़मीन पर इन पोस्टर्स का असर अब भी ईसाई समुदाय के रोज़मर्रा के जीवन, धार्मिक गतिविधियों और सामाजिक सुरक्षा पर पड़ रहा है.
सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ताओं को पेसा के तहत अपील करने की सलाह पर शालिनी गेरा ने ज़मीनी हक़ीक़त की ओर इशारा करते हुए कहा कि गांवों में अल्पसंख्यक ईसाइयों पर पहले से ही दबाव होता है, ऐसे में उनसे ग्राम सभा के सामने अपील करने की उम्मीद करना अव्यावहारिक है.
उन्होंने कहा, ‘पूरे गांव में एक-दो ही घर ऐसे होते हैं जो चर्च जाते हैं, जबकि बाकी पूरे गांव में बहुसंख्यकवाद हावी रहता है. हमने देखा है कि गांव वाले उन्हें ग्राम सभा में आने भी नहीं देते.’
वह कहती हैं, ‘ऐसे में वे वहां जाएं और अपील करें, इसका मतलब यही है कि अदालत ज़मीनी हालात को देखे बिना ही इस तरह के आदेश पारित कर रही है.’
