नई दिल्ली: नवी मुंबई के खारघर में एक निजी फोटोकॉपी दुकान से विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के 3,404 फॉर्म मिलने के बाद पांच बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) को निलंबित कर दिया गया है. इस मामले के सामने आने के बाद शिवसेना (यूबीटी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कार्यकर्ताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं.
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, ये फॉर्म पनवेल विधानसभा क्षेत्र के 11 मतदान केंद्रों से संबंधित थे. अधिकारियों के मुताबिक, इनमें से ज्यादातर फॉर्म पांच मतदान केंद्रों के थे. शिकायत मिलने के बाद सेक्टर-19 स्थित एक फोटोकॉपी सेंटर की जांच की गई, जहां मतदाताओं द्वारा भरे गए एसआईआर फॉर्म की प्रतियां तैयार किए जाने की बात सामने आई है.
उल्लेखनीय है कि यह मामला 27 अगस्त को तब सामने आया, जब शिवसेना (यूबीटी) के एक स्थानीय नेता ने भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) के पदाधिकारी सूरज पाटिल के पास 3,404 एसआईआर फॉर्म होने का दावा किया.
इसके बाद विवाद का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद पाटिल को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया. प्रशासन ने यह पता लगाने के लिए जांच शुरू की कि मतदाताओं द्वारा भरे गए फॉर्म निजी फोटोकॉपी दुकान तक कैसे पहुंचे.
इस संबंध में रायगढ़ के जिला कलेक्टर ने बताया कि पाटिल के खिलाफ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत एफआईआर दर्ज की गई है. जब्त किए गए फॉर्म 188 पनवेल विधानसभा क्षेत्र के थे और जांच में उन्हें असली पाया गया. इन फॉर्म में मतदाताओं की तस्वीरें, व्यक्तिगत जानकारी और बीएलओ के आधिकारिक हस्ताक्षर मौजूद थे.
रायगढ़ कलेक्टर ने आगे कहा कि अधिकारियों ने दस्तावेजों की जांच की और पाया कि वे मूल फॉर्म थे तथा उनकी जिम्मेदारी संबंधित बीएलओ की थी. इसके बाद इलाके के पांच बीएलओ को निलंबित कर दिया गया.
भाजपा और शिवसेना (यूबीटी) आमने-सामने
इस घटना के सामने आने के बाद भाजपा और शिवसेना (यूबीटी) के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है. शिवसेना (यूबीटी) के पदाधिकारी बालेश भोजने ने सवाल उठाया कि आम मतदाताओं द्वारा भरे गए चुनावी फॉर्म निजी लोगों तक कैसे पहुंचे.
शिवसेना कार्यकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन लाए जाने के बाद पाटिल वहां से चले गए.
हालांकि, भाजपा ने इस मामले में किसी भी तरह की संलिप्तता से इनकार किया है. पनवेल नगर निगम के महापौर और भाजपा नेता नितिन पाटिल ने कहा कि भाजपा कार्यकर्ताओं का इस मामले से कोई संबंध नहीं है.
वहीं, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) (राकंपा(शरदचंद्र पवार)) के विधायक रोहित पवार ने भी पांच बीएलओ के निलंबन को अपर्याप्त बताया.
उन्होंने कहा कि यह घटना एसआईआर प्रक्रिया के क्रियान्वयन से जुड़ी गंभीर खामियों को सामने लाती है.
रोहित पवार ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर आरोप लगाया कि खारघर में नागरिकों ने भाजपा कार्यकर्ताओं को एसआईआर फॉर्म के साथ पकड़ा, जिससे चुनाव आयोग के कथित पारदर्शी एसआईआर अभियान पर सवाल खड़े होते हैं.
खारघरमध्ये भाजप कार्यकर्त्यांच्या हाती SIR मोहिमेचे फॉर्म असल्याचं नागरिकांनीच रंगेहात पकडल्याने निवडणूक आयोगाच्या कथित पारदर्शक SIR मोहिमेचा पर्दाफाश झाला. यामुळं SIR ही मोहीम कशी फसवी आणि नावापुरती राबवली जाते हे स्पष्ट झालं. या मोहिमेच्या माध्यमातून भाजप आपल्या पुढील विजयाचा… pic.twitter.com/RhuZ0ndGbW
— Rohit Pawar (@RRPSpeaks) August 27, 2026
उन्होंने दावा किया कि इस अभियान के जरिए भाजपा अपनी अगली चुनावी जीत की ज़मीन तैयार करने की कोशिश कर रही है.
बाद में एक अन्य पोस्ट में पवार ने तंज कसते हुए कहा कि एसआईआर का नाम बदलकर ‘स्पेशल भाजपा वोटर कन्फर्मेशन (एसबीवीसी)’ कर देना चाहिए.
भाजप कार्यकर्त्याकडून ताब्यात घेतलेले हे SIR चे फॉर्म काल खारघर पोलीस ठाण्यात आणण्यात आले. त्यामुळं SIR (Special Intensive Revision) ही मोहिम केवळ भाजपाच्या मतदारांचीच नावे मतदार यादीत ठेवून विरोधी पक्षाच्या मतदारांना वगळण्याचं ‘राष्ट्रीय अभियान’ असल्याचं आता जगजाहीर झालंय.… pic.twitter.com/26h27hsaKZ
— Rohit Pawar (@RRPSpeaks) August 28, 2026
उन्होंने मांग की कि निलंबित बीएलओ को निर्देश देने वाले अधिकारियों की भी पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए. साथ ही, यदि भाजपा कार्यकर्ताओं की भूमिका साबित होती है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जानी चाहिए.
पवार ने कहा कि केवल बीएलओ को निलंबित करना पर्याप्त नहीं है. उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसे कितने मामले हैं जो सामने नहीं आ पाए हैं और कहा कि इस घटना का पता सतर्क नागरिकों की वजह से चला.
एसआईआर प्रक्रिया पर उठे सवाल
इस घटना के बाद संवेदनशील एसआईआर फॉर्म के रखरखाव और उनके निजी स्थानों तक पहुंचने को लेकर सवाल उठ रहे हैं. राजनीतिक दलों की ओर से लगाए गए आरोपों की अभी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है.
हालांकि, पांच बीएलओ का निलंबन, एफआईआर दर्ज होना और फॉर्म का असली पाया जाना महाराष्ट्र में एसआईआर प्रक्रिया की निगरानी को लेकर चिंता बढ़ाने वाला है.
