जब शांति की चाह अपराध बन जाए: अली ख़ान महमूदाबाद की गिरफ़्तारी

अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अली ख़ान महमूदाबाद सशर्त जमानत पर बाहर हैं. सत्ता द्वारा उनको निशाना बनाया जाना और शांति की मांग करने वाली उनकी फेसबुक पोस्ट में तथाकथित 'डॉग-व्हिसलिंग' की जांच करना परेशान करने वाले कई सवाल खड़े करता है.

रोहिंग्या शरणार्थियों को समुद्र में फेंकना क्रूर सरकारी नीति की निशानी

स्वामी विवेकानंद आज अपने देश के बारे में क्या सोचते, जो अन्य धर्मों तथा देशों के प्रताड़ित शरणार्थियों को दमनकारी कारागृहों में डाल देता है, उन्हें गोलियों के बीच धकेल देता है, और कभी उन्हें नरसंहार का शिकार बनने के लिए समुद्र में फेंक देता है. 

मुसलमान पिसते रहे, राष्ट्र ने मुंह मोड़ लिया पहलगाम हमले के बाद

पहलगाम आतंकी हमले के बाद कश्मीरी लोगों की मानवता और उनके पश्चाताप के बावजूद, कई राज्य की सरकारों और दक्षिणपंथी ताकतों ने देश भर में कश्मीरियों और मुसलमानों को सामूहिक रूप से प्रताड़ित किया. इस हमले के बाद देश ने जो त्रासद मंजर देखा, उसे उकेरता हर्ष मंदर का यह मार्मिक लेख.

ग़ाज़ा में तबाही और भारत की शर्मनाक चुप्पी

हिंदुत्व की विचारधारा से प्रभावित होकर कई भारतीयों ने न केवल ग़ाज़ा में इज़रायल के युद्ध का समर्थन किया है, बल्कि तबाह हो चुके फ़िलिस्तीनी लोगों के ख़िलाफ़ नफरत फैलायी है और फर्ज़ी प्रचार भी किया है. 

2020 के दिल्ली सांप्रदायिक नरसंहार के पीड़ितों के साथ विश्वासघात

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के पांच साल बाद सामाजिक विभाजन कम नहीं हुआ है, न ही हिंसा के शिकार हुए पीड़ितों को उचित मुआवज़ा मिला. न्याय तो आज भी दूर की कौड़ी है.

गांधीजी के शहादत दिवस पर हम क्यों हुए अजमेर दरगाह पर एकत्रित

30 जनवरी 2025 को शहीद दिवस के दिन मानवाधिकारों, इंसानियत और एकता के लिए खड़े होने वाले ढेरों लोग अजमेर में सद्भावना यात्रा के लिए जुटे थे. अलग-अलग सदी की तीन कहानियों से जुड़े ये लोग शांति और करुणा के लिए दरगाह शरीफ़ तक पहुंचे.

जस्टिस बीआर गवई को हर्ष मंदर का खत-‘बेघर लोग परजीवी नहीं, सबसे वंचित नागरिक हैं’

जस्टिस बीआर गवई ने हाल ही एक सुनवाई के दौरान दिल्ली में बेघर लोगों के लिए 'परजीवी' शब्द का इस्तेमाल किया था. हर्ष मंदर ने उन्हें लिखा है कि सच्चा न्याय हमेशा करुणा के साथ संबद्ध होता है और बेघर लोगों को गरिमामयी जीवन का अधिकार है.

भारतीय मुसलमान की त्रासदी: थोपा हुआ अकेलापन

भारतीय संविधान ने हर धर्म, जाति और पहचान के लोगों के लिए समान अधिकार वाला देश बनाने का संकल्प लिया था. लेकिन जिस तरह बहुसंख्यक हिंदू और ऊंची जातियां दलितों और मुसलमानों को हमारे पड़ोस, स्कूलों और हमारे जीवन से बाहर निकाल रही हैं, ये समुदाय डाल से टूटकर दूर जा गिरे हैं. 

साल 2024 में सिनेमा में मानवतावाद की वापसी हुई

2024 भारतीय सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक वर्ष था. विवेक पर आधारित फ़िल्मों से इतर इस साल ऐसी कई फ़िल्में देखने को मिलीं, जो करुणा से ओत-प्रोत थीं. ग़रीबी, पराजय और अकेलेपन पर कई उल्लेखनीय फ़िल्में बनीं, जिनमें से ज़्यादातर का अंत आशा और प्रेम के संदेश को साथ हुआ.

नमाज़ पर आखिर क्यों करे आपत्ति सत्ता और जनता

आज, ऐसा क्यों है कि मुसलमान प्रार्थना यानी नमाज़ का एक साधारण क्रियाकलाप कई लोगों को शिकायत और हिंसा के लिए उकसाता है और पुलिस को उनकी आपराधिक जवाबदेही तय करने के लिए प्रेरित करता है?

उपासना स्थल अधिनियम पर संसद में हुई बहस दे सकती है नई दिशा

जब तीन दशक पहले यह उपासना स्थल विधेयक संसद में पेश किया गया था, भाजपा ने इसे 'सबसे काला' विधेयक बताया था. उनका दावा था कि यह 'मुगल और ब्रिटिश शासन के दौरान हिंदू मंदिरों पर किए गए सभी अतिक्रमणों को वैध बनाने' का प्रयास करता है. जबकि ग़ैर-भाजपा सांसदों ने इसका समर्थन करते हुए इसे धर्मनिरपेक्षता और सौहार्द्र की रक्षा के लिए अनिवार्य कदम बताया था.

समाज पर गहराता संकट: हिंसक दावों और क़ानूनी फ़ैसलों के बीच फंसी मस्जिदें

जब तक भारतीय अदालतों को उपासना स्थल अधिनियम, 1991 की भावना का उल्लंघन करने की अनुमति दी जाती रहेगी, तब तक इतिहास के घावों को कुरेदा जाता रहेगा, सद्भाव बिगड़ता रहेगा और खून-खराबा होता रहेगा. हर्ष मंदर के निबंध की पहली क़िस्त.

हरियाणा: नूंह में लगाई गई आग का ज़िम्मेदार कौन है?

नूंह के मेव मुसलमान सदियों से क्षेत्र के हिंदुओं के साथ घनिष्ठ संबंध और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन साझा करते आए हैं, लेकिन 2017 के बाद से शुरू हुईं लिंचिंग की घटनाओं और नफ़रत के चलते होने वाली हिंसा ने इस रिश्ते में दरार डाल दी है.

कश्मीर में ‘लव जिहाद’ का हौवा महिलाओं को चुनने की आज़ादी से वंचित करने का प्रयास है

आज़ादी के सात दशक बाद भी जो औरतें धर्म या जाति की सीमाओं के बाहर जीवनसाथी चुनने का साहस दिखाती हैं, उन्हें परिवार और समाज के साथ पुलिस और नेताओं की प्रताड़ना का शिकार होना पड़ रहा है. वक़्त आ गया है कि महिलाओं द्वारा साथी के चयन को मूल अधिकारों की श्रेणी में शामिल किया जाए और इसकी रक्षा के लिए परिवार, समुदाय, राजनीतिक दलों और राज्य की कट्टरता के विरुद्ध खड़ा हुआ जाए.

निशुल्क इलाज देने वाले डॉ. प्रदीप बिजलवान का बिना इलाज के गुज़र जाना व्यवस्था पर सवाल है

क्या पैसे, शोहरत और सुरक्षा की परवाह किए बगैर चुपचाप समाज के सबसे वंचित तबके की मदद करने वाले डॉ. प्रदीप बिजलवान के अस्पताल और ऑक्सीजन की जद्दोजहद के बीच गुज़र जाने के कोई मायने हैं? क्या वे भी उस सरकारी रिकॉर्ड में मौत का महज़ एक आंकड़ा बनकर रह जाएंगे, जिसमें आज की तारीख़ में लगभग दो लाख मौतें दर्ज हैं?