25 जुलाई को नई दिल्ली में आयोजित ‘भागीदारी न्याय सम्मेलन’ में बोलते हुए राहुल गांधी ने कहा, ‘मैं 2004 से राजनीति में हूं-जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं, तो मुझे लगता है कि मैंने गलती की. मैंने ओबीसी की उस तरह रक्षा नहीं की जैसी मुझे करनी चाहिए थी. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मैं उस समय आपके मुद्दों को गहराई से नहीं समझ पाया था…मुझे अफ़सोस है कि अगर मुझे आपके (ओबीसी) इतिहास और आपके मुद्दों के बारे में थोड़ा भी पता होता, तो मैं उस समय ही जाति जनगणना करा लेता. यह मेरी गलती है. मैं उस गलती को सुधारने जा रहा हूं.’
उनका यह बयान आत्मचिंतन का संकेत देता है, फिर भी राहुल गांधी समकालीन भारतीय राजनीति की एक केंद्रीय वास्तविकता को समझने में अभी भी असफल रहे हैं. भाजपा के मूल मतदाता आधार में ‘अति पिछड़ा वर्ग’ शामिल हैं. सीएसडीएस के आंकड़े लगातार दर्शाते रहे हैं कि इस समूह ने हाल के हुए चुनावों में भाजपा के पक्ष में मतदान किया है.
यह आंकड़े बताते हैं कि ईबीसी- विशेषकर नाविक, मल्लाह, निषाद और अन्य सीमांत ओबीसी जैसे समुदाय भाजपा की ओर झुके हुए हैं. 2017, 2022 और 2024 के लोकसभा चुनाव में इन समुदायों के एक बड़े प्रतिशत ने भाजपा को वोट दिया. वर्तमान में उनका मतदान व्यवहार राजनीतिक रूप से निर्णायक है. उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में- जहां जातिगत पहचान राजनीतिक लामबंदी को मजबूती से प्रभावित करती है, वहां यह पूरे प्रदेश के नतीजों को प्रभावित कर रहे हैं. उनकी उपेक्षा करना जैसा कि कांग्रेस और सपा दोनों अपनी वर्तमान रणनीतियों में करते दिख रहे हैं, ठीक नही होगा.
हालांकि, अखिलेश यादव ने ‘पीडीए’ राजनीति में इन जातियों के उम्मीदवार और पार्टी पदों में प्रतिनिधित्व दिया है जो महत्वपूर्ण है, लेकिन इनके लिए विशेष नीतियों का यहां अभी भी अभाव है.
केंद्रीय स्तर पर और कई राज्यों में नहीं हुआ ओबीसी का वर्गीकरण
ऐसा नहीं है कि मतदाताओं की यह श्रेणी अचानक उभरी हो. कालेलकर आयोग ने 1955 में ही 837 ‘अत्यंत पिछड़ी’ जातियों की पहचान की थी और उनके लिए विशेष सुविधाओं की सिफारिश की थी. इसके बाद कई राज्यों में गठित पिछड़ा वर्ग आयोगों ने स्वीकार किया कि व्यापक ओबीसी समूह के भीतर कुछ जातियाँ स्पष्ट रूप से अधिक वंचित हैं, जिन्हें राज्य द्वारा अतिरिक्त संरक्षण की आवश्यकता है.
विडंबना है कि केंद्रीय स्तर पर और कई राज्यों में ओबीसी का वर्गीकरण नहीं हुआ है, जिसका लाभ कुछ प्रभावशाली जातियों तक सीमित होकर रह गया है. इस असंतुलन ने अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा को लाभ पहुंचाया है, जिसने प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व, सामुदायिक पहुंच और कल्याणकारी लक्ष्यों के माध्यम से ईबीसी के साथ सीधे राजनीतिक संबंध बनाने में कामयाबी हासिल की है.
राष्ट्रीय स्तर पर ईबीसी की विशेष मान्यता के शुरुआती और सबसे सशक्त अधिवक्ताओं में से एक एल.आर. नायक मंडल आयोग के सदस्य थे. 1980 में उन्होंने मंडल आयोग की सिफारिशों से असहमति जाहिर की थी, जिसमें उन्होंने सभी ओबीसी जातियों को एक ही सजातीय समूह मानने के ख़तरों के बारे में चेतावनी दी थी.
मंडल आयोग ने 31 दिसंबर 1980 को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की और 1990 में प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह द्वारा इसे लागू किया गया. हालांकि रिपोर्ट की सिफ़ारिशों-विशेषकर, केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी के लिए 27% आरक्षण-को क्रांतिकारी बताया गया, लेकिन नायक का मानना था कि यह ढांचा त्रुटिपूर्ण था.
‘दलित पिछड़े वर्ग’ अधिक उन्नत ओबीसी समूह
आयोग की रिपोर्ट के खंड 7 में दर्ज उनकी असहमति कहती थी कि ओबीसी श्रेणी में ऐसे समुदाय हैं, जो सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से ‘मध्यवर्ती जातियों’ की तुलना में काफ़ी पिछड़े हैं. उन्होंने इनके लिए ‘दलित पिछड़ा वर्ग’ पदबंध का प्रयोग किया.
उन्होंने कहा कि विशेष सुरक्षा उपायों के बिना यह ‘दलित पिछड़े वर्ग’ अधिक उन्नत ओबीसी समूहों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थ होंगे. उच्च जातियों के साथ प्रतियोगिता में तो कोसों दूर होंगे.
नायक के अनुसार आंतरिक वर्गीकरण के अभाव में मध्यवर्ती पिछड़े वर्ग-जिनके उच्च जातियों के साथ ऐतिहासिक रूप से सह-अस्तित्व के संबंध हैं और जिनकी सामाजिक- आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है- उन्हें आरक्षण का एकतरफा लाभ होगा. इस बीच सबसे हाशिए पर पड़े ओबीसी, मसलन मछुआरे, नाविक, धोबी, नाई, मोची, चरवाहे, खानाबदोश जनजातियां, पूर्व-अपराधी जनजातियां, इत्यादि पीछे छूटते जाएंगे.
उन्होंने एक उदहारण दिया कि ‘अगर एक बड़ी मछली और एक छोटी मछली को एक साथ रखा जाए, तो पहली दूसरी को निगल जाएगी.’
नायक ने प्रस्तावित किया कि ओबीसी सूची को दो उपश्रेणियों में विभाजित किया जाए. कुल 27% आरक्षण में से सूची ए में ‘दलित पिछड़ा वर्ग’ जिसकी जनसंख्या लगभग 25.56% है; उन्हें 15% आरक्षण और सूची बी में ‘मध्यम पिछड़ा वर्ग’ को रखा जाए, जिसकी आबादी 26.44% है; उन्हें 12% आरक्षण दिया जाए.
उन्होंने यह भी आग्रह किया कि ‘दलित पिछड़ा वर्ग’ को भी छात्रवृत्ति, सब्सिडी, कौशल विकास कार्यक्रम और लक्षित कल्याणकारी योजनाओं के लाभ प्रदान कियें जाए जो अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को प्रदान किये जाते हैं.
राजनीतिक आरक्षण का समर्थन नहीं
हालांकि, उन्होंने उनके लिए राजनीतिक आरक्षण का समर्थन नहीं किया. महत्वपूर्ण बात यह है कि नायक ने इन समुदायों से एकजुट और संगठित होने का आह्वान किया और चेतावनी दी, ‘उनके(अति पिछड़े वर्ग) के पास खोने के लिए कुछ नहीं है, सिवाय उनके सदियों पुराने शोषण की जंजीरों के.’
उन्होंने भारत में अपने व्यापक दौरों के दौरान देखा कि
‘मध्यम पिछड़े वर्गों’ में एक प्रवृत्ति तेज़ी से विकसित हो रही है कि वह ‘दलित पिछड़े वर्ग’ के साथ ऊंची जातियों की तरह व्यवहार करते हैं. इस असमान समाज में यह आवश्यक है कि आयोग सभी सावधानियां बरते ताकि गलाकाट प्रतिस्पर्धा के कारण सबसे कमतर जातियां विभिन्न लाभों से वंचित न रह जाएं.
उन्होंने शासक वर्गों-राजनीतिक और नौकरशाही दोनों को चेतावनी दी कि जब तक ‘दलित पिछड़े वर्गों’ को अन्य पिछड़े समूहों के बराबर नहीं लाया जाता, तब तक समतावादी समाज का संवैधानिक लक्ष्य एक मिथक ही रहेगा.
पैंतालीस साल बाद भी नायक द्वारा उठाए गए मुद्दे अनसुलझे हैं. रोहिणी आयोग जिसे ओबीसी के उप-वर्गीकरण की जांच का कार्य सौंपा गया था, उसने पाया कि आरक्षण का अधिकांश लाभ कुछ जातियों तक सिमटकर रह गया है, जिसमें सैकड़ों छोटे, गरीब समुदायों का प्रतिनिधित्व नगण्य है. इसके अनुभवजन्य निष्कर्षों ने नायक की 1980 की भविष्यवाणी की पुष्टि की.
इसी प्रकार, उत्तर प्रदेश में 2001 में गठित सामाजिक न्याय समिति ने भी निष्कर्ष निकाला कि निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए आंतरिक वर्गीकरण आवश्यक था. इन रिपोर्टों के बावजूद, राजनीतिक दल प्रभावशाली ओबीसी समूहों की प्रतिक्रिया के डर से सार्थक उप-वर्गीकरण को लागू करने में अनिच्छुक रहे हैं.
एल. आर. नायक द्वारा मंडल आयोग से असहमति भारत के आरक्षण ढाँचे में एक गहरी खामी की स्पष्ट पहचान थी. ओबीसी की एकरूपता की धारणा के विरुद्ध चेतावनी देकर उन्होंने पिछड़े वर्गों के भीतर मौजूद संरचनात्मक असमानताओं को उजागर किया. आंतरिक वर्गीकरण का उनका आह्वान-जिसे बाद के आयोगों ने भी समर्थन दिया-भारत में सामाजिक न्याय नीति के सबसे कम चर्चित, फिर भी महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है.
ईबीसी मतदाताओं के बीच भाजपा का प्रभुत्व
वर्तमान राजनीतिक माहौल में, जहां ईबीसी मतदाताओं के बीच भाजपा का प्रभुत्व चुनावी जीत का एक प्रमुख कारक है, कांग्रेस और अन्य इंडिया गठबंधन के दल इनके मुद्दों को दरकिनार नहीं कर सकते. यदि वे वास्तव में भाजपा के दबदबे को चुनौती देना चाहते हैं, तो उन्हें ‘अति पिछड़े’ ओबीसी समूहों की चिंताओं से सीधे जुड़ना होगा. उन्हें ऐसी कल्याणकारी योजनाएं तैयार करनी होंगी जो स्पष्ट रूप से ईबीसी को लक्षित करें.
पार्टी संरचनाओं में ईबीसी नेताओं को सार्थक भूमिकाएं प्रदान करनी होगी. ओबीसी के भीतर आंतरिक असमानताओं को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना और उन्हें दूर करने के लिए प्रतिबद्ध होना होगा. इन पार्टियों को नायक के ढाँचे को अपनाना होगा, तभी संविधान में निहित स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को सभी के लिए सुनिश्चित किया जा सकता है.
(संदर्भ: मंडल आयोग रिपोर्ट 1980: खंड 7: पृ. 229-231)
(लेखक इलाहाबाद स्थित जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में शोध छात्र हैं.)
