क्या हिंदी फिल्म गीतों ने देश में अलग-अलग भारतों के बीच कोई भावनात्मक पुल बनाया है

किसी देश के लोगों को केवल अधिकार और मत ही एक-दूसरे के क़रीब नहीं लाते. उन्हें कुछ साझी स्मृतियां भी चाहिए होती हैं. कुछ साझा सपने. कुछ ऐसे शब्द और धुनें, जिनमें वे अपने सुख-दुख को पहचान सकें. हिंदी फिल्म गीतों ने कई दशकों तक यही काम किया.

1956 में फेमस स्टूडियो में (बाएं से दाएं) जयकिशन, शंकर, मीनू कतरक, राज कपूर, दत्ताराम वाडकर और सत्तार. (फोटो साभार: Instagram/@filmhistorypics)

भारत का गणतंत्र 26 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया लेकिन हमारे गीतों का गणतंत्र उससे बहुत पहले जन्म ले चुका था. वह किसी संविधान सभा में नहीं बना था. उसके नियम किसी सरकारी दस्तावेज़ में नहीं लिखे गए थे. उसका कोई झंडा नहीं था, कोई राजधानी नहीं थी और न ही उसकी कोई तय सीमाएं थी. फिर भी वह धीरे-धीरे पूरे देश में फैलता चला गया.

ग्रामोफोन की सुई से निकलती आवाज़ों के साथ, रेडियो के आसपास जमा परिवारों के बीच, सिनेमाघरों के अंधेरे में, चाय की टपरियों, नाई की दुकानों, बस अड्डों, ढाबों, ट्रकों, बारातों और रेल यात्राओं में, और उन घरों में भी, जहां लोगों के पास अपनी बात कहने के लिए शायद बहुत शब्द नहीं थे, लेकिन कोई गीत ज़रूर था.

गणतंत्र के लिए प्रयुक्त अंग्रेज़ी शब्द रिपब्लिक (Republic) की जड़ लैटिन के res publica में है. इसका सामान्य अर्थ है- जनता की वस्तु, लोगों का साझा विषय, वह संपदा जो किसी एक व्यक्ति की नहीं, सबकी हो. हिंदी फिल्म गीत भी धीरे-धीरे ऐसी ही साझा सांस्कृतिक संपदा बन गए. उन्हें किसी गीतकार ने लिखा, किसी संगीतकार ने धुन दी, किसी गायक या गायिका ने स्वर दिया, किसी फिल्मकार ने दृश्य में पिरोया. लेकिन एक बार जब वे लोगों तक पहुंचे, तो उनकी यात्रा उनके रचयिताओं और फिल्मों की सीमाओं से आगे निकल गई.

वे किसी की प्रेम-कहानी का हिस्सा बने. किसी की जुदाई की आवाज़ बने- किसी मां की लोरी बने, किसी बेटी की विदाई में छलके, किसी मज़दूर की थकान और हौसले के साथ चले. कभी किसी अकेले शख़्स के कमरे में ख़ामोशियों के साथी बनकर बजते रहे, किसी ऐसे इंसान की आवाज़ बने, जिसकी अपनी आवाज़ कहीं सुनी नहीं जा रही थी. वे फिल्म के होकर भी लोगों के हो गए.

संविधान ने भारत के नागरिकों को बराबरी का अधिकार दिया. लोकतंत्र ने उन्हें बराबर का मत दिया. लेकिन किसी देश के लोगों को केवल अधिकार और मत ही एक-दूसरे के करीब नहीं लाते. उन्हें कुछ साझी स्मृतियां भी चाहिए होती हैं. कुछ साझा सपने. कुछ ऐसे शब्द और धुनें, जिनमें वे अपने सुख-दुख को पहचान सकें. हिंदी फिल्म गीतों ने कई दशकों तक यही काम किया.

उन्होंने भारत को केवल मनोरंजन नहीं दिया. उन्होंने करोड़ों लोगों को अपनी भावनाओं को पहचानने और व्यक्त करने की भाषा दी और कई बार अन्याय के सामने सवाल खड़े करने की भाषा भी.

हम में से कितने लोगों ने प्रेम में पड़ने से पहले प्रेम के गीत सुने थे और सोलह बरस की बाली उमर की पहली नज़र को सलाम किया था? कितनों ने किसी अपने से दूर होने से पहले ही चार दिनों के प्यार के बाद आने वाली लंबी जुदाई की पीड़ा को पहचान लिया था? कितनों ने कैफ़ी आज़मी के शब्दों से जाना होगा कि वक़्त कभी ऐसा हसीं सितम कर देता है कि दो लोग पास होकर भी एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं? कितनों ने अपने शहर से बाहर निकले बिना दूर-दराज़ जगहों की कल्पना गीतों के सहारे की? कितनों ने किसान, मज़दूर, बेरोज़गार नौजवान, विधवा, अनाथ, बेघर और भूखे आदमी का दुख पहली बार किसी फिल्मी गीत में महसूस किया?

‘गमन’ फिल्म में छाया गांगुली ने स्वरबद्ध किया था मखदूम मोहीउद्दीन के लिखे गीत को. संगीत जयदेव का था.

एक श्रोता के रूप में हम केवल गीत सुन रहे थे. लेकिन गीत हमारे भीतर चुपचाप एक दुनिया बना रहे थे. वे हमें बता रहे थे कि किसी दूसरे का दुख भी हमें क्यों छूना चाहिए, हार जाने और फिर उठ खड़े होने के बीच कितनी दूरियां होती हैं और उम्मीद किस तरह कभी-कभी केवल एक धुन के सहारे जीवित रह सकती है. फिल्मी भक्ति गीतों ने भी कई बार पूजा-स्थलों की सीमाएं पार कीं. वे केवल काल्पनिक ईश्वर से संवाद नहीं रहे, बल्कि वास्तविक जीवन में बेहतर इंसान बनने की सामूहिक कामना बन गए.

कई ऐसे गीत, जो कई वर्षों तक कहीं चुपचाप पड़े रहते हैं और अचानक कुछ स्वरों के साथ बीता हुआ समय फिर हमारे सामने ला खड़ा करते हैं. यही भीतरी संसार हमारा मन-तंत्र है. यह कोई राजनीतिक तंत्र नहीं है. न ही यह किसी औपचारिक सिद्धांत का दावा है. यह उस आंतरिक व्यवस्था का संकेत है, जिसमें कोई धुन एक व्यक्ति, एक जगह, एक मौसम या जीवन के किसी खो चुके हिस्से से हमेशा के लिए जुड़ जाती है. एक गीत सबके बीच बजता है, लेकिन हर व्यक्ति के भीतर उसका घर अलग होता है. वह सार्वजनिक भी है और अत्यंत निजी भी हर श्रोता को लगता है कि उसमें कही गई बात केवल उसके लिए है. यही हमारे गीतों के गणतंत्र का सबसे सुंदर विरोधाभास है.

भारत का संगीत केवल हिंदी फिल्म संगीत नहीं है. इस देश की हर भाषा और हर क्षेत्र की अपनी गहरी और समृद्ध संगीत परंपरा है. तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, मराठी, बांग्ला, असमिया, ओड़िया, पंजाबी, गुजराती, कश्मीरी, कोंकणी और अनेक दूसरी भाषाओं का फिल्म संगीत अपनी अलग पहचान, सौंदर्य और इतिहास रखता है. लोक संगीत की अनगिनत धाराएं हैं, शास्त्रीय संगीत की महान परंपराएं हैं. भक्ति संगीत, सूफ़ी संगीत, बाउल, भटियाली, लावणी, मांड, बिरहा, कजरी, ठुमरी, ग़ज़ल और क़व्वाली के असंख्य रंग हैं. इन सबकी अपनी दुनिया, अपना प्रभाव, अपना इतिहास है.

हिंदी फिल्म संगीत पूरे भारत का संगीत बन सका क्योंकि बीसवीं सदी के एक बड़े हिस्से में उसकी पहुंच अपनी भाषा और अपने प्रदेश की सीमाओं से बहुत आगे निकल गई थी. हिंदी फिल्म गीत उन इलाकों में भी सुने गए, जहां हिंदी रोज़मर्रा की भाषा नहीं थी. लोग हर शब्द का अर्थ नहीं जानते थे, फिर भी आवाज़, धुन और भाव के माध्यम से उनसे जुड़ते गए. धीरे-धीरे ये गीत एक ऐसी साझी सांस्कृतिक भाषा बन गए, जिसे समझने के लिए व्याकरण की आवश्यकता नहीं थी.

फिल्म ‘शंकर हुसैन’ में ख़य्याम के संगीत से सजे, जांनिसार अख़्तर द्वारा लिखित गीत को लता मंगेशकर का स्वर मिला.

देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले करोड़ों लोग, जिनकी भाषाएं, भोजन, वेशभूषाएं, लोकपरंपराएं और जीवन जीने के ढंग अलग थे, वे किन अनुभवों में एक-दूसरे से मिलते थे?

क्या यह कोई साधारण सांस्कृतिक घटना थी कि मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ उत्तर से दक्षिण तक अपनी-सी लगी. इंदौर में जन्मी लता मंगेशकर, सांगली में जन्मी आशा भोसले और बंगाल से आई गीता दत्त की आवाज़ें पूरे उपमहाद्वीप की स्मृतियों में बस गईं. जहां बंगाल के ही किशोर कुमार, मन्ना डे और हेमंत कुमार ने अनेक भाषाई सीमाओं के पार उल्लास, उदासी और मानवीय आकांक्षाओं को स्वर दिया, वहीं तलत और मुकेश की आवाज़ों का दर्द किसी एक भूगोल तक सीमित नहीं रहा. दक्षिण भारत से आए येसुदास और एसपी बालसुब्रह्मण्यम की आवाज़ें हिंदी फिल्मों के माध्यम से देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचीं. पी. सुशीला और एस. जानकी जैसी महान गायिकाओं ने तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और दूसरी भाषाओं में गाते हुए करोड़ों श्रोताओं की संवेदना को स्वर दिया. उनका महत्व किसी एक भाषा या प्रदेश की सीमा में समेटा नहीं जा सकता. भूपेन हज़ारिका ने असम और ब्रह्मपुत्र के अनुभवों को ऐसा स्वर दिया कि वे पूरे देश की संवेदना का हिस्सा बन गए.

1972 में बर्लिन फेस्टिवल ऑफ पॉलिटिकल सॉन्ग्स में भूपेन हज़ारिका (बाएं). (फोटो साभार: Festival des politischen Lieds/Wikimedia Commons)

फिल्मी गीतों की यही शक्ति थी कि वे निजी भावनाओं और सामाजिक अनुभवों के बीच आसानी से आ-जा सकते थे. पर्दे पर किसी एक पात्र या परिस्थिति के लिए लिखा गया गीत, पर्दे से बाहर निकलकर असंख्य जीवनों में नए अर्थ ग्रहण कर लेता था. गीतों ने लोगों से हमेशा प्रत्यक्ष राजनीति की भाषा में बात नहीं की. फिर भी उनमें राजनीति थी.

जब साहिर लुधियानवी पूछते हैं कि जिन्हें हिंद पर नाज़ है, वे कहां हैं, तो वह केवल एक फिल्मी दृश्य का सवाल नहीं रह जाता. जब शैलेन्द्र लिखते हैं कि दुनिया बनाने वाले काहे को दुनिया बनाई  तो वह किसी एक पात्र की शिकायत नहीं रहती. और जब मजरूह सुल्तानपुरी के नायक के पास न कोई साथी हो, न कोई मंज़िल और उसे अपने ही देश की गलियां अजनबी लगने लगें, तो वह किसी एक पात्र का अकेलापन नहीं रहता. वह अपने ही वतन में हाशिये पर धकेल दिए गए तमाम लोगों की पीड़ा बन जाता है.

जब गीत अमीरी और गरीबी के फ़र्क को सामने लाता है, जब भूख, जाति, धर्म, बेकारी, युद्ध या शोषण पर प्रश्न उठाता है, जब मेहनत करने वाला आदमी अपने हिस्से की इज़्ज़त मांगता है, तब गीत मनोरंजन से आगे बढ़ जाता है. वह समाज से बातचीत करने लगता है.

यही बात स्त्री-पुरुष संबंधों और प्रेम के चित्रण पर भी लागू होती है. हिंदी फिल्मों ने प्रेम को हमेशा बराबरी और स्वतंत्रता के साथ नहीं दिखाया. उनमें अपने समय की रूढ़ियां, असमानताएं और पुरुष-वर्चस्व भी दिखाई दिए. फिर भी उन्हीं फिल्मों के गीतों ने प्रेम को घरों की बंद दीवारों से निकालकर सार्वजनिक भाषा बनाया और निजी भावनाओं और इच्छाओं को अभिव्यक्त करना संभव किया.

उन्हीं गीतों ने स्त्री की इच्छाओं, प्रतीक्षा, शिकायत, नाराज़गी और कई बार उसके इनकार को भी शब्द दिए. जब गाइड की नायिका आज फिर जीने की तमन्ना व्यक्त करती है तो वह केवल प्रेम की प्रतीक्षा नहीं करती, वह अपने जीवन को अपनी शर्तों पर चुनती है.

पर हर गीत प्रगतिशील नहीं था और न ही हर फिल्म ही न्यायपूर्ण थी. हर दौर में बाज़ार, सत्ता और सामाजिक रूढ़ियों का प्रभाव मौजूद रहा. इसलिए यह हिंदीी फिल्म संगीत के अंध महिमामंडन का प्रयास नहीं है. यह उसके उजले और धुंधले दोनों पहलुओं को देखने का प्रयत्न है. यह जानने की जिज्ञासा है कि गीतों ने समाज को क्या दिया और यह भी समझने की कोशिश है कि इतने भिन्न लोगों की सामूहिक मेहनत से यह साझा संगीत कैसे बना.

गीतकार किसी एक प्रदेश से आया. संगीतकार की अपनी परंपरा थी. गायक की अपनी मातृभाषा थी. वादक किसी और भूगोल से आया. कहानी किसी और जीवन से निकली. स्टूडियो में ये सब एक साथ मिले और एक ऐसा गीत बना, जो पूरे देश का हो गया. यह केवल कलाकारों का साथ आना नहीं था, यह भारत की अनेक सांस्कृतिक धाराओं का संगम था.

नौशाद, अनिल बिस्वास, पंकज मलिक, सी. रामचन्द्र, सचिन देव बर्मन, शंकर-जयकिशन, रोशन, मदन मोहन, ओपी नैयर, सलिल चौधरी, ख़य्याम, उषा खन्ना, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, राहुल देव बर्मन, इलैयाराजा और एआर रहमान जैसे संगीतकार अलग-अलग संगीत-संस्कारों, अनुभवों और संवेदनाओं को फिल्म संगीत में लेकर आए. इन नामों के साथ उषा खन्ना की उपस्थिति यह याद दिलाती है कि पुरुष-प्रधान फिल्म उद्योग में एक महिला संगीतकार ने दशकों तक अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई.

लेकिन हिंदी फिल्म संगीत की कहानी केवल प्रसिद्ध गीतकारों, संगीतकारों और गायकों की कहानी नहीं हो सकती. इसमें उन असंख्य वादकों, अरेंजर्स, कोरस गायकों, संगीत सहायकों, रिकॉर्डिस्टों, लेखकों, निर्माताओं और तकनीशियनों की भी जगह होनी चाहिए, जिनके नाम अक्सर पर्दे पर छोटे अक्षरों में आए या कई बार आए ही नहीं. गीत किसी एक प्रतिभा की उपलब्धि हो सकता है, लेकिन उसका अंतिम रूप प्रायः अनेक लोगों के साझा श्रम से बनता है. यह भी अपने आप में एक छोटा-सा गणतंत्र है.

‘स्वदेस’ फिल्म के लिए जावेद अख़्तर द्वारा लिखे गीत को एआर रहमान ने स्वर और संगीत दिया था.

गीतों की यात्रा को उन माध्यमों ने भी आकार दिया, जिन्होंने उन्हें घर-घर पहुंचाया. ग्रामोफोन रिकॉर्ड, रेडियो सीलोन, बिनाका गीतमाला, आकाशवाणी और विविध भारती, सिनेमा हॉल और रिकॉर्ड की दुकानें. फिर ट्रांजिस्टर, कैसेट, टेलीविज़न, सीडी, एमपी थ्री, इंटरनेट और आज के डिजिटल मंच. तकनीक हर दौर में बदलती रही. गीत सुनने की आदत भी बदलती रही. आज लगभग पूरा संगीत-संसार एक मोबाइल फोन में मौजूद है.

फिर भी एक प्रश्न बचा हुआ है कि क्या गीतों की उपलब्धता बढ़ने के साथ उनका साझा प्रभाव भी बढ़ा है? या हर श्रोता अपने अलग संगीत-संसार में बंद होता जा रहा है?

एक समय था जब अलग-अलग आयु और वर्ग के लोग अनेक गीतों को साथ पहचानते थे. कोई धुन बजती और पूरा कमरा उसके साथ गाने लगता. आज विकल्प कहीं अधिक हैं लेकिन क्या साझा गीत कम हो गए हैं? क्या वह सांस्कृतिक चौक, जहां अलग-अलग लोग एक ही आवाज़ के आसपास इकट्ठे होते थे, धीरे-धीरे बिखर गया है? या डिजिटल संसार में वह किसी नए रूप में फिर बन रहा है?

यह भी सच है कि हमारे गीतों का गणतंत्र असंतुलनों से मुक्त नहीं रहा है. किसी भी वास्तविक समाज की तरह उसमें भी असमानताएं रही हैं. कुछ आवाज़ें केंद्र में रहीं, कुछ हाशिए पर. कुछ भाषाओं और क्षेत्रों को अधिक स्थान मिला, कुछ को कम. अनेक कलाकारों को वह पहचान नहीं मिली, जिसके वे अधिकारी थे. फिर भी इस गणतंत्र की एक असाधारण विशेषता थी. इसकी नागरिकता पाने के लिए किसी पहचान-पत्र की आवश्यकता नहीं थी. किसी गीत को अपना मान लेना ही पर्याप्त था.

आप उसे अपनी भाषा और अपने उच्चारण में गुनगुना सकते थे. उसकी धुन पर अपने शब्द बैठा सकते थे. उसे अपनी शादी, अपने त्योहार, अपनी यात्रा, अपने उत्सव, अपने शोक या अपने अकेलेपन का हिस्सा बना सकते थे. वह फिल्म का होकर भी आपका हो जाता था.

यहीं से इस संवाद का मूल प्रश्न जन्म लेता है क्या आधुनिक भारत के भीतर एक दूसरा गणतंत्र भी बन रहा था? एक ऐसा गणतंत्र, जिसे कलाकारों ने रचा, तकनीक ने फैलाया और जनता ने अपना बनाया? क्या हिंदी फिल्म गीतों ने इसी देश में अलग-अलग भारतों के बीच कोई भावनात्मक पुल बनाया? क्या उन्होंने हमें एक-दूसरे के दुख और सपनों को समझने में मदद की?

और आज, जब हमारी सार्वजनिक दुनिया पहले से कहीं अधिक बंटी हुई दिखाई देती है, तो क्या उन गीतों में अब भी हमें जोड़ने की कोई शक्ति बची है? शायद इन्हीं प्रश्नों पर विचार करने का समय फिर आ गया है. और इसी वजह से केवल पुराने गीतों की स्मृति ही महत्वपूर्ण नहीं है. उतना ही महत्वपूर्ण है उन गीतों के भीतर और उनके आसपास बने भारत को पहचानने का प्रयास.

(राजेश चेटवाल फिल्मकार और Rhombus Films के संस्थापक हैं.)