भारत के मुसलमानों को राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल दिया जाना कोई आकस्मिक घटना नहीं है, हालांकि 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के सत्ता में आने के बाद इसकी गति बहुत तेज़ हो गई है. आरएसएस और भाजपा की हिंदू बहुसंख्यक राजनीति ने भारत के मुसलमानों को देश की शासन व्यवस्था में भागीदारी से बाहर करने के उनके लक्ष्य के सबसे अधिक क़रीब पहुंचा दिया है.
लिंचिंग के दौरान युवक डरे हुए निहत्थे लोगों पर हिंसक हमला करते हैं. यह देश का नेतृत्व करने वालों द्वारा फैलाई गई नफ़रत से प्रेरित उनकी क्रूरता की कहानी है. सनकी लोगों द्वारा जबरन वसूली की कहानी है. पुलिस के मिलीभगत की कहानी है. चुपचाप खड़े तमाशबीन की कहानी है.
अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अली ख़ान महमूदाबाद सशर्त जमानत पर बाहर हैं. सत्ता द्वारा उनको निशाना बनाया जाना और शांति की मांग करने वाली उनकी फेसबुक पोस्ट में तथाकथित 'डॉग-व्हिसलिंग' की जांच करना परेशान करने वाले कई सवाल खड़े करता है.
स्वामी विवेकानंद आज अपने देश के बारे में क्या सोचते, जो अन्य धर्मों तथा देशों के प्रताड़ित शरणार्थियों को दमनकारी कारागृहों में डाल देता है, उन्हें गोलियों के बीच धकेल देता है, और कभी उन्हें नरसंहार का शिकार बनने के लिए समुद्र में फेंक देता है.
पहलगाम आतंकी हमले के बाद कश्मीरी लोगों की मानवता और उनके पश्चाताप के बावजूद, कई राज्य की सरकारों और दक्षिणपंथी ताकतों ने देश भर में कश्मीरियों और मुसलमानों को सामूहिक रूप से प्रताड़ित किया. इस हमले के बाद देश ने जो त्रासद मंजर देखा, उसे उकेरता हर्ष मंदर का यह मार्मिक लेख.
हिंदुत्व की विचारधारा से प्रभावित होकर कई भारतीयों ने न केवल ग़ाज़ा में इज़रायल के युद्ध का समर्थन किया है, बल्कि तबाह हो चुके फ़िलिस्तीनी लोगों के ख़िलाफ़ नफरत फैलायी है और फर्ज़ी प्रचार भी किया है.
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के पांच साल बाद सामाजिक विभाजन कम नहीं हुआ है, न ही हिंसा के शिकार हुए पीड़ितों को उचित मुआवज़ा मिला. न्याय तो आज भी दूर की कौड़ी है.
30 जनवरी 2025 को शहीद दिवस के दिन मानवाधिकारों, इंसानियत और एकता के लिए खड़े होने वाले ढेरों लोग अजमेर में सद्भावना यात्रा के लिए जुटे थे. अलग-अलग सदी की तीन कहानियों से जुड़े ये लोग शांति और करुणा के लिए दरगाह शरीफ़ तक पहुंचे.
जस्टिस बीआर गवई ने हाल ही एक सुनवाई के दौरान दिल्ली में बेघर लोगों के लिए 'परजीवी' शब्द का इस्तेमाल किया था. हर्ष मंदर ने उन्हें लिखा है कि सच्चा न्याय हमेशा करुणा के साथ संबद्ध होता है और बेघर लोगों को गरिमामयी जीवन का अधिकार है.
भारतीय संविधान ने हर धर्म, जाति और पहचान के लोगों के लिए समान अधिकार वाला देश बनाने का संकल्प लिया था. लेकिन जिस तरह बहुसंख्यक हिंदू और ऊंची जातियां दलितों और मुसलमानों को हमारे पड़ोस, स्कूलों और हमारे जीवन से बाहर निकाल रही हैं, ये समुदाय डाल से टूटकर दूर जा गिरे हैं.
2024 भारतीय सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक वर्ष था. विवेक पर आधारित फ़िल्मों से इतर इस साल ऐसी कई फ़िल्में देखने को मिलीं, जो करुणा से ओत-प्रोत थीं. ग़रीबी, पराजय और अकेलेपन पर कई उल्लेखनीय फ़िल्में बनीं, जिनमें से ज़्यादातर का अंत आशा और प्रेम के संदेश को साथ हुआ.
आज, ऐसा क्यों है कि मुसलमान प्रार्थना यानी नमाज़ का एक साधारण क्रियाकलाप कई लोगों को शिकायत और हिंसा के लिए उकसाता है और पुलिस को उनकी आपराधिक जवाबदेही तय करने के लिए प्रेरित करता है?
जब तीन दशक पहले यह उपासना स्थल विधेयक संसद में पेश किया गया था, भाजपा ने इसे 'सबसे काला' विधेयक बताया था. उनका दावा था कि यह 'मुगल और ब्रिटिश शासन के दौरान हिंदू मंदिरों पर किए गए सभी अतिक्रमणों को वैध बनाने' का प्रयास करता है. जबकि ग़ैर-भाजपा सांसदों ने इसका समर्थन करते हुए इसे धर्मनिरपेक्षता और सौहार्द्र की रक्षा के लिए अनिवार्य कदम बताया था.
जब तक भारतीय अदालतों को उपासना स्थल अधिनियम, 1991 की भावना का उल्लंघन करने की अनुमति दी जाती रहेगी, तब तक इतिहास के घावों को कुरेदा जाता रहेगा, सद्भाव बिगड़ता रहेगा और खून-खराबा होता रहेगा. हर्ष मंदर के निबंध की पहली क़िस्त.
नूंह के मेव मुसलमान सदियों से क्षेत्र के हिंदुओं के साथ घनिष्ठ संबंध और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन साझा करते आए हैं, लेकिन 2017 के बाद से शुरू हुईं लिंचिंग की घटनाओं और नफ़रत के चलते होने वाली हिंसा ने इस रिश्ते में दरार डाल दी है.