नई दिल्ली: ईरान संघर्ष के बीच कंटेनर जहाजों की कमी के कारण कच्चे माल की कीमतों में करीब 30% की बढ़ोतरी हुई है, जिसके चलते भारत में दवाओं के दाम तेज़ी से बढ़ने की आशंका है. यह जानकारी द इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में दी गई है.
उद्योग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, जहाजों की कमी के कारण चीन से आने वाले एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (एपीआई) की आपूर्ति प्रभावित हुई है. चीन भारतीय दवा निर्माताओं के लिए कच्चे माल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है. इस बाधा का असर स्थानीय उत्पादन पर पड़ सकता है और कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ उपभोक्ताओं पर डालने के लिए मजबूर हो सकती हैं.
इकोनॉमिक टाइम्स के हवाले से उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक कुछ प्रमुख कच्चे माल की कीमतों में 60% से अधिक तक वृद्धि हुई है. दिसंबर के बाद से ग्लिसरीन की कीमत 64% बढ़ गई है, जबकि पैरासिटामोल की कीमत में 26% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.
उद्योग के एक अधिकारी ने बताया कि कच्चे माल की कीमतों में तेज़ उछाल के कारण आयात करने वाले यह अतिरिक्त बोझ सीधे बड़ी दवा कंपनियों पर डाल रहे हैं.
अख़बार के अनुसार, अधिकारी ने कहा, ‘एपीआई की कीमतें बढ़ने सॉल्वेंट्स की कीमतों में 20% से 30% तक उछाल और शिपिंग कंपनियों द्वारा अतिरिक्त शुल्क वसूले जाने के कारण आयातकों के पास इस लागत को खुद वहन करने की कोई गुंजाइश नहीं है.’
दिसंबर से मार्च के बीच कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी के बाजार आंकड़ों के अनुसार, नीमोसुलाइड की कीमत 53% बढ़कर 425 रुपये से 650 रुपये हो गई है. नॉरफ्लॉक्सासिन की कीमत 14% बढ़कर 2,375 रुपये से 2,700 रुपये हो गई, जबकि ऑर्निडाजोल की कीमत 25% बढ़कर 960 रुपये से 1,200 रुपये तक पहुंच गई. वहीं क्लोबेराजोल प्रोपियोनेट की कीमत 47% बढ़कर 39,500 रुपये से 58,000 रुपये हो गई है.
फार्मा उद्योग विशेषज्ञ मेहुल शाह ने अख़बार को बताया, ‘पेट्रोकेमिकल्स से बनने वाले फार्मास्युटिकल सॉल्वेंट्स की कीमतें मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के कारण एक ही सप्ताह में 20% से 30% तक बढ़ गई हैं. सॉल्वेंट्स उत्पादन की सीधी लागत हैं, इसलिए इससे दवा निर्माण की लागत तुरंत बढ़ जाती है. आयातकों और आपूर्तिकर्ताओं ने यह बढ़ी हुई लागत दवा कंपनियों पर डालना शुरू कर दिया है.’
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो स्थिति और खराब हो सकती है. उद्योग ने केंद्र सरकार से इन बढ़ी हुई लागतों की भरपाई के लिए दवाओं की कीमतें बढ़ाने की अनुमति देने की मांग की है.
फेडरेशन ऑफ फार्मा आंत्रोंप्रेन्योर्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष हरीश जैन ने कहा, ‘फार्मा उद्योग में कीमतों पर कड़ा नियंत्रण है, इसलिए इनपुट लागत में अभूतपूर्व वृद्धि को समायोजित करना मुश्किल हो रहा है. राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) को इस असाधारण स्थिति का संज्ञान लेना चाहिए और डीपीसीओ 2013 के पैरा 19 के तहत निर्धारित सीमा से अधिक कीमत बढ़ाने की अनुमति देनी चाहिए.’
फार्मास्युटिकल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (फार्मेक्सिल) के पूर्व अध्यक्ष दिनेश दुआ ने कहा कि ईरान युद्ध के कारण शिपिंग मार्ग प्रभावित हो रहे हैं और माल ढुलाई की लागत बढ़ रही है, जिससे जल्द ही आवश्यक दवाओं की उपलब्धता पर भी असर पड़ सकता है.
उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि दवा कंपनियां आमतौर पर उत्पादन दक्षता बनाए रखने के लिए ‘जस्ट-इन-टाइम’ इन्वेंट्री प्रणाली अपनाती हैं, जिसमें स्टॉक न्यूनतम स्तर पर रखा जाता है. यदि संघर्ष अगले 10 से 15 दिनों तक जारी रहता है, तो यह सीमित भंडार पूरी तरह समाप्त हो सकता है.
यह लॉजिस्टिक्स संकट अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं के लिए भी खतरा बन रहा है. संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और ओमान जैसे देश सस्ती दवाओं के लिए काफी हद तक भारत पर निर्भर हैं. माल ढुलाई शुल्क के दोगुना होने और प्रति शिपमेंट 4,000 से 8,000 डॉलर तक के अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने से भारतीय दवा निर्माताओं पर अभूतपूर्व वित्तीय दबाव पड़ रहा है.
