श्रीकांत वर्मा की कविता एक अनवरत घमासान है, जिसे कवि निहत्था लड़ रहा है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: श्रीकांत वर्मा गहरे क्षोभ, बेबाक नाराज़ी, अदम्य असंतोष और आत्मप्रताड़न के भी कवि हैं. पर साथ-साथ वे जीवन में अब भी बच पाई कोमलता, लालित्य, सुंदरता, प्रेम और करुणा के भी कवि रहे हैं.

प्रेमचंद को याद करते हुए…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: जिस ‘महाजनी सभ्यता’ का प्रेमचंद ने विरोध किया था उस सभ्यता ने हमारे लोकतंत्र पर, कम से कम शासनतंत्र पर, कब्ज़ा कर लिया है. जिस साहित्य को प्रेमचंद ने कभी देशभक्ति और राजनीति के ‘आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई’ कहा था, उस साहित्य का एक बड़ा हिस्सा राजनीति का पिछलगुआ होता जा रहा है.

नया वर्ष एक पंचांग की घटना भर है, उससे अधिक कुछ नहीं

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: दिल्ली में इतनी धुंध और प्रदूषण है कि ऐसे में नववर्ष के लिए कुछ शुभकामनाएं करना बहुत कठिन लग रहा है. हम झूठ-झांसे-झगड़े-नफ़रत-अत्याचार-हिंसा-बलात्कार आदि के इतना आदी हो गए हैं कि उनका विरोध तो दूर उनसे नए वर्ष में हम कुछ ऊबने लगेंगे इसकी कोई उम्मीद नहीं की जा सकती.

सरकारी अनुमोदन के भरोसे साहित्य अकादेमी की ‘स्वायत्तता’!

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इस वर्ष साहित्य अकादेमी पुरस्कार एक प्रेस वार्ता में घोषित किए जाने के पहले संस्कृति मंत्रालय के निर्देश पर रोक लिए गए कि मंत्रालय से उनका अनुमोदन होना है. यह अकादेमियों की स्वायत्तता को सीधे अवमूल्यित करना और अकादेमी के लेखक-सदस्यों, जूरी के लेखक-सदस्यों और पुरस्कार के लिए अनुशंसित लेखकों सभी का एक साथ अपमान है.

‘जब याद आए तो तारों के पड़ोस में, किसी भी तारे को ढूंढकर मुझे देख लेना…’

स्मृति शेष: विनोद कुमार शुक्ल के यहां विचार से मनुष्यता नहीं बनती, मनुष्यता से विचार उपजता है. भाषा व्याकरण का पालन नहीं करती- उनकी रचना उनकी कल्पना का व्याकरण है.

संगीत ने स्त्रियों को और स्त्रियों ने संगीत को सशक्त किया…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: संगीत में स्त्रियों की उपस्थिति का साक्ष्य विरल है मगर आधुनिक शास्त्रीय संगीत में जल्दी ही स्त्रियों की शिरकत होने लगी. मिनिएचर कला में जो रागमाला का चित्रण है वह मुख्यतः स्त्री-केंद्रित है. ख़याल गायकी में स्त्री की उपस्थिति प्रबल और व्यापक है.

हमारा समय देर-सबेर बीत जाएगा, साहित्य नहीं बीतेगा

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: साहित्य का आज यह आपद्कार्य है कि वह खुली आंखों से साहस को पहचाने और उसकी भी निगरानी करे कि वह कहां-कब ग़ायब हो जाता है. साहित्य का, इस समय, यह भी कर्तव्य है कि वह स्वयं निर्भय हो, भयोत्पादक व्यवस्थाओं में शामिल या उनके बारे में चुप्पी साधने से इनकार करे और हमें निर्भयता की ओर ले जाए.

समकालीन कला उतनी स्मृतिहीन नहीं है जितनी समकालीन आलोचना

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदी आलोचना की तरह, कलालोचना में, ‘नितान्त समसामयिकता’ का लगभग वर्चस्व-सा है. आलोचना का एक बड़ा हिस्सा गैलरियों के आग्रह और उनके द्वारा दिए गए मोटे पारिश्रमिक पर लिखा जाता है. इसलिए उसमें विश्लेषण और प्रशंसा तो होती है, किसी तरह की कमी का उल्लेख नहीं होता.

न कोई तटस्थ साहित्य होता है, न तटस्थ इतिहास…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इतिहास ज़्यादातर बहिर्मुख होता है, साहित्य अंतर्मुख भी. सचाई पर दोनों में से किसी का एकाधिकार नहीं होता, न हो पाता है. इतिहास और साहित्य दोनों की सचाई के गल्प रचते हैं. साहित्य अपनी गल्पता खुले ढंग से स्वीकार करता है पर इतिहास को अपनी गल्पता स्वीकार करने में हिचक है, होती है.

अख़लाक़ लिंचिंग का एक दशक: असहिष्णुता को लगभग वैधता मिल चुकी है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: सत्ता पहले असहिष्णुता को बढ़ावा देती है, फिर हिंसा की अनदेखी करती है और फिर अपराधियों को बगैर दंड दिए छोड़ देती है. क्या यह संविधान से जानबूझकर किया जा रहा अपसरण नहीं है?

हम साहित्य के पास विचार नहीं जीवन का स्पंदन पाने जाते हैं…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अगर हम साहित्य के पास जाते और उससे प्रतिकृत होते हैं तो उसमें जीवन के स्पंदन की बड़ी भूमिका है. किसी कृति में जीवन का स्पंदन हमें आकर्षित करता है और स्पंदन की अनुपस्थिति साहित्य से अपनापा नहीं जगाती.

लोकतंत्र, सभ्यता और भारतीयता पर मंडराता संकट

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: भारतीयता की कोई प्रामाणिक परिभाषा बहुवचन में ही हो सकती है, एकवचन में नहीं. भारतीयता बहुधार्मिक, बहुभाषिक, बहुआंचलिक, बहुसांस्कृतिक रही है. हमारे संवैधानिक लोकतंत्र ने भारतीयता के इन मूल्यों को आत्मसात् किया है. एकवचन पर बल देकर बहुसंख्यावादी तंत्र हमारी बहुलता को नष्ट कर रहे हैं.

लोकतंत्र का लाभार्थी मध्यवर्ग अब चुपचाप देख रहा है उसी लोकतंत्र को दरकते

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: जब किसी समाज के इतने सारे लोग यह महसूस करने लगें कि वे कुछ नहीं कर सकते; दूसरों को अच्छा-बुरा कहते-करते देख भर सकते हैं; कि उनकी एकमात्र चिंता अपने को सुरक्षित बनाए रखने की है; कि उनमें साहस और विकल्पबुद्धि बिल्कुल ही नहीं बचे हैं तो ऐसा समाज बीमार समाज है

अनुत्तरित लोग: आदिवासी स्वर में गूंजती पृथ्वी की कविता

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कानजी पटेल के संपादन में हिंदी और अंग्रेज़ी अनुवाद में भारतीय समकालीन आदिवासी कविता संचयन ‘अनुत्तरित लोग’ में 141 भाषाओं के 382 कवियों की 700 कविताएं अपने मूल में हिंदी अनुवाद के साथ शामिल हैं. इस तरह यह भारत की आदिवासी कविता का सबसे वृहद संकलन है.

अस्सी के हुए नंद किशोर आचार्य: समाजवादी दृष्टि के कवि

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदी में एक ध्रुवीकरण प्रगतिशीलता-जनवाद बरक़्स कलावाद के रूप में बन गया है. इस पर ध्यान नहीं गया कि इस ध्रुवीकरण ने उस बड़ी जगह को हिसाब में ही नहीं लिया जिसमें समाजवादी दृष्टि से प्रेरित अनेक लेखक सक्रिय थे और हैं. नंद किशोर आचार्य इसी धारा के लेखक हैं.

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