लेखकों की अलमारी से: किन किताबों ने पढ़ने वालों का मन मोहा…

साल 2025 के विदा होते वक़्त में रचनाकारों और चिंतकों ने उन किताबों को याद किया जो उनके भीतर ठहर गईं. इस श्रृंखला में लोकप्रिय और अल्पचर्चित पुस्तकों के ज़रिये साहित्य, स्मृति, राजनीति और मानवीय संवेदना के उन सूत्रों को टटोला गया है, जो पाठक और लेखक दोनों को गहराई से समृद्ध करते हैं.

मां की परछाइयां: लकीरें जो साथ चलती हैं, प्रश्न पूछती हैं

पुस्तक समीक्षा: अरुंधति रॉय की 'मदर मैरी कम्स टू मी' में उनकी मां उनके जीवन रूपी उपन्यास में ऐसे पात्र के रूप में उपस्थित हैं, जो उनकी कथा का केंद्र तो हैं पर उनके इर्द-गिर्द जीवन बिताना उन्हें मंज़ूर नहीं. वह उनके जीवन की सबसे बड़ी आंधी हैं और उस अंधड़ से बचने का आश्रय भी.

मटीरियलिस्टस: पारंपरिक प्रेम की आधुनिक समीक्षा

सेलिन सोंग की 'मटीरियलिस्टस' निश्चित तौर पर प्रेम का रोमांटिक भाव-बोध से भरा प्रस्तुतीकरण है, पर वह जीवन की वास्तविकताओं और पात्रों के निर्णयों को रूमानियत में पिरोकर नहीं दिखाती. फिल्म आधुनिक जीवन की यंत्रचालित अंधी भौतिकता के बर-अक्स उन दुर्लभ होती संवेदनाओं का प्रतिपक्ष रचती है जिस पर ठहरकर विचार करने की ज़रूरत है.

प्रेमचंद और साहित्य की श्रेष्ठता का प्रश्न

जयंती विशेष: प्रेमचंद की दृष्टि में साहित्य की कई परिभाषाओं में सबसे सार्थक परिभाषा यह थी कि साहित्य जीवन की आलोचना है. उन्होंने अपने कथा-संसार के लिए पात्र गढ़े नहीं हैं, बल्कि जीवन से उठा कर अपने रचनात्मक संसार में प्रस्तुत किया है.

साहित्य में स्त्री दृष्टि

महिला दिवस विशेष: साहित्य में स्त्री दृष्टि निजी मुक्ति का नहीं बल्कि सामूहिक मुक्ति का आख्यान रचती है, इसीलिए ज़्यादा समावेशी है और अपने वृत्त में पूरी मानवता को समेट लेती है.

बापसी सिधवा का गुज़रना उपमहाद्वीप की साझी क्षति है

बापसी सिधवा की रचनात्मकता हमें हमारे समाजों को समझने की एक दृष्टि तो देती ही है पर वह हमें हमारे इतिहासों पर भी प्रश्न उठाने के बिंदु देता है. सिधवा उन चंद साहित्यकारों में हैं, जिनकी पहचान के कई आयाम थे. इसलिए सिधवा का गुज़रना इस उपमहाद्वीप की साझी संस्कृति को याद करने का भी एक मौका भी है और साझी क्षति भी.

कमलादेवी चट्टोपाध्याय की जीवनी आधुनिक स्त्रीवादी स्वर को समझने की राह दिखाती है

पुस्तक समीक्षा: अमेरिकी इतिहासकार निको स्लेट द्वारा कमलादेवी चट्टोपाध्याय की जीवनी 'द आर्ट ऑफ फ्रीडम' उनके उस योगदान को केंद्र में लाती है जिसे इतिहास ने विस्मृत कर दिया है.

मंज़ूर एहतेशाम की ‘तमाशा’ अभाव और भव्यताहीन साधारण जीवन का चिर-परिचित सच है

कला हो या जीवन दोनों ही बस अंततः सफल हो जाने वाले नायकों के गुणगान गाते हैं. मंज़ूर एहतेशाम की कहानी ‘तमाशा’ इसके विपरीत संघर्षों में बीत जाने वाले जीवन की कहानी है, बिना किसी परिणाम की प्राप्ति के.

स्त्री तेरी आज़ादी: दर्द की अंजुमन जो मिरा देश है

एक स्वतंत्र और ख़ुद को विकसित बताने वाले देश में स्त्रियों का सुरक्षित न महसूस कर पाना हमारे लोकतंत्र और समाज की साझी असफलता है, लेकिन अपराधी को समय से सज़ा न दे पाना उससे भी बड़े ख़ौफ़ और शर्म का सबब है.

प्रेमचंद: समाज के साथ खड़ा एक निर्भीक लेखक

जन्मदिन विशेष: प्रेमचंद ने 'चंद्रकांता संतति' पढ़ने वाले पाठकों को 'सेवासदन' का पाठक बनाया. साहित्य समाज की अनुकृति मात्र नहीं बल्कि समाज को दिशा भी दिखा सकता है, यह प्रेमचंद से पहले कल्पना करना असंभव था.

नैयरा नूर: सरहदों को घुलाती आवाज़

नैयरा नूर की पैदाइश हिंदुस्तान की थी, पर आख़िरी सांसे उन्होंने पाकिस्तान में लीं. वे इन दोनों मुल्कों की साझी विरासत की उन गिनी चुनी कड़ियों में थी, जिन्हें दोनों ही देश के संगीत प्रेमियों ने तहे-दिल से प्यार दिया.

यांत्रिकता का प्रतिरोध करती कुंवर नारायण की कविता

प्रायः समीक्षकों ने कुंवर नारायण को ऐसा कवि सिद्ध करना चाहा है जिनकी कविताएं बौद्धिकता और अतिवैयक्तिकता के अलावा और कुछ नहीं हैं. शमशेर जैसे कवि को भी उनकी कविताओं में ‘रस’ की कमी लगी. पर यह एकांगी दृष्टि कवि की बहुआयामी रचनाशीलता को कमतर कर के देखने की कवायद है.

‘बाबासाहेब: माई लाइफ विद डॉ. आंबेडकर’ गंभीर छवि वाले जननेता के सबसे सौम्य रूप को दिखाती है

पुस्तक समीक्षा: डॉ. बीआर आंबेडकर की पत्नी डॉ. सविता आंबेडकर की मूल रूप से मराठी में लिखी गई आत्मकथा का अंग्रेज़ी अनुवाद 'बाबासाहेब माई लाइफ विद डॉ. आंबेडकर' के नाम से आया है. यह किताब बाबासाहेब को विशिष्ट विद्वेता या युगांतरकारी छवि से उतारकर एक सामान्य, गृहस्थ के तौर पर सामने रखती है.

कृष्णा सोबती: क्या एक लेखक को उसकी लेखनी से जाना जा सकता है?

जन्मदिवस विशेष: साहित्य में स्त्री की उपस्थिति एक विचारणीय बात है. जिस प्रकार से कला-संस्कृति-समाज सब पुरुषों द्वारा परिभाषित और व्याख्यायित रहे हैं, ऐसे में स्त्री और उसकी भूमिका को भी प्राय: पुरुषों ने परिभाषित किया है. इसीलिए जब स्त्री और उसके इर्द-गिर्द निर्मित संसार को एक स्त्री अभिव्यक्त करती है तो एक अलग दृष्टि-एक अलग पाठ की निर्मिति होती है.

12th फेल और यूपीएससी की चाहत

एक सरकारी नौकरी को पाने के लिए लाखों लाख युवा अपनी युवावस्था, अपनी उत्पादकता के सबसे चरम वर्षों को जिस पूरी यंत्रणा से गुज़ारते हैं, क्या वह वाकई ज़रूरी है?

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