नई दिल्ली: चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में पहली बार नाम जुड़वाने वाले नए मतदाताओं के लिए ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया में नया प्रावधान लागू किया है. अब फॉर्म-6 भरने वाले आवेदकों को अपने माता-पिता की विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़ी जानकारी भी देनी होगी. यदि ऑनलाइन आवेदन के दौरान यह घोषणा-पत्र नहीं भरा जाता, तो आवेदन आगे नहीं बढ़ सकेगा.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, नए प्रावधान के तहत आवेदकों को यह बताना होगा कि क्या वे या उनके माता-पिता वोटर लिस्ट के पिछले एसआईआर में शामिल थे या नहीं. इसके लिए भारतीय निर्वाचन आयोग ने अपने पोर्टल ईसीआईनेट (ECINET) पर ऑनलाइन आवेदन करते समय फॉर्म-6 में ‘जे’ और ‘के’ सेक्शन के बीच एक नया ‘डिक्लेरेशन’ जोड़ा गया है.
इसमें आवेदक को तीन विकल्प दिए गए हैं…
• मेरा नाम पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में मौजूद है.
• मेरे माता-पिता/दादा-दादी का नाम पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में मौजूद है.
• न मेरा और न ही मेरे माता-पिता का नाम पिछली एसआईआर की मतदाता सूची में था.
अगर आवेदक पहले या दूसरे विकल्प को चुनता है, तो उसे संबंधित विधानसभा क्षेत्र, मतदान केंद्र और मतदाता सूची में दर्ज सीरियल नंबर भी भरना होगा. अगर यह जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो केवल तीसरा विकल्प चुनने का रास्ता बचता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, यह नया प्रावधान आधिकारिक तौर पर अनिवार्य नहीं बताया गया है, लेकिन जब तक इसे भरा नहीं जाता, ऑनलाइन आवेदन आगे नहीं बढ़ता. दूसरी ओर, आयोग की वेबसाइट से डाउनलोड होने वाले ऑफलाइन फॉर्म-6 में यह नया सेक्शन मौजूद नहीं है.
यह घटनाक्रम चुनाव आयोग की देशव्यापी एसआईआर प्रक्रिया की जांच के बीच सामने आया है.
अखबार के अनुसार, इस प्रक्रिया के तहत पिछले साल से 10 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची से 5.58 करोड़ से ज़्यादा नाम हटाए गए हैं, जिसे लेकर इन लोगों के बच्चों पर इसके पड़ने वाले असर को लेकर चिंताएं पैदा हो गई हैं.
रिपोर्ट बताती है कि यह व्यवस्था उन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए ऑनलाइन पोर्टल पर दिखाई दे रही है, जहां 2025-26 के दौरान एसआईआर पूरी हो चुकी है या जारी है. हालांकि बिहार, जहां सबसे पहले यह प्रक्रिया शुरू हुई थी और असम, जहां फिलहाल एसआईआर नहीं कराई जा रही, वहां यह नया प्रावधान नहीं दिख रहा है.
हालांकि, चुनाव आयोग की ओर से अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि अगर कोई आवेदक तीसरा विकल्प चुनता है, यानी उसके या उसके माता-पिता का नाम पिछले एसआईआर में नहीं था, तो उसके आवेदन की जांच या प्रक्रिया पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा.
वहीं, रिपोर्ट के अनुसार ये ऑनलाइन बदलाव ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960’ में किसी भी संबंधित संशोधन के बिना लागू किया गया है.
अख़बार में ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950’ की धारा 28 का हवाला देते हुए कहा गया है, ‘केंद्र सरकार, चुनाव आयोग से सलाह लेने के बाद आधिकारिक राजपत्र (ऑफ़िशियल गज़ट) में अधिसूचना के ज़रिए ही इस अधिनियम के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नियम बना सकती है.’
इस संबंध में चुनाव आयोग के दो पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि फार्म में किसी भी बदलाव के लिए नियमों में संशोधन की ज़रूरत होगी.
एक पूर्व अधिकारी ने अख़बार को बताया, ‘चुनाव आयोग खुद से फार्म में एक कॉमा भी नहीं जोड़ सकता.’
रिपोर्ट के मुताबिक, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत फॉर्म-6 एक वैधानिक फॉर्म है. इसमें किसी भी प्रकार का संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार को है, जो कानून मंत्रालय की अधिसूचना के ज़रिए नियम बदलती है.
उदाहरण के तौर पर, रिपोर्ट में बताया गया है कि इससे पहले जब संसद ने वर्ष 2021 में मतदाता सूची को आधार से जोड़ने का कानून बनाया था तब 17 जून 2022 को कानून मंत्रालय ने आधिकारिक अधिसूचना जारी कर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत फॉर्म-6 में बदलाव किए थे. यानी पहले नियम बदले गए, फिर फॉर्म में संशोधन किया गया. लेकिन इस बार ऐसी कोई अधिसूचना अब तक सामने नहीं आई है.
