तिरंगे से बलिदान की अनगिनत कहानियां जुड़ी हैं. सबके पास कोई कहानी है. पर स्वतंत्र भारत में तिरंगे की कुछ अलग कहानियां भी हैं. इनको भी न भूलें. न इनको नज़रअंदाज़ करें. ये डरावनी कहानियां हैं. ये उन बलिदान कथाओं को मुंह चिढ़ाती हैं. तिरंगे की ये नई कहानियां भी पढ़ें.
महावीर प्रसाद द्विवेदी ने लिखा था कि साहित्य समाज का दर्पण है. यह बड़ा दिलचस्प वाक्य है. सुनकर अच्छा भी लगता है. बोलने वाले इस पर तालियां भी पिटवा ले जाते हैं. लेकिन यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो समकालीन हिंदी व्यंग्य के दर्पण में कुछ दिखता क्यों नहीं, यह दर्पण दोनों तरफ से काला क्यों है? रचनाकार का समय में पढ़िए व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी को.