जाति जनगणना की घोषणा पहलगाम में आतंकवादी हिंसा की उत्तेजना के बीच की गई है. लोग पूछ रहे हैं कि पांच साल तक कश्मीर को अपने क़ब्ज़े में रखने के बाद भी भाजपा सरकार क्यों सैलानियों की हिफ़ाज़त नहीं कर पाई? इस सवाल से ध्यान हटाने के लिए सरकार ने जातिगत जनगणना का ऐलान किया, अख़बारों और टीवी चैनलों को एक विषय दे दिया.
जेएनयू के उत्तर पूर्व के विद्यार्थियों के अनुसार उन्हें अलग सुरक्षित जगह चाहिए, या ऐसी जगह जहां वे बहुसंख्या में हों. क्या अब मान लिया जाए कि बहुसंख्या ही सुरक्षा की गारंटी है? जो मांग दिल्ली में वे अपने लिए उठा रहे हैं, क्या वही दूसरे इलाक़ों में वहां बाहर से आये लोग कर सकते हैं?
माओवादियों और राज्य के इस खेल में पड़े बिना हमें सरकार से सशस्त्र कार्रवाई बंद करने की मांग करनी चाहिए. माओवादियों को घोषणा करनी चाहिए कि वे हिंसा रोक रहे हैं. राज्य के लिए बस्तर सिर्फ़ संसाधनों का भंडार है. माओवादियों के लिए यह सिर्फ़ एक आधार है जहां से वे अपनी 'क्रांति' का विस्तार करेंगे. लेकिन बस्तर वास्तव में वहां रहने वाले लोग मिलकर बनाते हैं. वे आदिवासी ही प्राथमिक हैं. न राज्य, न माओवादी.
आरएसएस के जिस विचार को ढांक-तोपकर अटल बिहारी या लालकृष्ण आडवाणी व्यक्त करते थे, उसे मोदी के मुंह से बिना किसी संकोच के सुना जा सकता है. और मोदी के कारण ढेर सारे बुद्धिजीवी और उद्योगपति आरएसएस को सलामी बजाते हैं. आरएसएस को और क्या चाहिए?
पहले हम हिंदुत्ववादियों को मुसलमान विरोधी घृणा फैलाते और हिंसा करते देखते थे, अब पुलिस व प्रशासन को ऐसा करते देख रहे हैं. पुलिस सक्रिय रूप से मुसलमानों को अंधेरे में धकेल रही है. भारत के हिंदुत्ववादीकरण का यह अंतिम चरण है जहां सरकारी मशीनरी मुसलमानों के अपराधीकरण के नए तरीक़े खोज रही है.
मुसलमानों के ख़िलाफ़ घृणा और हिंसा को हिंदू समाज के स्वभाव का अनिवार्य तत्त्व बनाने का अभियान नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कामयाब हुआ है. क़ातिल को मक़तूल का अभिभावक बनाकर पेश करने से बड़ी अश्लीलता क्या हो सकती है?
सद्भाव का बीज दिखलाई पड़ते ही उस पर घृणा का तेज़ाब डाल दिया जाता है. यह नहीं कि सद्भाव की संभावना नहीं है लेकिन उसे यथार्थ करने की इच्छा और मनोबल का अभाव है.
विश्वविद्यालय के अधिकारी जब मानदंडों का उल्लंघन करते हैं, तो अध्यापक समुदाय पर इसका भयानक असर होता है. नौजवान अध्यापकों को विशेष रूप से यह डर रहने लगेगा कि उन्हें उनकी स्वतंत्र राय के लिए दंडित किया जा सकता है.
अनुज चौधरी ने जुमे का ज़िक्र कर इशारा किया कि मुसलमानों को होली के रंग से ऐतराज़ है. कुछ लोगों ने कहा कि ऐतराज़ औरों को भी हो सकता है- कुछ को रंग से एलर्जी हो सकती है, कुछ को रंग पसंद न हों. वे सब मुसलमान हों, ज़रूरी नहीं. जो अनिच्छुक हैं, उन्हें रंग लगाने की ज़िद ही क्यों!
किसी भी व्यक्ति या पाठ को अध्ययन का विषय बनाने का मतलब है उसकी आलोचनात्मक पड़ताल. पढ़ाने का मतलब प्रचार नहीं है. धर्म के अध्ययन को लेकर संकट पैदा होता है क्योंकि धार्मिक लोग धर्म को आलोचना नहीं आस्था का विषय मानते हैं. पर श्रद्धा,आवेश से मुक्त होना कक्षा में प्रवेश की पहली शर्त है.
शिक्षा मंत्री त्रिभाषा सूत्र को संवैधानिक प्रावधान बतला रहे हैं. वे झूठ बोल रहे हैं. संविधान में कहीं भी भाषा के मामले में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है. संविधान में हिंदी अन्य भारतीय भाषाओं की तरह की एक भाषा है लेकिन हिंदीवादी उसे राष्ट्रभाषा कहते रहे हैं.
कुंभ भगदड़ हुई. कितनी मौतें हुईं, अब तक हमें नहीं मालूम. कोविड के चलते कितनी मौतें हुईं, हमें नहीं मालूम. सरकार का कहना है कि इतने लोग ज़िंदा बच गए, उसके लिए हमें सरकार का शुक्रिया अदा करना चाहिए.
‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ की नीतिविहीनता और चतुर सांप्रदायिकता का प्रदर्शन ‘आप’ ने पिछले 11 सालों में बार-बार किया. हर बार कहा गया कि वह अपने आदर्श से विचलित हो रही है. लेकिन वह आदर्श क्या था, यह आज तक किसी ने न बताया. फिर हम किस आदर्शवादी राजनीति से धोखे का रोना रो रहे हैं?
ज़किया जाफ़री ने अपनी ज़िंदगी के पिछले 22 साल इंसाफ़ की जद्दोजहद में झोंक दिए. हर कदम पर भारत के ताकतवर निज़ाम की तरफ़ से रुकावट और मुख़ालिफ़त के बावजूद उन्होंने इंसाफ़ की अपनी टेक नहीं छोड़ी.
राहुल गांधी मात्र एक तथ्य बयान कर रहे थे. भारतीय राज्य का चरित्र पिछले दस बरसों में बुनियादी तौर पर बदल गया है. यह कहने से किसी को बुरा क्यों लगना चाहिए? जो इसके कारण उनकी निंदा कर रहे हैं क्या वे ख़ुद इस बात को नहीं जानते और मानते?