क्या तरुण की हत्या का दोष समस्त मुसलमानों पर मढ़ना चाहिए?

तरुण की हत्या के बाद दिल्ली में और दिल्ली के बाहर मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा की घटनाएं बढ़ गई हैं. सरकार और पुलिस ने कहीं चेतावनी नहीं दी है कि ऐसी हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी. झूठी खबर और दुष्प्रचार के लिए भी किसी पर कार्रवाई नहीं की गई है. मीडिया और सरकार चाहती है कि हिंदुओं के भीतर मुसलमानों के खिलाफ घृणा बढ़े, गहरी हो. उनकी साझेदारी की जगहें कम होती जाएं, ख़त्म हो जाएं. लेकिन हम, विशेषकर वे हिंदू, जो ख़ुद को सजग कहते हैं, क्या चाहते हैं?

/
(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

हम नरेंद्रपुर से पटना के रास्ते में थे. नरेंद्रपुर पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की जन्मभूमि जीरादेई के क़रीब एक गांव है. वहां ‘परिवर्तन’ नामक संस्था के परिसर में गांधी पर एक चिंतन-कार्यशाला में भाग लेकर लौट रहा था. हमारी कार सीवान की सड़क पर थी. सीवान की उस सड़क को पहचानने की कोशिश कर रहा था जिसपर बचपन से किशोर तक रोज़ाना कितने घंटे गुज़ारे होंगे. तंग सड़क पर लोगों की आवाजाही के बीच गाड़ी सरक रही थी. सड़क के दोनों तरफ़ हिजाब और बुर्का पहने औरतों पर ध्यान न जाना मुमकिन न था. ‘सीवान में मुसलमान बहुत हैं’, ड्राइवर ने खिड़की से बाहर देखते हुए कहा. कार के वातावरण में कुछ तनाव-सा आ गया, हालांकि ड्राइवर ने सिर्फ़ दृश्य का बयान किया था, कोई राय नहीं दी थी. ‘हां! यहां मुसलमानों की तादाद अच्छी ख़ासी है’, मैंने ड्राइवर को बताया. ‘मैं यहीं रहता था. हमने यहां शेख़ मोहल्ले में बचपन गुजारा है.’ मैंने उसे अतिरिक्त सूचना दी. आगे बिना पूछे जोड़ा, ‘सब मिल जुलकर रहते थे.’  ‘मिलकर रहना अच्छी बात है’, ड्राइवर ने सहमति में कहा. मैंने अपनी पीठ कुछ ढीली की.

बात लेकिन ख़त्म नहीं हुई थी. ‘मुसलमान लोग ही कभी कभी गड़बड़ कर देता है.’ मिलजुल कर रहना अच्छी बात है लेकिन भारत में वह क्यों नहीं हो पाता या हो नहीं सकता, शायद ड्राइवर मुझे यह बताना चाहता था. मैं फिर अपनी सीट पर सीधा हो गया. ड्राइवर ने अपनी बात के पक्ष में उदाहरण दिया, ‘अब देखिए, दिल्ली में क्या हुआ. एक बच्ची ने रंग का ग़ुब्बारा फेंका. एक मुसलमान औरत को लग गया. फिर उसके घर-परिवारवाले तलवार, लाठी लेकर आए और उसके परिवार के एक मर्द को इतना मारा कि वह मर गया. इतनी छोटी बात पर किसी की जान ले लेना तो अच्छी बात नहीं है.’

ड्राइवर के स्वर में क्रोध न था. लेकिन इस उदाहरण के ज़रिए वह मुझे जिस निष्कर्ष तक ले जाना चाहता था, वह साफ़ था. भला हो एक्स( ट्विटर) का कि दिल्ली के इस हादसे के बारे में मुझे ड्राइवर से कुछ अधिक जानकारी थी. दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में होली के दिन ही एक हिंदू के मारे जाने की खबर सही थी. तरुण खटिक नामक इस युवक की मौत के बारे में जो जानकारी मुझे ड्राइवर दे रहा था, उतनी ही जानकारी घटना के एक दिन बाद तक हम सबको थी. इस खबर से सबको सदमा पहुंचा था कि एक रंग का गुब्बारा लग जाने पर किसी की हत्या कैसे की जा सकती है.

यह कोई नहीं पूछता कि रंग भरा गुब्बारा किसी को फेंक मारने से उसे चोट लग सकती है. रंग का गुब्बारा फेंककर किसी को मारने के पीछे निश्चय ही उसे आनंद देने का कोई इरादा नहीं होता. उसे जो चोट पहुंचती है, उससे मारने वाले को मज़ा आ जाता है. जिसे गुब्बारा मारा जाता है, उसे जो झटका लगता है, उससे मिलने वाला मज़ा एक अलग ही कोटि का मज़ा है. रंग से भिगाना जितना मक़सद नहीं है, उतना चोट पहुंचाना. पिछले कुछ सालों से इसमें एक और चीज़ जुड़ गई है. वह है मुसलमानों को चुनकर उन पर निशाना लगाना. तरुण खटिक की हत्या की घटना के बाद एक वीडियो देखा जिसमें एक हिंदू बच्चा एक मुसलमान औरत को निशाना साधकर रंग का गुब्बारा मारे जा रहा है. एक के बाद एक! गुब्बारे का आवेग इतना है कि उससे औरत को चोट तो लगी ही होगी, वह लड़खड़ा जाती है, उसके हाथ का बैग गिर जाता है. औरत के बग़ल में और लोग भी चल रहे हैं. लेकिन वह बच्चा मुसलमान औरत पर ही निशाना साध रहा है. यह उसने कहां सीखा होगा कि मुसलमानों को चोट पहुंचाने में होली का असली मज़ा है? उसके मां-बाप, मित्र-परिजन ने जब यह वीडियो देखा होगा तो उसे शाबाशी दी होगी या उसे डांटा होगा? देश में इस तरह की हज़ारों घटनाएं होली के दिन और उसके आस-पास हुई होंगी. प्रायः मुसलमान या अन्य लोग खामोशी से चोट बर्दाश्त ही कर गए हैं, उनकी किसी शिकायत की सूचना नहीं मिली है.

होली के पहले हमने पुलिस को ऐसी हिदायत जारी करते नहीं देखा है कि होली का फ़ायदा उठाकर किसी के साथ ज़बरदस्ती नहीं की जानी चाहिए. बल्कि एक पुलिस अधिकारी को शैतानी भरी मुस्कान के साथ यह चेतावनी देते सुना कि जो होली नहीं खेलना चाहते, वे उस दिन घर से बाहर न निकलें. इसका मतलब यह है कि होली में हिंसा की खुली छूट है. होली में अश्लीलता और हिंसा होगी ही, शिकायत की कोई जगह नहीं.

यही वजह है कि होली की आड़ में अक्सर अपनी पुरानी अदावतों का निबटारा किया जाता है. उदाहरण के लिए इस साल अकेले ओडिशा में होली के दिन 5 लोगों की हत्या की खबर आई. दूसरी क़िस्म की हिंसा की घटनाओं की संख्या दर्जनों में है, जिनमें मौत नहीं हुई. पिछले साल भी 6 लोगों की हत्या की खबर अकेले इस राज्य से थी. इनमें हत्या करने वाले हिंदू ही थे. दूसरे राज्यों से भी हत्याओं और हिंसा की खबरें मिलीं.

होली के दिन भांग और शराब या नशे की खुली छूट होती है. नशे के बहाने हिंसा की जा सकती है, की जाती है. होली का इंतज़ार किया जाता है कि उसकी हुड़दंग की आड़ में अपने शत्रु के साथ हिसाब-किताब बराबर किया जाए. इरादतन हत्या को नशे में की गई हत्या बतलाए जाने से उसकी और उससे मिलनेवाली सज़ा की गंभीरता भी कम हो जाती है. इन सबमें दोनों पक्ष हिंदू ही होते हैं. लेकिन हमें कभी किसी संगठन को या समाज के लोगों को इन हत्याओं पर सड़क पर आते नहीं देखा. आपस का मामला जो ठहरा!

लड़कियों और औरतों को होली की हिंसा की याद ज़िंदगी भर बनी रहती है. होली की छूट का फ़ायदा उठाकर लड़कियों और औरतों के साथ यौन हिंसा की घटनाएं आम हैं और समाज उनका बुरा नहीं मानता. उन औरतों में ज़्यादातर हिंदू ही होती हैं. हिंसा करने वाले हिंदू ही होते हैं.

तरुण खटिक की हत्या की खबर अभी राष्ट्रीय ख़बर है. यह ख़ासकर बतलाया जा रहा है कि तरुण खटिक दलित था. ठीक इसी समय एक दूसरे दलित की हत्या होली के दिन, होली के कारण ही कर दी गई. लेकिन यह खबर दबा दी गई. लखनऊ के करीबी गांव बेगरिया में 22 साल के दलित युवक सूरज गौतम की हत्या उसके गांव के ब्राह्मणों ने सिर्फ़ इसलिए कर दी कि उसने उन्हें होली की बधाई देने की हिमाक़त की थी. खबर है कि ब्राह्मण परिवार की एक औरत ने ही क्रोध में उसे चाकू मार दिया. लेकिन सूरज गौतम की हत्या की खबर हमारे ड्राइवर को नहीं थी. क्योंकि उस खबर को फैलाने में किसी की दिलचस्पी नहीं थी. यह तर्क भी हो सकता है कि यह हिंदुओं का आपसी मामला है. एक हिंदू ने दूसरे की हत्या की है. कोई सूरज गौतम के लिए न्याय की मांग नहीं कर रहा है. टेलीविज़न और शेष मीडिया को सूरज गौतम की हत्या में कोई दिलचस्पी नहीं है. जबकि यह दिल्ली की हत्या के मुकाबले और भी भयानक है. सूरज ने ब्राह्मण परिवार पर रंग भी नहीं डाला था. उन्हें सिर्फ़ हैप्पी होली कहा था. और उसे मार डाला गया.

तरुण खटिक की हत्या के अपराधियों को सजा देने की मांग सोशल मीडिया के हर मंच पर हो रही है. दिल्ली की मुख्यमंत्री ने मृतक के परिवार से मिलकर उन्हें सांत्वना दी और इस हत्या की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि इसके लिए ज़िम्मेवार लोगों पर फौरन और कड़ी कार्रवाई की जाएगी. ऐसा उन्होंने दिल्ली में हुई दूसरी हत्याओं के मामले में नहीं किया है. हत्या के फ़ौरन बाद, जैसा पिछले 10 सालों में भारत में रिवाज बन गया है, तरुण की हत्या के आरोपियों का मकान ज़मीदोज़ कर दिया गया. उसमें आग लगा दी गई और घर का सामान लूट लिया गया. जब बजरंग दल के नेतृत्व में हिंदू आगजनी और लूटपाट कर रहे थे, पुलिस खामोशी से देख रही थी. यह रिवाज है कि हिंदुओं की हिंसा को उनकी भावनाओं की अभिव्यक्ति मानकर जायज़ ठहराया जाता है.

उत्तम नगर में गस्ती लगाते दंगा निरोधी बल के सिपाही. (फोटो: द वायर हिंदी)

धीरे धीरे मालूम हुआ कि तरुण खटिक के परिवार और आरोपी मुसलमान के परिवार के बीच पुराना झगड़ा है. आरोपी परिवार का कहना है कि रंग का गुब्बारा किसी बच्ची ने नहीं, बल्कि 20 साल के लड़के ने फेंका था. वहीं, तरुण के परिवार का कहना है कि गुब्बार एक बच्ची ने फेंका था. आरोपी के परिवार का कहना है कि पहले कहासुनी और गाली-गलौज हुई, लेकिन बात संभल गई. इसके बाद तरुण जिम से और लोगों को लेकर आया और मारपीट हुई. उस मारपीट में उसके सिर पर संयोगवश ऐसी जगह चोट लगी कि उसकी मौत हो गई.

मारपीट में मुसलमान पक्ष के लोग भी ज़ख़्मी हुए हैं.

ये सारे तथ्य बिहार में रह रहे हमारे ड्राइवर को नहीं मालूम. उसकी तरह के लाखों हिंदुओं को भी यह नहीं मालूम. जब मैंने ड्राइवर को इन तथ्यों की जानकारी दी तो उसने कहा कि उसे तो मोबाइल और टीवी के ज़रिए उतना भर ही मालूम था. वह इससे सहमत था कि सारे तथ्यों की रौशनी में किसी एक पक्ष को ही पूरी तरह जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता.

बजरंग दल और भारतीय जनता पार्टी दुष्प्रचार करें, यह उनकी मुसलमान विरोधी राजनीति के लिए ज़रूरी है. लेकिन मीडिया को सच में क्यों दिलचस्पी नहीं है? वह क्यों मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा पैदा करने के मक़सद से तथ्यों का उत्पादन कर रहा है? इस भयंकर दुष्प्रचार का सामना मुसलमान कैसे कर पाएंगे?

इस दुर्घटना के बाद उस इलाक़े के हिंदुओं से बात करने पर आभास होता है कि उनमें मुसलमानों के ख़िलाफ़ द्वेष या घृणा नहीं है. लेकिन मुसलमान परिवार के मकान में आगजनी और लूटपाट क्या उनकी निष्क्रियता या भागीदारी के बिना संभव थी?

तरुण की हत्या के बाद दिल्ली में और दिल्ली के बाहर मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंसा की घटनाएं बढ़ गई हैं. सरकार और पुलिस ने कहीं चेतावनी नहीं दी है कि ऐसी हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी. झूठी खबर और दुष्प्रचार के लिए भी किसी पर कार्रवाई नहीं की गई है. मीडिया और सरकार चाहती है कि हिंदुओं के भीतर मुसलमानों के खिलाफ घृणा बढ़े, गहरी हो. उनकी साझेदारी की जगहें कम होती जाएं, ख़त्म हो जाएं. लेकिन हम, विशेषकर वे हिंदू, जो ख़ुद को सजग कहते हैं, क्या चाहते हैं?

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैं.)