अयोध्या के ‘भव्य और दिव्य’ बताते जाने वाले नए-नवेले राम मंदिर में चढ़ावे की रकम को लेकर पिछले दिनों जो कुछ घटित हुआ, जिसे कोई चोरी, कोई लूट तो कोई डकैती कह रहा है और जिसके सिलसिले में अभी भी रोज कोई न कोई शिगूफा सामने आ रहा है, साथ ही उससे जुड़े तथ्यों को गड्ड-मड्ड करने की कोशिशें उसकी तह तक पहुंचना लगातार दूभर किए दे रही हैं, उसको लेकर अब सबसे बड़ा सवाल यह हो गया है कि उसको किस रूप में देखा जाए?
क्या वैसी ही चोरियों के रूप में, जिनकी खबरें कभी इस तो कभी उस मंदिर में आती रहती हैं और जिनके प्रकरणों को कभी भी उनकी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचने दिया जाता?
देश के किसी भी जागरूक या जानकार नागरिक के लिए इस सवाल का ‘हां’ में जवाब देना बहुत मुश्किल है, क्योंकि उसे मालूम है कि देश तो क्या दुनिया का भी कोई दूसरा मंदिर इस राम मंदिर जैसा नहीं है. यह इकलौता ऐसा मंदिर है, जो इसको लेकर देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के धर्म के अनुयायियों के साथ चले लंबे विवाद में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले व केंद्र सरकार को दिए गए आदेश के बाद उस सरकार द्वारा गठित ट्रस्ट की देखरेख में लोगों से दान में मिले धन से बनवाया गया है.
इस मंदिर की असाधारणता इस बात में भी है कि इस संबंधी अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उसे हासिल विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया था, जो उसको किसी भी मामले में ‘पूर्ण न्याय’ करने कि असाधारण अधिकार देती हैं.
अनंतर, ट्रस्ट ने मंदिर निर्माण के लिए व्यापक ‘समर्पण और जनसंपर्क’ अभियान चलाया तो (सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार) आम लोगों, साधु-संतों, अमीरों और संगठनों ने 3,000 करोड़ रुपये से अधिक का स्वैच्छिक दान दिया.
नियमों के अनुसार ट्रस्ट इस धन और उससे बने मंदिर में आने वाले चढ़ावे का स्वामी नहीं, महज प्रबंधक है क्योंकि स्वामी तो स्वयं विराजमान रामलला हैं, जिन्हें एक विधिक व्यक्ति के रूप में संपत्ति रखने का पूरा अधिकार प्राप्त है. प्रबंधक के तौर पर ट्रस्ट उनके धन व संपत्ति की सुरक्षा, आय-व्यय के प्रबंधन और भक्तों व श्रद्धालुओं की सुविधाओं के लिए जवाबदेह है और उसके सदस्य भले ही जनता द्वारा निर्वाचित होकर नहीं आए, लेकिन देश की निर्वाचित सरकार द्वारा नियुक्त किए गए हैं. इस तरह वे सरकार और जनता के प्रति जवाबदेह हैं और उनसे उनके भरोसे पर खरा उतरने की अपेक्षा की जाती है, जो उनकी नैतिक जिम्मेदारी भी है.
ऐसे में इस मंदिर के चढ़ावे की रकम के साथ जो हुआ है, उसकी किसी और मंदिर (जो इसकी तरह आम लोगों के दान से नहीं बना) में हुई इस तरह की घटना से तुलना क्योंकर की जा सकती है?
तो क्या उस रूप में देखा जा सकता है, जिस रूप में कई विपक्षी पार्टियां देख रही हैं?
इस सवाल का जवाब विपक्षी पार्टियों की उन कमज़ोरियों में छिपा हुआ है, जिनके तहत वे इस घटनाक्रम को लेकर ट्रस्ट और उसकी नियोक्ता सरकार को कटघरे में खड़ी करते-करते अचानक खुद पर इस तोहमत के सामने कमजोर पड़ने लग जाती हैं कि वे सब की सब राम विरोधी हैं. उनसे पूछा जाने लगता है कि जब उनमें से कोई सरकार में रहते हुए ‘रामभक्त’ कारसेवकों पर फायरिंग करवा चुकी है और कोई कथित रूप से सर्वोच्च न्यायालय में दिए हलफनामे में राम के अस्तित्व से ही इनकार कर चुकी है तो अब उन्हें राम मंदिर में जो हुआ और हो रहा है, उसको लेकर सवाल उठाने का क्या अधिकार है?
तो जवाब में वे या तो रक्षात्मक होकर चुप्पी साध लेती हैं या सॉफ्ट हिंदुत्व की शरण कहकर पॉलिटिकली करेक्ट उत्तर देने लग जाती हैं. वे दृढ़ता से यह कहने तक से बचने के फेर में रहती हैं कि 1990 में उनकी सरकार को कारसेवकों पर फायरिंग इसलिए करनी पड़ी थी क्योंकि वे सर्वोच्च न्यायालय के यथास्थिति बनाए रखने के आदेश के खिलाफ विवादित बाबरी मस्जिद तोड़कर देश की संवैधानिक व्यवस्था की चूलें हिला देने पर आमादा थे और दो साल बाद छह दिसंबर, 1992 को अपनी शुभचिंतक सत्ता के संरक्षण में उसे हिलाकर ही माने थे.
ये पार्टियां तो यह कहते भी डरती हैं कि उनके सत्ताकाल में कारसेवकों पर गोलियां इसलिए चलाई गईं कि भगवान राम को प्रिय मर्यादाओं व जीवन-मूल्यों की रक्षा की जा सके. आगे बढ़कर यह पूछते भी जैसे उनकी जीभ कटती है कि क्या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी उस फायरिंग का बदला लेने का कोई उपक्रम है जो हमें उस पर बोलने का अधिकार नहीं है? अगर हां तो यह कैसा उपक्रम है जो हिंदू धर्म की प्रतिष्ठा का ही दुश्मन बन गया है?
वे पूछने वालों से यह भी नहीं पूछतीं कि जो राम अपने पिता के वचनों की मर्यादा की रक्षा के लिए बटेऊ की तरह उनका राज तजकर चौदह वर्ष के लिए वन चले गए थे, वे अपनी जन्मभूमि के नाम पर ऐसे अनेक अमर्यादित कृत्य होते कैसे देख सकते थे, जो इस सिलसिले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार ने दिखाया और जिनको लेकर मशहूर कलमकार कैफ़ी आज़मी को ‘छह दिसंबर को मिला दूसरा वनवास मुझे’ जैसी पंक्ति लिखनी पड़ी.
जहां तक राम के अस्तित्व को नकारने का सवाल है, 2007 में बहुचर्चित सेतुसमुद्रम शिप कैनाल परियोजना के मामले में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे में इतना भर कहा था कि रामायण के पात्रों व भगवान राम का अस्तित्व और राम सेतु का मानव-निर्मित होना साबित करने के कोई ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं.
संघ परिवार ने इसे लेकर आसमान सिर पर उठा लिया तो उसने बिना देर किए यह कहते हुए उक्त हलफनामा वापस ले लिया था कि वह सभी धर्मों व आस्थाओं का पूरा सम्मान करती है. उसने हलफनामे का मसौदा तैयार करने वाले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के दो वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित भी कर दिया था. लेकिन उसके समर्थक इसे बताने में अपनी हिचक से प्रायः इस सिलसिले में अपने मन में छिपे चोर का पता देते और डरते रहते हैं.
गौरतलब है कि विपक्षी पार्टियां उन महानुभावों को भी निरस्त्र नहीं कर पातीं, कहना चाहिए करने में रुचि नहीं रखतीं, जो अचानक इस राम मंदिर के लिए ‘पांच सौ साल के संघर्ष’ के बहाने यह भुला देना चाहते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ऐसे ही फितूरों की बिना पर देश की सत्ता हासिल करने के बाद उससे जुड़े कैसे-कैसे खेल किए. वरना तो 1984 से पहले उसे राम मंदिर की कतई याद नहीं आई थी, जबकि उसकी स्थापना 1925 में ही हो चुकी थी.
सवाल है कि जब ये पार्टियां इस बाबत स्वयं अपने पक्ष और दृष्टिकोण की रक्षा नहीं कर पा रहीं और संघ परिवार की तरह इससे जुड़े सवालों को करोड़ों हिंदुओं की आस्था व विश्वास के प्रश्न तक ही सीमित किए हुए हैं, तो कोई इस प्रकरण को उनके दृष्टिकोण से भला क्यों देखना चाहे? वह तो तब देखें, जब वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के हार्ड हिंदुत्व से त्रस्त होकर सॉफ्ट हिंदुत्व के रेत में सिर छुपाने के बजाय संवैधानिक मूल्य के रूप में धर्मनिरपेक्षता की समुचित कदर करती दिखें.
तो क्या पुण्य और पाप की निगाह से देखा जाए? पाप का कृत्य माना जाए या अपराध?
पहले समझ लेना चाहिए कि पाप ईश्वर व धर्म और उनके बनाए नियमों व नैतिकताओं के विरुद्ध विचारों, शब्दों व कृत्यों का नाम है. कहते हैं कि जब कोई व्यक्ति पाप करता है तो उसकी अंतरात्मा उसे कचोटती और चेताती है. लेकिन वह लगातार उसकी अनसुनी करता रहे तो कुछ नहीं कर पाती. इसके विपरीत अपराध राज्य की प्रतिनिधि सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का उल्लंघन है और उसका संबंध न्याय व्यवस्था व कानून से होता है.
पाप का न्याय और सजा आमतौर पर आध्यात्मिक रूप से ईश्वर द्वारा, कर्मफल या अगले जन्म में तय होती है, जबकि अपराधों का फैसला न्यायालयों में होता है और उनकी सजा इसी जीवन में दी जाती है. प्रायश्चित, पश्चाताप या क्षमा मांगने से पाप धुल सकते हैं लेकिन अपराध अदालत द्वारा तय प्रक्रिया और सजा या माफी के माध्यम से अपनी तार्किक परिणति तक पहुंचते हैं.
कुछ लोग इस मामले में इस आधार पर पाप और अपराध का घालमेल किया करते है कि कुछ कार्य ऐसे हो सकते हैं जो पाप व अपराध दोनों की श्रेणी में आएं, लेकिन सभी पाप अपराध नहीं होते और न ही सभी अपराध पाप होते हैं.
राम मंदिर में जिस तरह का भ्रष्टाचार हुआ है, उसको कोई भी नाम क्यों न दिया जाए, वह अपराध की श्रेणी में आएगा ही आएगा और चूंकि भ्रष्टाचार समेत सारे अपराध, वे किसी भी स्थान या किसी भी प्रकृति वाले संस्थान में क्यों न किए गए हों, राज्य के विरुद्ध किए गए माने जाते हैं, इसलिए ऐसे नहीं हो सकते कि उनके विरुद्ध सिर्फ वहीं आवाज उठाए, जिसने कभी कोई अपराध न किया हो. क्योंकि अपराधों से निपटने का दायित्व राज्य का है, जिस पर उनकी बात सुनने की भी ज़िम्मेदारी है.
साफ है कि जो लोग इस प्रकरण को अपराध के बजाय पाप या महापाप वगैरह कह रहे हैं, वे राज्य को इस दायित्व से मुक्त करके उसकी मदद करना चाहते हैं. यह अलग सवाल है कि उनकी यह मदद राज्य को कितनी रास आएगी.
साधु-संत जिस रूप में देख रहे हैं, उस रूप में देखना ठीक होगा?
दिक्कत यह है कि साधु-संतों में भी इस प्रकरण को लेकर सर्वानुमति नहीं है और वे भी इसको किसी एक रूप में नहीं देख पा रहे. उनमें भी ज्यादातर के ‘दरबारों’ में माया महाठगिनि बनी हुई है. उनमें मत व पंथ के भेद तो पहले से चले आ रहे हैं, तिस पर अब उनको साधु-संत नहीं, ‘संत-महंत’ कहने का चलन है और कई लोग इस चलन को उनमें साधु भाव के पराभव या तिरस्कार के स्वीकार के रूप में देखते हैं.
इस मामले में वे भी या तो राजनीति कर रहे हैं या उसके शिकार हैं, जिसके चलते अपनी मान्यताओं, स्वार्थों व पूर्वाग्रहों के अनुसार पार्टियों व खेमों में बंट गए हैं और समझ नहीं पा रहे कि जैसे ही स्वार्थ धर्म के निकट आते हैं, उसे धर्म नहीं रहने देते और ‘आए थे हरि भजन को ओपन लगे कपास’ की गति को प्राप्त करा देते हैं.
लेकिन इस सिलसिले में एक अच्छी बात यह है कि अवध में संत-महंतों के बीच के ‘बगुला भगतों’ की आलोचना की भी परंपरा रही है. वैसे ही जैसे, उन दुविधाग्रस्तों की आलोचना की, जिन्हें ‘माया मिली न राम’. इस परंपरा में भक्त या गृहस्थ किसी को नहीं बख्शा जाता और ऐसी उक्तियों की भरमार है, जिन्हें ‘स्वार्थ-धर्म’ के विरुद्ध कहा और कटूक्तियों में शामिल किया जा सके.
मिसाल के तौर पर, राम नाम जपना पराया माल अपना और मुंह में राम बगल में छुरी. यह परंपरा ‘राम जी की माया, कहीं धूप कहीं छाया’ तक भी जाती है. हिंदी के शीर्षस्थ आलोचकों में से एक विजय बहादुर सिंह के अनुसार ये उक्तियां रामभक्त होने का दावा करने वालों के पाखंड के खिलाफ अवध के लोक चित्त की प्रतिक्रियाएं हैं.
ऐसे में आप खुद ही फैसला कीजिए.
क्या उस रूप में देखना चाहिए, जिस रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार देख रहा है?
इस परिवार की विडंबना यह है कि वह इस महादेश की बहुलताओं का जरा-सा भी प्रतिनिधित्व नहीं करता. इसलिए उसके नियंत्रण वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर राम मंदिर के निर्माण के लिए जो श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट बनाया, उसमें भी एक ऐसी जाति का ही वर्चस्व रखा, जो वर्ण व्यवस्था में सबसे ऊपर है.
इस परिवार के कई सदस्य कहते हैं कि जो उनकी कसौटी पर खरे रामभक्त नहीं हैं, राम मंदिर में कुछ भी हो, उन्हें उस पर सवाल करने का हक नहीं है लेकिन यह नहीं देखते कि वे जिन्हें पूछने का हक देते है, उनके सवालों के सामने भी असहाय हो गए हैं और जवाब नहीं दे पा रहे.
इस परिवार का एक अंतर्विरोध यह भी है कि वह खुद तो सांस्कृतिक संगठन के अपने चोले में भी इस सबको लेकर लगातार राजनीति करता रहता है, लेकिन दूसरों का ऐसा करने का हक नहीं मानता.
वह राम मंदिर को लेकर ‘पांच सौ साल के संघर्ष’ की बात करता है तो भी इस बात को छिपा नहीं पाता कि अव्वल तो वह जिस संघर्ष की बात कर रहा है, उसमें भी उसका अपना बहुत छोटा सा हिस्सा है- वह भी 1984 के बाद का और उसकी राजनीतिक सुविधाओं से आक्रांत.
कई लोग कहते हैं कि इस मामले में वह महात्मा गांधी की हत्या के बाद का सबसे बड़ा जनतिरस्कार झेल रहा है और इस कारण घबराया हुआ है. लेकिन क्या वे कह सकते हैं कि महात्मा की हत्या के बाद से आज तक उसने कभी एक पल को भी पश्चाताप की सोची? फिर इस मामले में ही वह पश्चाताप की भला क्यों सोचेगा?
याद कीजिए, 22 जनवरी, 2024 को इस मंदिर में रामलला की प्राणप्रतिष्ठा के वक्त संघ के सर संघचालक मोहन भागवत की उपस्थिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 22 जनवरी, 2024 केवल कैलेंडर पर लिखी एक तारीख नहीं, बल्कि यह एक नए कालचक्र का उद्गम है और आने वाले हजार साल बाद भी लोग इस तारीख और इस ऐतिहासिक पल की चर्चा करेंगे. उन्होंने यह भी कहा था कि राम विवाद नहीं समाधान हैं.
साथ ही भागवत ने कहा था कि रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के साथ अश भारत का ‘स्व’ (आत्मगौरव) वापस लौट आया है और उनका मंदिर एक ऐसे नए भारत का प्रतीक है, जो पूरी दुनिया को त्रासदी और दुखों से राहत देगा. उन्होंने उस ऐतिहासिक और आनंदमय क्षण में जोश में होश न खोने की अपील भी की थी.
लेकिन अब, इस प्रकरण के बाद ये दोनों यह बताने के लिए मुंह तक नहीं खोल पा रहे कि उनके स्वयंसेवक कुछ ही वर्षों में यह कैसा नया विवादी युग लेकर हाजिर हो गए हैं?
कर हरिजन से हेत
आज की तारीख में इन सभी पहलुओं पर विचार कर उनसे जुड़े सवालों से जूझना और उनके जवाब तलाशना इसलिए बहुत जरूरी है कि आज हम इस प्रकरण को जिस रूप में देखेंगे, और उसको लेकर हमारी चिंताएं जो रूप धारण करेंगी, उसका हमारे भविष्य पर बहुत गहरा असर पड़ेगा.
यह तलाश बहुत आसान हो सकती है अगर हम उसे यह मानकर शुरू करें कि हमारे पास एक आस्था से बहुत बड़ी चीज है, जिसे विवेक कहते हैं और उससे समझौता करके कोई शरणस्थली तलाशने या किसी से उसकी निगाह उधार लेने की हमारी कोई मजबूरी नहीं है.
संत कबीर ने कभी इसी विवेक को संबोधित करते हुए कहा था: हरि से तू मति हेत करु, कर हरिजन से हेत, माल मुलक हरि देत हैं हरिजन हरि ही देत.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद (अयोध्या) में रहते हैं.)
