हिंदुत्व का प्रभुत्व: किसके पास बची है अपना आराध्य चुनने की आज़ादी?

मीडिया यह मानकर चलता है कि हिंदू धर्म से अलग विश्वास जताने वाला व्यक्ति अवश्य किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा होगा और निस्संदेह स्वयं निर्णय लेने में सक्षम नहीं होगा. वह व्यक्ति वोट दे सकता है, विवाह कर सकता है, संतान उत्पन्न कर सकता है; क़ानून उसे इन सबके लिए वयस्क मानता है. लेकिन वह स्वयं अपना ईश्वर या ख़ुदा नहीं चुन सकता.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

हाल की कई ख़बरों को पढ़ते हुए कवि तुलसीदास की यह पंक्तियां याद हो आईं- ‘जाके प्रिय न राम-बदैही. तजिये ताहि कोटि बैरी सम, जद्यपि परम सनेही॥’ विनय पत्रिका नाम की अपनी रचना में गोस्वामी जी हिंदुओं को मशविरा देते हैं कि उन्हें ऐसे प्रियजनों को बैरियों के समान त्याग देना चाहिए जिनकी राम-बैदेही में आस्था न हो.

बात दीगर है कि आधुनिक ‘हिंदुत्व’ ने तुलसीदास की आधी-अधूरी सलाह मानी. वे राम को छोड़कर रहीम को चुनने वाले अपने प्रियजनों को बैरी तो मानने लगे लेकिन उन्हें त्यागना या उनके हाल पर छोड़ना भूल गए. आख़िर, यह करते तो वह ‘लव जिहाद’ या ‘बहला-फुसलाकर किए गए धर्मांतरण’ का कथा-संसार किस तरह खड़ा होता जिनके सहारे समाचार चैनलों की कई शामें चीख-चिल्लाहट से गुलज़ार हुआ करती हैं.

मनुष्य और ईश्वर के रिश्ते पर दार्शनिक बहसों में किसकी रुचि है? ‘नेति-नेती’ तो इन समाचार चैनलों को बीते दिनों की घिसीपिटी बात मालूम होती होगी. जिस हिंदू धर्म पर खतरे के रूप में यह हिंदुत्ववादी मीडिया शामली के आयुष मलिक द्वारा इस्लाम अपनाने को पेश कर रही थी, उस धर्म के भीतर मौजूद दार्शनिक व्यापकता से यह पूरी तरह बेख़बर दिखता है.

एक या अनेक ‘ईश्वर’?

हिंदू धर्म की व्याख्या करने के लिए यों तो अनेकों ग्रंथ हैं लेकिन हिंदुत्व की राजनीतिक विचारधारा के सिद्धांतकारों ने अक्सर गीता को ‘पवित्र किताब’ के रूप में देखना चाहा है. गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं,

‘ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् .
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥’

(हे पार्थ! जो भी मनुष्य मुझे जिस भी नाम, रूप, या धारणा से याद करता है या मेरी शरण में आता है, मैं उस मनुष्य को उसी रूप में स्वीकार करता हूं और उसी रूप में प्रकट होता हूं. अंततोगत्वा, संसार के सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरी ही राह पर तो चल रहे हैं.)

ईश्वर का नाम अल्लाह हो या कृष्ण सब आस्तिक उसी राह पर तो चल रहे हैं. अलग-अलग राहों के प्रति इस स्वीकार के उद्घोष में कितनी उदारता, कितनी व्यापकता है. विश्व भर में धर्म और ईश्वर के सांस्कृतिक इतिहास के प्रति इससे बड़ा सच और क्या होगा?

मानव सभ्यताओं का इतिहास, ईश्वर की खोज का इतिहास भी रहा है. आरंभ से ही मनुष्य इन प्रश्नों से जूझता आया है- ईश्वर एक है या अनेक? यदि है, तो उसका स्वरूप कैसा है? अलग-अलग संस्कृतियों ने इन प्रश्नों के भिन्न-भिन्न उत्तर दिए. कई बार एक ही संस्कृति के भीतर ईश्वर को अनेक रूपों में परिभाषित किया गया.

अपने सृष्टिकर्ता की खोज, उस विनाशकारी शक्ति की खोज जो पूरी सृष्टि को मिटा सके, नियम-क़ायदों को संचालित करने वाली अदृश्य सत्ता की तलाश, चांद-सूरज की गति को बनाए रखने वाली शक्ति के प्रति जिज्ञासा, इंसाफ़ करने वाले की कल्पना, रोते हुए की पुकार सुनने वाले – उसके आंसू पोंछने वाले की तलाश- ईश्वर को खोजने की वजहें जाने कितनी रहीं होंगी. जिस बात को मनुष्य समझ नहीं सका, जिसे विज्ञान समझा नहीं सका, उसे ईश्वर की उपस्थिति ने समझने में सहूलियत दी. बहुतों को आज भी देती है.

समय और परिस्थिति के अनुसार मनुष्य ने अपने ईश्वर की सूरतें गढ़ी थीं. कभी उसने किसी सुंदर आकृति में उसे देखने की गुस्ताख़ी की, तो कभी उससे भी परहेज़ किया. कभी ईश्वर महबूब बना, कभी माता-पिता. किसी ने कोटि-कोटि देवताओं की कल्पना की, तो किसी ने कहा कि एक विशेष देवता बाकी सब पर श्रेष्ठ है. किसी ने केवल एक सृष्टिकर्ता की सत्ता में विश्वास किया.

‘अनल-हक़’ और ‘अहं ब्रह्मास्मि’ जैसे सूत्र भी ईश्वर को परिभाषित करने के प्रयासों के रूप में सामने आए. जो जीव है, वही ईश्वर है- ‘बूंद समानी समुंद मैं, सो कत हेरी जाइ?’

इनके अतिरिक्त भी न जाने कितनी परिभाषाएं ईश्वर की रची गईं, जिन्होंने अनगिनत धर्मों को जन्म दिया. उनमें से कुछ टिके रहे, कुछ बदले, कुछ इतिहास की गति में विलीन हो गए. मनुष्य की आस्थाओं के रूप, उसकी अनास्थाओं के रूप, ईश्वर की प्रकृति, उसकी मेहरबानी और उसका क्रोध- इन सबकी कल्पनाओं ने मिलकर बेशुमार कहानियां, काव्य और मिथक रचे. इंसान इन्हें संभालता, गढ़ता, मिटाता हुआ न जाने कब से चला आ रहा है.

तो क्या ये सारी व्याख्याएं, ये तमाम कल्पनाएं, एक-दूसरे से कटी हुई अलग-थलग दुनियाओं में विकसित हो रही थीं? या फिर एक ही भूगोल, एक ही सभ्यता के भीतर इन विविध व्याख्याओं के लिए जगह मौजूद थी? अगर एक ही हिंदुस्तान में इतनी तरह की धार्मिक और दार्शनिक व्याख्याएं साथ विद्यमान थीं, तो उन्हें मानने वाले लोग कैसे तय होते थे? क्या यह बात अपने आप में धर्मांतरण के सहज स्वीकार की कहानी नहीं कहती?

ज़ाहिर है, नए धर्मों और विचारधाराओं के उभरने की संभावना तभी बनती होगी, जब व्यक्ति अपने परिवार या समुदाय के धर्म को मानने के लिए पूरी तरह बाध्य न रहा हो. आखिर कोई तो ऐसा समाजिक-सांस्कृतिक अवकाश रहा होगा, जहां लोग नई व्याख्याओं को सुनने, नई कहानियों से प्रभावित होने और नए धार्मिक आंदोलनों की ओर आकर्षित होने के लिए उपलब्ध रहे हों.

चुनने की आज़ादी

केवल लालच या तलवार की धार पर धर्मांतरण की कल्पना, भले ही हिंदुत्व के इतिहास-केंद्रित रक्तपिपासु आग्रहों को संतुष्ट किया करे, इस तर्क से इनकार नहीं किया जा सकता कि धर्म चुनने की स्वतंत्रता भारतीय संस्कृति का एक केंद्रीय तत्व रहा है. इसकी ग़ैरमौजूदगी में न तो नवीन धार्मिक व्याख्याओं की कोई जगह बनती, न शास्त्रार्थ और खंडन-मंडन की परंपरा विकसित होती, और न ही बौद्ध भिक्षुओं के व्यापक ‘धम्म चक्र प्रवर्तन’ संभव हो पाते.

क्या इस सारे शोरगुल में यह विचार करने की आवश्यकता नहीं है कि क्यों मनुष्य परंपरा से प्राप्त अपने पारिवारिक धर्म के प्रति उदासीन बन जाता है? क्या ईश्वर के प्रति अदमनीय जिज्ञासा के बिना यह संभव है? उस आध्यात्मिक प्रेम के बिना जहां व्यक्ति हर तरह के बदलाव के लिए तैयार हो?

(फोटो साभार: विकिपीडिया/फेसबुक)

ध्यान रहे कि बदलाव आज के दौर में सुविधा का विपरीतार्थक है. एक जहमत है. फिर भी कुछ तो बात है जो मनुष्य को ईश्वर की संकल्पना पर पुनर्विचार करने, नई परिभाषाएं तलाशने और तलाशते हुए किसी अनुकूल दर्शन के मिल जाने पर उसे अपना बना लेने के लिए प्रेरित करती होगी.

निश्चित ही यह हर व्यक्ति के बस की बात नहीं. ऐसे में वह व्यक्ति कितना अकेला पड़ जाता होगा जिसने इसका साहस किया. नास्तिकता या वैज्ञानिक चेतना रखते हुए भी समाज को इन जिज्ञासुओं के प्रति अधिक सहिष्णु होने की आवश्यकता है. विशेषकर तब, जब हम धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखते हों. ईश्वर की खोज का सवाल नास्तिकता और धर्मनिरपेक्षता के सवाल से अभिन्न है. इन्हें अलग नहीं किया जा सकता.

धर्मनिरपेक्षता केवल नास्तिकता के आधार पर ही परिभाषित नहीं होती, किसी के धर्म खोजने के अधिकार के साथ खड़े होना भी जरूरी है.

आज के युवा के जीवन में आजादी और सर्विलांस एक साथ मौजूद हैं. अगर वह केवल पूंजीवादी व्यवस्था का उपभोक्ता है तो फासीवाद को उससे कोई दिक्कत नहीं. लेकिन जैसे ही वह आनंद की संकल्पना के परे जाकर इस आजादी का इस्तेमाल करता है, खतरा बन जाता है. सोशल मीडिया की अंतहीन स्क्रॉलिंग, नेटफ्लिक्स की बिंज-वॉचिंग और टिंडरनुमा मुक्ति के रास्ते डेटिंग के भावनात्मक संताप से मुक्त से यह खुशनुमा मध्यवर्गीय संसार अगर अब भी किसी युवा के जीवन में इन आध्यात्मिक सवालों की जगह बची रहने दे, तो वह अपने-आप में विशिष्ट है.

यह वह युवा है जो अपने वक़्त से मिली दुनियावी सहूलियत को दरकिनार करके कुछ तलाश रहा है. उसके सामने वह आरामदेह दुनिया मौजूद है.कितनी सुरक्षित दिखती है उसकी निजता. यह मनुष्य को पहले कब उपलब्ध थी?

लेकिन बस तब तक, जब तक वह किसी बड़े संरचनात्मक तंत्र को नहीं छेड़ता. ज्यों ही वह इन दुनियावी चीज़ों से हटकर आध्यात्मिक की तलाश करने की आजादी चाहता है, निजता का उसका भ्रम टूटते हुए देर नहीं लगती. तमाम सीमाएं लांघते हुए राज्य और प्रशासन व्यक्ति की आध्यात्मिक अंतरंगता को छेक लेता है. आजादी का सारा आधुनिक वहम भरभरा कर गिर जाता है.

मनुष्य और ईश्वर के बीच धर्म का क्या काम?

कभी भक्त कवियों और सूफ़ियों ने ईश्वर से मनुष्य के संबंध को कैसी अंतरंगता दी थी. आज उस अंतरंगता को भेदता हुआ प्रशासनिक सर्विलांस व्यक्ति के मन-मस्तिष्क का स्कैन कर लेना चाहता है- उसने क्या देखा, क्या सर्च किया, किसके व्याख्यान सुने, कौन-सी धर्म-पुस्तकें पढ़ीं, क्या सोचा.

यह एक भयावह स्थिति है. इसका सामना करता हुआ अकेला आदमी भक्ति आंदोलन के उन संत कवियों से कम बहादुरी नहीं दिखा रहा जिन्होंने कभी धर्म की रूढ़ियों, परंपराओं और सांसारिक बंधनों को नकार दिया था. यह साहस उन्हें ईश्वर के प्रेम से मिला था. उन्होंने पूछा था कि मनुष्य और ईश्वर के बीच धर्म का क्या काम? पुरोहित की क्या भूमिका? मौलवी की क्या जगह? यह मध्यकालीन हिंदुस्तानी स्त्री-पुरुष का उद्घोष था.

अब ईश्वर की तलाश की गुंजाइश नहीं रह गई है. वह दुर्लभ नहीं है, न उसे खोजने की जरूरत है. आज वह सत्ता और प्रशासन द्वारा सर्टिफाइड रेडीमेड रूप में उपलब्ध है. ‘आई लव मुहम्मद’ कहने की अनुमति भले न हो, ‘जय श्री राम’ किसी भी ईसाई या मुसलमान से कभी भी कहलाया जा सकता है.

स्पष्ट है, इस देश की बहुसंख्यकवादी राजनीति तय करना चाहती है कि मेरे ईश्वर का स्वरूप क्या होगा. ध्यान की अवस्था में मुझे कौन-सा चेहरा देखना ही होगा- यह तय करने का अधिकार अब सत्ता अपने पास रखना चाहती है. मेरे और मेरे परमेश्वर के बीच का रिश्ता अब उसके प्रति मेरे प्रेम, मेरी तलाश और मेरी अनुभूति से तय नहीं होगा; उसे हिंसक राजनीति और उसके लठैत तय करेंगे.

आज मेरे पास वह आज़ादी कहां है कि मैं कबीर की तरह अपना ईश्वर स्वयं परिभाषित कर सकूं, या रसखान की तरह अपनी पसंद का ईश्वर चुन सकूं? चाहे संभल का मामला हो या आयुष मलिक का वाकया, सभी इसका उत्तर ‘ना’ में ही देते हैं.

एक जीवात्मा और अनिर्वचनीय परमात्मा के बीच अब पुलिस है, प्रशासन है, हिंदुत्ववादी लठैत हैं, कचहरी है, मीडिया है- और इनके ज़रिए उस निरीह जीव के विरुद्ध खड़ा किया गया समूचा समाज है.

धार्मिक आज़ादी का सवाल

संविधान हर नागरिक को धर्म के पालन और उसके प्रचार का मौलिक अधिकार देता है. प्रश्न है कि वर्तमान न्याय-व्यवस्था और प्रशासनिक संरचना इस अधिकार को व्यवहार में कितना प्रभावी रहने देते हैं?

एक व्यक्ति के रूप में जब मैं अपने धार्मिक अधिकारों के बारे में सोचती हूं, तो पाती हूं कि परंपरा से प्राप्त धार्मिक क्रियाओं को दोहराते रहने के बजाय अगर मैं विभिन्न धर्मग्रंथों को पढ़कर, गुंथ-मथ कर, अपना धर्म स्वयं चुनना चाहूं, तो आज़ाद भारत में उसके लिए कितनी गुंजाइश बची है?

यहां मैं किसी धर्म की आलोचना की बात भी नहीं कर रही; केवल अपने धर्म के पालन की बात कर रही हूं. अपने पसंद के धर्म के पालन की.

इस प्रश्न का उत्तर हम सभी जानते हैं. वह हमें ‘द केरल स्टोरी’ जैसी फिल्मों से भी मिलता है और आए दिन ईसाइयों की रविवार की प्रार्थनाओं पर होने वाले हमलों से भी. एक स्त्री तो मानो अपना धर्म चुन ही नहीं सकती. दलित, आदिवासी और ग़रीब भी धर्म परिवर्तन की कोई स्वतंत्र एजेंसी नहीं रखते. कम-से-कम हमारा मध्यवर्ग और मीडिया तो यही मानता है. हम केवल यहीं नहीं रुक गए.

आयुष का मामला दिखाता है कि एक वयस्क मध्यवर्गीय पुरुष भी अब धर्म के मामले में इन अनजान अभिभावकों के अधीन आ गया है. यह एक अगला कदम है. अब तो धनी और शिक्षित पुरुषों के विवेक पर भी हमारा विश्वास समाप्त हो चुका है. हम उनकी एजेंसी में भी यक़ीन नहीं रखते.

मीडिया यह मानकर चलता है कि हिंदू धर्म से अलग विश्वास जताने वाला व्यक्ति अवश्य किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा होगा और निस्संदेह स्वयं निर्णय लेने में सक्षम नहीं होगा. वह व्यक्ति वोट दे सकता है, विवाह कर सकता है, संतान उत्पन्न कर सकता है; क़ानून उसे इन सबके लिए वयस्क मानता है. लेकिन वह अपना ख़ुदा नहीं चुन सकता.

संविधान निर्माताओं ने व्यक्ति की इस नैसर्गिक इच्छा को संवैधानिक वैधता प्रदान की थी. आज स्थिति यह है कि मेरे दिल में किसी और रूप (या अरूप) के ईश्वर की हसरत हो, फिर भी क़ानून, मीडिया और सामाजिक दबाव मुझे बाध्य करते हैं कि मैं किसी और रूप की ही पूजा करती रहूं.

किंवदंती है कि जब भगवान कृष्ण ने तुलसीदास को दर्शन दिए, तब तुलसी ने हाथ जोड़ने से भी इनकार कर दिया. उन्होंने विनती की कि वे उन्हें उनके इष्ट रामचंद्र के रूप में दर्शन दें. प्रभु ने इसका बुरा नहीं माना. उन्होंने तुलसी को धनुर्धर राम के रूप में दर्शन दिए. आज का हिंदुत्व और समाचार चैनल तब होते तो तुलसीदास जी मीडिया ट्रायल झेल रहे होते! और क्या पता धर्म के लठैत उन पर टूट पड़ते, या कि उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून तक लगा दिया जाता!

अंततः, हिंदुत्ववादी विचारधारा हिंदू धर्म के भीतर भी विकल्पों और विविधताओं को खत्म करना चाहती है. पश्चिम बंगाल में लगाए जाने वाले हिंदुत्व के नारों पर विचार कीजिए.

अल्पसंख्यक धर्मों के प्रचार और उनमें धर्मांतरण को ‘साज़िश’ करार देने वाले क़ानून उसी देश में बनाए जा रहे हैं जिसका इतिहास धर्मचक्र-प्रवर्तन का रहा है. जहां संभवतः पहली बार संगठित रूप से धर्म-प्रचार के लिए संघ बनाए गए. जहां एक समय बौद्धों की विशाल आबादी थी. क्या हिंदुत्ववादी इतिहासकार यह बताएंगे कि वे हिंदुस्तानी बौद्ध आखिर कहां गए? वे किस धर्म में गए? अगर वे हिंदू धर्म में आ गए तो क्या यह बिना धर्मांतरण के संभव हुआ?

वही धर्मांतरण, जो बौद्ध भिक्षु के लिए एक अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य था, एक ईसाई के धार्मिक जीवन का भी बुनियादी हिस्सा है. यह वैकल्पिक नहीं है. एक ईसाई का दायित्व है कि वह सेवा करे, दान दे, और मानवता का येशु-संदेश लोगों तक पहुंचाए. उस विचार की रक्षा करे जिसके लिए मसीह ने अपने प्राण तक दे दिए. यहां धर्म-प्रचार को रोकना, किसी व्यक्ति से उसके धर्म के पालन का अधिकार छीनना है.

उन्नीसवीं सदी के हिंदू धर्म-सुधारकों ने ईसाई मिशनरियों के धर्म प्रचार को पसंद नहीं किया. उनका मुकाबला करने के लिए उन्होंने भी उसी मिशनरी पद्धति को अपनाया था. आर्य समाज इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. दयानंद सरस्वती ने देश भर में घूम-घूमकर प्रचार किया, शास्त्रार्थ किए, ईसाई धर्म और इस्लाम की आलोचना की और हिंदुओं को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास किया. आज की हिंदुत्ववादी विचारधारा इस तरह की बौद्धिक कसरत और वैचारिक संघर्ष में विश्वास नहीं करती. वह यह काम प्रशासन, लाठी और घृणा के सहारे करना चाहती है.

प्रश्न यह है कि क्या जीव को उसके महबूब से दूर करने की कोशिश भय के ज़ोर से सफल हो सकती है? क्या वह उसके ईश्वर के प्रति समर्पण को और गहरा नहीं कर देगी? क्या लाठी के सहारे इसे रोकने का प्रयास करने वाले इस बात को समझ भी पा रहे हैं कि वे इंसान की कितनी आदिम इच्छा को नियंत्रित करना चाहते हैं? क्या ईश्वर की तलाश से मनुष्य को रोक लेने का यह अहंकार नष्ट होने के लिए अभिशप्त नहीं है? साथ ही, क्या यह न्यायसंगत भी है? क्या लोकतंत्र में इसकी कोई वैध जगह है?

अंततः, क्या वह पूरा तंत्र स्वयं अनैतिक नहीं हो जाता, जब वह मनुष्य के हृदय और उसकी आत्मा को ज़ोर-जबरदस्ती से वश में करना चाहता है? जब इस्लाम को अपनाने वाला एक व्यक्ति कैमरे के सामने आकर अपनी आस्था को व्यक्त कर रहा है तो उसकी पत्नी उसे ‘साज़िश’ रचकर धर्मांतरित करने की आरोपी कैसे हो जाती है? क्या धर्मपरिवर्तन संबंधी इस नवीन और अन्यायपूर्ण क़ानून पर पुनर्विचार की आवश्यकता नहीं है?

या फिर हमारे समाज ने तय कर लिया है कि आध्यात्मिकता तलाश रहा व्यक्ति सिर पर कफ़न बांधकर यह काम करे; और इश्क़-ए-हक़ीक़ी की हसरत रखता हो, तो कुर्बानी देने को तैयार रहे?

(लेखक अहमदाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं.)