लोहिया जयंती: जब ‘दुश्मन’ बना दिए गए लोहिया और आंबेडकर

कोई तीन दशक पहले अपनी बढ़त के दिनों में सपा और बसपा ने आपसी प्रतिस्पर्धा में डाॅ. लोहिया और बाबासाहेब को भी ‘एक दूजे का कट्टर दुश्मन’ बना डाला था और अब, बदले राजनीतिक प्रवाहों के बीच में भी वे आगे बढ़कर बहुजनों या समाजवादियों की व्यापक एकता का मार्ग प्रशस्त करने की समझदारी नहीं दिखा पा रही हैं.

सत्तापक्ष द्वारा लोकसभा में विपक्ष के नेता की बढ़ती बेकद्री कई सवाल खड़े करती है

नरेंद्र मोदी सरकार अपनी तीसरी पारी में भी विपक्ष को लेकर न सहज हो पाई है, न उससे लोकतांत्रिक ढंग से बरतना सीख पाई है. सीख पाती तो उसके उठाए सवालों का समुचित जवाब देती, न कि उन्हें उठाने का बुरा मानकर उसके नेता तक पर हमलावर हो जाती.

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: जिन्होंने महिलाओं के हक़ों के लिए जद्दोजहद शुरू की…

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का हासिल क्या है? इस सवाल का जवाब यह है कि भले ही इस बीच महिलाओं के हक़ में बहुत कुछ न हो पाया हो और इस दिवस के आयोजन भी कर्मकांड में बदलते गए हों, लेकिन इतना तो हुआ है कि महिलाओं ने अनेक ऐसे क्षेत्रों में भी, जो पहले उनके लिए सर्वथा निषिद्ध थे, अपनी उपलब्धियों से अपने द्वेषियों को क़रारा जवाब दिया है.

होली: बुराई आज न ऐसे रहे न वैसे रहे…

सुनने में बात बहुत अच्छी लगती है कि होली है तो जो हो गया बिराना उसको फिर अपना कर लो, लेकिन क्या ऐसा करना तब तक संभव है जब तक उन कारणों की पड़ताल न की जाए, जिनके चलते वह बिराना हुआ या कि रह गया.

बलात्कार के मामलों में अदालतें स्त्रियों को इंसाफ़ से अधिक पीड़ा दे रही हैं

बलात्कार जैसे क्रूरतम अपराध का शिकार बनाई गई महिलाओं के लिए इंसाफ़ की राह इसलिए भी छोटी होने को नहीं आ रही कि अदालती फैसलों में उनके प्रति जो संवेदनहीनता कभी-कभी दिखती है, वह हमारे सामंती मूल्यों वाले पितृसत्तात्मक समाज में सदाबहार बनी हुई है.

कभी विपक्ष को कुछ न समझने वाली मोदी सरकार अब उससे कैसे पार पाएगी

बजट सत्र में विपक्ष के लगातार सवालों के बाद मोदी सरकार अपनी भरपूर तल्ख़ी के बावजूद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर ठीक से आक्रामक तक नहीं हो पा रही: विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाने का मंसूबा बांधा, जो टूट गया, क्योंकि सरकार को अचानक याद आया कि अभी तो उन्होंने लोकसभा की विशेषाधिकार हनन समिति ही नहीं बनाई, प्रस्ताव लाए तो भला उसे भेजेंगे कहां?

सांप्रदायिक विद्वेष झेलते, थक रहे देश के लिए दीपक का दख़ल ख़ुशख़बरी की तरह है

देश की संवैधानिक संस्थाएं नफ़रत से लड़ नहीं रहीं, वे महज़ दिखावे की कार्रवाई करती हैं या अक्सर नफ़रती भीड़ के साथ खड़ी रह जाती है. नफ़रत से लैस भीड़ के आगे समाज जिस तरह चुप्पी साध रहा है, उससे यही संकेत जाता है कि समाज भी उस हिंसा में शामिल है. दीपक ने इस चुप्पी को तोड़ दिया है.

नवाब आसफुद्दौला के रोज़गार मॉडल से ‘न्यू इंडिया’ में कोई सीख ली जा सकती है?

1784 में भीषण अकाल के वक़्त अवध सूबे के नवाब आसफुद्दौला की हुकूमत ने लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराने के लिए जो क़दम उठाए, उनके तहत मनरेगा की ही तर्ज पर उनसे काम लेकर मेहनताना कहें या मजदूरी दी जाती थी. इसने उस दुस्सह अकाल के दौरान जहां बड़ी संख्या में लोगों को भूखे मरने से बचाया, वहीं उनके आत्मसम्मान सम्मान की भी रक्षा की.

30 जनवरी: महात्मा का शहादत दिवस सत्य और अहिंसा के लिए कहीं ज़्यादा चिंतित होने का वक़्त है

जिन सत्य व अहिंसा के बल से महात्मा ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम की अगुवाई की, उसे लड़ा व जीता और जिसकी पृष्ठभूमि में देश का संविधान बना और लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना हुई, आज की सत्ताओं द्वारा उनको उनकी धुरी पर सर्वथा विपरीत दिशा में घुमाकर लोकतंत्र व संविधान से दुश्मनी साधी जा रही है.

भूले-बिसरे: संविधान के बुनियादी ढांचे से छेड़छाड़ के अंदेशों पर अंकुश याद रखा जाना चाहिए

वर्तमान में हम भारतीय बेहद यक़ीन के साथ कहते हैं कि देश में कोई सरकार आए, वह संविधान के मूल यानी बुनियादी ढांचे से छेड़छाड़ नहीं कर सकती. क्योंकि यह ढांचा 'संविधान की आत्मा' है. हालांकि याद रखने योग्य बात यह है कि 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए ऐतिहासिक फैसले से पहले यह विश्वास हमारे पास नहीं था.

नेहरू को कोसने वाले नहीं जानते कि सोमनाथ में राजेंद्र प्रसाद के भाषण में नेहरू की नीतियों की ही ताईद थी

बीते दिनों 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद की प्रशंसा करते हुए पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को कभी सोमनाथ न जाने को लेकर कोसा. हालांकि, 1951 में पुनर्निमित सोमनाथ मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में डॉ. प्रसाद ने नेहरू से अपनी सारी 'असहमतियों' को धता बताते हुए कहा था कि आस्था और दृढ़ विश्वास ने भारत को धर्मनिरपेक्षता की नीति अपनाने के लिए प्रेरित किया है कि धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया

… जब बिड़हर के किसानों की बगावत ज़मींदारों को घुटनों के बल ले आई थी

ग्यारह जनवरी,1921 वो दिन था जब अवध के किसानों ने तत्कालीन फ़ैज़ाबाद (अब आंबेडकरनगर) ज़िले के नितांत पिछड़े बिड़हर क्षेत्र में ब्रिटिश राज और उसके चहेते ज़मींदारों के ख़िलाफ़ खुला विद्रोह कर दिया था. हालांकि इस विद्रोह का दूसरा पहलू यह रहा कि महात्मा गांधी इसमें हुई हिंसा, लूटपाट व आगजनी से बहुत नाराज़ हुए.

आदिवासी समाज को कट्टर बनाकर उसमें धर्म की लड़ाई पैदा करने की कोशिश की जा रही है: जसिंता केरकेट्टा

कवि, लेखक, पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता जसिंता केरकेट्टा को उनके सृजन के अतिरिक्त देश के आदिवासियों की स्थिति पर अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संवादों-परिसंवादों के लिए भी जाना जाता है. वे मानती हैं कि आदिवासियों की निगाह से देश अपनी परवाह करते हुए अपने आसपास और देश-दुनिया और प्रकृति की परवाह करने का नाम है और इसमें संकीर्णताओं की कोई जगह नहीं है. उनसे बातचीत.

किसी पुरस्कार या सम्मान का मान ऊंचा रखना हमेशा देने वाले के हाथ में होता है, पाने वाले के नहीं: कथाकार शिवमूर्ति

लब्धप्रतिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति को पिछले दिनों अवध का प्रतिष्ठित 'माटी रतन' सम्मान दिया गया. उन्हें आम तौर पर दलितों-वंचितों, स्त्रियों और गांवों के ऐसे कथाकार के रूप में जाना जाता है, जो अपनी रचनाओं में क़िस्सागोई की शैली में मानव जीवन की साधारणता के असाधारण आख्यान रचता है. पेश है उनसे लंबी बातचीत के मुख्य अंश.

जिस एसआईआर के बचाव में खड़ी है भाजपा, उसी पर सवाल क्यों उठा रहे हैं सीएम आदित्यनाथ

योगी आदित्यनाथ एसआईआर में गड़बड़ियों को लेकर बोलने वाले देश के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री बनने को कुछ लोगों ने इसे पहले से अन्य सीएम द्वारा एसआईआर संबंधी गड़बड़ियों की शिकायतों की पुष्टि के रूप में देखा है. हालांकि कई हलकों में यह सवाल पूछा जाने लगा कि क्या यूपी में एसआईआर में 'खेल' करने के अरमानों के विपरीत उलटे भाजपा को ही बड़े नुकसान का अंदेशा सताने लगा है?