जब हिंदी और उर्दू धार्मिक पहचान की भाषा बनीं: स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भाषाई राजनीति पर केंद्रित किताब

पुस्तक समीक्षा: हिंदी और उर्दू की धार्मिक अस्मिता से जुड़ाव क्या केवल अंग्रेज़ों की देन थी या इसमें भारतीय विद्वानों की भी कोई भूमिका थी? इन सवालों की बहुत गहन और सारगर्भित पड़ताल शुभनीत कौशिक की हालिया किताब ‘भाषा की राजनीति, ज्ञान की परम्परा' करती है.

छात्र गतिविधियों पर लगते अंकुश, सिसक रहा इलाहाबाद विश्वविद्यालय  

पिछले वर्षों में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र गतिविधियों और बहस-विमर्श की जगह सिकुड़ रही है. प्रशासनिक शिकंजा कसता गया है. इस संस्थान की आत्मा को मार दिया गया है.

ओबीसी जातियों का वर्गीकरण: आज भी अनुत्तरित हैं मंडल आयोग के सदस्य एलआर नायक के प्रश्न

राष्ट्रीय स्तर पर ईबीसी की विशेष मान्यता के शुरुआती अधिवक्ता एल.आर. नायक मंडल आयोग के सदस्य थे. 1980 में उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों से असहमति जाहिर की थी, जिसमें उन्होंने सभी ओबीसी जातियों को एक ही सजातीय समूह मानने के ख़तरों के बारे में चेतावनी दी थी.

रामचरण मल्लाह और मल्लाहों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का सौ साल पुराना संघर्ष

रामचरण मल्लाह एक प्रशिक्षित वकील के रूप में 20वीं सदी के शुरुआती दौर में लखनऊ में निषाद और मल्लाह जातियों की एक प्रमुख आवाज़ बनकर उभरे. 1925 में उन्होंने निषाद/मल्लाह समुदाय में राजनीतिक जागरूकता लाने के उद्देश्य से ‘अखिल भारतीय निषाद महासभा’ की स्थापना की थी.

आंतरिक असमानताओं और वर्गीकरण पर टिकी है ‘ओबीसी एकता’ की राजनीति

अधिकांश पिछड़ी जातियों के ख़िलाफ़ भेदभाव केवल उच्च जातियों द्वारा ही नहीं किया जाता है, बल्कि 'प्रभुत्वशाली ओबीसी जातियों' द्वारा भी किया जाता है. ओबीसी की प्रथम स्तरीय जातियों में कुछ जातियां दबंग स्वभाव की हैं. यह जातियां ओबीसी की अन्य जातियों पर सामंतवादी व्यवहार करती पाई जाती हैं.

नदी पुत्र: निषाद समुदाय के इतिहास की छानबीन करती किताब

पुस्तक समीक्षा: रमाशंकर सिंह की किताब ‘नदी पुत्र: उत्तर भारत में निषाद और नदी’ हाल ही में प्रकाशित होकर आई है. इस किताब में नदियों के साथ जुड़ीं निषाद समुदाय की स्मृतियों, ऐतिहासिक दावेदारियों, सामाजिक गतिशीलता, अपवंचना और बहिष्करण के तत्वों की पड़ताल की गई है.