मेटा ने लगातार दूसरी बार जम्मू कश्मीर के पैलेट गन पीड़ितों पर द वायर की ग्राउंड रिपोर्ट हटाई

बुधवार रात मेटा के प्लेटफॉर्म- फेसबुक और इंस्टाग्राम दोनों से हटाई गई द वायर की रिपोर्ट में बताया गया था कि पैलेट गन से घायल होने के दस साल बाद भी इसके पीड़ित रोज़ाना संघर्ष कर रहे हैं. फरवरी 2026 से अब तक, और ख़ासकर पिछले एक महीने में फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब ने सरकारी आदेशों के आधार पर द वायर और द वायर हिंदी की कम से कम 22 पोस्ट भारत में दिखने पर रोक लगाई है.

पेलेट गन पीड़ित इंशा मुश्ताक अपनी मां अफरोज़ा बानो के साथ श्रीनगर स्थित अपने घर में बैठी हुई. (फोटो: प्रज्ञा सिंह)

नई दिल्ली: मेटा ने बुधवार (12 अगस्त) की रात करीब डेढ़ महीने में दूसरी बार जम्मू-कश्मीर के पैलेट गन पीड़ितों पर द वायर की ग्राउंड रिपोर्ट को अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया है. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और इंस्टाग्राम से इस रिपोर्ट से संबंधित पोस्ट हटाए जाने से पहले द वायर को मेटा की ओर से कोई सूचना नहीं मिली थी.

द वायर के पत्रकारों- प्रज्ञा सिंह और जुनैद डार की इस रिपोर्ट का शीर्षक था, ‘Kashmir’s Pellet Survivors Describe What Happens After the Pellets Stop Flying- (कश्मीर के पैलेट पीड़ितों ने बताया- पैलेट बरसना बंद होने के बाद क्या होता है).’

फेसबुक और इंस्टाग्राम ने पोस्ट हटाने की वजह बताते हुए कहा, ‘भारत के सूचना प्रौद्योगिकी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) नियमों के तहत कानूनी आवश्यकताओं के अनुसार लागू की गई एक स्वचालित (ऑटोमेटेड) प्रणाली के माध्यम से हमने इस सामग्री तक पहुंच प्रतिबंधित की है.’

बुधवार को प्रकाशित यह रिपोर्ट देर रात दोनों प्लेटफॉर्म से हटा दी गई. इसमें बताया गया था कि पैलेट गन से घायल होने के बाद जिन पीड़ितों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई, वे दस साल बाद भी रोजमर्रा की जिंदगी में संघर्ष कर रहे हैं. पीड़ितों ने यह भी बताया कि 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च कर रहे ज्यादातर शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर हाल में पैलेट गन के इस्तेमाल ने उनके पुराने जख्मों और दर्द को फिर से ताजा कर दिया है. ज्ञात हो कि इस प्रदर्शन के बाद तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा था.

द वायर से बातचीत में मोहम्मद अशरफ ने कहा, ‘दिल्ली नहीं जानती कि पैलेट पीड़ित किस दौर से गुजरते हैं.. और मैं उम्मीद करता हूं कि वहां के लोगों को कभी यह न जानना पड़े और यह सब जंतर-मंतर पर ही खत्म हो जाए.’

अपने साथ हुई घटना बताते हुए पुलवामा जिले के रहमू गांव निवासी अशरफ ने बताया कि 28 अगस्त, 2016 को स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (एसओजी) और राष्ट्रीय राइफल्स (आरआर) ने जब उनके गांव पर छापा मारा, तब पांच-छह फीट की दूरी से उनके शरीर पर ‘पैलेट की बौछार’ कर दी गई.

रिपोर्ट में बताया गया कि अशरफ के इलाज पर उनके परिवार ने करीब 8-9 लाख रुपये खर्च किए. इसके लिए परिवार ने अपनी कुछ जमीन बेच दी और अपनी बचत भी खर्च की. अशरफ की नौ सर्जरी हुईं. उनका कहना था कि पैलेट से लगी चोटें गोली की चोटों से भी बदतर होती हैं, क्योंकि ये ‘कभी ठीक नहीं होतीं.’

अशरफ ने 2017 में पैलेट गन पीड़ितों के लिए एक संगठन बनाया था, जिसके माध्यम से करीब 9 लाख रुपये जुटाए गए थे. लेकिन 2019 में पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने इस काम के लिए उन्हें परेशान करना शुरू कर दिया. इसके बाद अब वह पैलेट पीड़ितों के फोन तक उठाने से बचते हैं.

अशरफ के अलावा इस रिपोर्ट में पैलेट गन की शिकार हुईं इंशा मुश्ताक की मुश्किलों का भी जिक्र है. जब उन पर हमला हुआ था, तब वह सिर्फ 14 साल की थीं और डॉक्टर बनने का सपना देखती थीं. रिपोर्ट में वकील आमिर के संघर्ष को भी सामने रखा गया है, जिन्होंने जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में याचिका दायर कर पैलेट गन पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी, लेकिन उनकी कोशिश सफल नहीं हुई.

इससे पहले 1 जुलाई को फेसबुक और इंस्टाग्राम ने द वायर की उस पोस्ट को भी रोक दिया था, जो जुनैद डार की रिपोर्ट ‘चौहान फिल्म के संवाद पर कश्मीर के पैलेट पीड़ितों का आरोप- हमारे दर्द का मज़ाक उड़ा रहा बॉलीवुड’ पर आधारित थी. इस रिपोर्ट में बताया गया था कि अजय देवगन की आगामी एक्शन फिल्म ‘चौहान’ के ट्रेलर ने हजारों कश्मीरी पैलेट गन पीड़ितों की दर्दनाक यादें ताजा कर दी थीं.

फरवरी 2026 से अब तक, और खासकर पिछले एक महीने में, फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब ने सरकारी आदेशों के आधार पर भारतीय दर्शकों के लिए द वायर और द वायर हिंदी की कम से कम 22 पोस्ट को रोका है.

इन हटाई गई या भारत में दिखने से रोकी गई पोस्ट में खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर से संबंधित रिपोर्ट, निखिल गुप्ता की लंबित सजा, गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई के खिलाफ अमेरिकी सरकार के आरोपपत्र, जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन से जुड़ी कला, चीनी अतिक्रमण को लेकर अरुणाचल के एक समूह के दावे, फ़िल्म ‘सतलुज’ पर सेंसरशिप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बनाए गए कार्टून से संबंधित ख़बरें और रिपोर्ट्स शामिल हैं.