नई दिल्ली: अमेरिकी वित्त विभाग ने सोमवार (18 मई) को घोषणा की कि उसने ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों के कथित ‘संभावित उल्लंघनों’ के मामले में अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड (एईएल) के साथ 27.5 करोड़ अमेरिकी डॉलर के समझौते पर सहमति बनाई है. यह मामला नवंबर 2023 से जून 2025 के बीच दुबई स्थित एक आपूर्तिकर्ता के जरिए मंगाई गई एलपीजी के आयात से जुड़ा है.
एक अन्य घटनाक्रम में, अमेरिकी अभियोजकों ने गौतम अडानी के खिलाफ चल रहे आपराधिक धोखाधड़ी और साजिश के मामले को खारिज करने की मांग की है. यह कदम मीडिया में आई उन ख़बरों के कुछ दिनों बाद उठाया गया है, जिनमें कहा गया था कि ट्रंप प्रशासन ऐसा करने की तैयारी कर रहा था.
विज्ञप्ति के अनुसार, दुबई स्थित आपूर्तिकर्ता, जिसकी पहचान सार्वजनिक नहीं की गई है, ने एईएल को कथित तौर पर ओमान और इराक से गैस की आपूर्ति करने का दावा किया था. हालांकि, अमेरिकी वित्त विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (ओएफएसी) द्वारा जारी समझौता आदेश से संबंधित प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, एईएल इन लेनदेन में मौजूद ‘चेतावनी संकेतों’ (रेड फ्लैग्स) को पहचानने में विफल रही.
विज्ञप्ति के अनुसार, इसके चलते एईएल ने अमेरिकी वित्तीय संस्थानों के माध्यम से लगभग 19.2 करोड़ अमेरिकी डॉलर मूल्य के 32 भुगतान किए, जो अमेरिकी डॉलर में किए गए थे. नवंबर 2023 से जून 2025 के बीच इन कार्गो खेपों को गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह के माध्यम से भारत में आयात किया गया था.
विज्ञप्ति में कहा गया है कि ये भुगतान ईरानी मूल की उन खेपों से जुड़े थे, जो अमेरिका के ईरान लेनदेन और प्रतिबंध नियमों (आईटीएसआर) के प्रावधानों का उल्लंघन करते थे. इन नियमों के तहत ईरान के ऊर्जा व्यापार पर सीमाएं लागू हैं.
विज्ञप्ति में कहा गया, ‘नवंबर 2023 से जून 2025 के बीच एईएल ने दुबई स्थित एक कारोबारी से तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की खेप खरीदी, जिसने दावा किया था कि वह ओमान और इराक की गैस की आपूर्ति कर रहा है. हालांकि, कई ऐसे चेतावनी संकेत (रेड फ्लैग्स) मौजूद थे, जिनसे एईएल को यह समझ जाना चाहिए था कि वास्तव में यह एलपीजी ईरान से आ रही थी.’

ओएफएसी ने कहा कि एईएल ने प्रतिबंधों के इन कथित उल्लंघनों की जानकारी स्वेच्छा से नहीं दी थी और वह रियायत पाने की पात्र नहीं थी. एजेंसी ने इस मामले को ‘गंभीर’ (egregious) श्रेणी का बताया. ओएफएसी के अनुसार, कंपनी सबसे ऊंची दंड श्रेणी में आती थी, जिसके तहत मूल नागरिक जुर्माना 38.42 करोड़ अमेरिकी डॉलर बनता. हालांकि, अंतिम समझौता राशि 27.5 करोड़ अमेरिकी डॉलर तय की गई.
विज्ञप्ति के मुताबिक, अंतिम राशि कम होने का एक कारण यह था कि एईएल ने ओएफएसी के साथ ‘महत्वपूर्ण सहयोग’ किया. इसमें तेज़ी से और पर्याप्त खर्च के साथ विस्तृत स्वतंत्र आंतरिक जांच कराना, ओएफएसी की सूचना संबंधी मांगों का तुरंत जवाब देना और कथित उल्लंघनों से जुड़े बड़ी मात्रा में डेटा उपलब्ध कराना शामिल था.
ओएफएसी ने कुछ अन्य बातों को भी राहत देने वाले कारकों के रूप में गिनाया. एजेंसी ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में एईएल के खिलाफ ओएफएसी की ओर से कोई दंड या उल्लंघन नोटिस जारी नहीं किया गया था. इसके अलावा, वर्ष 2025 में कंपनी के कुल समेकित राजस्व में एलपीजी कारोबार की हिस्सेदारी 1.5 प्रतिशत से भी कम थी.
विज्ञप्ति में यह भी कहा गया कि जून 2025 में सामने आई उन सार्वजनिक रिपोर्ट्स के बाद, जिनमें एईएल पर ईरानी मूल की एलपीजी के आयात में शामिल होने के आरोप लगाए गए थे, कंपनी ने एलपीजी आयात पर रोक लगा दी, अमेरिकी कानूनी सलाहकारों की सेवाएं लीं और प्रतिबंध अनुपालन से जुड़ी प्रक्रियाओं को और मजबूत किया.

‘रेड फ्लैग्स’
ओएफएसी के अनुसार, चूंकि ये लेनदेन अमेरिका की प्रतिबंध नीति को कमजोर करते थे, इसलिए इनसे पैदा हुआ राजस्व तेहरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्र के अन्य समूहों को समर्थन देने में योगदान देता था.
नोट में कहा गया है, ‘एईएल ने ईरान के ऊर्जा क्षेत्र से राजस्व हासिल करने की क्षमता को बढ़ावा देकर प्रतिबंध कार्यक्रम के उद्देश्यों को गंभीर नुकसान पहुंचाया. इन पैसों का इस्तेमाल ईरानी शासन अपने अवैध परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने, आतंकवादी और उससे जुड़े समूहों को वित्तीय सहायता देने तथा अपने ही लोगों पर दमन करने के लिए करता है.’
अमेरिकी एजेंसी की विज्ञप्ति में कहा गया है कि इन खेपों से जुड़े जहाज प्रतिबंधों से बचने के लिए अपनाई जाने वाली गतिविधियों में शामिल थे. इनमें ट्रैकिंग संकेतों में हेरफेर, समुद्र में लंबे समय तक जहाजों का बिना लोकेशन जानकारी के रहना (डार्क पीरियड), और जहाजों के स्वामित्व तथा ध्वज पंजीकरण में बार-बार बदलाव शामिल थे.
विज्ञप्ति में कहा गया कि अदानी समूह ने इन कार्गो खेपों की वास्तविक उत्पत्ति को लेकर मौजूद कई ‘रेड फ्लैग्स’ या चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज किया. इनमें असामान्य रूप से कम कीमतें, जहाजों की संदिग्ध गतिविधियां, शिपिंग दस्तावेजों में विसंगतियां और तीसरे पक्ष की ओर से बार-बार दी गई चेतावनियां शामिल थीं कि एलपीजी संभवतः ईरान से आई हो सकती है.
ओएफएसी ने कहा कि ईरान के ऊर्जा निर्यात को सीमित करना उस देश पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों का एक ‘मुख्य उद्देश्य’ है, जबकि एईएल की गतिविधियां सीधे तौर पर इस उद्देश्य के खिलाफ थीं और उन्होंने ईरानी सरकार को ‘महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ’ पहुंचाया.
डीओजे ने अदालत से अडानी के खिलाफ आपराधिक मामले का आरोपपत्र खारिज करने की मांग की
मीडिया रिपोर्ट्स में यह सामने आने के कुछ दिनों बाद कि ट्रंप प्रशासन गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी के खिलाफ लगाए गए आपराधिक आरोप वापस लेने पर विचार कर रहा है, अमेरिकी न्याय विभाग (डीओजे) ने इस मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश को पत्र लिखकर आरोपपत्र खारिज करने का अनुरोध किया है. विभाग ने कहा कि अब वह इस मामले को आगे बढ़ाने का इच्छुक नहीं है.
प्रिंसिपल एसोसिएट डेप्युटी अटॉर्नी जनरल आर. ट्रेंट मैककॉटर और न्यूयॉर्क के पूर्वी जिले के अमेरिकी अटॉर्नी जोसेफ नोसेला जूनियर ने सोमवार को जस्टिस निकोलस गाराउफिस को लिखे पत्र में कहा:
‘न्याय विभाग ने इस मामले की समीक्षा की है और अभियोजन संबंधी अपने विवेकाधिकार का उपयोग करते हुए यह निर्णय लिया है कि व्यक्तिगत आरोपियों के खिलाफ इन आपराधिक आरोपों पर अब और संसाधन खर्च नहीं किए जाएंगे.’
पिछले सप्ताह द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि न्याय विभाग अडानी समूह के मालिक गौतम अडानी के खिलाफ धोखाधड़ी और रिश्वतखोरी से जुड़े आरोप हटाने की तैयारी कर रहा है.
वहीं, ब्लूमबर्ग ने सूत्रों के हवाले से बताया था कि अमेरिकी अधिकारी औपचारिक रूप से इन आपराधिक आरोपों को खारिज करने की घोषणा कर सकते हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (एसईसी) नवंबर 2024 में गौतम अडानी और उनके कई सहयोगियों के खिलाफ दर्ज समानांतर नागरिक धोखाधड़ी मामले के समाधान की दिशा में आगे बढ़ रहा है.
इसके एक दिन बाद, 15 मई को गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी ने अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड से जुड़े एसईसी के आरोपों के निपटारे के लिए 1.8 करोड़ अमेरिकी डॉलर के प्रस्तावित जुर्माने पर सहमति जताई. इन आरोपों में कहा गया था कि भारतीय अधिकारियों को रिश्वत देने या रिश्वत का वादा करने का मामला शामिल है. हालांकि, दोनों ने आरोपों को न तो स्वीकार किया है और न ही खारिज किया है.
गौतम अडानी, सागर अडानी, विनीत जैन, भारतीय अक्षय ऊर्जा कंपनी एज्योर पावर के दो पूर्व अधिकारी और कनाडाई पेंशन फंड के तीन पूर्व अधिकारियों पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने वर्ष 2020 से 2024 के बीच भारत के सरकारी अधिकारियों को 25 करोड़ डॉलर से अधिक की रिश्वत देने की साजिश रची थी, ताकि सौर ऊर्जा परियोजनाओं के ठेके हासिल किए जा सकें. इन परियोजनाओं से 2 अरब डॉलर से अधिक का मुनाफा होने की उम्मीद थी.
गौतम अडानी, सागर अडानी और विनीत जैन पर वायर फ्रॉड (इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से धोखाधड़ी) और प्रतिभूति धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए थे. वहीं अन्य आरोपियों, जिनमें एज्योर पावर के पूर्व अधिकारी भी शामिल हैं, पर विदेशी भ्रष्ट आचरण अधिनियम का उल्लंघन करने की साजिश रचने का मामला दर्ज किया गया था.
सोमवार को न्याय विभाग द्वारा भेजे गए पत्र की प्रतिलिपि जिन लोगों को भेजी गई, उनमें अडानी के वकील रॉबर्ट जिउफ्रा जूनियर भी शामिल थे. वे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भी प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और ट्रंप की आपराधिक सजा को ‘हश मनी’ मामले में पलटने की कोशिश में उनकी ओर से पैरवी कर रहे हैं.
द न्यूयॉर्क टाइम्स ने सूत्रों के हवाले से यह भी रिपोर्ट किया था कि न्याय विभाग द्वारा आरोप हटाने का फैसला उस बैठक के बाद सामने आया, जो पिछले महीने वाशिंगटन डीसी में जिउफ्रा और अभियोजकों के बीच हुई थी. रिपोर्ट के मुताबिक, जिउफ्रा ने उस दौरान एक ‘असामान्य प्रस्ताव’ रखा था कि अडानी अमेरिका में 10 अरब डॉलर का निवेश करने और 15,000 नौकरियां पैदा करने के लिए तैयार हैं.
अडानी ने ट्रंप के 2024 में दोबारा चुने जाने के तुरंत बाद भी इसी तरह का वादा किया था.
