ईरान पर हमला हमारे सभ्यतामूलक सहचर देश पर हमला है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: ईरान में दशकों से एक आततायी धार्मिक तानाशाही थी जिससे निजात पाने की ज़िम्मेदारी ईरानी जनता की है. अमेरिका-इज़रायल उसके सर्वोच्च शासक की हत्या कर दें यह किसी भी तरह से उचित नहीं समझा जा सकता. कल को कोई और देश हमारे यहां सत्ता-परिवर्तन करने के लिए हमला कर दे तो क्या इसे हम स्वीकार कर लेंगे?

आचार्य रामचंद्र शुक्ल और कविता की ज़रूरत

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: 'कविता क्या है?’ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि ‘ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएंगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कविकर्म कठिन होता जाएगा.’

बीहड़, अटपटे, अबूझ होते जा रहे संसार में कविता ही आख़िरी मकान है

विश्व सभ्यता में आज शक्तिशाली-बाहुबली अत्याचारियों और शासकों, तानाशाहों, नृशंस अमीरों, प्रबल टैक्नोक्रेट का वर्चस्व है. पर इसी समय में कविता आज भी बहुत सारे जलावतन हुए लोगों और कवियों की मातृभूमि है- बेघरबार हुओं का आख़िरी घर है. रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया जा रहा अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह ‘संसार’ इन्हीं कविताओं को बचाए रखने का प्रयास है.

…जब प्रकाश बदलता है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: फ्रेंच कला में प्रकाश को लेकर एक विशेष आग्रह दिखाई देता है. ऐसा लगता है कि प्रकाश को जितना लक्ष्य किया गया है, उतना कहीं और नहीं हुआ. इसे लेकर रज़ा कहते थे कि कि यहां प्राकृतिक रूप से जो प्रकाश है, उसमें भी लगातार फेरबदल होता रहता है, और कलाकारों ने उसे पकड़ने की कोशिश की है.

अमूर्तन दृष्टि का स्वयंप्रतिष्ठ रूपायन होता है, उसे सिर्फ़ कौशल से समझाया नहीं जा सकता

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कई बार लगता है कि अति उत्साह या कि उत्तेजना में कलाकार, जैसे कि बहुतेरे कवि भी, ज़रूरत से ज़्यादा कह जाते हैं. असल कौशल या सूझ तो इस बात में होती है कि कितना विन्यस्त किया जाए और कितना अविवक्षित रहने दिया जाए. देखने-पढ़ने वाले को यह महसूस होना चाहिए कि ‘है अभी कुछ और जो कहा नहीं गया’.

काशी की प्रतिसत्ता अब सत्ता की चपेट में है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: काशी, जैसा कि बहुत सारा भारत भी, अपनी प्रश्नवाचकता, अपनी बौद्धिक और सर्जनात्मक निर्भीकता और नवाचार से विरत-विपथ हो रहा है. प्रश्नाकुल पांडित्य, निर्भीक विद्वत्ता, उदग्र चिंतन की, सजग और विपथगामी सर्जनात्मकता की काशी अब दिखाई नहीं पड़ती- हो सकता है कि अंतःसलिल हो गई हो.

महात्मा गांधी बीते वक़्त के अवशेष हैं या भविष्य की संभावना?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: पुरुषोत्तम अग्रवाल की नई पुस्तक ‘मज़बूती का नाम महात्मा गांधी’ हमें अपना समय और गांधी को बेहतर समझने में मदद तो करती है- वह गहरे स्तर पर हमें उस खो गई ‘विवेक की छन्नी’ खोजने की ओर उकसाती है जिसके साथ गांधी जी विचार और कर्म करते थे.

सच की जगह कहां बची हुई है?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: सच की जगह कम हो गई है और उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई है. यह अहसास गहराता जाता है कि पूरे समाज में सच के लिए धीरज भी बाक़ी नहीं रहा. फिर भी ऐसे लोग हैं जो निडर सच पर अड़े हुए हैं.

श्रीकांत वर्मा की कविता एक अनवरत घमासान है, जिसे कवि निहत्था लड़ रहा है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: श्रीकांत वर्मा गहरे क्षोभ, बेबाक नाराज़ी, अदम्य असंतोष और आत्मप्रताड़न के भी कवि हैं. पर साथ-साथ वे जीवन में अब भी बच पाई कोमलता, लालित्य, सुंदरता, प्रेम और करुणा के भी कवि रहे हैं.

प्रेमचंद को याद करते हुए…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: जिस ‘महाजनी सभ्यता’ का प्रेमचंद ने विरोध किया था उस सभ्यता ने हमारे लोकतंत्र पर, कम से कम शासनतंत्र पर, कब्ज़ा कर लिया है. जिस साहित्य को प्रेमचंद ने कभी देशभक्ति और राजनीति के ‘आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई’ कहा था, उस साहित्य का एक बड़ा हिस्सा राजनीति का पिछलगुआ होता जा रहा है.

नया वर्ष एक पंचांग की घटना भर है, उससे अधिक कुछ नहीं

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: दिल्ली में इतनी धुंध और प्रदूषण है कि ऐसे में नववर्ष के लिए कुछ शुभकामनाएं करना बहुत कठिन लग रहा है. हम झूठ-झांसे-झगड़े-नफ़रत-अत्याचार-हिंसा-बलात्कार आदि के इतना आदी हो गए हैं कि उनका विरोध तो दूर उनसे नए वर्ष में हम कुछ ऊबने लगेंगे इसकी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती.

सरकारी अनुमोदन के भरोसे साहित्य अकादेमी की ‘स्वायत्तता’!

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इस वर्ष साहित्य अकादेमी पुरस्कार एक प्रेस वार्ता में घोषित किए जाने के पहले संस्कृति मंत्रालय के निर्देश पर रोक लिए गए कि मंत्रालय से उनका अनुमोदन होना है. यह अकादेमियों की स्वायत्तता को सीधे अवमूल्यित करना और अकादेमी के लेखक-सदस्यों, जूरी के लेखक-सदस्यों और पुरस्कार के लिए अनुशंसित लेखकों सभी का एक साथ अपमान है.

‘जब याद आए तो तारों के पड़ोस में, किसी भी तारे को ढूंढकर मुझे देख लेना…’

स्मृति शेष: विनोद कुमार शुक्ल के यहां विचार से मनुष्यता नहीं बनती, मनुष्यता से विचार उपजता है. भाषा व्याकरण का पालन नहीं करती- उनकी रचना उनकी कल्पना का व्याकरण है.

संगीत ने स्त्रियों को और स्त्रियों ने संगीत को सशक्त किया…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: संगीत में स्त्रियों की उपस्थिति का साक्ष्य विरल है मगर आधुनिक शास्त्रीय संगीत में जल्दी ही स्त्रियों की शिरकत होने लगी. मिनिएचर कला में जो रागमाला का चित्रण है वह मुख्यतः स्त्री-केंद्रित है. ख़याल गायकी में स्त्री की उपस्थिति प्रबल और व्यापक है.

हमारा समय देर-सबेर बीत जाएगा, साहित्य नहीं बीतेगा

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: साहित्य का आज यह आपद्कार्य है कि वह खुली आंखों से साहस को पहचाने और उसकी भी निगरानी करे कि वह कहां-कब ग़ायब हो जाता है. साहित्य का, इस समय, यह भी कर्तव्य है कि वह स्वयं निर्भय हो, भयोत्पादक व्यवस्थाओं में शामिल या उनके बारे में चुप्पी साधने से इनकार करे और हमें निर्भयता की ओर ले जाए.

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