सैयदा हमीद के मन में असम की बहुत ख़ूबसूरत यादें हैं. लेकिन आज अचानक उन्हें अहसास कराया जा रहा है कि वे औरत हैं और मुसलमान हैं. उनकी तकलीफ़ कौन महसूस करना चाहता है?
हिंदू समाज में घृणा पहले भी थी लेकिन 2014 में हमने सारे संकोच को तोड़ दिया जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार किया गया. भारत घृणा और हिंसा की राह पर चल निकला. स्वाधीनता दिवस के दिन इस घृणा का मुख्य प्रवक्ता अपना पुराना, आज़माया हुआ रिकॉर्ड बजा रहा था. क्या उसे सुनकर हमें वितृष्णा होती है?
कर्नाटक की घटना दिल दहलाने वाली है. क्या हिंदू समाज घृणा में इस हद तक आत्मघाती हो चुका है कि अपने बच्चों की बलि देने को तैयार है अगर उससे मुसलमानों को और पीड़ित करने का एक बहाना मिल सके?
5 अगस्त, 2019 के बाद का कश्मीर भारत के लिए आईना है. उसके बाद भारत का तेज़ गति से कश्मीरीकरण हुआ है. नागरिकों के अधिकारों का अपहरण, राज्यपालों का उपद्रव, संघीय सरकार की मनमानी.
न्यायालय और सड़क की भीड़ में भेद मिट जाना चिंता का विषय है. यह एक नई राष्ट्रवादी स्वतःस्फूर्तता का जन्म है. नेहरू प्लेस की भीड़ संगठित नहीं थी. वे लोग बजरंग दल के सदस्य शायद नहीं थे. लेकिन जैसे ही अदालत ग़ज़ा के लिए सहानुभूति की बात सुनते ही बिफर पड़ी, यह भीड़ फ़िलिस्तीन का झंडा देखते ही भड़क उठी.
इन दिनों भाजपा की संघीय सरकार त्रिभाषा सूत्र को लेकर बहुत गंभीर दिखाई दे रही है. उसकी चिंता यह है कि बच्चे अधिक से अधिक भाषा सीख पाएं. लेकिन किसी भी शोध से सिद्ध नहीं हुआ है कि तीन भाषाएं पहले दर्जे से ही सिखाई जानी चाहिए.
संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता के होने के बावजूद भारत में धीरे-धीरे भेदभावपूर्ण क़ानून बन रहे हैं. गोमांस खाने और उसकी ख़रीद बिक्री पर रोक संबंधी क़ानून कई राज्यों में लागू हैं. पिछले वर्षों में कई ऐसे क़ानून बन चुके हैं जो मुसलमानों और ईसाइयों के ख़िलाफ़ हैं. धर्मांतरण से जुड़े हुए क़ानून मुसलमानों और ईसाइयों पर ही लागू किए जाते हैं. इसी तरह नागरिकता के क़ानून में संशोधन का क़ानून भी पारित हो गया.
इज़रायल ईरान पर यह कहकर हमला करता है कि उसके वजूद के लिए वह ख़तरा है. एक मुल्क जिसके पास परमाणु बम हैं, एक पड़ोसी मुल्क पर हमला करता है यह कहकर कि वह परमाणु बम बनाने के क़रीब है.
पिछले कई वर्षों से बक़रीद के नज़दीक आते ही हिंदुओं की तरफ़ से क़ुर्बानी के ख़िलाफ़ शोर बढ़ने लगता है. कई जगह क़ुर्बानी को मुश्किल बनाने के लिए राजकीय नियम कड़े कर किए जाते हैं. सार्वजनिक जगहों पर क़ुर्बानी की मनाही से लेकर दूसरी तरह की पाबंदियां लगाई जाती हैं.
महमूदाबाद के बहाने अब अशोका विश्वविद्यालय पर हमला हो रहा है. क्या हम इस प्रख्यात संस्थान से उम्मीद कर सकते हैं कि वह हॉर्वर्ड की तरह सरकार के सामने सिर उठाकर खड़ा हो जाए? शायद वह परंपरा हमारे यहां नहीं है. संभावना यह है कि इस बार फिर इस संस्थान के आका भाजपा को संतुष्ट करने के लिए कोई बलि दे देंगे.
22 अप्रैल के बाद के हफ़्तों में साबित हुआ कि एक समाज के तौर पर हम परिपक्व नहीं हैं. कोई भी असाधारण घटना हमें जड़ से हिला दे सकती है. इस पूरी परिस्थिति में दहशतगर्दी और पाकिस्तान विरोध के बहाने जो नया उबाल दिखा उसने फिर साबित किया कि भारत की सबसे बड़ी समस्या मुस्लिम समुदाय के प्रति घृणा है.
जिस सरकार ने अब सोफ़िया कुरैशी को अपना चेहरा बनाकर खड़ा किया है, वह एक फ़ौजी की पत्नी के साथ नहीं खड़ी हुई. सिर्फ़ इसलिए उसे अकेला छोड़ दिया गया कि वह अपनी तकलीफ़ के साथ और उसके बावजूद मुसलमानों के साथ खड़ी हुई थी.
हिमांशी नरवाल के बयान में इंसानियत जगाने की जो ताक़त थी, उससे घबराकर हिंदुत्ववादी गिरोह उनकी साख ख़त्म करने के लिए कुत्सा अभियान चलाए हुए हैं. एक साधारण हिंदू के लिए यह परीक्षा की घड़ी है: वह हिमांशी के साथ खड़ा होगा या उस पर हमलावर हिंदुत्ववादियों के साथ?
जाति जनगणना की घोषणा पहलगाम में आतंकवादी हिंसा की उत्तेजना के बीच की गई है. लोग पूछ रहे हैं कि पांच साल तक कश्मीर को अपने क़ब्ज़े में रखने के बाद भी भाजपा सरकार क्यों सैलानियों की हिफ़ाज़त नहीं कर पाई? इस सवाल से ध्यान हटाने के लिए सरकार ने जातिगत जनगणना का ऐलान किया, अख़बारों और टीवी चैनलों को एक विषय दे दिया.
जेएनयू के उत्तर पूर्व के विद्यार्थियों के अनुसार उन्हें अलग सुरक्षित जगह चाहिए, या ऐसी जगह जहां वे बहुसंख्या में हों. क्या अब मान लिया जाए कि बहुसंख्या ही सुरक्षा की गारंटी है? जो मांग दिल्ली में वे अपने लिए उठा रहे हैं, क्या वही दूसरे इलाक़ों में वहां बाहर से आये लोग कर सकते हैं?