कई दशक पहले हर्ष मंदर ने मध्य भारत के ग्रामीण तथा आदिवासी इलाक़ों में कई बरस प्रशासनिक अधिकारी बतौर काम किया था. इस संस्मरण में वे उन बरसों को याद करते हैं जब उन्होंने तमाम किस्म के आर्थिक स्वास्थ्य संकटों से जूझ रहे लोगों को क़रीब से देखा था, और दयालुता व करुणा के मूल्य को पहचाना था.
डीवाई चंद्रचूड़ का तर्क कि सैकड़ों वर्ष पहले बाबरी मस्जिद का निर्माण 'अपवित्र कृत्य' था, आरएसएस और भाजपा के हिंदुत्व के प्रति उनकी अडिग निष्ठा को दर्शाता है.
उस पत्नी के बारे में सोचिए जो अपने पति के लौटने का 19 साल तक इंतज़ार करती है. उस बेटी के बारे में सोचिए जो अपने पिता के जेल जाने के बाद पैदा हुई. उसने कभी अपने पिता का चेहरा नहीं देखा. वह पढ़ाई करके डॉक्टर या इंजीनियर बन सकती थी. लेकिन उसके पिता के जेल में होने के कारण, यह संभव नहीं था.
एक वक्त देश में कई आतंकी हमले हुए थे. हर हमले के बाद कुछ अपवादों को छोड़कर, मुस्लिम पुरुषों पर जघन्य आरोप लगाये गये और उन्हें सालों तक जेल में रखा गया. उनके परिवार ग़रीबी और अपमान में जीते रहे. और फिर ये मामले निराधार साबित होने लगे. अदालतों ने आरोपियों को निर्दोष घोषित कर दिया. लेकिन उनका खोया जीवन कौन लौटाएगा?
मोदी युग का हिंदुत्व सिनेमा एक नया अवतार है. नाज़ी युग के सिनेमा की तरह, हिंदुत्व फ़िल्में न केवल अपनी कट्टरता को पूरी तरह से उजागर करती हैं, बल्कि उसका भौंडा प्रदर्शन भी करती हैं.
डॉक्टर और दवाई की कंपनियों के गठजोड़ के कारण मरीज़ों को चिकित्सा सेवा के लिए बहुत अधिक ख़र्च वहन करना पड़ता है. मरीज़ दवा के लिए भुगतान करता है, लेकिन दवा के चुनाव पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता है.
जब मरीज़ों की भलाई से अधिक लाभ को प्राथमिकता दी जाती है, तब स्वास्थ्य सेवा का क्षेत्र किसी भी तरह से धन पाने का व्यवसाय बन जाता है. इसी कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र का अपेक्षाकृत नेक व सेवा-उन्मुख पेशा पहले बाज़ार-आधारित वस्तु में बदला, और फिर कॉरपोरेट आधारित मुनाफ़ाख़ोरी उद्योग में बदल गया .
भले ही मुसलमानों को उनकी जनसंख्या के बराबर अनुपात में संसद और राज्य विधानसभाओं में जगह मिल जाए, लेकिन यह अपने आप में उनके हितों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व की गारंटी नहीं देता है.
भारत के मुसलमानों को राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल दिया जाना कोई आकस्मिक घटना नहीं है, हालांकि 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के सत्ता में आने के बाद इसकी गति बहुत तेज़ हो गई है. आरएसएस और भाजपा की हिंदू बहुसंख्यक राजनीति ने भारत के मुसलमानों को देश की शासन व्यवस्था में भागीदारी से बाहर करने के उनके लक्ष्य के सबसे अधिक क़रीब पहुंचा दिया है.
लिंचिंग के दौरान युवक डरे हुए निहत्थे लोगों पर हिंसक हमला करते हैं. यह देश का नेतृत्व करने वालों द्वारा फैलाई गई नफ़रत से प्रेरित उनकी क्रूरता की कहानी है. सनकी लोगों द्वारा जबरन वसूली की कहानी है. पुलिस के मिलीभगत की कहानी है. चुपचाप खड़े तमाशबीन की कहानी है.
अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अली ख़ान महमूदाबाद सशर्त जमानत पर बाहर हैं. सत्ता द्वारा उनको निशाना बनाया जाना और शांति की मांग करने वाली उनकी फेसबुक पोस्ट में तथाकथित 'डॉग-व्हिसलिंग' की जांच करना परेशान करने वाले कई सवाल खड़े करता है.
स्वामी विवेकानंद आज अपने देश के बारे में क्या सोचते, जो अन्य धर्मों तथा देशों के प्रताड़ित शरणार्थियों को दमनकारी कारागृहों में डाल देता है, उन्हें गोलियों के बीच धकेल देता है, और कभी उन्हें नरसंहार का शिकार बनने के लिए समुद्र में फेंक देता है.
पहलगाम आतंकी हमले के बाद कश्मीरी लोगों की मानवता और उनके पश्चाताप के बावजूद, कई राज्य की सरकारों और दक्षिणपंथी ताकतों ने देश भर में कश्मीरियों और मुसलमानों को सामूहिक रूप से प्रताड़ित किया. इस हमले के बाद देश ने जो त्रासद मंजर देखा, उसे उकेरता हर्ष मंदर का यह मार्मिक लेख.
हिंदुत्व की विचारधारा से प्रभावित होकर कई भारतीयों ने न केवल ग़ाज़ा में इज़रायल के युद्ध का समर्थन किया है, बल्कि तबाह हो चुके फ़िलिस्तीनी लोगों के ख़िलाफ़ नफरत फैलायी है और फर्ज़ी प्रचार भी किया है.
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के पांच साल बाद सामाजिक विभाजन कम नहीं हुआ है, न ही हिंसा के शिकार हुए पीड़ितों को उचित मुआवज़ा मिला. न्याय तो आज भी दूर की कौड़ी है.