स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ के अवसर पर द वायर हिंदी ‘आज़ादी के मायने’ नाम से एक श्रृंखला शुरू कर रहा है, जहां हम समकालीन लेखकों-विचारकों के लिए आज़ादी क्या है, इस बारे में उनके विचारों से रूबरू होंगे. एक तरह से यह श्रृंखला स्वतंत्रता को आज के संदर्भो में, उसके रोज़ाना के अर्थों में समझने का, उसके मायनों से वाक़िफ़ होने का अवसर है. प्रस्तुत है सातवीं क़िस्त.
§
।।कथा एक।।
झंडा फहराने के बाद मंत्री जी सलामी मंच पर हैं.
सामने से परेड गुजर रही है, तिरंगे को सेल्यूट करती.
तिरंगे के साथ मंत्री जी को मुफ़्त में ही सलामी मिल रही है. उनसे देर तक खड़े नहीं रहा जाता. मोटा पेट और घुटने परेशान करते हैं. जैसे तैसे राम-राम करके परेड निबटाई. थक गया बेचारा. इधर तिरंगा पूरी शान से लहरा रहा है. सामने ही बच्चे, जवान, बूढ़े; सभी उसे बड़े गर्व से देख रहे हैं. इन सबको को देखकर तिरंगा और भी उत्साह से लहराने लगा.
अब मंच से बच्चों के देशभक्ति गीत चल रहे हैं. मंत्रीजी एकदम सामने, बड़े सोफे पर. उनका ध्यान ‘झंडा ऊंचा रहे हमारा’ पर है ही नहीं. जल्दी निबटाओ यार! क्या ये स्साला ‘इस देश को रखना मेरे बच्चों संभालकर.’ वह बेचैन है. इत्ता लंबा खींच दिया कार्यक्रम, हद है!
मंत्री ने साथ खड़े पी.ए. को इशारा किया. वो झुककर कान मंत्री जी के मुंह के पास लाकर खड़ा हो गया.
…जी सर? …जादौन का फोन आया तो था? बोलने लगा, आज स्वतंत्रता दिवस पर मंत्रालय तो बंद रहेगा सो वह लिफाफा लेकर कल….
मंत्रीजी बिफर गए. …उसे वापस फोन करो. अभी करो. कहो, स्वतंत्रता दिवस का बहाना नहीं चलेगा. हमें आज ही पेमेंट चाहिये. अभी-के-अभी हमारे बंगले पर जाएं. हम इधर झंडे-फंडे में बिजी हैं, पर मैडम घर होंगी, वे ले लेंगी, बता दो उसे.…
कार्यक्रम बढ़िया चल रहा है. खूब उत्साह से.
बस, झंडा अब वैसा नहीं लहरा रहा.
झंडा उदास-सा लटक गया है. हवा रुक गई है शायद.
या कहीं, तिरंगे ने मंत्री जी की बातें तो नहीं सुन लीं?
।।कथा दो।।
मंत्री जी की कार के बोनट पर तिरंगा लगा है.
कार पर मंत्रीजी सवार हों तो ड्राइवर झंडा खोल देता है. प्रोटोकॉल है.
कार फर्राटे से भागती है तो तिरंगा ज़ोर से हवा में फहराने लगता है.
तेज हवा. ज़माने भर की धूल-धक्कड़. धूप. आंधी. धुआं. प्रदूषण. और इनके बीच भागती कार पर फंसा तिरंगा. लहरा रहा है कि फड़फड़ा रहा है, बताना कठिन.
लहरा रहा है, कहकर गर्व कर सकते हैं हम, पर असल में तिरंगा तो सरकारी ड्यूटी पर है- जनता को यह बताने की ड्यूटी कि कार में मंत्री जा रहा है, तनिक संभल के बेट्टा! तिरंगा यहां ताकत के प्रदर्शन का हथियार बन गया है. मंत्री की कार पर लगा हर तिरंगा बड़ा मजबूर लगता है. एक मंत्री की कार का रूतबा बढ़ाने के लिए तिरंगे को रास्ते भर धूल-धक्कड़ से गुज़रना पड़ता है.
और मंत्री?
वह देश की धूल, हवा, मुसीबतों से परे इस बंद एयरकंडीशन गाड़ी में आराम से चला जा रहा है. आज स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराने के बाद जब वो कार में लौट रहा था तो उसने ड्राइवर को फटकारा भी कि गाड़ी का एयरकंडीशनर ठीक कराओ, काम नहीं कर रहा .
मंत्री बेख़बर है कि उसने तिरंगे को किस स्थिति में रख छोड़ा है!
।।कथा तीन।।
अपनी जाति, धर्म और संप्रदाय का झंडा लेकर निकले थे लोग.
कोई गौरव यात्रा थी, या विरोध मार्च, या दंगे की तैयारी जहां ऐसे झंडे दंगाइयों का मनोबल बढ़ाने का काम करते हैं. अपना झंडा लिए लोग निकले हुए थे कि सामने तिरंगा पड़ गया .
अब?
दुविधा आ गई, राष्ट्र बड़ा कि धर्म?
खाप पंचायत बड़ी कि देश का कानून?
संविधान बड़ा कि फ़तवा?
अदालत बड़ी कि दंगाई?
…सवाल बड़े थे पर उत्तर इस भीड़ में किसी के पास नहीं थे. ऐसे में क्या किया जाए? क्या तिरंगे को लांघकर धर्मयुद्ध पर निकल जाया जाये? तिरंगे का कितना लिहाज़ किया जाये, कितना नहीं?
धर्मप्राण लोग परेशान थे. बेचारे असमंजस में हैं. भीड़ के एक हाथ में नंगी तलवार, एक में अपना ही झंडा, पर अभी इस तिरंगे का क्या करें? बड़ी परेशानी है. हर स्वतंत्रता दिवस पर ये तिरंगा ऐसे लोगों का रास्ता रोक कर हमेशा खड़ा हो जाता है. तिरंगे को विश्वास है कि एक दिन ये लोग भी समझ जायेंगे कि उनका असली झंडा कौन सा है.
परंतु तिरंगे को देश की बदली राजनीतिक समझ की ख़बर ही नहीं.
अब राजनीति के एक हाथ में धर्म ध्वजा और दूसरे में तिरंगा रहता है. सबकी यही रणनीति है.
।।कथा चार।।
भीड़ भरी सड़क से कार निकल रही है.
चौराहे पर लाल बत्ती पर कुछ बच्चे तिरंगा बेच रहे हैं.
कल स्वतंत्रता दिवस है. आज खूब बिकेंगे. कागज़ के छोटे-छोटे तिरंगे. छोटे-छोटे मासूम बच्चे लेकर घूम रहे हैं, कारों के पीछे दौड़ रहे हैं. एक बच्चा तो इतना नन्हा-सा है कि उसे स्वतंत्रता दिवस का मतलब ही न मालूम होगा परंतु पेट की भूख का मतलब उसे रटा हुआ है .
‘ले लो साहब, एक रुपये में एक’ दस-बारह झंडे हैं उसकी मुट्ठी में.
वो झंडे लेकर लोगों का पीछा कर रहा है. कोई तो ख़रीद ले.
‘क्यों से, हमीं मिले उल्लू बनाने को? पीछे तो तू ही एक रुपये में दो तिरंगे दे रहा था?’ रुकी हुई कार में बैठे अंकल मुस्कुराते फटकारने लगे.
‘चलो, आप एक रुपये में दो ही ले लो..’
उसने एक और तिरंगा निकाल कर दो की जोड़ी आगे बढ़ा दी.
‘नहीं, नहीं चाहिए.’
अंकल की कार धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी.
बच्चा पीछे लगा रहा .
‘अच्छा, तीन ले लो बाबूजी.’
बच्चा तिरंगे का मोलभाव कर रहा है.
बाप ने सारे तिरंगे गिनकर पकड़ाये हैं. सख्त हिदायत देकर यहां छोड़कर गया है कि आज-के-आज सारे बेचकर ही घर लौटना है. कल पंद्रह अगस्त निकल गया तो एक भी न बिकेगा. तिरंगे को छाती से लगाकर घूम रहा है बच्चा. स्वतंत्रता दिवस का उसे ठीक से नहीं पता उसे पर वह जानता है कि सारे झंडे बेच दिये तो बाप से नहीं पिटेगा और आज भूखा नहीं सोना पड़ेगा.
।।कथा पांच।।
‘पंद्रह अगस्त आ रहा है. तिरंगा लगेगा.’ अध्यक्ष महोदय ने कहा.
पार्टी का ग्रामीण कार्यालय.
स्वतंत्रता दिवस की तैयारी के लिए कर्मठ कार्यकर्ताओं के साथ स्थानीय अध्यक्ष महोदय बैठे. उपाध्यक्ष ने बहाना मार दिया. वे नहीं पहुंचे हैं. नाराज़ रहते हैं. अध्यक्ष जी से प्रतिद्वंदता रहती है. कल बोलने लगे, इस बार झंडा हम फहरायेंगे, छब्बीस जनवरी वाला अध्यक्ष जी ने फहरा दिया, इस बार हम करेंगे. अध्यक्ष जी तैयार नहीं हुए. इस पर उपाध्यक्ष जी पार्टी एकता का मुद्दा उठाने लगे. बोले कि ऐसे पार्टी कैसे चलेगी? वे रूठ गए. आज आये ही नहीं. आज की मीटिंग से तीन साथियों को लेकर गायब हैं.
अध्यक्ष जी ने आते ही उपाध्यक्ष जी के लिए हॉल में चहुतरफा देखा और मुस्कुराकर पूछा: चौरसिया जी नहीं आए?’
सब हंस पड़े.
किसी ने बताया: ‘जिला कार्यालय चले गए हैं. बोले, वहां के प्रोग्राम में शामिल होंगे. वहां साथियों को बतायेंगे कि यहां गांव में कैसा खेल चल रहा है. बोल रहे थे, ऐसे पार्टी नहीं चलेगी.’
‘दिखा देना यार, चल रही है, बढ़िया चल रही है’. अध्यक्ष जी ने भरे हाल पर विहंगम नज़र डालकर कहा. बातें चल पड़ीं कि ये उपाध्यक्ष महोदय भीतर-भीतर पार्टी की जड़ें काट रहे हैं. अध्यक्ष ने अपने गुर्गों को आश्वस्त किया कि पंद्रह अगस्त बिना तमाशे के निकाल लो फिर इसको ठिकाने लगाते हैं.
तभी अध्यक्ष जी बोले: ‘झंडा निकाल लाओ यार. आज ही बढ़िया से बंधवा-फंधवा दो.’
दो लोग स्टोर की तरफ़ गए और कुछ देर में ही खाली हाथ लौट आये.
‘क्या हुआ गगन जी?’
‘सर, तिरंगा नही मिल रहा.’
‘कैसी बात करते हो? तिरंगा कहां जायेगा? ठीक से देखो. पड़ा होगा कहीं कोने में.’
‘सब तरफ़ देख लिया. नहीं मिला.’
‘ये स्साला चौरसिया तो उठाकर नहीं ले गया?’
‘क्या करेगा ले जाकर?’
एक ने संदेह व्यक्त किया: ‘हरामी है. परेशानी में डालने के लिए ले जा सकता है.’
अध्यक्ष जी ने कहा कि ठीक से देखा न होगा, मिल जायेगा.
‘झंडा कहां गायब हो जायेगा?’ अध्यक्ष जी बोले.
‘सर केसरिया झंडे तो तीन-तीन पड़े हैं. एकदम सामने. कहें तो उठा लायें?’
‘भैय्या, पंद्रह अगस्त है. बाकी दिन उनके हरे की टक्कर में खूब केसरिया लहराओ, पर आज तो तिरंगा ही लगेगा. मजबूरी है. आज कोई और रंग नहीं चलता.’
अध्यक्ष जी अब खुद उठे. उनके साथ सब उठ गए. सभी हॉल से जुड़े स्टोर में गए. सब तरफ़ सामान बिखरा पड़ा है. अल्लम गल्लम.
कार्यालय प्रभारी चौरसिया गुट के हैं. वे भी गायब हैं.
‘ज़रा-सा स्टोर तो संभालते बनता नहीं, तिरंगा फहरायेंगे, हद है!’
अध्यक्ष जी बड़बड़ाते हुए सामान उलटने-पुलटने लगे.
‘दबा होगा कहीं, इस अटाले में.’ वे बोले.
और तिरंगा मिल गया.
सभी ने राहत की सांस ली.
तिरंगा चुनावी पोस्टरों के ढेर के नीचे दबा मिला.
।।कथा छह।।
कल पंद्रह अगस्त है.
तिरंगे में फूल लपेटकर रात में ही एहतियातपूर्वक खंभे पर लटका दिया है. बड़े बाबू ने डोरी दो बार खींच कर टेस्ट कर ली. हर बार झंडा फटाक से खुला और ठाठ से लहराने लगा. बड़े बाबू मुस्कुराये, संतुष्ट हुए कि कल का कार्यक्रम बढ़िया रहेगा. उन्होंने फाइनली गुलाब की पंखुड़ियों को तिरंगे में बांधा, डोरी फिर से चेक की, तभी घर गए. वे सुबह छह बजे मैदान पर आ भी गए.
आठ बजे कलक्टर साहब और स्थानीय विधायक मिलकर झंडे की डोर खींचेंगे.
पंद्रह अगस्त का झंडा दोनों साथ फहरायेंगे.
इधर तिरंगे को यह पता चला तो फहराने का उत्साह ही नहीं बचा. वैसे तो वह सालों से परेशान हैं कि हर पंद्रह अगस्त को भ्रष्ट अफसर या नेता ही उसे फहराता है. फिर वह झंडे के नीचे खड़े होकर देशभक्ति के नाम पर लफ़्फ़ाज़ी करता है जिसे सुन-सुन कर तिरंगा तड़प जाता है. वो लहराता लगता है, पर वास्तव में यह सब देख तड़पता है. जिनसे उसे घिन आती है, वे ही उसे लहराकर निकल जाते हैं.
उसने इस बार तय किया है, ये नहीं होगा.
देखते हैं बेट्टा, तुम मुझे कैसे लहरा पाते हो!
तिरंगे ने गुलाब की पंखुड़ियों से भी गुपचुप गुफ़्तगू की है. वे सहमत हैं. वे गिरीं भी, तो इन लोगों के सर पर नहीं सीधे मिट्टी में गिरेंगी. देश की माटी में. तिरंगे ने डोर को कहा है, तू ज़ोर से लिपटे रहना कि कोई मुझे खोल न सके.
तो झंडा बंधन शुरू हुआ.
अफ़सर और नेता ने मिलकर डोर खींची.
झंडा नहीं खुला.
वे बार-बार खींचते गए.
तिरंगा नही खुला.
बड़े बाबू घबराकर भागते हुये स्टेज पर चढ़े. हाय, यह कैसा अनर्थ! कलक्टर ने बड़े बाबू को रोषपूर्वक देखा. सर थोड़ा जोर से, बाबू ने इशारा किया. खुलेगा. हमने खुद दो बार टेस्ट किया है. जोर से खींचें. पास आकर वे कलक्टर को इशारे से समझाने लगे.
डोर और ज़ोर से खींची गई.
तिरंगा तो नहीं खुला, डोरी के साथ तिरंगे का बंधा बंडल विधायक जी के सिर पर गिरा.
भीड़ हंसने लगी.
तिरंगे का मन भी हुआ कि वह हंसे.
पर वह हंसा नहीं.
जानता है, अब बड़ा बाबू सस्पेंड होगा.
(लेखक प्रख्यात व्यंग्यकार हैं.)
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